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Sunday, July 2, 2017

मन जड़-पदार्थ है



एक पुरानी कहानी है। एक अपढ़ ग्रामीण, सम्राट के दर्शन के लिए, अपने घोड़े पर सवार हो राजधानी की तरफ चला। संयोग की बात, सम्राट भी उसी मार्ग से, शिकार करने के बाद राजधानी की तरफ वापिस लौटता था। उसके संगी-साथी कहीं पीछे जंगल में भटक गये थे। वह अपने घोड़े पर अकेला था। इस ग्रामीण का उस सम्राट से मिलना हो गया।

सम्राट ने पूछा, क्यों भाई चौधरी! राजधानी किसलिए जा रहे हो? तो उस ग्रामीण ने कहा कि सम्राट के दर्शन करने; बड़े दिन की लालसा है, आज सुविधा मिल गई। सम्राट ने कहा, तुम बड़े सौभाग्यशाली हो। सम्राट के दर्शन ऐसे तो आसान नहीं, लेकिन तुम्हें आज सहज ही हो जायेंगे। ग्रामीण ने कहा, जब बात ही उठ गई, तो एक बात और बता दें। दर्शन तो सहज हो जायेंगे, लेकिन मैं पहचानूंगा कैसे कि सम्राट यही है? यही मन में एक चिंता बनी है। सम्राट ने कहा, घबड़ाओ मत; जब हम राजधानी में पहुंचें और तुम देखो, किसी घोड़े पर सवार आदमी को, जिसे सभी लोग झुक-झुक कर नमस्कार कर रहे हैं, तो समझना कि यही सम्राट है।

फिर वे बहुत तरह की बातें, गपशप करते राजधानी पहुंच गये, द्वार के भीतर प्रविष्ट हुए; लोग झुक-झुक कर नमस्कार करने लगे। ग्रामीण बहुत चौंका। थोड़ी देर बाद उसने कहा कि भाई साहब, बड़ी दुविधा हो गई, या तो सम्राट आप हैं या मैं हूं।

उसकी दुविधा, मन की ही दुविधा है। मन इतने निकट है चेतना के कि भ्रांति हो जाती है कि या तो सम्राट आप हैं या मैं हूं। जब भी कोई झुक कर नमस्कार करता है तो मन समझता है, मुझे की जा रही है; इसी भ्रांति से अहंकार निर्मित होता है। जब भी कोई प्रेम करता है, मन समझता है मुझे किया जा रहा है। मन सिर्फ निकट है जीवन के। बहुत निकट है। इतना निकट है कि जीवन उसमें प्रतिबिंबित होता है और जीवित मालूम होता है मन।

मन पदार्थ का हिस्सा है। मन चेतना का हिस्सा नहीं है। मन शरीर का ही सूक्ष्मतम अंग है। मन शरीर का ही विकास है। लेकिन चेतना के बिलकुल निकट है। और इतना सूक्ष्म है मन, और चेतना के इतने निकट है कि यह भ्रांति बड़ी स्वाभाविक है हो जाना मन को, कि मैं ही सब कुछ हूं।

यह भ्रांति संसार में तो चलती ही है, साधना में भी पीछा नहीं छोड़ती। संसारी व्यक्ति तो मन को भरने में लगा रहता है, कभी भर नहीं पाता। क्योंकि भर पायेगा ही नहीं; वह मन का स्वभाव नहीं है। चेतना भर सकती है। भरी ही हुई है, वह उसका स्वभाव है। चेतना खिल सकती है, फूल बन सकती है। बनी ही हुई है, वह उसका स्वभाव है। मन तो जड़-पदार्थ है। यंत्रवत है। न खिल सकता, न भर सकता। लेकिन मन भरने की कोशिश में लगा है। जन्मों-जन्मों तक चेष्टा करने के बाद भी मन भरता नहीं; फिर भी आशा नहीं मरती।

दिया तले अँधेरा 

ओशो

धर्म की शुरुआत



जीवन में उत्तरदायित्व की समस्या बड़ी से बड़ी समस्या है। और अगर ठीक समाधान न खोजा जाए तो जीवन की पूरी यात्रा ही भ्रांत और भटक सकती है। साधारणतः सदा ही दूसरे को दोषी ठहराने का मन होता है, क्योंकि यही अहंकार के लिए तृप्तिदायी है। मैं, और कैसे गलत हो सकता हूं? मैं कभी गलत होता ही नहीं। मैं तो खड़ा ही इस भित्ति पर है कि गलती मुझसे नहीं हो सकती। 

जैसे ही यह समझ आनी शुरू हुई कि गलती मुझसे भी हो सकती है, मैं का भवन गिरने लगता है। और जिस दिन यह दिखाई पड़ता है कि मैं ही सारी भूलों के लिए उत्तरदायी हूं, उस दिन अहंकार ऐसे ही तिरोहित हो जाता है जैसे सुबह के सूरज उगने पर ओस-कण। अहंकार कहीं पाया ही नहीं जाता, अगर यह समझ में आ जाए कि उत्तरदायी मैं हूं। जिसने यह जान लिया कि दायित्व मेरा है उसका अहंकार मर जाता है। और जिसने यह कोशिश की कि हर हालत में दूसरा जिम्मेवार है उसका अहंकार और भी सुरक्षित होता चला जाता है। 

अहंकार को समझने की पहली बात: क्यों हम दूसरे पर दायित्व को थोपते हैं? जब भी भूल होती है तो दूसरे से ही क्यों होती है? और यही दशा दूसरे की भी है; वह भी दोष दूसरे पर थोप रहा है। तब संघर्ष पैदा होता है, कलह पैदा होती है। फिर समझौता भी कर लिया जाए तो भी कलह का धुआं तो शेष ही रह जाता है। क्योंकि समझौता तब तक सत्य नहीं हो सकता जब तक कि बुनियादी रूप से मैं यह न जान लूं कि जिम्मेवार मैं हूं। तब तक सब समझौता कामचलाऊ है, ऊपर-ऊपर है। तब ऐसा ही है कि आग को हमने राख में दबा दिया; अंगारे मौजूद हैं, और कभी भी फिर विस्फोट हो जाएगा। अवसर की तलाश रहेगी; समझौता टूटेगा; संघर्ष फिर ऊपर आ जाएगा। क्योंकि समझौते में हमने यह तो स्वीकार किया ही नहीं गहरे में कि भूल हमारी है। अगर हमने यह जान लिया कि भूल हमारी है तब तो समझौते का कोई सवाल नहीं। तब तो हम झुक जाते हैं; तब तो हम समग्र रूप से स्वीकार कर लेते हैं। तब तो किसी को क्षमा भी नहीं करना है। तब तो भूल अपनी ही थी। 

कहते हैं नेपोलियन जब हार गया, और जब पराजित नेपोलियन को सेंट हेलेना के द्वीप में ले जाया गया, तो उसके किसी मित्र ने उसे कहा कि अब तुम व्यर्थ चिंता का बोझ मत ढोओ; जो हुआ, हुआ; अब तुम माफ कर दो दुश्मनों को और जीवन के इन आखिरी क्षणों में शांति से जी लो। नेपोलियन के शब्द बड़े महत्वपूर्ण हैं। नेपोलियन ने कहा, आई कैन फॉरगिव देम, बट आई कैन नाट फॉरगेट; मैं उन्हें क्षमा तो कर सकता हूं, लेकिन भूल नहीं सकता।

और अगर भूल नहीं सकते तो यह क्षमा कैसी? यह क्षमा मजबूरी की क्षमा है। यह क्षमा असहाय की क्षमा है। अब कुछ और किया नहीं जा सकता, इसलिए नेपोलियन क्षमा कर रहा है। लेकिन भीतर आग सुलग रही है। भीतर अभी भी वह क्रुद्ध है। और कभी अवसर आ जाए, सुविधा मिल जाए, तो फिर लड़ने को तत्पर हो सकता है।

यदि तुमने दूसरे पर दोष मढ़ने को जीवन की शैली बना लिया हो तो तुम कभी धार्मिक न हो पाओगे--एक बात निश्चित! तुम संसार में कितने ही सफल हो जाओ, तुम कितना ही धन कमा लो, कितनी ही यश-प्रतिष्ठा, लेकिन तुम वस्तुतः असफल ही रह जाओगे। क्योंकि तुम्हारे भीतर कोई क्रांति घटित न हो सकेगी। और एक ही क्रांति है, वह भीतर की क्रांति है। बाहर तुम कितना पा लेते हो उसका बहुत मूल्य नहीं है; क्योंकि भीतर तो तुम बढ़ते ही नहीं, भीतर तो तुम बचकाने रह जाते हो। बाहर की साधन-सामग्री बढ़ जाती है, भीतर का मालिक कली की तरह बंद रह जाता है। और जब तक कली न खिले तब तक जीवन में कोई सुवास न होगी। स्वर्ग तो बहुत दूर, सुवास भी नहीं हो सकती। और भीतर की कली तब तक न खिलेगी जब तक तुम्हारी दृष्टि में यह रूपांतरण न आ जाए कि भूल मेरी है। 

धर्म की शुरुआत होती है इस बोध से कि भूल मेरी है। ऐसा ही नहीं कि कभी-कभी भूल मेरी होती है। अगर कभी-कभी का तुमने हिसाब रखा तो कौन निर्णय करेगा? अगर तुमने सोचा कि कभी मेरी भूल होती है, कभी और की भूल होती है, तब तुम आधे-आधे ही रहोगे। यह सवाल नहीं है कि भूल किसकी होती है, भूल तो दूसरे की भी होती है। लेकिन धार्मिक दृष्टि का यह आधार है कि जब भी कहीं कुछ गड़बड़ हो रही है तो भूल मेरी है, पूर्णतः भूल मेरी है, समग्रतः भूल मेरी है। ऐसे बोध के आते ही अहंकार गिर जाता है और तुम्हारे भीतर एक क्रांति शुरू हो जाती है, तुम बदलना शुरू हो जाते हो। 

ताओ उपनिषद 

ओशो

तुसी सानूं परमात्मा दे दरसन करा देओ, तुहाडी बड़ी मेहरबानी होएगी!



संत महाराज! तुम्हें भी पहरे पर बैठे-बैठे न मालूम क्या-क्या सूझता है! वहां दरवाजे पर पहरा देते-देते एक से एक ऊंचे खयाल तुम्हें उठते हैं। पहले भैया, परमात्मा को भी तो पूछने दो कि उसे तुम्हारे दर्शन करने हैं कि नहीं! आपने चाहा, सो बड़ी कृपा! मगर यह मामला दोत्तरफा है। कोई तुम्हीं थोड़े ही उसके दर्शन करोगे, उसको भी तो तुम्हारे दर्शन करने पड़ेंगे। तो पहले मुझे उससे पूछने दो कि संत महाराज के दर्शन करने हैं? जहां तक मैं समझता हूं, अभी वह राजी नहीं है। तो तुम थोड़ा ठहरो।
 
ऐसे खाली बैठे-बैठे ऊंचे खयाल उठते हैं।

ट्रेन लेट थी और हर घंटे के बाद लेट होने की अवधि बढ़ती ही जा रही थी। एक घंटा, दो घंटे से बढ़ते-बढ़ते ट्रेन पूरे छह घंटे बाद भी नदारद। आखिर मुल्ला नसरुद्दीन झुंझला उठा और स्टेशन मास्टर के पास जा पहुंचा और उससे बोला: सुनिए भाई साहब, यहां आस-पास कोई कब्रिस्तान है या नहीं?

स्टेशन मास्टर ने जवाब दिया: नहीं तो, क्यों क्या बात है?

मुल्ला बोला: अजी जनाब, मैं यह सोच रहा था कि ट्रेन का इंतजार करते-करते जो लोग मर जाते होंगे, उन्हें कहां दफनाया जाता होगा?

अब तुम भी बैठे...दरवाजे पर बैठे, सो ऊंचे-ऊंचे खयाल आते हैं कि तुसी सानूं परमात्मा दे दरसन करा देओ! परमात्मा ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा भैया? तुम अपने घर चंगे, वह अपने घर चंगा--और कठौती में गंगा! न वह तुम्हारे पीछे पड़ा, न तुम उसके पीछे पड़ो। उसको खुद ही झंझट लेनी होगी तो वह खुद ही तुम्हारे पीछे पड़ेगा। तुम तो शांति से बैठे रहो। ऐसी दार्शनिक बातों में न पड़ा करो। पंजाबी होकर ये बातें शोभा देतीं भी नहीं।

शुरू-शुरू संत महाराज जब आए थे, जब वे ध्यान करते थे, तो उनका ध्यान देखने लायक था। जहां वे ध्यान करते थे, वहां जगह खाली करवा देनी पड़ती थी, क्योंकि वे ध्यान में एकदम क्या-क्या बकते, क्या-क्या वजनी गालियां देते! घूंसे तानते, कुश्तमकुश्ती करते। किससे करते, वह कुछ पता नहीं चलता। किसी अदृश्य शक्ति से बिलकुल जूझते। जैसे भूत-प्रेतों से लड़ रहे हों। मुझसे आकर लोग पूछते कि संत क्या करते हैं? मैं कहता: कुछ नहीं, पंजाबी हैं। ऐसे धीरे-धीरे पंजाबीपन निकल जाएगा। निकल गया। अब शांत हो गए हैं। जब से शांत हो गए हैं, मैं उनसे संत महाराज कहने लगा हूं। संत भी उनको नाम इसीलिए दिया था कि भैया! किसी भी तरह शांत हो जाओ! शांति धारण करो!

हो जाती है ऐसी झंझट। मैं नवसारी में एक शिविर ले रहा था। कोई तीन सौ मित्र शिविर में ध्यान कर रहे थे। एक सरदार जी आ गए। अच्छी बात कि सरदार जी आए! मगर उन्होंने ध्यान क्या किया...सक्रिय ध्यान में उन्होंने मार-पीट शुरू कर दी! संत तो हवाई मार-पीट करते थे, उन्होंने बिलकुल मार-पीट शुरू कर दी। आस-पास के दो-चार-दस आदमियों की पिटाई कर दी। जो पास आ जाए उसको ही लगा दें। और इस तरह बिफराए कि बिलकुल जेहाद छेड़ दिया--धर्मयुद्ध! बामुश्किल उनको रोका जा सका। उनको जब रोका गया तो वे चिल्लाएं कि मुझे ये ध्यान नहीं करने दे रहे हैं!
ये ध्यान करने भी तुम्हें कैसे दें! तुम किसी का सिर खोल दोगे, किसी का हाथ-पैर तोड़ दोगे। वे कह रहे हैं: अभी तो मेरा ध्यान जोश में आ रहा है। और आपने ही तो कहा कि हो जाने दो जो होना है, निकाल दो सब चीजें! सो जो-जो भरा है...।

वे कुछ बुरे आदमी नहीं थे। बाद में सबसे माफी मांगी उन्होंने कि भाई क्षमा करना, कोई से दुश्मनी नहीं है, किसी का कुछ मैं बिगाड़ना नहीं चाहता। मगर मन बड़ा मेरा हलका भी हो गया है। कई दिनों से यह बात चढ़ी थी। वह तो यही कहो कि कृपाण वगैरह साथ नहीं लाए थे।

संत अब शांत हो गए हैं। और उनको काम मैंने दिया है द्वार पर पहरे का, क्योंकि उससे ज्यादा और ध्यानपूर्ण कोई काम नहीं है; वहां कुछ करना नहीं है, सिर्फ बैठे रहना है। दरवाजे से लोगों का आना-जाना है, वह देखते रहना है। यही तो ध्यान की प्रक्रिया है। ध्यान में भी ऐसे ही पहरेदार बन कर बैठ जाना पड़ता है भीतर और मन के दरवाजे से जो विचारों का आना-जाना होता है उसको देखते रहना पड़ता है। संत दरवाजे पर बैठे-बैठे ही समाधि को उपलब्ध हो जाएंगे।

तुम चिंता न करो संत! तुम्हारी चिंता मैं कर रहा हूं। तुम बेफिक्र रहो। परमात्मा का भी दर्शन होगा। परमात्मा कहीं छिपा थोड़े ही है; मौजूद ही है, सिर्फ हमारी आंखों पर थोड़ी सी धूल जमी है--विचारों की धूल, वह धूल झड़ जाएगी कि तुम्हें परमात्मा दिखाई पड़ने लगेगा। जो भी आएगा दरवाजे के भीतर और जो भी जाएगा, उसमें ही परमात्मा दिखाई पड़ेगा।

और द्वार पर बैठना तुम्हारे लिए इसलिए रखा है। और तुम उसका ठीक उपयोग कर रहे हो। क्योंकि वही ध्यान की प्रक्रिया है--साक्षी। मन है क्या? सतत विचारों का आवागमन। राह चलती ही रहती है, चलती ही रहती है--विचार, वासनाएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं, भाग-दौड़ मची हुई है, बाजार भरा हुआ है। तुम बैठे हो किनारे और देख रहे हो। तुम्हें कुछ करना नहीं है, सिर्फ देखना है--कौन गया, कौन आया; नजर रखनी है। कोई निर्णय भी नहीं लेना--कौन अच्छा, कौन बुरा। ऐसे बैठे-बैठे यह छोटा सा पहरेदारी का काम तुम्हें भीतर की पहरेदारी सिखा देगा।

यहां मैंने जो भी काम किसी को दिया है, उसके पीछे प्रयोजन है, खयाल रखना। तुम्हें शायद एक दफा समझ में आए या न आए, शायद तुम्हें बहुत बाद में समझ में आए कि क्या प्रयोजन था। जब प्रयोजन पूरा हो जाए तभी शायद समझ में आए। लेकिन यहां जिसे भी मैंने जो काम दिया है, उसका प्रयोजन है। यहां कोई भी काम ऐसा नहीं है जो साधना से जुड़ा न हो। जिसके लिए जो जरूरी है, वह उसी के लिए वैसी ही साधना में संयुक्त करा दिया है।

संत, परमात्मा भी मिलेगा। परमात्मा चारों तरफ मौजूद है। उसके ऊपर थोड़े ही कोई पर्दा है। परमात्मा कोई मुसलमान औरत थोड़े ही है कि बुर्का ओढ़े बैठे हैं। अभी तुमने पाकिस्तान की खबरें पढ़ीं? मूढ़ता की भी हदें होती हैं! अब वहां स्त्रियों को मनाही कर दी गई है कि वे किसी भी खेल में पैंट-कमीज नहीं पहन सकती हैं। क्योंकि पैंट-कमीज पहनें तो उनकी नंगी टांगें लोगों को दिखाई पड़ जाएं! इतना ही नहीं, अब स्त्रियों के किसी खेल में पुरुष दर्शक नहीं हो सकते। स्त्रियां खेलें फुटबाल और खेलें टेनिस, मगर पुरुष दर्शक नहीं हो सकते, सिर्फ स्त्रियां ही दर्शक हो सकती हैं। वह तो बड़ी कृपा की कि उन्होंने...जरा एक कदम और आगे बढ़ते कि स्त्रियां खेलें हॉकी और बुर्का पहनें। तब आता पूरा मजा। तब होती धार्मिकता पूरी।

मूढ़ताओं की हद है! ये सब बातें किस बात का सबूत देती हैं? आदमी की पाशविकता का, आदमी की हैवानियत का। क्या ओछी बात! और स्त्रियां चुप हैं, कोई विरोध नहीं है। पहले तुम उन्हें मस्जिदों में नहीं जाने देते थे, चलो वह भी ठीक; अब तुम उन्हें खेल में भी मत जाने देना। और आज नहीं कल इसका आखिरी तार्किक परिणाम वही होने वाला है कि बुर्का ओढ़ो और हॉकी खेलो।
परमात्मा कोई मुसलमान स्त्री नहीं है कि बुर्का ओढ़े बैठे हुए हैं। परमात्मा तो प्रकट है--हर फूल में, हर पत्ते में, हर चांद, हर तारे में। सिर्फ हम अंधे हैं, या हमारी आंखें बंद हैं, या हमारी आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ है। उसी पर्दे को हटाने का उपाय चल रहा है यहां।

संत, पर्दा हट रहा है। और जैसे-जैसे पर्दा हटेगा, वैसे-वैसे तुम्हारी आकांक्षा प्रगाढ़ होगी, वैसे-वैसे परमात्मा को पाने की प्यास गहन होगी। पीड़ा बढ़ेगी, विरह जगेगा। अब पा लूं, अब पा लूं--ऐसी त्वरा पैदा होगी। ये सब अच्छे लक्षण हैं। ये शुभ लक्षण हैं। ये, वसंत करीब आ रहा है, इसकी सूचनाएं हैं।

रहिमन धागा प्रेम का

ओशो


आपके पास कोई नया विचार या जीवन-दर्शन नहीं है। और एक ओर आप स्वयं गीता, बाइबिल, कुरान आदि धर्मग्रंथों द्वारा प्रतिपादित धर्मों को नहीं मानते, फिर आप उनके विचारों की चोरी क्यों करते हैं?



सत्य वेदांत,

विचार कभी भी नया नहीं होता। विचार का स्वभाव ही उसे नया नहीं होने दे सकता। मौलिकता और विचार विपरीत आयाम हैं। विचार तो हमेशा ही बासा होता है; क्योंकि शब्द बासे होते हैं, भाषा बासी होती है।

अनुभूति मौलिक होती है। जीवन-सत्य का साक्षात्कार मौलिक होता है। लेकिन जैसे ही जीवन-सत्य को भाषा का वेश दिया, जैसे ही जीवन-सत्य को अभिव्यक्ति दी, वैसे ही उसकी मौलिकता आच्छादित हो जाती है।

इसलिए जो लोग कहते हैं कि मेरे पास कोई नया विचार नहीं, वे सोचते होंगे मेरी आलोचना कर रहे हैं, लेकिन वस्तुतः अनजाने वे मेरे सत्य का प्रचार कर रहे हैं।

मैंने कभी कहा नहीं कि विचार मौलिक होता है। मैंने कभी कहा नहीं कि यह विचार मेरा है। मैं कैसे मौलिक होगा? मैं तो उधार है। मेरा का भाव भी उधार है। लेकिन मैं और मेरे के पीछे भी कुछ है--चैतन्य है, साक्षी है। और उस चैतन्य में जागना, उस चैतन्य में डूबना, उस चैतन्य से आपूरित हो जाना--वह मौलिक है, वह कभी भी बासा नहीं, वह कभी उधार नहीं। लेकिन वहां मैं की कोई सीमा नहीं, वहां मैं की कोई पहुंच नहीं। इसलिए जो मौलिक है वह अस्तित्व का है; और जो उधार है वह अहंकार का है।

अब मेरी भी मजबूरी है। और मेरी ही नहीं, जिन्होंने जाना उन सबकी यही मजबूरी रही। बोलना तो पड़ेगा भाषा में, क्योंकि जिनसे बोलना है उनके पास मौन को समझने की कोई क्षमता नहीं। जो जाना है वह मौन में जाना है, और जिनसे कहना है उन्हें मौन का कुछ पता नहीं। तो भाषा का उपयोग करना होगा। और भाषा का उपयोग किया कि अनुभूति की ताजगी गई, अनुभूति का जीवन गया। भाषा आई कि अनुभूति को मौत आई। अनुभूति तो ताजी होती है, जीवंत होती है, जैसे सुबह की ओस की ताजगी, नये-नये खिले फूल की ताजगी--लेकिन अनुभूति रहे अनुभूति तो ही; भाषा के वस्त्र पहनाए कि बस बात खोनी शुरू हो गई।

फिर और भी अड़चनें हैं। मैं जब कुछ कहूंगा तो तुम वही थोड़े ही सुनोगे जो मैंने कहा; तुम वह सुनोगे जो तुम सुन सकते हो। तुम्हारी बंधी धारणाएं हैं, तुम्हारे अपने पक्षपात हैं। उन्हीं पक्षपातों की आड़ से सुनोगे। सुनोगे नहीं--भाषांतर करते रहोगे, अपना रंग पहनाते रहोगे, अपना ढंग देते रहोगे। कहूंगा तो मैं, लेकिन सुनोगे तो तुम, और तुम आ जाओगे उस सब में जो मैंने कहा। तुम तक पहुंचते-पहुंचते वह बात मेरी न रह जाएगी, तुम्हारी हो जाएगी। और अगर तुमने फिर किसी को वह बात कही, तब तो सत्य हजारों कोस दूर छूट जाएगा।

पहली बात, मौन मौलिक है। मौलिक शब्द को समझो। मौलिक का अर्थ होता है: जो मूल से उगा, जो मूल से आया--मूल उदगम से, परम स्रोत से। 

लेकिन भाषा तो मौलिक नहीं है, शब्द तो मौलिक नहीं हैं। शब्द आते हैं परंपरा से। शब्द आते हैं सदियों पुरानी यात्रा करके। उन पर न मालूम कितनी यात्रा की धूल जमी है। मगर उन्हीं शब्दों का उपयोग करना होगा, मजबूरी है, एक आवश्यक बुराई है।

सत्य वेदांत, तुमने जो पूछा है वैसे पत्र मेरे पास निरंतर आते हैं। जे.कृष्णमूर्ति के एक अनुयायी ने कुछ ही दिन पहले पत्र लिखा है कि मेरे विचारों में जे.कृष्णमूर्ति की झलक है।

जे.कृष्णमूर्ति को जो सुनता है, स्वभावतः उसे मेरे विचारों में जे.कृष्णमूर्ति की झलक मिल सकती है। लेकिन इस पूछने वाले को यह सवाल नहीं उठा कि जे.कृष्णमूर्ति के विचारों में बुद्ध की झलक है या नहीं? और जे.कृष्णमूर्ति के विचारों में लाओत्सु के विचारों की झलक है या नहीं? जे.कृष्णमूर्ति के विचारों में उपनिषद की छाया है या नहीं? नहीं, यह सवाल नहीं उठा। उसका अपना पक्षपात है। जे.कृष्णमूर्ति मौलिक हैं। लेकिन मुझमें उसे जे.कृष्णमूर्ति के विचारों की झलक मिलनी शुरू हो गई। अपना पक्षपात थोप देने की आकांक्षा बड़ी प्रगाढ़ होती है।

मैं तो कहता नहीं कि मेरे विचार मौलिक हैं। जे.कृष्णमूर्ति का दावा है कि उनके विचार मौलिक हैं। और वह दावा गलत है; क्योंकि ऐसा एक भी विचार नहीं है जे.कृष्णमूर्ति का जो उपनिषदों में मौजूद न हो, जो बुद्ध की वाणी में मौजूद न हो, जिसे लाओत्सु ने और भी प्रगाढ़ता से न कहा हो। जे.कृष्णमूर्ति के विचारों में झेन सदगुरुओं की सहज पुनरुक्ति है। लेकिन जे.कृष्णमूर्ति जीवन भर यह कोशिश करते रहे हैं कि उनके विचार मौलिक हैं। इतना ही नहीं, अपने विचारों की मौलिकता को सिद्ध करने के लिए वे यह भी कहते हैं कि मैं सौभाग्यशाली हूं कि मैंने उपनिषद नहीं पढ़े, बुद्ध-वचन नहीं पढ़े, कोई धर्म-शास्त्र नहीं पढ़े।

यह बात सरासर झूठ है। क्योंकि जे.कृष्णमूर्ति को ये सारे शास्त्र पढ़ाए गए थे। पढ़े ही नहीं, बल्कि एनीबीसेंट, लीडबीटर और दूसरे थियोसॉफिस्टों ने कोई बीस वर्ष जे.कृष्णमूर्ति के ऊपर श्रम किया, ताकि वे सारे अस्तित्व में अब तक जो भी श्रेष्ठतम विचार हुए हैं, उनके मालिक हो जाएं। लेकिन यह दावा कि मेरे विचार मौलिक हैं, तभी सिद्ध किया जा सकता है जब इनकार ही कर दिया जाए कि मुझे पता ही नहीं कि उपनिषदों में क्या है।

मैं तो कहता नहीं कि मेरे विचार मौलिक हैं, इसलिए मेरी आलोचना करनी असंभव है। मेरी तो धारणा ही यही है कि विचार मौलिक होते ही नहीं--किसी के भी हों। अनुभूति मौलिक होती है। और अनुभूति एक ही सत्य की है, इसलिए क्या करोगे?

एक छोटे स्कूल में यह घटना घटी। दो छोटे बच्चे, जुड़वां भाई। अध्यापिका ने कुत्ते के ऊपर निबंध लिखने को कहा था। सारे बच्चे निबंध लिख कर लाए थे। वे दोनों बच्चे भी निबंध लिख कर लाए थे। अध्यापिका बहुत हैरान हुई, क्योंकि उनके दोनों निबंध शब्दशः एक जैसे थे, जरा सा भी भेद नहीं था। तो अध्यापिका ने पूछा कि यह आश्चर्य की बात है, तुम दोनों ने निबंध बिलकुल एक जैसा लिखा है, एक मात्रा का भी भेद नहीं है।

उन दोनों बच्चों ने कहा, हम कर भी क्या सकते हैं! हमारे घर में दोनों का एक ही कुत्ता है, उसी का वर्णन कर रहे हैं। और ऊपर से यह भी मुसीबत है कि हम जुड़वां भाई हैं, इसलिए हमारे देखने और सोचने का ढंग भी एक ही जैसा है। इसमें हमारा कोई कसूर नहीं।

मैं नहीं कहता हूं कि कृष्णमूर्ति ने उपनिषद से विचार चुराए हैं; वह बात गलत होगी। लेकिन उपनिषद के ऋषियों ने जो सत्य जाना, वह सत्य ही एक है। फिर बुद्ध जानें उसे, जरथुस्त्र जानें उसे, नानक जानें उसे, कबीर जानें उसे, कृष्णमूर्ति जानें उसे, या तुम जानो, कुछ भेद न पड़ेगा। थोड़े-बहुत भेद हो सकते हैं अभिव्यक्ति के, लेकिन मूलतः भेद नहीं हो सकता। 

सत्य एक है। और सत्य के जानने की विधि भी एक है--अहंकार का विसर्जन, मन से मुक्ति। जहां मन न रहा, वहां सत्य प्रकट होता है।

अब यूं समझो कि एक अंधे आदमी की आंख खुले, तो क्या उसे कुछ प्रकाश में दूसरा अनुभव होगा जैसा कि पहले अंधे आदमियों की आंखें खुली थीं तो उनको भी वही प्रकाश का अनुभव हुआ था? क्या तुम यह कहोगे कि यह अंधा आदमी प्रकाश के संबंध में जो कह रहा है, यह उधार है, यह दूसरों की बातें दोहरा रहा है? 

मगर प्रकाश एक है, आंख के देखने का ढंग एक है। जब भी कोई अंधा आदमी आंख पाएगा, तो क्या करेगा--वही रंग, वही प्रकाश, वही चांद, वही तारे, वही सूरज। थोड़ा अंदाजे-बयां और हो सकता है। लेकिन बयान का ढंग, अंदाज, मौलिक भेद नहीं पैदा करता। 

कृष्णमूर्ति का दावा गलत है कि विचार मौलिक हैं। अनुभूति मौलिक है। मैं जो कह रहा हूं, अपनी अनुभूति से कह रहा हूं। यह और बात है कि औरों को भी यह अनुभूति हुई है। मैं यह दावा नहीं कर रहा हूं कि यह अनुभूति मुझे ही हुई है, पहली बार ही हुई है। उपनिषद के ऋषियों को भी हुई थी, कृष्ण ने भी जानी थी, महावीर ने भी पहचानी थी, बुद्ध भी उसी में डूबे थे, मीरा उसी में नाची थी, गाई थी, गुनगुनाई थी।

इसलिए जो लोग सोचते हैं कि मेरी आलोचना कर रहे हैं, वे गलती में हैं; वे मेरे सत्य की ही उदघोषणा कर रहे हैं। हां, मैंने अगर कहा होता कि मेरे विचार मौलिक हैं, तो आलोचना सार्थक हो सकती थी। यह आलोचना तो मूढ़तापूर्ण है। मैं तो खुद ही कहता हूं कि विचार मौलिक हो ही नहीं सकते हैं, मेरेतेरे का सवाल ही नहीं है।

राम नाम जान्यो नहीं 

ओशो

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