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Wednesday, November 11, 2015

आप गांव-गांव क्यों नहीं घूमते?

लोग मुझसे पूछते हैं कि आप गांव-गांव क्यों नहीं घूमते? अगर मैं गांव-गांव घूमूं तो मैं पागल हूं। बुद्ध को घूमना पड़ा क्योंकि और कोई उपाय न था। मैं तो यहां एक जगह बैठकर सारी दुनिया से लोगों को बुला ले सकता हूं, जरूरत नहीं है गांव-गांव घूमने की। और गांव-गांव मैं घूमूं तो जो काम मैं एक जगह बैठकर कर सकता हूं, वह नहीं हो सकेगा।

लोग मुझसे पूछते हैं कि प्रचार की क्या आवश्यकता है? बुद्ध ने तो नहीं किया। तो बुद्ध बयालीस साल क्या करते रहे, मक्खियां मारते रहे? हां, अखबार में नहीं प्रचार किया क्योंकि अखबार नहीं थे। रेडियो और टेलीविजन और फिल्म नहीं बनाई क्योंकि नहीं बन सकती थी। बन सकती होती तो तुम जैसे बुद्धू नहीं थे कि नहीं बनाते। जो भी साधन उपलब्ध हो सकते थे सत्य को पहुंचाने के लिए उन्होंने उनका उपयोग किया। अपने शिष्यों को भेजा दूर-दूर तक।

आज विज्ञान ने बहुत साधन उपलब्ध कर दिए हैं। उन सारे साधनों का उपयोग किया जाना जरूरी है। और मनुष्य को एक बहुत बड़ी संपदा आज मिली है जो कभी नहीं मिल सकती थी पहले। यहूदी और ईसाई और जैन और बौद्ध इन सबने अलग-अलग, अपने-अपने देशों में, अपनी-अपनी धाराओं में, अपने-अपने ढंग से, जीवन-सत्य को पाने के लिए विधियां खोजी थीं। आज हम सारी विधियों को साथ अनुभव कर सकते हैं, साथ समझ सकते हैं। आज सारी विधियों का निचोड़ निकाल सकते हैं। वही महत् कार्य यहां हो रहा है। यहां सूफियों का नृत्य हो रहा है, बौद्ध भिक्षु आता है तो वह हैरान होता है क्योंकि बौद्ध भिक्षु तो सिर्फ बैठकर ही ध्यान करना जानता है। उसे यह पता ही नहीं है कि ध्यान नृत्य करके भी हो सकता है। और जब सूफी फकीर आता है तो वह भी हैरान होता है क्योंकि वह सोचता है सिर्फ नाचकर ही ध्यान हो सकता है। लेकिन यहां विपस्सना का प्रयोग भी हो रहा है, लोग आंख बंद किए घंटों बैठे हुए हैं।

सूफी समझ नहीं पाता विपस्सना को, बौद्ध समझ नहीं पाता सूफी के दरवेश नृत्य को। उदारता चाहिए, बड़ा दिल चाहिए, बड़ी छाती चाहिए। इस प्रयोग को समझने के लिए बड़ी गहरी समझ, बड़ी शुद्ध समझ चाहिए। इसलिए यह प्रयोग बहुत थोड़े-से लोग ही कर पाएंगे, लेकिन वे धन्यभागी होंगे जो इस प्रयोग को कर पाएंगे। क्योंकि यही प्रयोग भविष्य की आधारशिला बनेगा, यही प्रयोग भविष्य के मंदिर की पहली ईंट है। जब मंदिर की आधारशिला रखी जाती है तो तुम्हें मंदिर के शिखर तो दिखाई नहीं पड़ते; अभी तो शिखर आए ही नहीं, दिखाई भी कैसे पड़ेंगे। यह तो बहुत स्वप्नद्रष्टा जो होते हैं, भविष्यद्रष्टा जो होते हैं कवि और मनीषी, वे केवल देख पाएंगे कि जो आज ईंट रखी जा रही है बुनियाद की वह केवल ईंट नहीं है, जल्दी ही उस पर स्वर्ण-शिखर चढ़ेंगे। लेकिन स्वर्ण-शिखरों की बुनियाद में ईंट होती हैं।

और ध्यान रखें कि मंदिर सिर्फ ईंट ही नहीं होता, ईंटों के जोड़ से कुछ ज्यादा होता है। कोई काव्य सिर्फ शब्दों का ही जोड़ नहीं होता, शब्दों के जोड़ से ज्यादा होता है। कोई संगीत सिर्फ स्वरों का जोड़ नहीं होता, स्वरों का अतिक्रमण होता है? जो लोग बाहर-बाहर से देखेंगे उनको तो दिखाई पड़ेगा कि क्या हो रहा है? सिर्फ ईंटें रखी जा रही हैं। अभी तो ईंटें रखी जा रही हैं लेकिन जल्दी यह मंदिर बनेगा, इस पर स्वर्ण-शिखर चढ़ेंगे। और तब जिन लोगों ने ईंट रखी हैं उनके आनंद का पारावार न रहेगा; उनके भी हाथ उपयोग में आए इस महत् मंदिर के बनने की प्रक्रिया में।

बुद्ध भी यही चाहते थे, महावीर भी यही चाहते थे, कृष्ण भी यही चाहते थे; लेकिन जो उस समय हो सकता था उन्होंने किया, जो आज हो सकता है वह आज किया जाएगा। लेकिन इतने पर ही अंत नहीं हो जाता, मनुष्य तो विकासमान है, रोज विकसित होता रहेगा; भविष्य में बुद्ध आते रहेंगे और इस मंदिर के नए-नए रूप प्रगट होते रहेंगे। इस मंदिर पर ही कोई यात्रा समाप्त नहीं हो जाने वाली है। इसलिए सच्चा धार्मिक आदमी नए मंदिरों को अंगीकार करने की क्षमता रखता है। ये तो झूठे धार्मिक आदमी हैं जो नए मंदिर को इनकार करते हैं, जो पुराने की ही पूजा करते हैं, जो मुर्दा की ही पूजा करते हैं।

स्मरण है, कल भीखा ने कहा : धन्यभागी हैं जो जीवित ब्रह्म की वाणी को समझ लें। बहुत आसान है सदियों के बाद सद्गुरुओं को समझना क्योंकि तब तक उनके पीछे परंपरा, इतिहास, पुराण की लंबी धारा खड़ी हो जाती है। लेकिन जब कोई सद्गुरु पहली बार खड़ा होता है तो उसके पीछे कोई परंपरा नहीं होती, वह अपरिभाष्य होता है। उसे किस कोटि में रखें, किस गणना में रखें यह भी समझ में नहीं आता। उसे क्या कहें यह भी समझ में नहीं आता। उसके लिए अभी भाषा भी नहीं है, शब्द भी नहीं है; परिभाषा भी नहीं है, व्याख्या भी नहीं है। धीरे-धीरे व्याख्या खोजी जाएगी, परिभाषा खोजी जाएगी। लेकिन समय लगेगा। और तब तक सद्गुरु विदा हो जाता है। तब तक पिंजड़ा पड़ा रह जाता है, हंसा उड़ जाता है।

जिनके पास आंखें हैं वे इन छोटी बातों में नहीं पड़ते कि व्याख्या, परिभाषा, कोटि। वे तो सीधे आंख में आंख डालकर देखने की चेष्टा करते हैं, वे तो सीधे प्रयोग में सम्मिलित हो जाते हैं। वैसा प्रयोग ही संन्यास है। संन्यास का अर्थ है : तुम बिना चिंता किए मेरे साथ अज्ञात में उतरने को तैयार हो। तुम जोखिम उठा रहे हो, तुम मेरे साथ एक नाव में उतर रहे हो जो अज्ञात सागर में जाएगी। दूसरे किनारे का कोई पता नहीं है और दूसरे किनारे का कोई आश्वासन भी नहीं दिया जा सकता। यह यात्रा ऐसी है कि इसमें आश्वासन होते ही नहीं। इसमें आश्वासन दिए कि यात्रा खराब हुई क्योंकि आश्वासन से अपेक्षा पैदा होती है। और जहां अपेक्षा है वहां वासना है। और जहां वासना है वहां प्रार्थना नहीं।

गुरु प्रताप साध की संगति 

ओशो 

Sunday, November 8, 2015

भगवान, क्या परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध किया जा सकता है?

मुल्ला नसरुद्दीन नदी के किनारे गया था तैरना सीखने। जो उस्ताद उसे तैरना सिखाने को थे, वह तो एकदम चौंके, क्योंकि मुल्ला जैसे ही तट पर गया नदी के, पत्थर पर पैर फिसल गया काई जमी होगी भड़ाम से गिरा, एक पैर तो पानी में भी पड़ गया, कपड़े भी भींग गए, एकदम उठा और घर की तरफ भागा। उस्ताद ने कहा कि बड़े मियां, कहां जाते हो? मुल्ला ने कहा कि अब जब तक तैरना न सीख लूं, नदी के पास पैर न रखूंगा। यह तो खतरनाक धंधा है! यह तो उसकी दुआ कहो, यह तो उसकी कृपा कहो। अगर जरा और फिसलकर अंदर चला गया होता, तो उस्ताद, तुम तो खड़े थे बाहर, तुम तो देखते ही रहे, हम काम से गए थे! अब तो तैरना सीख लूंगा, तभी पानी के पास फटकूंगा।

अगर अब तैरना कहां सीखोगे? कोई गद्देत्तकिए बिछा कर तैरना सीखा जाता है। और गद्देत्तकिए बिछाकर तुम कितना ही तैरने का अभ्यास कर लो, पानी में काम न आएगा, खयाल रखना। हाथ पैर पटकना सीख लोगे गद्देत्तकिए पर, लेकिन पानी में सब बेकाम हो जाएगा।

नहीं, तैरना सीखने के लिए भी पानी के पास जाना ही पड़ता है। परमात्मा का अस्तित्व कैसे सिद्ध करोगे? तर्क से? विचार से? तो तो तुम उल्टे काम में लग गए। परमात्मा को जाना है लोगों ने निर्विचार से। परमात्मा को जाना है लोगों ने हृदय से। और तुम सिद्ध करने लगे बुद्धि से। नहीं सिद्ध होगा, तो आज नहीं कल तुम कहोगे: है ही नहीं। और एक बार तुम्हारे मन में यह बात गहरी बैठ गई कि है ही नहीं, तो बस अटक गए। तो तुम्हारा विकास अवरुद्ध हुआ।

गलत प्रश्न न पूछो! पूछो कि क्या मैं हूं? पूछो कि कैसे मैं जानूं कि मैं कौन हूं? परमात्मा को छोड़ो! परमात्मा से लेना देना क्या है? पहले पानी की बूंद तो पहचान लो, फिर सागर को पहचान लेना। अभी बूंद से भी पहचान नहीं और सागर के संबंध में प्रश्न उठाए। वे प्रश्न व्यर्थ हैं। उनके उत्तर सिर्फ नासमझ देने वाले मिलेंगे। हां, किताबों में इस तरह के प्रमाण दिए हुए हैं, बड़े बड़े प्रमाण दिए हुए हैं, बड़े पंडित, शास्त्री प्रमाण देते हैं ईश्वर के होने का। और उनके प्रमाण सब बचकाने, दो कौड़ी के! क्योंकि प्रमाण कोई दिया ही नहीं जा सकता।

क्या प्रमाण हैं उनके?

इस तरह के प्रमाण कि जैसे कुम्हार घड़ा बनाता है। बिना कुम्हार के घड़ा कैसे बनेगा? इसी तरह परमात्मा ने जगत को बनाया, वह कुम्भकार है कुम्हार है।…कर दिया शूद्र उसको भी!…अब जरा कोई इन बुद्धिमानों से पूछे कि अगर घड़े को बनाने के लिए कुम्हार की जरूरत है, तो कुम्हार को बनाने के लिए भी तो किसी की जरूरत है! वह कहते हैं, हां, परमात्मा ने कुम्हार को बनाया। फिर तुम्हारी दलील का क्या होगा? परमात्मा ने संसार बनाया, फिर परमात्मा को किसने बनाया?

यही तो बुद्ध ने पूछा, महावीर ने पूछा और पंडितों की बोलती बंद हो गई। पंडित तो नाराज हो गए। इसको वह अतिप्रश्न कहते हैं। तुम पूछे कि संसार किसने बनाया, तो सम्यक प्रश्न। और कोई पूछे कि भई, जब बिना बनाए कोई चीज बनती ही नहीं, तो परमात्मा को किसने बनाया? तो अतिप्रश्न। तो जबान काट ली जाएगी। यह न्याय हुआ? तुम्हारा ही तर्क जरा आगे खींचा गया।

और फिर इसका अंत कहां होगा? अगर तुम कहो कि हां, परमात्मा को फिर और किसी बड़े परमात्मा ने बनाया, और उसको फिर किसी और बड़े परमात्मा ने बनाया, तो इसका अंत कहां होगा? यह तो अंतहीन शृंखला हो जाएगी, व्यर्थ शृंखला हो जाएगी। नहीं, ऐसे प्रमाणों से कुछ सिद्ध नहीं होता। ऐसे प्रमाणों से सिर्फ प्रमाण देने वालों की नासमझी, बुद्धिहीनता, असंवेदनशीलता सिद्ध होती है और कुछ भी सिद्ध नहीं होता। परमात्मा सिद्ध नहीं होता, सिर्फ प्रमाण देने वालों का बुद्धूपन सिद्ध होता है।

बुद्ध परमात्मा का प्रमाण नहीं देते। बुद्ध परमात्मा का प्रमाण बनते हैं।

भेद को समझ लेना। बुद्ध प्रमाण बनते हैं परमात्मा का, बुद्ध प्रमाण होते हैं परमात्मा का। मैं तुमसे कहूंगा, तुम भी प्रमाण बनो। तुम भी प्रमाण बन सकते हो, क्योंकि तुम्हारे भीतर भी बुद्धत्व छिपा पड़ा है। झरने को तोड़ने की जरूरत है। जरा चट्टान हटाओ विचारों की और फूटने दो भाव का झरना! नाचो, गाओ जीवन के उत्सव को अनुभव करो! और तुम्हें पता चल जाएगा कि परमात्मा है। जिस दिन तुम जानोगे कि जीवन एक रास है; एक महोत्सव है, राग से, रंग से भरा; एक इंद्रधनुष है, सतरंगा; एक संगीत है, अदभुत स्वरों से पूर्ण, उस दिन परमात्मा का प्रमाण मिल गया। हालांकि तुम वह प्रमाण किसी और को भी न दे सकोगे। गूंगे का गुड़ हो जाता है वह अनुभव।

मगर धन्य हैं वे, जिन्हें कुछ ऐसा अनुभव मिल जाता है जिसे वह कह नहीं पाते। इस जगत में सर्वाधिक धन्य वे ही हैं, जिन्हें गूंगे का गुड़ मिल जाता है।

सपना यह संसार 

ओशो 

Monday, July 27, 2015

कुतूहल से सत्य का संबंध

आप कुछ नए नहीं हैं।
 इस पृथ्वी पर कुछ भी नया नहीं है, सभी बहुत पुराने हैं। आप बुद्ध के चरणों में भी बैठ कर सुने हैं, आपने कृष्ण को भी देखा है, आप जीसस के पास भी उठे —बैठे हैं, लेकिन फिर भी वंचित रह गए हैं! क्योंकि कभी भी आपका हृदय तैयार नहीं था। आपके पास से बुद्ध की सरिता बहती निकल गई है, महावीर की सरिता बहती निकल गई है, आप प्यासे रह गए हैं।

आनंद रो रहा था, जिस दिन बुद्ध के प्राण छूटने को थे, और छाती पीट रहा था। और बुद्ध ने उससे कहा कि तू रोता क्यों है? जरूरत से ज्यादा मैं तेरे पास था, चालीस वर्ष! और अगर चालीस वर्ष में भी नहीं हो पाई वह घटना, तो अब रोने से क्या होगा! मेरे मिटने से इतना परेशान क्यों हो रहा है? तो आनंद ने कहा है, इसलिए परेशान हो रहा हूं कि आप मौजूद थे और मैं न मिट पाया। अगर मैं मिट जाता तो आपको मेरे भीतर प्रवेश मिल जाता। चालीस साल नदी मेरे पास बहती थी और मैं प्यासा रह गया हूं। और अब मैं रोता हूं क्योंकि जरूरी नहीं है कि यह नदी कब, किस जन्म में दुबारा मुझे मिलेगी।

आप कुछ नए नहीं हैं। आपने बुद्धों को दफनाया, महावीरों को दफनाया, जीसस, कृष्ण, क्राइस्ट, सबको आप दफना कर जी रहे हैं। वे हार गए आपसे, आप काफी पुराने हैं। जब से जीवन है, तब से आप हैं। अनंत—अनंत यात्रा है।
कहां हो जाती होगी चूक?

बस यहीं हो जाती है कि आप खुले ही नहीं हैं, बंद हैं।

मैं तो आपसे वही कहूंगा, जो मैंने जाना है। अगर आप भी अपने को एक खुलापन बना सकें, तो आप भी उसे जान लेंगे। और ऐसा नहीं है कि कोई कठिनाई है बहुत! एक ही कठिनाई है और वह आप हैं। कुछ लोग कुतूहल से चलते हैं। जैसे राह चलते बच्चे पूछ लेते हैं, इस वृक्ष का नाम क्या है? और अगर आप उत्तर न दें, तो तत्थण भूल जाते हैं कि उन्होंने पूछा भी था! वे दूसरी बात पूछने लगते हैं कि यह पत्थर यहां क्यों पड़ा है? पूछने के लिए पूछते हैं, जानने के लिए नहीं पूछते। बिना पूछे नहीं रह सकते हैं, इसलिए पूछते हैं; जानने के लिए नहीं पूछते।
जो लोग कुतूहल से जी रहे हैं, वे अभी भी बचकाने हैं। अगर आप ऐसे ही पूछ लेते हैं कि ईश्वर क्या है, जैसे कि कोई बच्चा राह चलते दुकान देख कर पूछ लेता हो कि यह खिलौना क्या है, तो आप अभी बच्चे हैं। और बच्चा तो माफ किया जा सकता है, आप माफ नहीं किए जा सकते। कुतूहल नहीं चलेगा। धर्म कोई खिलवाड़ नहीं है बच्चों का। और फिर उत्तर भी मिल जाए तो उससे कोई प्रयोजन नहीं है। बच्चे का मजा पूछने में है। उसने पूछा, यही उसका मजा है। आप उत्तर देंगे भी, तो उस उत्तर में उसे कोई बहुत रस नहीं है। क्या बात है?

मनसविद कहते हैं कि बच्चे नया—नया बोलना सीखते हैं, तो अपने बोलने का अभ्यास करते हैं पूछ—पूछ कर। जैसे बच्चा नया—नया चलना सीखता है, तो बार —बार उठ कर चलने की कोशिश करता है। बोलना सीखता है, तो बार—बार बोलने की कोशिश करता है। इसलिए बच्चे एक ही बात को कई दफा कहते हैं। इसीलिए कई दफा कहते हैं, क्योंकि उन्हें बोलने का एक नया अनुभव, एक नया आयाम मिला है। उस नए आयाम में वे तैर कर अभ्यास कर रहे हैं। इसलिए कुछ भी पूछते हैं, कुछ भी बोलते हैं।

अगर आप भी धर्म की दुनिया में कुछ भी पूछ रहे हैं, कुछ भी बोल रहे हैं, कुछ भी सोच रहे हैं—और कोई गहरी जिज्ञासा नहीं है, बस कुतूहल है—तो अभी आप और कुछ बुद्धों को दफनाके! अभी और न मालूम कितने बुद्धों को आपके साथ मेहनत करनी पडेगी!

कुतूहल से सत्य का कोई संबंध नहीं है।

ओशो 

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