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Sunday, August 9, 2015

‘स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो। - 2

हिंदुओं ने संन्‍यासियों को स्‍वामी कहा-इस कारण कि उसने सारा स्‍वामित्‍व छोड़ दिया और अब एक ही जगह उसने अपने स्वामित्व को बनाने की चेष्टा की है, वह उसकी स्वयं की आत्मा है। वह अपना मालिक है। इसलिए हिंदुओं ने अपने संन्यासियों को स्वामी कहा है।

बुद्ध ने अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा है। उलटा लगता है। लेकिन बुद्ध ने इसलिए अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा, कि इस दुनिया में सभी को स्वामी होने का खयाल है। यहां सभी स्वामी हैं, कोई इसका, कोई उसका। यह शब्द गंदा हो गया। तो मैं तुम्हें भिक्षु कहूंगा। भिक्षु तो मैं इसलिए कहूंगा कि इस दुनिया में हालत उलटी है, यहां सब भिखारी अपने को स्वामी कह रहे हैं, इसलिए मैं स्वामी को भिखारी कहूंगा।

बुद्ध ने कहा कि इस दुनिया में जब सब मामला ही उलटा है और लोग शीर्षासन कर रहे हैं, तो तुम्हें मुझे पैर के बल खड़ा करना पड़ेगा। यहां सब भिखारी अपने को स्वामी मान रहे हैं, तब तुमको स्वामी कहने से बड़ी भांति पैदा होगी, इसलिए मैं तुमको भिक्षु कहूंगा। क्योंकि तुम अपने स्वामी हो। और भिक्षु अपने को स्वामी कह रहे हैं, इसलिए उचित है कि स्वामी अपने को भिक्षु कहें।

पर बात एक ही है, इरादा एक ही है, कि आंतरिक मालकियत उपलब्ध हो।

साधना सूत्र

ओशो 

‘स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो।’


मालकियत! इसलिए हिंदू संन्यासियों ने संन्यासी का नाम स्वामी चुना है। लेकिन कैसा स्वामित्व? मकान का, धन का, दुकान का स्वामित्व? नहीं, क्योंकि वह तो सिर्फ धोखा है। तुम बनते हो गुलाम और स्वामी होने का खयाल रखते हो! तुम बनते हो दास और सोचते हो कि सम्राट हो गए!

सुना है मैंने, मुसलमान फकीर फरीद एक गांव से गुजरता था। और एक आदमी एक गाय को रस्सी से बांध कर घर की तरफ ले जाता था। तो फरीद रुक गया उसकी ऐसी आदत थी , उसने अपने शिष्यों से कहा, घेर लो इस आदमी को और इस गाय को, और तुम्हें मुझे कुछ शिक्षा देनी है। तो वह आदमी थोड़ा चौंका। उसने कहा कि मुझे घेरने की क्या जरूरत है? उसने कहा कि तुम चुप रहो, तुमसे हमें कुछ करना नहीं, सिर्फ मेरे शिष्यों को शिक्षा देनी है। और फरीद ने कहा कि शिष्यो, मैं पूछता हूं इन दोनों में मालिक कौन है? गाय या यह आदमी? शिष्यों ने कहा कि आप भी क्या पूछते हैं? जाहिर है कि आदमी मालिक है। क्योंकि गाय उसकी संपत्ति है और गले में उसने उसके फंदा डाला है। तो फरीद ने कहा कि मैं तुमसे दूसरा सवाल पूछता हूं अगर हम बीच की रस्सी काट दें और गाय भाग खड़ी हो, तो गाय के पीछे यह आदमी दौड़ेगा कि गाय आदमी के पीछे दौड़ेगी? उन्होंने कहा कि निश्चित ही यह आदमी गाय के पीछे दौड़ेगा। तो गाय इस आदमी को नहीं खोजेगी? यह आदमी गाय को खोजेगा? तो फिर मालिक कौन है? तो फरीद ने कहा कि यह रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह इस आदमी के गले में है।

वस्तुएं हमारे गले में फंदा कस लेती हैं। जिनके हम मालिक होते हैं, उनके हम गुलाम हो जाते हैं। जिसके भी आप मालिक होंगे, उसके गुलाम हो जाएंगे।

जरा खयाल करें! हमारे मुल्क में पति अपने को स्वामी कहते हैं। उनसे बड़ा गुलाम खोज सकते हैं आप? स्वामी हैं वे। पत्नी जब उनको पत्र लिखती है तो उसमें स्वामी लिखती है और नीचे दस्तखत करती है, आपकी दासी।

और सब भलीभांति जानते हैं कि कौन दास है और कौन मालिक है। किसी को जरा भी संदेह नहीं है उस मामले में। स्त्रियां होशियार हैं, वे राजी हैं, कि ठीक, दस्तखत ही करने हैं दासी के! चलेगा। लेकिन असलियत में कौन मालिक है? पति तब तक गुलाम रहेंगे, जब तक वे मालिक होने का खयाल रखते हैं। जब तक उनको खयाल है कि पत्नी के स्वामी होना है, तब तक वे शब्दों में स्वामी बने रहें, वे गुलाम रहेंगे।

जो भी मालिक बनने की दूसरे के ऊपर कोशिश करेगा, वह गुलाम हो जाएगा। सब तरह की मालकियत बाहर की दुनिया में गुलामी लाती है।

साधना सूत्र

ओशो 

शांति को खोजना, जिसमें कोई विघ्‍न न डाल सके

 इसका यह अर्थ हुआ कि विघ्‍न से बच कर मत खोजना, विघ्‍न के बीच ही खोजना। बच्चा शोर न भी मचा रहा हो, तो और मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर लेना और कहना कि तुम सब शोर मचाओ, मैं ध्यान करता हूं। और जिस दिन तुम पाओ कि बच्चे शोर कर रहे हैं और तुम्हारा ध्यान चल रहा है, उस दिन तुम समझना कि यह तुम्हारा है। पहाड़, हिमालय मत खोजना, ठीक बीच बाजार में बैठ कर ध्यान करना। क्योंकि पहाड़ धोखा दे सकता है। पहाड़ शांति देता है, इसलिए धोखा दे सकता है। पहाड़ से बचना, बाजार में ही शांति खोजना। जिस दिन बाजार में ही तुम शांति को पा लोगे, उस दिन अब तुमसे कोई भी छीन न सकेगा। क्योंकि जो छीन सकता था, उसी के बीच तुमने पा लिया है।

इसलिए घर छोड़ कर मत भागना। गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो गए अगर तुम, तो ही संन्यास सच्चा है। अगर घर छोड़ा, पत्नी छोड़ी, बच्चे छोड़े, धन छोड़ा, और फिर तुम संन्यासी हुए, तो संन्यास जो है, आरोपित है, झूठा है, कंडीशनल है। अगर पत्नी फिर वापस दे दी जाए, तो वह एक रात में तुम से तुम्हारे संन्यास को छीन लेगी। और जल्दी छीन लेगी। देर न लगेगी।

इसीलिए तथाकथित संन्यासी बड़ा ड़रा रहता है। कहीं स्त्री न छू जाए, ड़रा हुआ है। क्यों ड़रा हुआ है इतना? इतना भयभीत संन्यास कहां ले जाएगा? इतना निर्बल संन्यास क्या परिणाम लाएगा? इससे आत्मा सबल हुई कि निर्बल हो गई? यह हम कभी सोचते ही नहीं!  एक आदमी स्त्री को छूने से ड़रता है। हम सोचते हैं, बड़ा आत्मवान है। और स्त्री को छूने से ड़र रहा है! स्त्री छू जाए तो उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है! यह तो हद की निर्बल आत्मा हो गई। इस निर्बल आत्मा की क्या उपलब्धि है? ऐसे कहता रहता है कि स्त्री तो हड्डी—मांस का ढेर है। और छूने से ड़रता भी है! तो यह जो ऊपर ऊपर कह रहा है, यह केवल आयोजन है अपने को समझाने का, भीतर रस मौजूद है। छू ले तो रस का जन्म हो जाए। रस का जन्म हो जाए तो उसे लगेगा कि भीतर पतन हो गया है।

लेकिन कोई स्त्री किसी पुरुष में रस पैदा नहीं करती और न कोई पुरुष किसी स्त्री में रस पैदा करता है। रस होता है, तो उसे बाहर खींच लेती है। यह सहारा है आत्‍मदर्शन का। अगर आपके भीतर वासना है, तो स्त्री की मौजूदगी उस वासना को बाहर ले आती है। तो स्त्री सिर्फ दर्पण का काम कर रही है, स्त्री सिर्फ निदान कर रही है, वह एक डायग्नोसिस कर रही है कि आपके भीतर क्या छिपा है। उससे भागना क्या! उसे सदा पास रखना अच्छा है, क्योंकि पता चलता रहे कि भीतर क्या है। और उसके पास रहते अगर वासना खो जाए, तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हुआ, तो शक्ति उपलब्ध हुई, जो आंतरिक है।

साधना सूत्र
ओशो 

महावीर के पास एक बहुत बडा धनिक आया...

 …एक नगर सेठ। और उसने आ कर महावीर को कहा कि मुझे सामयिक खरीदनी है, मुझे ध्यान खरीदना है। और जो भी आप मूल्य कहें, मैं चुकाने को तैयार हूं। महावीर ने कहा, यह असंभव है, ध्यान खरीदा नहीं जा सकता। खरीदने वाली वृत्ति वाला व्यक्ति ध्यान को समझ भी नहीं सकता, पाना तो बहुत दूर है। तुम्हारा सब धन भी नहीं खरीद सकेगा। उस धनी ने कहा कि शायद तुम्हें पता नहीं कि कितना धन मेरे पास है! तुम बोलो, उससे दुगुना भी दूंगा। तुम सिर्फ बोलो भर कि इतना लगेगा।

वह आदमी एक ही भाषा जानता होगा -धन की। और उसने जीवन में सब धन से खरीदा था, तो उसकी कुछ गलती नहीं है, क्षमा योग्य है। उसने सब खरीद लिया था। सुंदर स्त्री चाहिए तो धन से मिल गई थी। बड़ा महल चाहिए तो धन से मिल गया था। बड़ा चिकित्सक चाहिए तो धन से मिल गया था। धन से क्या नहीं खरीदा जा सकता? उसने सब खरीद लिया था। तो उसने सोचा होगा कि ध्यान भी ऐसी क्या बला है जो धन से न मिल जाए! जब सब धन से मिलता है, तो यह भी मिल जाएगा।

लेकिन तकलीफ असल में ध्यान पाने की थी ही नहीं। गांव का एक गरीब आदमी ध्यानी हो गया था, उसी के गांव का! और महावीर ने कहा था कि यह उपलब्ध हो गया ध्यान को। इससे अड़चन थी। महावीर को पता चल गया था कि धनी को अड़चन क्या हो रही है। तो महावीर ने कहा कि तू ऐसा कर, कि तेरे गांव में ही एक गरीब आदमी है, उसको ध्यान उपलब्ध हो गया है, तू उसी से खरीद ले, तू उसी के पास चला जा। और वह गरीब आदमी है, शायद पैसे के लोभ में आ जाए। तू उससे खरीद ले, शायद बेच दे। तो उसने कहा कि इसमें क्या दिक्कत है, यह तो बिलकुल आसान है। अगर वह ध्यान न बेचे, तो मैं उस गरीब आदमी को पूरा का पूरा ही खरीद सकता हूं। इसमें कोई अड़चन ही नहीं।

अब उसकी भाषा बिलकुल ठीक है, क्योंकि जब हम पूरे गरीब आदमी को ही खरीद सकते हैं, तो ध्यान में क्या रखा है। मगर गरीब आदमी खरीद लिया जाए तो भी ध्यान नहीं खरीदा जा सकता। वह गरीब आदमी उठा कर, जंजीरों में डाल कर, घर में भी पटक दिया जाए, तो भी ध्यान जंजीरों में नहीं पड़ जाएगा। भाषा की मुश्किल है। वह धन की भाषा ही समझता है।
 
वह गया उस गरीब आदमी के पास। और उसने कहा, जो तुझे चाहिए तू बोल, मैं सब देने को तैयार हूं लेकिन ध्यान मुझे दे दे। और अगर तूने ध्यान न दिया, तो मैं सैनिक ले कर आया हूं तुझे उठा लेंगे। उस गरीब आदमी ने कहा कि तुम मुझे उठा लो, वही आसान है। ध्यान मैं तुम्हें कैसे दूं? ध्यान कोई वस्तु है, जो मैं तुम्हें दे दूं! ध्यान तो अनुभव है। तुम मुझे ले चलो, लेकिन मेरे अनुभव को कैसे मैं तुम्हें दे दूं? अनुभव तो तुम्हें तुम्हारा ही करना पड़ेगा। एक शक्ति है, जो दूसरे से मिल सकती है। और एक शक्ति है, जो स्वयं के अनुभव से ही मिल सकती है। जो दूसरे से मिलती है, उसके साथ अशांति रहेगी, क्योंकि उसके साथ भय रहेगा। जो दूसरे ने दी है, वह दूसरा छीन सकता है। और जो दूसरे ने दी है, वह मेरी है नहीं- चाहे मैंने चुराई हो, चाहे मैंने फुसला कर मांगी हो, चाहे दान में प्राप्त की हो, चाहे शक्ति के दवाब से ली हों-किंतु वह मेरी नहीं है, वह किसी दूसरे की है। और जो दूसरे की है, वह दूसरे की ही रहती है, इसलिए भय लगा रहता है। भय पीछे पीछे सरकता रहता है।
भय से अशांति पैदा होती है। जो छिन सकता है, उससे चिंता पैदा होती है। और फिर जितनी बाहर की शक्ति इकट्ठी होती जाती है, उतना ही उसके अनुपात में भीतर की निर्बलता दिखाई पड़ती है। इससे अशांति पैदा होती है।

इसलिए कोई गरीब आदमी इतनी गरीबी का अनुभव नहीं करता, जितना अमीर आदमी कर सकता है, अगर उसमें अक्ल हो। नालायक हो, बे अक्ल हो तो उसे पता ही नहीं चलता। थोड़ी सी भी बुद्धि हो तो अमीर आदमी को जिस तरह की गरीबी का पता चलता है, उस तरह की गरीबी का पता गरीब आदमी को कभी नहीं चल सकता। क्योंकि कंट्रास्ट नहीं है, तुलना नहीं है। अमीर आदमी के पास धन का ढेर लग जाता है और भीतर वह देखता है, हृदय भिखारी का पात्र है, वहां कुछ भी नहीं है। गरीब आदमी के हाथ में भी भिक्षा का पात्र है, भीतर भी भिक्षा का पात्र है। तुलना में विरोध नहीं है। उसे पता नहीं चलता कि वह कितना गरीब है। कितना गरीब है आदमी, यह अमीर हो कर ही पता चलता है।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि महावीर जब साम्राज्य को छोड़ कर गरीब होते हैं, बुद्ध जब सम्राट के सिंहासन से उतर कर रास्ते के भिखारी बनते हैं, तो उन्हें जिस गरीबी का अनुभव हुआ है, वह किसी दूसरे भिखारी को नहीं हो सकता है। उनकी गरीबी में अमीरी का बड़ा हाथ है, उनकी गरीबी शाही है, उसमें सम्राट होने का अनुभव छिपा है। और उन्होंने सम्राट हो कर जान लिया कि इससे भी भीतर की गरीबी नहीं मिटती, बल्कि प्रकट हो कर दिखाई पड़ती है।

तो जितनी बाहर की शक्ति इकट्ठी होगी, उतनी भीतर की निर्बलता प्रकट हो कर दिखाई पड़ेगी। उससे चिंता पैदा होगी। इसलिए ध्यान रहे, गरीब आदमी उतना चिंतित नहीं होता, जितना अमीर आदमी चिंतित होता है।

साधना सूत्र

ओशो 

बड़े से बड़ा चमत्कार

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि फलां साधु के पास जाते हैं, तो हाथ में ताबीज प्रकट हो जाता है, भस्म प्रकट हो जाती है। ये मदारी से प्रभावित हो कर लौटे हैं, अध्यात्म से प्रभावित हो कर नहीं लौटे हैं। यह जो शक्ति है, यह जो ताबीज या भस्में प्रकट कर रहा है, उसकी भी जो गहरे में आकांक्षा है, वह अध्यात्म नहीं है। जो प्रभावित हो रहा है, उसका भी जो प्रभावित होने में जो कारण है, वह अध्यात्म नहीं है। वे सब शक्ति के प्रदर्शन से प्रभावित हो रहे हैं। कि किसी साधु के छूने से कोई बीमार ठीक हो जाता है, तो भी हम जो प्रभावित हो रहे हैं, वह अध्यात्म नहीं है। वह कुछ और है। बाहर की भाषा हमारी समझ में आती है।

लेकिन हम बुद्ध जैसे व्यक्ति को न पहचान पाएंगे। न तो उनके छूने से कोई बीमार ठीक हो रहा है, न वह किसी बीमार को ठीक कर रहे हैं छू कर। और कभी अगर ऐसा हो भी जाता है, तो भी बुद्ध यह नहीं कहते कि ऐसा मैंने किया है। वे यही कहते हैं कि संयोग की होगी बात, तुम्हारे कर्मफल ऐसे होंगे कि यह बात होने के करीब होगी। वे यह नहीं कहते, मैंने किया है। वे यही कहते हैं, ऐसा हो गया है, इस पर ज्यादा ध्यान मत दो। न धन है, न पद है, न चमत्कार है, तो बुद्ध को आप पहचानेंगे कैसे? आपके पहचानने के सारे रास्ते ही समाप्त हो गए।

मैं एक यात्रा में था। मेरे कंपार्टमेंट में एक सज्जन और थे। हम दोनों ही थे। स्वभावत: उन्हें चुप रहना मुश्किल हो गया, कुछ बात चलानी चाही। लेकिन मैंने हां-ना में उत्तर दिए, तो बात ज्यादा चली नहीं। तो फिर उन्होंने पान निकाला कि आप पान लें, मैंने कहा कि पान मैं खाता नहीं। तो फिर उन्होंने सिगरेट निकाली कि आप सिगरेट लें, मैंने कहा कि सिगरेट मैं पीता नहीं। तो उन्होंने कहा, यह बताइए कि आपसे मैत्री बनाने का कोई उपाय है या नहीं। क्योंकि अगर मैं पान लेता तो मैत्री बनती, सिगरेट लेता तो मैत्री बनती। मैंने उनसे पूछा कि पान और सिगरेट के अतिरिक्त आपको मैत्री बनाने का कोई और उपाय पता है या नहीं? उनकी भाषा खतम हो गई थी। वे जो उपाय कर सकते थे, वह समाप्त हो गया, तो लगा कि अब कोई संबंध निर्मित नहीं हो सकता।
बुद्ध से आप कैसे संबंध निर्मित करेंगे? क्योंकि शक्ति की सारी भाषा व्यर्थ है। अगर आप शून्य को भी शक्ति मानते हों! जानते हों कि किसी का शून्यवत हो जाना इस जगत में सबसे बड़ा चमत्कार है। ना-कुछ हो जाना इस जगत में सबसे बड़ी घटना है। क्योंकि क्षुद्रतम आदमी भी मानता है कि मैं कुछ हूं। क्षुद्रतम आदमी भी मानता है कि मैं कुछ हूं तो इस जगत में मैं कुछ हूं यह मानना तो सामान्य बात है। लेकिन यह अनुभव कर लेना कि मैं ना-कुछ हूं शून्यवत हूं बड़े से बड़ा चमत्कार है।

जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी, जो उसे लोगों की दृष्टि में ना-कुछ जैसा बना देगी।’

एक बहुत मजे की बात है। बाहर से जो शक्ति मिलती है, स्वभावत: उसका दिखावा बाहर होता है। तुम भीतर कमजोर होते हो, लेकिन बाहर लोगों की आंखें चौंधिया जाती हैं। जब तुम राष्ट्रपति हो जाते हो, तो सारे लोग तुम्हारे चरणों में झुकने लगते हैं। सारे लोग तुम्हारा जयजयकार करने लगते हैं। सारे लोग मान लेते हैं कि हां, तुम्हारे पास शक्ति है। तुम भीतर बिलकुल निर्बल और कमजोर होते हो। तुम भीतर जानते हो कि कोई शक्ति नहीं है, लेकिन सारा जगत देखता है कि शक्ति घटित हो रही है। जो शक्ति बाहर से मिलती है, बाहर के लोग उस शक्ति का अनुभव भी कर पाते हैं, क्योंकि वह उन्हीं की दी गई है। तुम सिर्फ दर्पण हो, जिसमें उन्हीं की शक्ति प्रतिबिंबित हो रही है और उन्हीं पर वापस लौट रही है। जो उन्होंने दिया है, वह उन्हें दिखाई भी पड़ता है।
लेकिन जो शक्ति भीतर से पैदा होती है, साधारणत: बाहर के लोगों को वह दिखाई नहीं पड़ती। वह केवल उनको ही दिखाई पड़ सकती है, जिनको भीतर का कोई अनुभव है। अन्यथा बाकी लोगों को दिखाई नहीं पड़ती।
महावीर तुम्हारे पास से निकल जाएं, तो तुम यह मत सोचना कि तुम पहचान लोगे। गामा निकलेगा, तुम बिलकुल पहचान लोगे। एक सम्राट निकलेगा, तुम बिलकुल पहचान लोगे। एक बुद्ध निकलेगा, तुम नहीं पहचान पाओगे। क्योंकि बुद्ध की शक्ति किसी ऐसे स्रोत से आ रही है, जिसको देखने की तुम्हारे पास आख भी नहीं है। उलटा होगा, जब बुद्ध तुम्हारे पास से निकलेंगे, तुमको लगेगा कि यह कुछ भी नहीं हैं, ना कुछ हैं। बड़ी कठिनाई होगी तुम्हें पहचानने में। और पहचानने का अर्थ होगा कि तुम्हारा जीवन रूपांतरित होगा, तो ही तुम पहचान पाओगे।

इसलिए बुद्ध को पहचानना सस्ता नहीं है। बुद्ध को पहचानने में तुम्हें बदलना पड़ेगा। इसके पहले कि तुम पहचान सको, तुम्हें नया होना पड़ेगा, तब तुम पहचान पाओगे। लेकिन कौन इतनी झंझट करता है! कि बुद्ध को पहचानने की जरूरत भी क्या है जिसमें हमको बदलना पड़े? हम जैसे हैं, वैसे ही बुद्ध हमारी पहचान में नहीं आएंगे। हम चूक जाएंगे।

हां, लेकिन राजनेताओं को, धनपतियों को, सेनापतियों को हम पहचान लेंगे। हम जैसे हैं, वैसे में ही वे पहचान में आ जाएंगे। क्योंकि हमारे और उनके बीच कोई भी फर्क नहीं है। हम एक ही जगत के अंग हैं। हमारी उनकी भाषा एक है, हमारा उनका अस्तित्व एक है। और जो भी उनके पास है, वह हमारा दिया हुआ है। इसलिए हम उसे भलीभांति पहचानते हैं, वह हमारी ही संपदा है।

तो यह सूत्र कहता है, ‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो। और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी, जो उसे लोगों की दृष्टि में ना-कुछ जैसा बना देगी।’

साधना सूत्र
ओशो 

‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।’


किस शक्ति की? निश्चित ही, इस शक्ति की नहीं, जो धन से, पद से, शास्त्र से, उधार शान से मिलती है। उस शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो, जो किसी से भी नहीं मिलती, जो तुमसे पैदा होती है। जो मिलती ही नहीं, जन्मती है। जिसको खरीद लाने का बाजार से कोई उपाय नहीं है, जो तुम्हारी आत्मा का स्फुरण है। जो तुम्हारे भीतर जन्मती है। और तुम्हारे भीतर से बाहर की तरफ जाती है। बाहर से भीतर की तरफ नहीं आती। तब आप समझ जाएंगे कि अभीप्सा और शक्ति को इसमें क्यों जोड़ा है।

अभीप्सा का अर्थ है, भीतर की आकांक्षा। और शक्ति भी भीतर ही छिपी है, वहीं से पैदा होती है। तब ही तुम वस्तुत: शक्तिशाली हो पाओगे। इसलिए हमने वर्धमान को महावीर कहा। कोई ऐसा नहीं कि कोई गामा से महावीर लड़ते तो जीत जाते। ऐसा कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी हम गामा को महावीर नहीं कह सकते। क्योंकि शरीर तो शक्तिशाली है, लेकिन भीतर की आत्मा तो वैसी ही दुर्बल है। और शरीर कितनी देर चलेगा? गामा क्षय रोग से मरा। और आखिरी दिन बड़े कष्ट के रहे।

यह आप जान कर हैरान होंगे कि पहलवान सभी खतरनाक बीमारियों से मरते हैं। और आखिरी दिन पहलवानों के बहुत दुखद होते हैं। क्योंकि जो भी शक्ति थी वह शरीर की थी। और शरीर की शक्ति को ही उन्होंने समझा कि अपनी है। और जब शरीर क्षीण होने लगता है तब उनको लगता है कि यह तो धोखा था। और शरीर तो क्षीण होगा। और पहलवान का शरीर जल्दी क्षीण होता है, क्योंकि उसने शरीर के साथ जबर्दस्ती की। सब पहलवानी जबर्दस्ती है। जिसको हम कसरत कहते हैं, वह श्रम नहीं है, वह जबर्दस्ती है।

तो पहलवान जबर्दस्ती कर रहा है शरीर के साथ। तो उसकी मांसपेशियां उभर आएंगी। क्योंकि वह इतना जोर डाल रहा है मांसपेशियों पर, इतना खून जबर्दस्ती बहा रहा है उनमें से कि वे उभर आएंगी। इसलिए कोई पहलवान ज्यादा उम्र का नहीं होता, जल्दी मर जाता है। क्योंकि जो शरीर साठ साल काम दे सकता था, वह अब चालीस साल ही काम देगा। आपने बीस साल की शक्ति का हिंसात्मक रूप से उपयोग कर लिया। पहलवान जल्दी मरते हैं। और पहलवानों के आखिरी दिन बड़े दीन और दुखी हो जाते हैं। क्योंकि जैसे ही वार्धक्य आना शुरू होता है वैसे ही उन्हें पता लगता है कि हम तो कमजोर ही थे। तो शक्ति का जो भ्रम पैदा हो रहा था, वह शरीर से हो रहा था।

हमने वर्धमान को महावीर कहा है। इसलिए कहा है कि एक ऐसी जगह से वीर्य की ऊर्जा पैदा हो रही है, जो कभी भी छीनी न जा सकेगी। अंतर्भाव हुआ है, शक्ति जगी है। किसी भी साधन पर निर्भर नहीं है। न धन पर, न पद पर, न शरीर पर। निर्भर ही नहीं है। स्वतंत्र है, अपनी है, तो इसको हमने आत्म-शक्ति कहा है। जो अपनी है, वह आत्म-शक्ति है। जो किसी भी ढंग से पराए से मिलती है, जिसके होने में पराए के सहारे की जरूरत पड़ती है, वह शक्ति का धोखा है।

‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।’

इस शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो, बाकी शेष शक्तियों पर से ध्यान हटा लो। क्योंकि उन पर ध्यान देने का अर्थ है कि इस शक्ति का विकास न हो सकेगा। और जब तक तुम निर्भर रहोगे दूसरों पर, तब तक तुम पाओगे कि तुम रोज रोज कमजोर होते गए हो। सभी निर्भर लोग कमजोर हो जाते हैं। निर्भरता कैसी भी हो, कमजोरी लाती है।

और हम सब निर्भर हैं। और हमने अनेक तरह के उपाय कर रखे हैं, जिनमें निर्भरता से हम शक्तिशाली होने के भ्रम में होते हैं। निर्भरता धोखा है। उससे शक्ति का आभास होता है, लेकिन शक्ति कभी उपलब्ध नहीं होती।

साधना सूत्र

ओशो 

10—शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।

10—शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।
 और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा,
वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि
में ना—कुछ जैसा बना देगी।
11—शांति की अदम्य अभीप्सा करो।
जिस शांति की कामना तुमको होगी,
वह ऐसी पवित्र शांति है,
जिसमें कोई विध्‍न न डाल सकेगा।
और जिस शांति के वातावरण में
आत्मा उसी प्रकार विकसित होगी, जैसे
शांत सरोवर में पवित्र कमल विकसित होता है।
 12—स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो।
 परंतु ये संपत्तियां केवल शुद्ध आत्मा की हों
और इसलिए सभी शुद्ध आत्मा इसके समानरूप से स्वामी हों
और इस प्रकार ये सभी की (जब वे संयुक्त हों) संपत्ति हों।

साधना सूत्र 

ओशो 

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