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Monday, November 14, 2016

याद रखना, अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा।



मैंने सुना है कि एक आदमी बहुत उदास और दुखी बैठा है। उसकी एक बड़ी होटल है। बहुत चलती हुई होटल है। और एक मित्र उससे पूछता है कि तुम इतने दुखी और उदास क्यों दिखाई पड़ते हो कुछ दिनों से? कुछ धंधे में कठिनाई, अड़चन है? उसने कहा, बहुत अड़चन है। बहुत घाटे में धंधा चल रहा है। मित्र ने कहा, समझ में नहीं आता, क्योंकि इतने मेहमान आते—जाते दिखाई पड़ते हैं! और रोज शाम को जब मैं निकलता हूं तो तुम्हारे दरवाजे पर होटल के तख्ती लगी रहती है नो वेकेंसी को, कि अब और जगह नहीं है, तो धंधा तो बहुत जोर से चल रहा है! उस आदमी ने कहा, तुम्हें कुछ पता नहीं। आज से पंद्रह दिन पहले जब सांझ को हम नो वेकेंसी की तख्ती लटकाते थे, तो उसके बाद कम से कम पचास आदमी और द्वार खटखटाते थे। अब सिर्फ दस पंद्रह ही आते हैं। पचास आदमी लौटते थे पंद्रह दिन पहले; जगह नहीं मिलती थी। अब सिर्फ दस पंद्रह ही लौटते हैं। धंधा बड़ा घाटे में चल रहा है।



मैं एक घर में मेहमान था। गृहिणी ने मुझे कहा कि आप मेरे पति को समझाइए कि इनको हो क्या गया है। बस, निरंतर एक ही चिंता में लगे रहते हैं कि पांच लाख का नुकसान हो गया। पत्नी ने मुझे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि नुकसान हुआ कैसे! नुकसान नहीं हुआ है। मैंने पति को पूछा। उन्होंने कहा, हुआ है नुकसान, दस लाख का लाभ होने की आशा थी, पांच का ही लाभ हुआ है। नुकसान निश्चित हुआ है। पांच लाख बिलकुल हाथ से गए।


अपेक्षा से भरा हुआ चित्त, लाभ हो तो भी हानि अनुभव करता है। साक्षीभाव से भरा हुआ चित्त, हानि हो तो भी लाभ अनुभव करता है। क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया, और जितना भी मिल गया, वह भी परमकृपा है, वह भी अस्तित्व का अनुदान है।

कठोपनिषद 

ओशो 

मनुष्य दो भांति से विकसित होता है...

   एक तो उसके पास साधन, सुविधाएं, संपत्ति, परिग्रह बढ़ता चला जाए, लेकिन आत्मा न बढ़े। और दूसरा, उसकी अंतस चेतना बढ़े। संसार में जो भी हम पा सकते हैं, उससे हम विकसित नहीं होते। हमारी शक्ति भला विकसित होती हो, हमारे महल बड़े हो जाते हों, हमारी धन की राशि बड़ी हो जाती हो, हमारा ज्ञान बड़ा संग्रह बन जाता हो, स्मृति भरपूर हो जाती हो; उपाधियां, सम्मान, सत्कार मिल जाते हों, लेकिन भीतर की चेतना, भीतर की आत्मा, बीइंग, वैसा ही अविकसित रह जाता है जैसा जन्म के साथ था।


बाहर की यह दौड़ सभी को पकड़ लेती है। भीतर की दौड़ बड़ी मुश्किल से कभी किसी को पकड़ती है। उसके भी कारण हैं।


बाहर की दौड़ इसलिए आसानी से पकड़ लेती है कि बाहर का हमें इंद्रियों के द्वारा अनुभव होता है। आंखों से दिखाई पड़ती हैं वस्तुएं, कानों से ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं, नाक गंध की खबर देती है, स्वाद मिलता है। शरीर के सारे उपकरण बाहर की खबर देते हैं, भीतर की कोई खबर नहीं देते। शरीर विकसित ही इसलिए हुआ है कि उससे बाहर की खबर मिल सके। शरीर आत्मा और बाहर के बीच सेतु है, इसलिए शरीर बाहर की खबर देता है। इस खबर के मिलते ही चेतना बाहर की तरफ दौड़नी शुरू हो जाती है।


आंखे बाहर देखती हैं, भीतर तो देखती नहीं। और जहां हमें दिखाई पड़ता है, वहीं मार्ग भी मालूम होता है। समस्त इंद्रिया बहिर्गामी हैं। होंगी ही। क्योंकि अंतर्गामी इंद्रियों की कोई जरूरत नहीं है। जो भीतर है मेरे, उसे तो मैं बिना इंद्रियों के भी जान ले सकता हूं। जो बाहर है, उसे बिना इंद्रियों के जानने का कोई उपाय नहीं है।


मनुष्य की सारी इंद्रियों का विकास बाहर के जगत को जानने की आकांक्षा  से हुआ है। मेरे हाथ आपको छू सकते हैं। मेरे हाथ से मैं सब कुछ पकड़ सकता हूं सिर्फ अपने हाथ को छोड्कर। मेरी आंखे सब कुछ देख सकती हैं, सिर्फ मेरी आंखे खुद को नहीं देख सकतीं। आँख-आंख को ही नहीं देख सकती।


स्वभावत: इस कारण चेतना बाहर की तरफ बहती है। और हम बाहर के संग्रह में, बाहर के संसार में, बाहर की वस्तुओं में, उनके बढ़ाने में, उनके विकास में संलग्न हो जाते हैं। ऐसे एक आदमी संपत्तिशाली हो जाता है और भीतर दरिद्र रह जाता है। ऐसे एक आदमी महाशक्तिशाली हो जाता है-बाहर की दुनिया में, लेकिन भीतर दीन रह जाता है। और जब तक भीतर दीनता है, तब तक बाहर की कोई शक्ति और सामर्थ्य किसी काम में आने वाली नहीं।

कठोपनिषद 

ओशो 

दो दिन की जिंदगी में न इतना मचल के चल , दुनिया है चलचलाव का रस्ता संभल के चल



सम्राट बहादुरशाह जफर के शब्द हैं: सम्राट के हैं, इसलिए सोचने जैसे भी बहुत; ऐसे तो कभी ऐसी बातें भिखारी भी कह देते हैं, लेकिन संभावना है कि भिखारी के मन में अपने को सांत्वना देने की आकांक्षा  हो। जब ऐसी बात कोई सम्राट कहता है तो सांत्वना का सवाल नहीं है, किसी सत्य का साक्षात हुआ हो तभी ऐसा वक्तव्य संभव है।
    
जिनके पास है, उन्हें ही पता चलता है कि संपदा व्यर्थ है। जिनके पास शक्ति है, उन्हें पता चलता है कि शक्ति सार्थक नहीं। जिनके पास नहीं है, वे तो वासना के महल बनाते ही रहते हैं। जिनके पास नहीं है, वे तो कल्पना के जाल बुनते ही कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिनके पास नहीं हैं वे भी ऐसी बातें करने लगते हैं, जो ज्ञान की मालूम पड़ती हैं, लेकिन सौ में निन्यानबे मौकों पर वे बातें धोखे से भरी हैं। अपने को समझाने के लिए भिखमंगा भी महल की तरफ देखकर कह सकता है, कुछ सार नहीं वहां—समझाने को, कि अगर सार होता तो मैं महल को पा ही लेता न! सार नहीं है, इसलिए छोड़ा हुआ है।


जिसे हम पा नहीं पाते, उसे मत समझना कि हमने छोड़ा है। जिसे हम पाकर छोड़ते हैं, उसे ही समझना कि छोड़ा है!


जीवन में जीवन के जो परम गुह्य सत्य हैं, वे केवल उन्हें ही पता चलते हैं, जिन्होंने यह दौड़ पूरी कर ली; जो पके; जिन्होंने जिंदगी में जल्दबाजी न की, अधैर्य न बरता; जो समय के पहले भाग न खड़े हुए। पलायन से कोई कभी परमात्मा तक नहीं पहुंचा है। और न पराजय से कभी त्याग फलित हुआ है।


इसलिए उपनिषद कहते हैं : तेन त्यक्तेन भुजीथा:। जिन्होंने भोगा, उन्होंने ही त्याग किया है। जिसने भोगा ही नहीं, वह त्याग न कर सकेगा। उसके त्याग में भोग की वासना दबी ही रहेगी, छिपी ही रहेगी, बनी ही रहेगी। वह त्याग भी करेगा तो भोग के लिए ही करेगा; इसी आशा में करेगा कि किसी परलोक में भोग मिलने को है।


जिसका त्याग भोग से आया, उसके मन से परलोक की भाषा ही समाप्त हो जाती है। क्योंकि जहा वासना नहीं है, वहां परलोक कैसा? जहां वासना नहीं है, वहां स्वर्ग कैसा? जहां वासना नहीं है, वहां अप्सराएं कैसी? जहा वासना नहीं है, वहां कल्पवृक्ष नहीं लगते। कल्पवृक्ष वासनाओं का ही विस्तार है—और ध्यान रखना, पराजित वासनाओं का; हारे हुए मन का, थके हुए मन का। जो इस जिंदगी में जीत न पाया, वह परलोक की जिंदगी में जीतने के सपने देखता है।


कार्ल मार्क्स के वक्तव्य में सचाई है कि धर्म अफीम का नशा है। सौ में निन्यानबे प्रतिशत लोगों के संबंध में मार्क्स का वक्तव्य बिलकुल सही है; धर्म अफीम का नशा है। वक्तव्य गलत है, क्योंकि वह जो एक प्रतिशत बच रहा, उसके संबंध में वक्तव्य सही नहीं है। किसी बुद्ध के संबंध में, किसी महावीर के संबंध में, किसी कृष्ण के संबंध में वक्तव्य सही नहीं है; लेकिन निन्यानबे प्रतिशत लोगों के संबंध में सही है।


आदमी दुख में रहा है, इसलिए स्वर्ग की कल्पनाएं पैदा करता है। उन कल्पनाओं की अफीम घेर लेती है मन को। यहां के दुख सहने योग्य हो जाते हैं वहां के सुख की आशा में। आज की तकलीफ को आदमी झेल लेता है कल के भरोसे में। रात का अंधेरापन भी अंधेरा नहीं मालूम पड़ता, सुबह कल होगी। आदमी चाह के सहारे चलता जाता है।


ध्यान रखना, धर्म तुम्हारे लिए अफीम न बन जाए। धर्म अफीम बन सकता है खतरा है। धर्म जागरण भी बन सकता है और गहन मूर्च्छा भी। सब कुछ तुम पर निर्भर है। होशियार, जहर को भी पीता है और औषधि हो जाती है। नासमझ, अमृत भी पीए तो भी मृत्यु घट सकती है। सारी बात तुम पर निर्भर है। अंततः तुम्हीं निर्णायक हो।


एस धम्मो सनंतनो 

ओशो 

ओशो, क्या आपने धर्म को पूरी तरह पा लिया है? क्या आप एक सदगुरू हैं? क्या आप परमात्मा को मुझ तक लाने में समर्थ है?



दीवानों की बस्ती में कोई समझदार आ गया! समझदारी से उठाए गए प्रश्नों का कोई मूल्य नहीं। नीचे लिखा है, सत्य का एक जिज्ञासु। न तो जिज्ञासा है, न खोज है; मान्यताओं से भरा हुआ मन होगा।

जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि ईश्वर है। जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि धर्म है। जिज्ञासु को तो यह भी पता नहीं कि सदगुरु है। जिज्ञासु प्रश्न थोड़े ही पूछता है, जिज्ञासु अपनी प्यास जाहिर करता है।

प्रश्न दो ढंग से उठते हैं : एक तो प्यास की भांति; तब उनका गुणधर्म और। और एक जानकारी से, बुद्धि भरी है कूडा करकट से, उसमें से प्रश्न उठ आते हैं। पहला प्रश्न, 'क्या आपने धर्म को पूरी तरह पा लिया है?'

धर्म का पता है, क्या है? पूरी तरह का अर्थ मालूम है, क्या होता है? धर्म की दुनिया में पा लेने वाला बचता है?

एक एक शब्द को समझना जरूरी है। क्योंकि हो सकता है, कोने कातर में तुम्हारे भी, इस तरह के विचार भरे पड़े हों, इस तरह की मान्यताएं भरी पड़ी हों। पहली तो बात धर्म को कोई पाता नहीं, धर्म में स्वयं को खोता है। धर्म कोई संपदा नहीं है, जिसे तुम अपनी मुट्ठी में ले लो। धर्म तो मृत्यु है, जिसमें तुम समा जाते हो। तुम नहीं 'बचते तब धर्म बचता है। जब तक तुम हो, तब तक धर्म नहीं।

इसलिए जो दावा करे कि उसने धर्म को पा लिया है, उसने तो निश्चित ही न पाया होगा। दावेदारी का धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह तो बात ही छोटी हो गई। जिसे तुम पा लो, वह धर्म ही बड़ा छोटा हो गया। जो तुम्हारी मुट्ठी में आ जाए, वह विराट न रहा। जिसे तुम्हारी बुद्धि समझ ले, वह समझने के योग्य ही न रहा। जिसे तुम्हारे तर्क की सरणी में जगह बन जाए, जो तुम्हारे कटघरों में समा जाए, वह धर्म का आकाश न रहा।

बुद्ध ने कहा है, जब तुम ऐसे मिट जाओ कि आत्मा भी न बचे, अनात्मा हो जाओ, अनात्मावत हो जाओ, अनत्ता हो जाओ, शून्य हो जाओ, तभी जिसका आविर्भाव होता है, वही धर्म है: एस धम्मो सनंतनो।

एस धम्मो सनंतनो 

ओशो 


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