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Thursday, May 11, 2017

मेरे जीवन में इतना विषाद क्यों है?




अनिल भारती,

किसके जीवन में विषाद नहीं है? जब तक स्वयं का साक्षात न हो, विषाद होगा ही। जब तक परमात्मा न मिले, विषाद होगा ही। यह स्वाभाविक है।

इसलिए विषाद के विश्लेषण में न पड़ो। उतनी शक्ति ध्यान में लगाओ। यही भेद है मनोविज्ञान में और धर्म में। मनोविज्ञान विश्लेषण करता है कि विषाद क्यों है? इसका कारण क्या है? और धर्म इसकी चिंता ही नहीं करता कि विषाद क्यों है, इसका कारण क्या है? धर्म तो सीधा ध्यान का सुझाव देता है। 

यूं समझो कि तुम्हारे घर में अंधेरा है। अब पहले यह समझो कि अंधेरा क्यों है, क्या कारण है, या दीया जलाओ? मैं तो यह कहूंगा कि अगर अंधेरे को समझना भी हो तो बिना दीया जलाए कैसे समझोगे? पहले दीया जलाओ, फिर खोजो अंधेरे को कहां है। मिलेगा भी नहीं।

विषाद का विश्लेषण न पूछो। दीया जला लो। विषाद अंधकार की भांति है।


जब तेरी फुरकत में घबराते हैं हम
सर को दीवारों से टकराते हैं हम
ऐ अजल आ चुक खुदा के वास्ते
जिंदगी से अब तो घबराते हैं हम
कहके आये थे न आवेंगे कभी
बे बुलाये आज फिर जाते हैं हम
किसने वादा घर में आने का किया
आपसे बाहर हुए जाते हैं हम
जब तेरी फुरकत में घबराते हैं हम
सर को दीवारों से टकराते हैं हम

अभी तो करोगे भी क्या--सर को दीवारों से ही टकराओगे! जब तक परमात्मा न मिल जाए, तब तक जीवन एक पीड़ा ही है, एक घाव है। परमात्मा के मिलते ही स्वास्थ्य है। और कठिन नहीं है उसका मिल जाना। मिल जाना सरल है।

जागो। मन से अपनी ऊर्जा को खींचो और ध्यान में उस ऊर्जा को सन्निहित कर दो। ध्यान का दीया जले कि मीन फिर सागर में आ जाए। और फिर आनंद ही आनंद है।

ज्यूँ मछली बिन नीर 

ओशो




क्या आप मसीहा हैं? आप अपने को क्या समझते हैं?




मेलाराम असरानी


मैं हूं ही नहीं--कैसा मसीहा, कैसा अवतार, कैसा तीर्थंकर, कैसा पैगंबर! और हूं ही नहीं तो क्या समझूं? समझे कौन? समझे किसको? मैं तो गया। मैं तो बहुत समय हुआ, जा चुका।

यह बूंद तो कब की सागर में खो गयी। मगर बूंद जब सागर में खोती है तो सागर हो जाती है। इसलिए तो कबीर ने कहा कि यह देखो मजा, नदी सागर को पी गयी। कबीर की ये उलटबांसियां कि नदी सागर को पी गयी--सूचक हैं, बड़ी सूचक हैं। 

अब मैं नहीं हूं। अब तो जो है वही है। अब कहां मैं, कहां तू? यह मैं मैं तू तू गयी। अगर मैं कहूं मैं मसीहा हूं तो भूल होगी। अगर मैं कहूं मैं तीर्थंकर हूं तो भूल होगी। अगर मैं कहूं मैं अवतार हूं तो भूल होगी। मैं नहीं हूं , अब तो भगवत्ता है। वही भगवत्ता जो तुम्हारे भीतर भी है। मगर तुम मिटने की तैयारी नहीं जुटा पाते।

मेलाराम असरानी, तुम तो मेला बने हो। और मेले में तो झमेला होने वाला है। तुम तो भीड़ हो। मैं शून्य हूं, तुम भीड़ हो। तुम तो क्या क्या नहीं हो! तुम्हारे भीतर एक भी नहीं है, अनेक तन हैं । एक दौड़ नहीं, अनेक दौड़ें हैं। और सब दौड़ें एक-दूसरे के विपरीत हैं, इसलिए हंगामा मचा हुआ है। इसलिए भीतर सतत संघर्ष है, द्वंद्व है, उपद्रव है।

और तुम यहां मेरे पास भी आते हो, तो तुम भी क्या करो, तुम्हारे उसी उपद्रव में से ऐसे प्रश्न उठते हैं कि क्या आप मसीहा हैं! क्या विचार है, सूली लगानी है मुझे? क्योंकि बिना सूली लगाए कहीं कोई मसीहा हुआ है? जीसस को कोई मानता मसीहा जब तक सूली न लगती? अगर तुम्हारे दिल सूली लगाने के हों तो चलो मैं मसीहा हूं। तुम अपनी मर्जी पूरी कर लो। या मेरे कानों में खीले ठोंकने हैं या मेरे ऊपर पागल कुत्ते छोड़ने हैं? क्योंकि जब तक खीले न ठुकें और पागल कुत्ते न छोड़े जाएं, तब तक कोई तीर्थंकर नहीं होता। जब तक चट्टानें न गिरायी जाएं, विक्षिप्त हाथियों को न छोड़ा जाए, भोजन में जहर न दिया जाए, तब तक कोई बुद्ध नहीं होता। क्या तुम्हारे इरादे हैं?

मैं किन्हीं कोटियों में बंटने को राजी नहीं हूं। मैं किसी कोटि में खड़े होने को राजी नहीं हूं।

बुद्ध के जीवन में एक प्यारा उल्लेख है, शायद तुम्हारे काम पड़ जाए। एक महाज्योतिषी काशी से लौट रहा है--अपने ज्योतिष का अध्ययन पूरा करके। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। उसकी भविष्यवाणियां सच होने लगीं। उसकी बात पत्थर की लकीर बनने लगी। वह अपने गांव वापिस आ रहा है। राह में एक छोटी सी नदी पड़ती है--निरंजना। बुद्ध-गया के पास बहती है। उसी निरंजना के तट पर बुद्ध परम ज्योति में लीन हुए। नदी का नाम भी बड़ा प्यारा है--निरंजना! निरंजन तो परमात्मा का नाम है। बुद्ध ने भी ठीक जगह चुनी।

निरंजना के तट पर बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहे हैं। और वह काशी से आया हुआ पंडित, भरी दुपहरी है, जब नदी के तट पर पहुंचा तो देख कर हैरान हुआ--गीली रेत में किसी के पैरों के चिंह बने हैं। वह तो बहुत चौंका,क्योंकि उसके ज्योतिष के अनुसार इन पैरों के चिन्हों में जो लकीरें बनी हैं, वे तो केवल चक्रवर्ती सम्राट की हो सकती हैं।  चक्रवर्ती सम्राट का अर्थ होता है--जो छहों महाद्वीप, सारी पृथ्वी का सम्राट हो। चक्रवर्ती सम्राट इस भरी दोपहरी में, इस गरीब नदी के किनारे, नंगे पैर चलने को आएगा! और चक्रवर्ती सम्राट कोई था भी नहीं उन दिनों। भारत में तो असंभव। भारत में बुद्ध के समय दो हजार राज्य थे, कहां चक्रवर्ती सम्राट! एक-एक जिला, एक-एक राजा।

भारत कभी राष्ट्र रहा ही नहीं। इसकी बुद्धि में टुकड़ों में बंटने की आदत है, वह अभी भी नहीं छूटी। इसे इकट्ठा होना नहीं आता। हर चीज टूट जाती है यहां। भारत दो हजार खंडों में बंटा हुआ था, कौन चक्रवर्ती सम्राट था! 
 
मगर ये पैर के चिन्ह बहुत स्पष्ट थे। ज्योतिष को बहुत चिंता हुई कि क्या मेरा शास्त्र गलत है। उसने पैरों के चिन्हों का पीछा किया। जिस तरफ चिन्ह जाते मालूम होते थे पैर के, उसी तरफ चल पड़ा कि इस आदमी को देखना जरूरी है। चलते-चलते पहुंचा उस वृक्ष के नीचे जहां बुद्ध बैठे थे, तब और मुश्किल में पड़ गया। बुद्ध के चेहरे को देख कर तो लगे कि है तो चेहरा चक्रवर्ती सम्राट का ही। व्यक्तित्व में वही आभा है जो चक्रवर्ती सम्राट की होनी चाहिए--वही मंडल है, वही वर्तुल है प्रकाश का वही सुगंध है! वही ऐश्वर्य! मगर आदमी भिखमंगा मालूम होता है। पास में भिक्षापात्र रखा हुआ है, बिछाने को चटाई भी नहीं है। झाड़ के नीचे चट्टान पर बैठा हुआ है। वह पैरों पर गिर पड़ा ज्यातिषी उसके अपने शास्त्र जो बड़े बहुमूल्य थे वहीं रख दिये और बुद्ध से कहा कि मेरी जिज्ञासा को शांत कर दें, मैं बहुत अड़चन में पड़ गया हूं। बारह वर्ष की मेरी चेष्टा और श्रम पानी में मिला दिया आपने। ये पैरों के चिंह आपके हैं? जरा आपके पैर देख लूं।
 
बुद्ध ने पैर आगे बढ़ा दिये, उसने पैर गौर से देखे और कहा कि निश्चित ही आपको तो चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिये। आप भिखारी कैसे? यह भिक्षापात्र कैसा? इस गरीब नदी के तट पर, गर्मी के दिन हैं, निरंजना बिलकुल सूख गयी है, जरा-सी पानी की धार है, आप यहां क्या कर रहे हैं चक्रवर्ती हो कर?


बुद्ध ने कहा, " मैं कैसा चक्रवर्ती! इस भिक्षापात्र के सिवाय मेरे पास कुछ भी नहीं। और यह भी मेरा नहीं है। यहां कुछ भी मेरा नहीं है। अरे यह मेरी देह भी मेरी नहीं है। यह मेरा मन भी मेरा नहीं है। मैं भी मेरा नहीं हूं।'
 
तो उस ज्योतिषी ने पूछा, "फिर एक ही बात हो सकती है कि आप कोई देवता हैं जो आकाश से उतरे, पृथ्वी का निरीक्षण करने या किसी और प्रयोजन से?'

  बुद्ध ने कहा कि नहीं-नहीं, मैं कोई देवता भी नहीं हूं।

"तो क्या आप गंधर्व हैं?' गंधर्व हैं देवताओं के संगीतज्ञ। वह भी देवताओं की एक कोटि है। "क्या आप गंधर्व हैं?'

बुद्ध ने  कहा कि नहीं, मैं कोई गंधर्व भी नहीं। ज्योतिष मुश्किल में पड़ता जा रहा है। क्रुद्ध भी होता जा रहा है कि यह आदमी कैसा है, हर बात में इनकार कर रहा है कि मैं यह भी नहीं। तो कहा, कम से कम आप आदमी तो हैं?
 
बुद्ध ने कहा कि नहीं-नहीं, मैं आदमी भी नहीं। तब तो ज्योतिषी और गुस्से में आ गया। उसका गुस्सा स्वाभाविक , बारह साल का श्रम व्यर्थ गया, शास्त्र गलत सिद्ध हुए और यह एक आदमी है जो जवाब दे रहा है यूं कि इस पर कहीं से कोई पकड़ ही नहीं बैठती। इसको किस कोटि में रखें?
तो कहा, "पशु हैं क्या?'

बुद्ध ने कहा कि नहीं। "पत्थर हैं क्या?' बुद्ध ने कहा, नहीं। तो उसने कहा कि आप ही कहें, कौन हैं?
 बुद्ध ने कहा, "मैं सिर्फ जागरण हूं। मैं सिर्फ होश हूं, बोध हूं। मैं नहीं हूं, बोध मात्र है।'

इसलिए मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं बुद्ध हूं--सिर्फ बोध है। और मैं मिटा तब बोध हुआ। अगर मैं रहे तो बोध नहीं।

मेलाराम असरानी, मैं न मसीहा हूं, न तीर्थंकर , न पैगंबर  न अवतार। मैं नहीं हूं। एक शून्य है। इस शून्य में तुम जो चाहो देख लो, तुम जो चाहो प्रक्षेपित कर लो। इसलिए किसी को भगवान दिख सकता है, किसी को शैतान दिख सकता है। यह शून्य तो दर्पण मात्र है, तुम्हारा चेहरा ही दिखाई पड़ेगा। 

अब मेलाराम असरानी देखेंगे तो इनको मेला दिखाई पड़ेगा--कुंभ मेला भरा हुआ! क्या नाम चुना है--मेलाराम! अरे राम ही काफी थे, राम तक को मेला बना दिया! राम को ही बचा लो, मेले को जाने दो। और राम तभी बचता है जब तुम मिटते हो। मेला मिटा यानी तुम मिटे। मेला अहंकार की भीड़-भाड? है, उपद्रव है, शोरगुल है। मेला गया कि राम बचा। और राम जहां है वहां कोई मैं-भाव नहीं है। मेरा अर्थ दशरथ पुत्र राम से नहीं है,ध्यान रहे। राम से मेरा अर्थ भगवत्ता से है, भगवान से है। तुम्हारे भीतर भी भगवान पड़ा है, मगर उपेक्षित हीरे की तरह और तुम कचरे में भटके हुए हो।

मुझसे क्या पूछते हो मैं कौन हूं! मुझे तुम तभी पहचान लोगे, उससे पहले कोई उपाय नहीं है। जागे हुए को पहचानना हो तो नींद से जाग जाओ। मगर तुम नींद में ही पूछ रहे हो--"क्या आप मसीहा हैं?' यह तुम नींद में बड़बड़ा रहे हो। ये तुम्हारे स्वप्न की बातें हैं। और अगर मैं कह दूं हां मैं मसीहा हूं , तो स्वप्न वाले दो काम कर सकते हैं--कुछ हैं, जो मसीहा को मिटाने में लग जाएंगे, सूली बनाने में लग जाएंगे; और कुछ हैं जो मसीहा की पूजा करने लग जाएंगे। दोनों ही मसीहा को मिटाने में लगे हैं--एक हिंसात्मक ढंग से, एक अहिंसात्मक ढंग से। सूली चढ़ाने वाला भी मिटा रहा है, पूजा करने वाला भी मिटा रहा है। पूजा करने वाला कह रहा है कि आप बड़े पूज्य हो,बस कृपा करो, दूर-दूर रहो; दो फूल हम चढ़ा देते हैं, इससे ज्यादा हमसे कुछ और न हो सकेगा। हमें माफ करो, हम पर कृपा करो। ये दो फूल ले लो और हमें छुटकारा दो।

सूली चढ़ाने वाला भी यही कह रहा है। जरा उसका ढंग हिंसात्मक है। वह कह रहा है कि हम नहीं चाहते तुम रहो, क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी हमें अड़चन देती है। हम तुम्हारी मौजूदगी को मिटा देना चाहते हैं। वह भी मिटा रहा है, पूजा करने वाला भी मिटा रहा है। पूजा करने वाला कह रहा है कि तुम मसीहा हो, भगवान हो, तीर्थंकर हो, पैगंबर हो, अवतार हो। हम मनुष्य ठहरे। हम हैं मेलाराम, तुम हो राम, क्या लेना-देना? मगर अब मिल गये हो राह पर तो जयराम जी! ये दो फूल ले लो और हमें जाने दो!

दोनों अपने-अपने ढंग से इनकार करने की कोशिश कर रहे हैं। समझने की चेष्टा करो, जानने की चेष्टा करो। तभी तुम पहचान पाओगे कि शून्य होना भी एक ढंग है। वही तो अथर्ववेद  की ऋचा है--

पृष्ठात्पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहम्
अन्तरिक्षादिद् विमारुहम्, दिवोनाकस्य
पृष्ठात्र्ऽस्वज्योतिरगाहम्

चले चलो, उठ चलो--शरीर से, पार्थिव लोक से अंतरिक्ष लोक; अंतरिक्ष लोक से ज्योतिषमान लोक,से परम ज्योतिपुंज में लीन हो जाओ। शून्य हो जाओगे तो महाशून्य तुम्हारा है। मिटोगे तो सब कुछ तुम्हारा है।


ज्यूँ मछली बिन नीर 


ओशो

Friday, May 5, 2017

बुद्ध के जीवन में उल्लेख है...



    बुद्ध को सभी सुख उपलब्ध थे, जो आप खोज सकते हैं। लेकिन सभी सुख उपलब्ध होने में एक बड़ा खतरा हो जाता है। और वह खतरा यह हो जाता है कि भविष्य की आशा नहीं रह जाती है।

दुख में एक सुविधा है, भविष्य में आशा रहती है। जो कार आप चाहते हैं, वह कल मिल सकती है, आज, अभी नहीं मिल सकती। श्रम करेंगे, पैसा जुटाएंगे, चोरी करेंगे, बेईमानी करेंगे, कुछ उपाय करेंगे। कल, समय चाहिए। जो मकान आप बनाना चाहते हैं, वक्त लेगा।

लेकिन बुद्ध को एक मुसीबत हो गई, एक अभिशाप, जो वरदान सिद्ध हुआ। उनके पास सब था, इसलिए भविष्य का कोई उपाय न रहा। जो भी था, वह था। महल बड़े से बड़े उनके पास थे। स्त्रियां सुंदर से सुंदर उनके पास थीं। धन जितना हो सकता था, उनके पास था। जो भी हो सकता था उस जमाने में श्रेष्ठतम, सुंदरतम, वह सब उनके पास था।

बुद्ध मुश्किल में पड़ गए। क्योंकि आशा का कोई उपाय न रहा। होप समाप्त हो गई। इससे बड़ा मकान नहीं हो सकता; इससे सुंदर स्त्री नहीं हो सकती; इससे ज्यादा धन नहीं हो सकता। बुद्ध की तकलीफ यह हो गई कि उनके पास सब था, इसलिए भविष्य गिर गया। और दुख दिखाई पड़ गया कि सब दुख है। वे भाग खड़े हुए। 

यह बड़े मजे की बात है, सुख में से लोग जाग गए हैं, भाग गए हैं, और दुख में लोग चलते चले जाते हैं! सुख में लोग इसलिए भाग खड़े होते हैं कि दिखाई पड जाता है कि अब और तो कुछ हो नहीं सकता। जो हो सकता था, वह हो गया, और कुछ हुआ नहीं। और भीतर दुख ही दुख है। भविष्य कुछ है नहीं। आशा बंधती नहीं। आशा टूट जाती है। आशा के सब सेतु गिर गए। बुद्ध भाग गए।

जब बुद्ध भाग रहे हैं, तो उनका सारथी उनसे कहता है कि आप क्या पागलपन कर रहे हैं! सारथी गरीब आदमी है। उसको अभी आशाएं हैं। वह प्रधान सारथी भी हो सकता है। वह सम्राट का सारथी हो सकता है। अभी राजकुमार का सारथी है। अभी बड़ी आशाएं हैं। वह बुद्ध को कहता है कि मैं का आदमी हूं; मैं तुम्हें समझाता हूं; तुम गलती कर रहे हो। तुम नासमझी कर रहे हो। तुम अभी यौवन की भूल में हो। लौट चलो। इतने सुंदर महल कहा मिलेंगे? इतनी सुंदर पत्नियां कहां मिलेंगी? इतना सुंदर पुत्र कहा पाओगे? तुम्हारे पास सब कुछ है, तुम कहा भागे जा रहे हो!

वह सारथी और बुद्ध के बीच जो बातचीत है, वह सारथी गलत नहीं कहता। वह अपने हिसाब से कहता है। उसको अभी आशाओं का जाल आगे खड़ा है। ये महल उसे भी मिल सकते हैं भविष्य में। ये सुंदर स्त्रियां वह भी पा सकता है। अभी दौड़ कायम है। उसे बुद्ध बिलकुल नासमझ मालूम पड़ते हैं कि यह लड़का बिलकुल नासमझ है। यह बच्चों जैसी बात कर रहा है। जहां जाने के लिए सारी दुनिया कोशिश कर रही है, वहां से यह भाग रहा है! आखिरी क्षण में भी वह कहता है कि एक बार मैं तुमसे फिर कहता हूं लौट चलो। महलों में वापस लौट चलो।

तो बुद्ध कहते हैं, तुझे महल दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि तू उन महलों में नहीं है। मुझे वहा सिर्फ आग की लपटें और दुख दिखाई पड़ता है। क्योंकि मैं वहां से आ रहा हूं। मैं उनमें रहकर आ रहा हूं। तू उनके बाहर है। इसलिए तुझे कुछ पता नहीं है। तू मुझे समझाने की कोशिश मत कर।

बुद्ध महल छोड़ देते हैं। और छ: वर्ष तक बड़ी कठिन तपश्चर्या करते हैं परमात्मा को, सत्य को, मोक्ष को पाने की। लेकिन छ: वर्ष की कठिन तपश्चर्या में भी न मोक्ष मिलता, न परमात्मा मिलता, न आत्मा मिलती।

बुद्ध की कथा बड़ी अनूठी है। छ: वर्ष वे, जो भी कहा जाता है, करते हैं। जो भी साधना—पद्धति बताई जाती है, करते हैं। उनसे गुरु घबड़ाने लगते हैं। अक्सर शिष्य गुरु से घबड़ाते हैं, क्योंकि गुरु जो कहता है, वे नहीं कर पाते। लेकिन बुद्ध से गुरु घबड़ाने लगते हैं। गुरु उनको कहते हैं कि बस, जो भी हम सिखा सकते थे, सिखा दिया; और तुमने सब कर लिया। और बुद्ध कहते हैं, आगे बताओ, क्योंकि अभी कुछ भी नहीं हुआ। तो वे कहते हैं, अब तुम कहीं और जाओ।

जितने गुरु उपलब्ध थे, बुद्ध सबके पास घूमकर सबको थका डालते हैं। छ: वर्ष बाद निरंजना नदी के किनारे वे वृक्ष के नीचे थककर बैठे हैं। यह थकान बड़ी गहरी है। एक थकान तो महलों की थी कि महल व्यर्थ हो गए थे। महल तो व्यर्थ हो गए थे, क्योंकि महलों में कोई भविष्य नहीं था।

इसे थोड़ा समझें, बारीक है। महलों में कोई भविष्य नहीं था। सब था पास में, आगे कोई आशा नहीं थी। जब उन्होंने महल छोड़े, तो आशा फिर बंध गई; भविष्य खुला हो गया। अब मोक्ष, परमात्मा, आत्मा, शांति, आनंद, इनके भविष्य की मंजिलें बन गईं। अब वे फिर दौड़ने लगे। वासना ने फिर गति पकड़ ली। अब वे साधना कर रहे थे, लेकिन वासना जग गई। क्योंकि वासना भविष्य के कारण जगती है। वासना है, मेरे और भविष्य के बीच जोड़। अब वे फिर दौड़ने लगे।

ये छ: वर्ष, तपश्चर्या के वर्ष, वासना के वर्ष थे। मोक्ष पाना था। और आज मिल नहीं सकता, भविष्य में था। इसलिए सब कठोर उपाय किए, लेकिन मोक्ष नहीं मिला। क्योंकि मोक्ष तो तभी मिलता है, जब दौड़ सब समाप्त हो जाती है। वह भीतर का शून्य तो तभी उपलब्ध होता है, या पूर्ण तभी उपलब्ध होता है, जब सब वासना गिर जाती है।

यह भी वासना थी कि ईश्वर को पा लूं सत्य को पा लूं। जो चीज भी भविष्य की मांग करती है, वह वासना है। ऐसा समझ लें कि जिस विचार के लिए भी भविष्य की जरूरत है, वह वासना है। तो बुद्ध उस दिन थक गए। यह थकान दोहरी थी। महल बेकार हो गए। अब साधना भी बेकार हो गई। अब वे वृक्ष के नीचे थककर बैठे थे। उस रात उनको लगा, अब करने को कुछ भी नहीं बचा। महल जान लिए। साधना की पद्धतियां जान लीं। कहीं कुछ पाने को नहीं है। यह थका बड़ी गहरी उतर गई, कहीं कुछ पाने को नहीं है। इस विचार ने कि कहीं कुछ पाने को नहीं है, स्वभावत: दूसरे विचार को भी जन्म दिया कि कुछ करने को नहीं है।

गीता दर्शन 

ओशो 



समय सदा वर्तमान है



स्मृति है मन की, वह कहीं है नहीं। और भविष्य केवल कल्पना है मन की, वह भी कहीं है नहीं। जो समय है, वह तो सदा वर्तमान है। आपका कभी अतीत से कोई मिलना हुआ? कि भविष्य से कोई मिलना हुआ? जब भी मिलना होता है, तो वर्तमान से होता है। आप सदा अभी और यहीं, हियर एंड नाउ होते हैं। न तो आप पीछे होते हैं, न आगे होते हैं। ही, पीछे का खयाल आप में हो सकता है। वह आपके मन की बात है। और आगे का खयाल भी हो सकता है, वह भी मन की बात है।


अस्तित्व वर्तमान है; मन अतीत और भविष्य है। एक और मजे की बात है, अस्तित्व वर्तमान है सदा, और मन कभी वर्तमान नहीं है। मन कभी अभी और यहीं नहीं होता। इसे थोड़ा सोचें।


अगर आप पूरी तरह से यहीं होने की कोशिश करें इसी क्षण में, भूल जाएं सारे अतीत को, जो हो चुका, वह अब नहीं है; भूल जाएं सारे भविष्य को, जो अभी हुआ नहीं है; सिर्फ यहीं रह जाएं, वर्तमान में, तो मन समाप्त हो जाएगा। क्योंकि मन को या तो अतीत चाहिए दौड़ने के लिए पीछे, स्मृति; या भविष्य चाहिए, स्पेस चाहिए, जगह चाहिए। वर्तमान में जगह ही नहीं है। वर्तमान का क्षण इतना छोटा है कि मन को फैलने की जरा भी जगह नहीं है। क्या करिएगा? अगर अतीत छीन लिया, भविष्य छीन लिया, तो वर्तमान में मन को करने को कुछ भी नहीं बचता। इसलिए ध्यान की एक गहनतम प्रक्रिया है और वह है, वर्तमान में जीना। तो ध्यान अपने आप फलित होने लगता है, क्योंकि मन समाप्त होने लगता है। मन बच ही नहीं सकता।


समय सिर्फ वर्तमान है। मन है अतीत और भविष्य। अगर आप साक्षी होंगे, तो वर्तमान में हो जाएंगे। भविष्य और अतीत दोनों खो जाएंगे। क्योंकि साक्षी तो उसी के हो सकते हैं, जो है। अतीत के क्या साक्षी होंगे, जो है ही नहीं? भविष्य के क्या साक्षी होंगे, जो अभी होने को है? साक्षी तो उसी का हुआ जा सकता है, जो है। साक्षी होते ही मन समाप्त हो जाता है। इसलिए भविष्य का जो रस है, वह जरूर समाप्त हो जाएगा। लेकिन आपको पता ही नहीं है कि भविष्य का रस तो समाप्त होगा, वर्तमान का आनंद आपके ऊपर बरस पड़ेगा। और भविष्य का रस तो केवल आश्वासन है झूठा, वह कभी पूरा नहीं होता।


इसे इस तरह सोचें। अगर आप पचास साल के हो गए हैं, तो यह पचास साल की उम्र आज से दस साल पहले भविष्य थी। और दस साल पहले आपने सोचा होगा, न मालूम क्या—क्या आनंद आने वाला है! अब तो वह सब आप देख चुके हैं। वह अभी तक आनंद आया नहीं।


बचपन से आदमी यह सोचता है, कल, कल, कल! और एक दिन मौत आ जाती है और आनंद नहीं आता। लौटकर देखें, कोई एकाध क्षण आपको ऐसा खयाल आता है, जिसको आप कह सकें वह आनंद था! जिसको आप कह सकें कि उसके कारण मेरा जीवन सार्थक हो गया! जिसके कारण आप कह सकें कि जीवन के सब दुख झेलने योग्य थे! क्योंकि वह एक आनंद का कण भी मिल गया, तो सब दुख चुक गए। कोई नुकसान नहीं हुआ। क्या एकाध ऐसा क्षण जीवन में आपको खयाल है, जिसके लिए आप फिर से जीने को राजी हो जाएं! कि यह सारी तकलीफ झेलने को मैं राजी हूं क्योंकि वह क्षण पाने जैसा था।

गीता दर्शन 

ओशो 



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