Osho Whatsapp Group

To Join Osho Hindi / English Message Group in Whatsapp, Please message on +917069879449 (Whatsapp) #Osho Or follow this link http...

Sunday, January 14, 2018

सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं



प्रेम के शास्त्र का यह बुनियादी सिद्धांत है। कंजूस की वहां गति नहीं। पकड़ने वाले के लिए वहां उपाय नहीं। वहां खोनेवाले की मालिकी है। वहां जो बचाते हैं, दीन और दरिद्र रह जाते हैं। वहां जो लुटाते हैं, वही पाते हैं।

प्रेम का जगत् बड़ी उलटबांसी है।

संसार में एक गणित चलता है; प्रेम का गणित बड़ा उलटा है। संसार में बचाओगे तो बचेगा। प्रेम में लुटाओगे तो बचेगा। संसार में लुटाओगे तो दीन-दरिद्र हो जाओगे। प्रेम में न लुटाया तो दीन-दरिद्र हो जाओगे।

संसार से सत्य की दिशा बिल्कुल उलटी है।

संसार परमात्मा की प्रतिछाया है। जैसे कभी-कभी किसी झील पर तुम खड़े हो और झील में झांक कर देखो, तो जमीन पर तो तुम्हारे पैर नीचे हैं और सिर ऊपर है; लेकिन झील में दिखाई पड़ेगा कि पैर ऊपर हैं और सिर नीचे है।


परमात्मा से संसार ठीक उलटा है। संसार के गणित को उलटा लो तो धर्म का गणित बन जाता है।
आज के सूत्र बड़े बहुमूल्य हैं। उनका मूल्य नहीं आंका जा सकता। धर्म के शास्त्र की जो बुनियादी भित्ति है, इन्हीं सूत्रों की ईंटों से बनी है। इन्हें खूब भाव से ग्रहण करना। इनके रस में डूबना।



"सीस उतारै हथ से, सहज आसिकी नाहिं।


तुमने सदा सुना है कि भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है। बात सच भी है और झूठ भी है। सच इसलिए कि जिन्हें प्रेम आ जाए उनके लिए भक्ति से सरल और क्या! झूठ इसलिए कि प्रेम आना बड़ा कठिन है। प्रेम आ जाए तो सब सुगम। फिर तो प्रयास करना ही नहीं होता--प्रसाद में मिलता है। प्रभु की तरफ जाना ही नहीं पड़ता भक्त को, भगवान ही भक्त को खोजने आता है। हरि सुमिरण मेरा करैं! भक्त की स्मृति हरि को होने लगती है। भक्त तो भूल ही जाता है। प्रेम में किसको याद रहती है! प्रेम की मस्ती में कौन हिसाब रखता है--मंत्र, पाठ-पूजा, प्रार्थना, उपासना! लेकिन परमात्मा स्मरण रखने लगता है। इधर भक्त का स्मरण भूलता है उधर परमात्मा में स्मरण जगता है। और मजा तो तभी है जब हरि तुम्हारा स्मरण करे। तुम्हीं स्मरण करते रहे तो कुछ खास मजा नहीं। जब आग दोनों तरफ से लगे तभी प्रेम के फल पकते हैं।


तो तुमने सुना है बहुत बार कि भक्ति बड़ी आसान है। तुमने यह भी सुना है कि कलियुग में तो भक्ति ही मार्ग है। सच्चाई है इसमें और सच्चाई नहीं भी। सच्चाई है अगर प्रेम कर पाओ। मगर प्रेम कर पाओगे? प्रश्न तो वहां खड़ा है।


"सीस उतारै हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।


पलटू कहते हैं : भूलकर भी यह मत सोचना कि प्रेम का रास्ता सरल है, कि आशिकी सहज है कि सुगम है। हां, सुगम है किन्हीं के लिए। जो अपने सिर को अपने हाथ से उतार कर रख दें, उनके लिए ज़रा भी कठिन नहीं है। लेकिन जिन्होंने अपने को बचा-बचा कर चाहा कि पहुंच जाएं, उनके लिए महा दुर्गम है यह पथ। वे कभी नहीं पहुंच पाएंगे। जिन्होंने सोचा कि हम अपने को भी बचा लें और परमात्मा को भी पा लें, वे भटकेंगे अनंत काल तक, कभी न पहुंच पाएंगे।


अजहुँ चेत गंवार 

ओशो 

Wednesday, January 3, 2018

सजगता

जिसे लोग धर्म समझते है वह धर्म नहीं है। ईसाइयत, इस्लाम और हिंदू धर्म, ये धर्म नहीं है। लोग जिन्‍हें धर्म कहते है, वे मृत चट्टानें हे। मैं तुम्‍हें धर्म नहीं धार्मिकता सिखाता हूं: एक बहती हुई सरिता, पग-पग पर मोड़ लेती है, निरंतर अपना मार्ग बदलती है। लेकिन अंतत: सागर तक पहुंच जाती है।


ये सभी तथाकथित धर्म तुम्‍हारे लिए कब्रें खोदते है। तुम्‍हारे प्रेम को तुम्‍हारे आनंद को और तुम्‍हारे जीवन को नष्‍ट करने के काम में संलग्‍न रहे है। और ईश्‍वर के बारे में, स्‍वर्ग नरक के बारे में, पुनर्जन्‍म ...ओर न जाने कैसी-कैसी व्‍यर्थ बातों के विषय में वे तुम्‍हारी खोपड़ी में रंगीन कल्‍पनाएं मनमोहक भ्रम और भ्रांत धारणाओं का कूड़ा-करकट भरते रहते है।


मेरा तो भरोसा है प्रवाह मे, परिवर्तन में, गति में, क्‍योंकि यही जीवन का स्‍वभाव है। यह जीवन केवल एक स्‍थायी चीज को जानता है। और वह है: सतत परिर्वतन सिर्फ परिवर्तन ही कभी परिवर्तन नहीं होता। अन्‍यथा हर चीज बदल जाती है। कभी पतझड़ आ जाता है। और वृक्ष नंगे हो जाते है। सारी पत्‍तियां चुपचाप,बिना शिकायत के गिर जाती है। और शांति पूर्वक पुन: उसी मिट्टी में विलीन हो जाती है।

 
नीले आकाश में बाँहें फैलाए नग्‍न खड़े वृक्षों का एक अपना ही सौंदर्य है। उनके ह्रदय में एक गहन आशा और आस्‍था अवश्‍य होती होगी क्‍योंकि वह जानते है कि जब पुरानी पत्‍तियां झड़ती है तो नई आती ही होंगी। और जल्‍दी ही नई, ताजी और सुकोमल कोंपलें फूटने लगती है।


धर्म एक मृत संगठन नहीं है, संप्रदाय नहीं है, वरन एक तरह की धार्मिकता होनी चाहिए। एक ऐसी जीवंत गुणवता, जिसमें समाहित है: सत्‍य के साथ होने की क्षमता। प्रामाणिकता, सहजता, स्‍वाभाविकता, प्रेम से भरे ह्रदय की धड़कनें और समग्र अस्‍तित्‍व के साथ मैत्रीपूर्ण लयबद्घता। इसके लिए किन्‍हीं धर्मग्रंथों और पवित्र पुस्‍तकों की आवश्‍यकता नहीं है।


सच्‍ची धार्मिकता को मसीहाओं, उद्धारकों, पवित्र ग्रंथों, पादरियों, पोपों, पंडित, पुरोहित, मौलवियों, तुम्‍हारे शंकराचार्य की और किसी, मंदिर,मस्जिद, चर्चों की आवश्यकता नहीं है। क्‍योंकि धार्मिकता तुम्‍हारे ह्रदय की खिलावट है। वह तो स्‍वयं की आत्‍मा के, अपनी ही सत्‍ता के केंद्र-बिंदु तक पहुंचने का नाम है। और जिस क्षण तुम अपने आस्‍तित्‍व के ठीक केंद्र पर पहुंच जाते हो। उस क्षण सौंदर्य का, आनंद का, शांति का और आलोक का विस्‍फोट होता है। तुम एक सर्वथा भिन्‍न व्‍यक्‍ति होने लगते हो। तुम्‍हारे जीवन में जो अँधेरा था वह तिरोहित हो जाता है। और जो भी गलत था वह विदा हो जाता है। फिर तुम जो भी कहते हो वह परम सजगता और पूर्ण समग्रता के साथ होते हो।

मैं तो बस एक ही पुण्‍य जानता हूं और वह है: सजगता।

अमृत कण 

ओशो 

Tuesday, January 2, 2018

एक मित्र ने पूछा है: हमसे तो कहा जाता है कि हम मां-बाप, गुरु को आदर दें, सम्मान दें और उनकी बात को हमेशा प्रमाणिक मानें, उस पर शक न करें, उस पर संदेह न करें। तो मेरा क्या विचार है इस संबंध में?



पहली बात, अगर कोई भी आपसे कहता हो मुझे आदर दो, तो उसे आदर कभी मत देना; क्योंकि यह मांग उस आदमी के भीतर आदर-योग्य होने की कमी का सूचक है। अगर कोई कहता हो; अगर गुरु यह कहता हो, मुझे आदर दो, उसे कभी आदर मत देना, क्योंकि यह आदमी गुरु होने के योग्य ही नहीं रहा। गुरु कभी आदर नहीं मांगता। जो आदर मांगता है, वह गुरु नहीं रह जाता। आदर की मांग बड़े क्षुद्र मन की सूचना है। आदर मांगा नहीं जाता; आदर मिलता है। 


मैं यह नहीं कहता कि मां-बाप को आदर दो। मैं यह कहता हूं, मां-बाप ऐसे होने चाहिए कि उन्हें आदर मिले। आदर मांगा नहीं जा सकता। और मांगा हुआ आदर एकदम झूठा होगा। अगर कोई देगा भी, वह झूठा होगा। अगर बच्चे आदर देंगे इसलिए कि मां-बाप मांगते हैं कि आदर दो, क्योंकि हम बुजुर्ग हैं, हमने जिंदगी देखी है और हमने यह किया और हमने वह किया। अगर इस वजह से वे आदर मांगते हैं, तो वे पक्का समझ लें, वे बच्चे में आदर नहीं, अनादर के बीज बो रहे हैं। हां, आज तो बच्चा कमजोर है इसलिए डर की वजह से आदर देगा। लेकिन कल आप कमजोर हो जाएंगे और बच्चा ताकतवर हो जाएगा; आप बूढ़े हो जाएंगे और बच्चा जवान हो जाएगा, तब? तब पासा बदल जाएगा। बच्चा सताएगा और अनादर देगा। ये जो जवान बच्चे अपने मां-बाप को अनादर दे रहे हैं, यह अकारण नहीं है। इनसे बचपन में जबरदस्ती आदर मांगा गया, उसका रिएक्शन है, उसकी प्रतिक्रिया है। जब इनके हाथ में ताकत आएगी, तो ये इसका बदला चुकाएंगे। आपके हाथ में ताकत थी, तो आपने आदर मांग लिया। अब इनके हाथ में ताकत है, तो अब ये उसका बदला चुकाएंगे कि जो आदर दिया था, उसको एक-एक रत्ती-रत्ती पाई चुकता कर लेंगे। 

 
सारी दुनिया में बच्चों की जो बगावत है, वह मां-बाप के प्रति नहीं है, मां-बाप के जबरदस्ती मांगे गए आदर के प्रति है। मां-बाप को कौन अनादर देगा? कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उनको अनादर देने की। लेकिन मां-बाप होने तो चाहिए, वे हैं कहां? गुरु होने तो चाहिए, वे हैं कहां? इसलिए मैं यह नहीं कहता कि गुरु को आदर दो। मैं तो यह कहता हूं, जिसके प्रति तुम्हारा आदर खिंचा हुआ चला जाए, उसे गुरु समझ लो। मां-बाप को आदर मिलना नहीं चाहिए; दिया नहीं जाना चाहिए; मांगा नहीं जाना चाहिए। यह तो हद्द हो गई। अगर एक मां अपने बेटे से कहे कि तुम मुझे आदर दो, यह किस बात की खबर हुई? यह इस बात की खबर हुई कि वह मां मां होने में समर्थ नहीं हो सकीं। नहीं तो आदर तो मिलता। एक पिता अपने बेटे से कहे, मुझे आदर दो, क्योंकि मैं तुम्हारा पिता हूं। यह बात भी अगर कहनी पड़े और समझानी पड़े, तो बात खत्म हो गई। यह पिता पिता होने के योग्य नहीं था। 

 
जब भी आदर मांगा जाता है तो समझ लेना चाहिए, समाज में आदर पाने योग्य लोग समाप्त हो गए। सचमुच योग्य व्यक्ति कभी आदर नहीं मांगता, सम्मान नहीं मांगता। और जिस व्यक्ति को इस बात का अहसास है कि वह जो कह रहा है, सच है, वह कभी यह नहीं कहता कि मेरी बात को प्रमाण मान लेना। जिस आदमी को अपनी बात पर शक होता है, वह हमेशा जोर देकर कहता है कि मेरी बात प्रमाण है, मैं जो कह रहा हूं, वह सत्य है। जिस आदमी को शक होता है अपनी बात पर, वह यह कहता है कि मैं जो कह रहा हूं, वह प्रमाणित है, इस पर शक करोगे, गर्दन काट देंगे। लेकिन जिसको अपनी सच्चाई पर, अनुभव पर, जिसे सीधा बोध होता है कि मैं जो कह रहा हूं, वह सच है, वह कभी ऐसा नहीं कहता। वह कहता है कि मुझे दिखाई पड़ता है कि यह सच है, तुम भी सोचना और खोजना। क्योंकि उसे इस बात का पता है कि अगर दूसरे व्यक्ति ने सोचा और खोजा, तो वह निश्चित ही इस नतीजे पर आ जाएगा, जो मैं उससे कह रहा हूं। लेकिन जिसको यह डर होता है कि मैं जो कह रहा हूं, पता नहीं, वह सच है या झूठ, वह कहता है, यह प्रमाणिक है। और मेरी बात को इसलिए मान लेना कि मैं तुम्हारा पिता हूं; इसलिए मान लेना कि मैं गुरु हूं; इसलिए मान लेना कि मेरी उम्र तुमसे ज्यादा है। ये बातें सब कमजोरी के लक्षण हैं और झूठ के लक्षण हैं, सत्य के लक्षण नहीं हैं। 


इसलिए कोई गुरु कभी नहीं कहता कि मेरी बात को प्रमाण मान लेना। वह कहता है, खोजना, अन्वेषण करना। वह यह नहीं कहता कि मेरी बात मान लो कि यही सच है। जो आदमी ऐसा कहता है, वह गुरु नहीं है, वह तो शत्रु है, क्योंकि वह आपके भीतर सोच-विचार के पैदा होने के बीज को नष्ट कर रहा है। वह आपको विश्वास की तरफ ले जा रहा है। विश्वास आपको अंधेपन की तरफ ले जाएगा। कल कोई दूसरा आदमी कहेगा कि मेरी बात मान लो, क्योंकि मेरी उम्र भी ज्यादा है, फिर आप उसकी बात भी मान लेना। परसों कोई तीसरा आदमी कहेगा कि मेरी बात मान लो, तो उसकी बात भी मान लेना।

दुनिया में बड़ा खतरा है विश्वास के कारण। क्योंकि जो लोग विश्वास करते हैं, वे किसी भी चीज पर विश्वास कर सकते हैं। उन्हें कोई भी चीज समझाई जा सकती है, क्योंकि विश्वास करने वाला आदमी कभी विचार नहीं करता। इसलिए दुनिया की हुकूमतें, दुनिया के पोलिटिशियंस, दुनिया के धर्म-पुरोहित, दुनिया के शोषण करने वाले लोग, कोई भी यह नहीं चाहते कि आप विचार करो। वे सब चाहते हैं, विश्वास करो। क्योंकि आप विश्वास करोगे, तो दुनिया में कोई क्रांति नहीं होगी, कोई बगावत नहीं होगी। आपका शोषण मजे से होता रहेगा, आपको मूढ़ बनाया जाता रहेगा और आप चुपचाप चलते रहोगे। विचार से वे सब घबड़ाए हुए हैं। और विचार के न होने का यह परिणाम है कि पांच हजार साल से आदमी कष्ट उठा रहा है, न मालूम कितने प्रकार के, जिनका कोई हिसाब नहीं है। विचार पैदा होना चाहिए। क्योंकि विचार बगावत है, विचार रिबेलियन है। विचार पैदा होना चाहिए, तो शायद बगावत भी पैदा हो और हम एक नई दुनिया बनाने में समर्थ हो जाएं। 

अंतर की खोज 

ओशो 

शब्दों का भार

मनुष्य के मन पर शब्दों का भार है; और शब्दों का भार ही उसकी मानसिक गुलामी भी है। और जब तक शब्दों की दीवालों को तोड़ने में कोई समर्थ न हो, तब तक वह सत्य को भी न जान सकेगा, न आनंद को, न आत्मा को। इस संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। 
 
सत्य की खोज में--और सत्य की खोज ही जीवन की खोज है--स्वतंत्रता सबसे पहली शर्त है। जिसका मन गुलाम है, वह और कहीं भला पहुंच जाए, परमात्मा तक पहुंचने की उसकी कोई संभावना नहीं है। जिन्होंने अपने चित्त को सारे बंधनों से स्वतंत्र किया है, केवल वे ही आत्माएं स्वयं को, सत्य को और सर्वात्मा को जानने में समर्थ हो पाती हैं।
 
अंतर की खोज 
 
ओशो 
 
 
 
 
 

हम शांत कैसे हो जाएं? आप कहते हैं, शांति द्वार है; आप कहते हैं, शून्य द्वार है, तो हम शांत कैसे हो जाएं? शून्य कैसे हो जाएं? निर्विकल्प दशा को कैसे उपलब्ध हो जाएं? समाधि कैसे मिले?



बहुत सरल है निर्विकल्प दशा को उपलब्ध करना। अत्यंत सरल, उससे सरल कोई बात ही नहीं है। लेकिन ये जो तीन बातें मैंने पहली कहीं, ये बड़ी कठिन हैं। और इन तीन को जो नहीं कर पाता वह उस अत्यंत सरल बात को भी नहीं कर पाता। वह चौथी सीढ़ी है। इन तीन को पार करके ही उसे पार किया जा सकता है। वह तो बहुत सरल है। कठिनाई है इन तीन बातों की--विश्वास को, अनुकरण को, आदर्श को त्यागने में बड़ी कठिन, बड़ा आर्डुअस, बड़ा श्रम है। लेकिन चौथी बात बहुत सरल है। जो इन तीन बातों को कर ले, चौथी बात करनी ही नहीं पड़ती, बड़ी सरलता से हो जाती है। उस सूत्र के संबंध में अंत में थोड़ी सी बात आपको समझाऊं। लेकिन इन तीन को किए बिना वह नहीं हो सकेगा।

चित्त की निर्विकल्प दशा, शून्य दशा, ध्यान दशा बहुत सरल है। लेकिन सीढ़ियां जो उस तक पहुंचाती हैं वे बड़ी कठिन मालूम होती हैं। और वे भी कठिन इसलिए नहीं हैं कि वे कठिन हैं, आप में साहस नहीं है जरा सा भी, इसलिए वे कठिन हो गई हैं। साहस हो, एक क्षण की देर नहीं है।

शून्यता पा लेनी बहुत सरल है, साहस चाहिए। 

क्या करें शून्यता पाने को

बहुत सरल सी बात है, अगर चित्त के प्रति चित्त में चलती हुई जो विचार की धारा है, दिन-रात चल रही है, विचार और विचार और विचार, चित्त में विचारों की शृंखला चल रही है। जैसे रास्ते पर लोग चलते हैं, ऐसा ही चित्त में विचार चलते हैं। यह विचारों की भीड़ चल रही है चित्त में। इसके प्रति अगर कोई चुपचाप जागरूक हो जाए, साक्षी बन जाए, बस और कुछ भी न करे। लड़ने की जरूरत नहीं है, राम-राम जपने की जरूरत नहीं है। क्योंकि राम-राम जपना खुद ही अशांति का एक रूप है। एक आदमी राम-राम, राम-राम कर रहा है, यह आदमी बहुत अशांत है, और कुछ भी नहीं। क्योंकि शांत आदमी इस तरह की बकवास करता है, एक ही शब्द को लेकर दोहराता है बार-बार? यह आदमी अशांत ही नहीं है, पागल होने के करीब है। चूंकि हम निरंतर इस बात को मान बैठे हैं कि राम-राम जपना बड़ा अच्छा है। हम फिकर नहीं कर रहे। यही आदमी अगर एक कोने में बैठ कर कुर्सी, कुर्सी, कुर्सी, कुर्सी कहने लगे, तो हम चिंतित हो जाएंगे। 

यही आदमी अगर कुर्सी, कुर्सी, कुर्सी कहने लगे, तो हम चिंतित हो जाएंगे। भागेंगे, कहेंगे कि चिकित्सा करवानी है, हमारे घर में एक व्यक्ति कुर्सी, कुर्सी, कुर्सी घंटे भर तक बैठ कर कहता रहता है। लेकिन राम-राम कहने में कोई फर्क है? एक ही बात कोई शब्द को लेकर दोहराना विक्षिप्त होने की शुरुआत है, स्वस्थ होने की नहीं। चित्त रुग्ण हो रहा है। न तो राम-राम की जरूरत है, जिसको आप जप कहते हैं, न मंत्रों की जरूरत है। चित्त को शांत करना है। और आप व्यर्थ की बातें दोहरा कर उसको अशांत कर रहे हैं शांत नहीं।

कुछ मत दोहराइए, कोई भगवान का नाम नहीं है। कोई शब्द-मंत्र नहीं है। कुछ दोहराने की जरूरत नहीं है। फिर चुपचाप बैठ कर मन में जो अपने आप चल रहा है कृपा करके उसको ही देखिए, अपनी तरफ से और मत चलाइए। वैसे ही काफी चल रहा है अब आप और काहे को चलाने की कोशिश कर रहे हैं। जो मन में चल रहा है अपने आप, आप उसके किनारे बैठ कर चुपचाप देखते रहिए, बस साक्षी हो जाइए, जस्ट ए विटनेस, सिर्फ एक देखने वाले। बुरा चले तो भी निकालने की कोशिश मत करिए, क्योंकि निकालने की कोशिश में आप सक्रिय हो गए, फिर साक्षी न रहे। हटाने की कोशिश मत करिए किसी विचार को। किसी विचार को लाने की कोशिश भी मत करिए। क्योंकि दोनों हालत में आप कूद पड़े धारा में, बाहर खड़े न रहे। मन की धारा के किनारे तटस्थ तट पर बैठ जाइए और देखते रहिए, मन को चलने दीजिए, चुपचाप देखते रहिए। और कुछ भी मत करिए, सिर्फ देखना, सिर्फ दर्शन पर्याप्त है। आप थोड़े ही दिनों में पाएंगे कि देखते ही देखते मन की धारा क्षीण होने लगी, मन की नदी का पानी सूखने लगा। जैसा आपकी गांव की नदी का सूखा रह जाता है, वैसे ही मन का पानी धीरे-धीरे सूखने लगेगा। आप देखते रहिए, धीरे-धीरे अनुभव होने लगेगा आपको कि देखते ही देखते बिना कुछ किए मन की धारा क्षीण होने लगी है, और एक दिन आप चकित हो जाएंगे कि आप बैठे हैं और मन की धारा में कहीं कोई विचार नहीं है। जिस दिन भी यह अनुभव आपको हो जाएगा, उसी दिन आपको पता चल जाएगा कि दर्शन विचार की धारा को तोड़ने की विधि है। अ-दर्शन मर्ूच्छित भाव से विचार में पड़े रहना विचार को बढ़ाने की विधि है। हम मर्ूच्छित भाव से विचार में पड़े रहते हैं, विचार को देखते नहीं। बस इसके अतिरिक्त और कोई बंधन नहीं है विचार के।

जिस दिन भी आप द्रष्टा होने में समर्थ हो जाते हैं उसी दिन विचार विलीन हो जाते हैं। और तब जो शेष रह जाता है वह है शांति, वह है निर्विकल्प दशा, वह है समाधि, वह है ध्यान, और भी कोई नाम, जिसको जो मर्जी हो दे सकता है। वह है चित्त की निर्विकार स्थिति। उस दशा में ही जाना जाता है जीवन, उस दशा में ही पहचाना जाता है सत्य, उस दशा में ही मिलन हो जाता है उससे जिसे भक्त भगवान कहते हैं, ज्ञानी आत्मा कहते हैं, विचारशील लोग सत्य कहते हैं। सत्य की उपलब्धि ही मुक्ति है। उसको जानते ही व्यक्ति के जीवन में फिर कोई बंधन, कोई दुख, कोई मृत्यु नहीं रह जाती। 


इस दिशा में थोड़ा प्रयोग करें और देखें। क्योंकि इस दिशा में तो प्रयोग करके देखा ही जा सकता है। यह दिशा तो सिर्फ अनुभव की दिशा है। इसमें कोई और आपके साथ कोई सहयोग नहीं कर सकता। कोई आपको पकड़ कर समाधि में नहीं ले जा सकता। आपको ही श्रम करना होगा। 

और मैं कहता हूं, अत्यंत सरल है समाधि को उपलब्ध करना, अगर पहले की सीढ़ियां चढ़ने का साहस आपमें हो। 

अंतर की खोज 

ओशो

Popular Posts