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Wednesday, November 22, 2017

मुझे लगता है कि मैं बीच में लटका हुआ हूं : न तो इस संसार में हूं और न उस संसार में हूं न तो कुत्ता हूं और न परमात्मा हूं इस अवस्था से बाहर कैसे निकलूं?



यदि तुम इससे बाहर आते हो, तो तुम कुत्ता बन जाओगे। यदि तुम खो जाते हो, पूरी तरह खो जाते हो फिर कोई बचता ही नहीं जो इसके बाहर आ सकता हो तो तुम परमात्मा हो जाओगे। इसलिए मुझसे मत पूछो कि इससे बाहर कैसे निकलूं। यह अहंकार पूछ रहा है कि इससे बाहर कैसे निकलूं। तुम्हें पता नहीं चल रहा है कि तुम कहां हो। सुंदर है, शुभ है। थोड़े और खो जाओ और 'ना कुछ' हो जाओ। और मिट जाओ। तुम थोड़े कम खोए हो : आधा कुत्ता ही खोया है।

भारत में हमारे पास मनुष्य के विकास के संबंध में सुंदर कथाएं हैं। सर्वाधिक अर्थपूर्ण और सुंदर कथाओं में से एक है परमात्मा के अवतार की कथा, नरसिंह अवतार की कथा आधा मनुष्य, आधा सिंह। हिंदू अवतारों में परमात्मा का एक अवतार है नरसिह आध मनुष्य, आधा सिंह। यही है खोई हुई अवस्था। जब तुम्हें लगता है कि तुम आधे कुत्ते हो और आधे परमात्मा; जब तुम्हें लगता है कि न तुम कुत्ते हो और न परमात्मा, हर चीज धुंधली धुंधली है, सीमाएं अस्पष्ट हैं; जब तुम स्वयं को सेतु के मध्य में अनुभव करते हो; तो यह नरसिंह की अवस्था है. आधा मनुष्य, आधा सिंह।


यदि तुम इससे बाहर आने की कोशिश करते हो, तो तुम पूरे सिंह हो जाओगे, क्योंकि तब तुम और ज्यादा सघन हो जाओगे। तुम पीछे लौट जाओगे। इससे बाहर आने का अर्थ है पीछे हट जाना। वह कोई प्रगति न होगी, विकास न होगा। उसकी जरूरत नहीं है। और खो जाओ, और मिट जाओ। तुम इतने भयभीत क्यों हो इस स्थिति से? क्योंकि तुम खोयाखोया अनुभव कर रहे हो; तुम्हारी पहचान अब स्पष्ट नहीं है, तुम कौन हो एकदम पक्का नहीं है, सीमाएं खो रही हैं; तुम्हारा चेहरा एकदम पहचान में नहीं आ रहा है। तुम्हारा जीवन प्रवाह जैसा हो गया है। अब वह पत्थर जैसा नहीं है। वह पानी की भांति ज्यादा है; कोई रूप नहीं, आकार नहीं। तुम भयभीत हो जाते हो।


तुम्हारे भीतर जो भयभीत है, वह कुत्ता है। क्योंकि यदि तुम थोड़ा और आगे बढ़ते हो तो कुत्ता पूरी तरह खो जाएगा, मिट जाएगा।
 
पहली बात, जब कोई यात्रा आरंभ करता है, तो वह बर्फ की भांति होता है, एकदम ठंडा, पत्थर जैसा होता है। जब थोड़ा आगे बढ़ता है, तो वह पिघलता है, बर्फ पानी बन जाती है। यह होती है धुंधली  धुंधली अवस्था, नरसिंह की अवस्था, आधी आधी। यदि तुम और आगे जाते हो, तो तुम वाष्पीभूत हो जाओगे, मिट जाओगे। न केवल तुम पानी हो जाओगे, तुम भाप बन जाओगे, अब तुम दिखाई नहीं पड़ोगे; तुम तिरोहित हो जाओगे। यदि तुम भयभीत हो इस मिटने से, तो तुम सहारा खोजोगे। तुम कोशिश करोगे फिर से जम जाने की, ठोस हो जाने की, ताकि तुम कोई रूप, कोई आकार, कोई नाम पा सको कोई 'नाम रूप'। हिंदुओं ने इस संसार को कहा है, नाम रूप का संसार। तब तुम्हारी एक पहचान होगी, तुम जानोगे कि तुम कौन हो।

केवल कुत्ता जानता है कि वह कौन है हर चीज निश्चित है, तय है। यदि तुम यात्रा पर आगे  बढ़ते हो, पथ पर गतिमान होते हो, तो सब धुंधला  धुंधला हो जाता है पहाड़ पहाड़ नहीं रहते, नदियां नदियां नहीं रहती। बड़ी अस्तव्यस्तता हो जाती है, एक अराजकता हो जाती है।
 
लेकिन स्मरण रहे : केवल अराजकता से ही नाचते सितारे पैदा होते हैं। ध्यान रहे, केवल अराजकता में ही परमात्मा पाया जाता है। फिर तीसरी अवस्था है वाष्पीभूत होने की, इस तरह तिरोहित हो जाने की कि कोई नामो निशान भी नहीं बचता। एक पदचिह्न भी पीछे नहीं छूटता। तुम खो जाते हो। तुम्हारा होना ' होने' जैसा हो जाता है। और यही वह अवस्था है, जिसे मैं परम अवस्था कहता हूं परमात्म अवस्था कहता हूं।

इसीलिए तुम परमात्मा को नहीं देख सकते। तुम खोजते रहो, खोजते रहो : एक दिन तुम खो जाओगे, और वही ढंग है परमात्मा को पाने का। परमात्मा कहीं मिलेगा नहीं। तुम परमात्मा को कहीं खड़े हुए नहीं पाओगे साक्षात्कार करने के लिए, क्योंकि कौन करेगा साक्षात्कार? यदि तुम अभी भी मौजूद हो, बचे हो साक्षात्कार करने के लिए, तो परमात्मा की कोई संभावना नहीं है। और जब तुम्हीं न बचे तो कौन करेगा साक्षात्कार? किसी विषयवस्तु की भांति परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होगा तुमसे। तुम्हारा उससे साक्षात्कार होगा अपने आत्यंतिक केंद्र की भाति। लेकिन वह केवल तभी संभव है जब तुम पिघल जाओ, तुम तरल हो जाओ पानी की भांति, फिर तुम वाष्पीभूत हो जाते होतुम आकाश में उड़ते बादल हो जाते हो, जिसका कोई पता नहीं होता, कोई नाम नहीं होता, कोई रूप नहीं होता; एक निर्मुक्त बादल, जिसका कोई ठौर ठिकाना नहीं होता।
 
यही भय है : क्योंकि यह एक महामृत्यु है। यह है संपूर्ण अतीत के प्रति मरना। जो भी तुम हो, जो भी तुम्हारे पास है ,सब छोड़ना होता है; सूली पर चढ़ना होता है। मृत्यु से पहले मर जाओ, वही एकमात्र ढंग है परमात्मा होने का।

तो इस बीच की अवस्था से भयभीत मत होना; अन्यथा तुम पीछे जा सकते हो। तुम फिर ठोस हो जाओगे बर्फ की भांति। तुम कोई नाम रूप, पहचान पा लोगे, लेकिन तुम चूक गए।

पतंजलि योगसूत्र 

ओशो 

एक और मित्र ने पूछा है कि आप जो कह रहे हैं वह आपका अनुभव है कि सत्य है?



शायद उनका खयाल है कि अनुभव और सत्य दो चीजें हैं। अनुभव यानी सत्य! लेकिन कौन सा अनुभव सत्य है? असत्य अनुभव भी तो होते हैं। एक आदमी रास्ते पर जा रहा है और एक रस्सी पड़ी है और सांप का अनुभव हो जाता है, वह भाग खड़ा होता है। वह लौट कर कहता है, सांप था, मैंने अनुभव किया। लेकिन सांप तो वहां था नहीं, रस्सी पड़ी थी। असत्य अनुभव भी होते हैं।


असत्य अनुभव भी होते हैं, शायद इसीलिए उन्होंने पूछा, कि आप जो कह रहे हैं, अनुभव है कि सत्य है। असत्य अनुभव भी होते हैं, लेकिन कौन सा? और सत्य कौन सा अनुभव? और सत्य पर्यायवाची हो जाते हैं। जब तो मैं की प्रतीति चलती है, तब तक अनुभव का कोई भरोसा नहीं कि वह सत्य है कि झूठ। सच तो यह है, कि जब तक कोई भीतर मैं है, तब तक सत्य का अनुभव नहीं हो सकता है।

मैं सभी अनुभवों को असत्य कर देता है। लेकिन जिस दिन भी मैं चला गया, मैं नहीं है, सिर्फ अनुभव हुआ। आप ऐसा नहीं कहते कि मैंने अनुभव किया, आप कहते हैं, मैं नहीं था, तब अनुभव हुआ। 


फिर असत्य नहीं होता, फिर असत्य करने वाली चीज ही चली गई। जैसे हम एक लकड़ी पानी में डालें। पानी में डालते से ही लकड़ी तिरछी हो जाती है। लकड़ी तिरछी नहीं होती, लेकिन लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ने लगती है। वह जो पानी की सघनता है, वह लकड़ी को तिरछा कर देती है। लकड़ी तिरछी फिर भी नहीं होती, लकड़ी बाहर निकालिए, लकड़ी सीधी है। फिर पानी में डालिए, लकड़ी तिरछी दिखाई फिर भी नहीं होती, लकड़ी बाहर निकालिए, लकड़ी सीधी है। फिर पानी में डालिए, लकड़ी फिर तिरछी हो गई। वह पानी का जो माध्यम है, वह लकड़ी को तिरछी करता है। अहंकार का जो माध्यम है, ईगो का जो माध्यम है, वह सत्य को असत्य करता है।


तो जब तक अहंकार के द्वारा कोई देख रहा है जगत को, तब तक उसके अनुभव असत्य के अनुभव होंगे। यही असत्य के अनुभव का अर्थ हुआ, अहंकार के द्वारा देखी गई वस्तु। और सत्य के अनुभव का अर्थ हुआ, निर-अहंकार दशा में जाना गया, जहां कोई मैं नहीं है वहां जाना गया।


इसलिए भूल कर भी कभी आप यह मत सोचना, कि मैं सत्य को जान लूंगा। मैं कभी सत्य को नहीं जानता। जब सत्य जाना जाता है तब मैं होता ही नहीं, और जब तक मैं होता है, तब सत्य का कोई प्रयोजन नहीं। और हम सब मैं से भरे हुए हैं। हम जीवन भर मैं को ही मजबूत करते हैं। और मैं के लिए अनुभवों का आधार लेकर सब अनुभव इकट्ठे करते हैं। और जब तक मैं का आधार है, तब तक सब अनुभव झूठे होते हैं, कोई अनुभव सत्य नहीं हो सकता।


इसलिए अगर ठीक से समझें, तो मैं के द्वारा देखा गया परमात्मा ही माया है। मैं के द्वारा देखा गया परमात्मा ही जगत है। मैं के द्वारा देखा गया वह है, जो नहीं है। और जिस दिन मैं समाप्त हो जाता है, उस दिन जो देखा जाता है, उस दिन जो प्रतीति होती है, वह प्रतीति प्रभु है, सत्य है। कोई और नाम दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ती है।

जीवन संगीत ( साधना शिविर)

ओशो

जीवन में इतनी उदासी और निराशा क्यों है?

जीवन में न तो उदासी है और न निराशा है। उदासी और निराशा होगी--तुममें। जीवन तो बड़ा उत्फुल्ल है। जीवन तो बड़ा उत्सव से भरा है। जीवन जीवन तो सब जगह--नृत्यमय है; नाच रहा है। उदास...?
 
तुमने किसी वृक्ष को उदास देखा? और तुमने किसी पक्षी को निराश देखा? चांदत्तारों में तुमने उदासी देखी? और अगर कभी देखी भी हो, तो खयाल रखना: तुम अपनी ही उदासी को उनके ऊपर आरोपित करते हो।

तुम उदास हो, तो रात चांद भी उदास मालूम पड़ता है। तुम्हारा पड़ोसी उदास नहीं है, तो उस को उदास नहीं मालूम पड़ता। उस के लिए चांद नाचता हुआ मालूम पड़ता है। पड़ोसी को प्रियतमा आ गई है, तो चांद प्रफुल्ल मालूम होता है। तुम्हारी प्रियतमा चल बसी है, मर गई है, तो चांद रोता मालूम पड़ता है। यह तो तुम्हारी ही धारणा तुम चांद पर थोप रहे हो। जिस दिन तुम कोई धारणा न रखोगे, तुम पाओगे--सब तरफ उत्सव है। 

देखते नहीं: ये गुलमोहर के फूल, ये वृक्ष, यह हरियाली, यह पक्षियों के गीत--चारों तरफ जीवन अपूर्व उत्सव में लीन है। सिर्फ मनुष्य उदास मालूम होता है। क्या हो गया है? कौन सी दुर्घटना मनुष्य के जीवन में हो गई है?

जो पहली दुर्घटना समझने जैसी है, जिसके कारण मनुष्य उदास हो गया है: वह है कि मनुष्य अकेला है, जिसने अपने को विराट से तोड़ लिया है। जो सोचता है: मैं अलग-थलग। जिसने एक अस्मिता और अहंकार निर्मित कर लिया है। 

इस अस्तित्व में कहीं भी अहंकार नहीं है--सिर्फ आदमी को छोड़कर। पशु-पक्षी हैं, पौधे हैं, पहाड़ हैं, चांदत्तारे हैं, लेकिन कोई अहंकार नहीं है। वे सब परमात्मा में जी रहे हैं; विराट के साथ एक हैं--तल्लीन हैं। सिर्फ आदमी टूट गया है--संगीत से। सिर्फ आदमी के सुरत्ताल बेसुरे हो गये हैं। 

यह जो विराट संगीत का उत्सव चल रहा है, इसमें मनुष्य अकेला है, जो अपनी ढपली अलग बजाता है; जो कोशिश करता है कि मैं अपनी ढपली से ही आनंदित हो जाऊं--इसलिए उदासी है।

अहंकार है कारण--उदासी और निराशा का।

निराशा का क्या अर्थ होता है? निराशा का अर्थ होता है: तुमने आशा बांधी होगी, वह टूट गई। अगर आशा न बांधते, तो निराशा न होती। निराशा आशा छी छाया है। 

आदमी भर आया बांधता है; और तो कोई आशा बांधता ही नहीं। आदमी ही कल की सोचता है, परसों की सोचता है, भविष्य को सोचता है। सोचता है, आयोजन करता है बड़े कि कैसे विजय करूं, कैसे जीतूं? कैसे दुनिया की दिखा दूं कि मैं कुछ हूं? कैसे सिकंदर बन जाऊं? फिर नहीं होती जीत, तो निराशा हाथ आती है। सिकंदर भी निराश होकर मरता है; रोता हुआ मरता है। 

जो भी आदमी आशा से जीएगा, वह निराश होगा। आशा का मतलब है: भविष्य में जीना; अहंकार की योजनाएं बनाना; और अहंकार को स्थापित करने के विचार करना। फिर वे विचार असफल होए। अहंकार जीत नहीं सकता। उसकी जीत संभव नहीं है। उसकी जीत ऐसे ही असंभव है, जैसे सागर की एक लहर सागर के खिलाफ जीतना चाहे। जीतेगी? सागर की लहर सागर का हिस्सा है। 

मेरा एक हाथ मेरे खिलाफ जीतना चाहे, कैसे जीतेगा? वह तो बात ही पागलपन की है। मेरे हाथ मेरी ऊर्जा है। हम लहरें हैं--एक ही परमात्मा की। जीत और हार का कहां सवाल है? या तो परमात्मा जीतता है, या परमात्मा हारता है। हमारी तो न कोई जीत है, न कोई हार है। चूंकि हम जीत के लिए उत्सुक हैं, इसलिए हार निराश करती है।

भक्त का इतना ही अर्थ है; भक्त कहता है: तू चाहे-जीत; तू चाहे--हार; और तुझे जो मेरा उपयोग करना है--कर ले। हम तो उपकरण हैं। हम तो बांस की पोंगरी हैं, तुझे जो गीत गाना हो--गा ले। गीत हमारा नहीं है। हम तो खाली पोंगरी हैं। गाना हो, तो ले। न गाना हो--तो न गा। तेरी मर्जी। न गा, तो सब ठीक; गा--तो सब ठीक। 

ऐसी दशा में निराशा कैसे बनेगी? भक्त निराश नहीं होता। निराश हो ही नहीं सकता। उसने निराशा का सार इंतजाम तोड़ दिया। आशा ही न रखी, तो निराशा कैसे होगी?

अब तुम कहते हो: मन उदास क्यों होता है? जीवन में उदासी क्यों है? उदासी का अर्थ ही यही होता है कि तुम जो करना चाहते हो, नहीं कर पाते। जगह-जगह पड़ गया हूं। और मैं पागल हुआ जा रहा हूं कि यह सब तो मैं इकट्ठे तो बन नहीं सकता! और इस सब ऊहापोह में मुझे यह भी समझ में नहीं आता कि मैं क्या बनना चाहता हूं!

मनुष्य के जीवन की अधिकतम उदासी का कारण यही है कि तुम सहज नहीं जी रहे हो। तुम्हारा हृदय जहां स्वभावतः जाता है, वहां नहीं जा रहे हो। तुमसे कुछ इतर लक्ष्य बना लिए हैं। 

कण थोड़े कांकर घने 

ओशो

सम्यक श्रवण



बहुत प्रसिद्ध फकीर हुआ, यहूदी बालसेन। बालसेन के शिष्य जो भी बालसेन बोलता था, लिखते थे। बालसेन अकसर उनसे कहता कि लिख लो, जो मैंने कहा ही नहीं। और यह भी लिख लेना, तुम वही लिख रहे हो, जो मैंने कहा नहीं है।

बालसेन को समझा भी तो नहीं जा सकता। क्योंकि समझ शब्दों से नहीं आती, तुम्हारे अनुभव से आती है। तुम वही तो सुनोगे जो तुम सुन सकते हो।

एक दिन ऐसा हुआ कि बालसेन बोलता ही गया। सुननेवाले थक गए। और थोड़ी ही देर में सुनने वालों के हाथ से सब सूत्र खो गए। यह समझ में ही न आया कि वह क्या बोलता है? कहां बोल रहा है? क्यों बोल रहा है? फिर धीरे-धीरे लोगों के काम का समय हो गया। मंदिर खाली होने लगा। लोगों की दुकानें खुलने का वक्त आ गया। आफिस, दफ्तर लोग भागे। आखिर में बालसेन अकेला रह गया। जब आखिरी आदमी जा रहा था तो उसने कहा कि, 'रुक! क्या मेरी जान लेगा?' उस आदमी ने कहा, कि 'मैं क्यों आपकी जान लूंगा? मैं तो जा रहा हूं। सब लोग जा चुके हैं।'

बालसेन ने कहा कि 'मेरी हालत तुमने वैसी कर दी, जैसे कोई आदमी सीढ़ी पर चढ़े। तुम्हें जहां तक दिखाई पड़ा, तुम सीढ़ी को सम्हाले रहे। लेकिन यह सीढ़ी वहां है, जो ज्ञात से अज्ञात तक जाती है। और जैसे ही मैं तुम्हारी आंखों के पार हुआ, तुम सीढ़ी छोड़कर जाने लगे। मेरी जान लोगे? मैं तो चढ़ गया अज्ञात पर और तुम सब भागे जा रहे हो। सीढ़ी सम्हालने वाला तक कोई नहीं। तो तू जब तक रुका था, तो मैंने सोचा कम से कम एक तो मौजूद है, जो सीढ़ी को सम्हाले रखेगा। तब तक मैं कुछ न बोला। कम से कम मुझे नीचे तो उतर आने दे!'

बुद्ध जहां से बोलते हैं वह सीढ़ी का वह हिस्सा है, जो अज्ञात से टिका है। तुम जहां खड़े हो वह सीढ़ी का वह हिस्सा है, जो ज्ञात की पृथ्वी से टिका है। तुम्हारे बीच संवाद तो होना असंभव है। बुद्ध जो कहेंगे, तुम वह न समझ पाओगे। तुम जो समझोगे, वह बुद्ध ने कभी कहा नहीं।

इसलिए महावीर या बुद्ध के पास जब भी कोई आता तो वे कहते हैं, इसके पहले कि मैं बोलूं, तू सुनने की कला सीख ले। मेरे बोलने से कुछ सार नहीं है। क्योंकि मैं जो भी कहूंगा वह गलत समझा जाएगा। और गलत समझा गया ज्ञान अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक है। अज्ञानी तो विनम्र होता है, भयभीत होता है, डरता है; सोचता है कि मुझे कुछ पता नहीं है, लेकिन अर्ध-ज्ञानी अहंकार से भर जाता है। और उसे लगता है, मुझे पता है। और एक दफे जिसे खयाल हो गया मुझे पता है और पता नहीं है, उसका भटकना सुनिश्चित है।

इस बात को हम ठीक से समझ लें। 'सम्यक श्रवण' का, 'राईट लिसनिंग' का क्या अर्थ होगा? सम्यक श्रवण का अर्थ होगा, जब कोई बोलता हो, तब तुम सिर्फ सुनो। तब तुम सोचो मत। क्योंकि तुमने सोचा कि एक धुआं खड़ा हो गया। तुमने सोचा, कि तुम्हारे विचार मिश्रित होने लगे। तुमने सोचा कि तुम्हारा मन खिचड़ी की भांति हो गया। तुमने सोचा, कि तुम सुनोगे कैसे?

मन एक साथ एक ही काम कर सकता है। मन की क्षमता दो काम एक साथ करने की नहीं है। और जब कभी तुम दो काम भी करते हो, तब भी तुम समझ लेना; एक क्षण मन एक काम करता है फिर तुम दूसरा काम करते हो। फिर एक काम करता है। लेकिन एक क्षण में मन एक ही काम करता है। तुम बदल सकते हो। तुम मुझे सुनो एक क्षण में फिर एक क्षण सोचो; फिर मुझे सुनो, फिर सोचो। ऐसा तुम कर सकते हो, लेकिन जितनी देर तुम सोचोगे, उतनी देर तुम मुझे चूक जाओगे। इसका यह अर्थ नहीं है कि आवाज तुम्हारे कानों में न पड़ेगी, आवाज तो पड़ेगी; कान झंकृत होंगे, शब्द सुने जाएंगे, लेकिन समझे न जा सकेंगे। 

तुम्हारे घर में आग लग गई हो, रास्ते पर कोई गीत गा रहा हो, क्या तुम वह गीत सुन सकोगे? गीत सुनाई तो पड़ेगा लेकिन तुम न सुन सकोगे। तुम वहां मौजूद नहीं। तुम्हारे घर में आग लगी है, तुम चिंता से भरे हो; तुम्हारे मन में लपटें उठ रही हैं। भविष्य, अतीत सब सामने खड़ा हो गया है; अब क्या होगा? तुम भयातुर हो, तुम पत्ते की तरह कंप रहे हो तूफान में; तुम गीत सुन सकोगे? गीत कान पर पड़ेगा, आवाज तो टकराएगी, ध्वनि तो सुनी जाएगी, लेकिन अगर बाद में कोई तुमसे पूछेगा कि 'कौन-सा गीत गाया गया था?' तुम कहोगे, 'कैसा गीत! किसने गाया?'

घर में आग लग गई है, और तुम भागे जा रहे हो, रास्ते पर लोग नमस्कार करेंगे, क्या तुम उनकी नमस्कार सुन सकोगे? यह भी हो सकता है कि तुम जवाब भी दो, फिर भी तुमने सुना नहीं। यह भी हो सकता है कि हाथ यंत्रवत उठें और नमस्कार का उत्तर दे दें। आदत के कारण एक आटोमेटिक, यंत्रवत तुम व्यवहार कर लो, लेकिन नमस्कार न तो तुमने सुनी, न तुमने जवाब दिया। तुम सोए हुए थे। तुम वहां थे ही नहीं।

सम्यक श्रवण का अर्थ होगा, जब बोला जाए तब तुम चुप रहो। तुम्हारे भीतर की जो अंतर्वाता है, वह मौन हो जाए। तुम्हारे भीतर कोई तरंगें न चलती हों। तब तुम्हारा सुनना शुद्ध होगा। तभी बुद्ध कहेंगे, झेन फकीर कहेंगे कि तुमने सुना, तुमने कानों का उपयोग किया। तुम जब देखते हो तब तुम देखते ही नहीं हो, तुम जो देखते हो, उसके ऊपर प्रक्षेप भी करते हो; प्रोजेक्ट भी करते हो।

बिन बाती बिन तेल 

ओशो

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