Osho Whatsapp Group
To Join Osho Hindi / English Message Group in Whatsapp, Please message on +917069879449 (Whatsapp) #Osho Or follow this link http...
Wednesday, March 1, 2023
जिस भगवान को हम नहीं जानते, उसका स्मरण कैसे करें?
Monday, August 22, 2022
पात-पात डोलती है प्रार्थना सांझ गुनगुनाने लगी
याद घर बुलाने लगी! इन थोड़े-से शब्दों में सारे धर्म का सार है--याद घर बुलाने लगी। जहां हम हैं, वहां हम तृप्त नहीं। जो हम हैं उससे हम तृप्त नहीं। एक बात निश्चित है कि हम अपने घर नहीं, कहीं परदेश में हैं। कहीं अजनबी की भांति भटक गए हैं। कहां जाना है यह भला पता न हो, लेकिन इतना सभी को पता है कि जहां हम हैं, वहां नहीं होना चाहिए।
एक बेचैनी है। कुछ भी करो, कितना ही धन कमाओ, कितनी ही पद-प्रतिष्ठा जुटाओ, कुछ कमी है, जो मिटती नहीं। कोई घाव है, जो भरता नहीं। कोई पुकार है जो भीतर कहे ही चली जाती है: यह भी नहीं, यह भी नहीं; कहीं और चलो। खोजो घर। द्वार-द्वार दरवाजे-दरवाजे दस्तक दिए। न मालूम कितने- कितने जन्मों में, कितने-कितने ढंग से अपने घर को खोजा है।
मगर सारी खोज एक ही बात की है कि कोई ऐसा स्थान हो, जहां तृप्ति हो। कोई ऐसी भावदशा हो, जिसमें कोई वासना न उठती हो।
वासना का अर्थ ही है कि जो हम हैं, उसमें रस नहीं आ रहा, कुछ और होना चाहिए। चाह का अर्थ ही है बेचैनी। चाह उठती ही बेचैनी से। राहत नहीं है। कोई कांटा चुभ रहा है। कोई अतृप्ति सब तरफ से घेरे है। सब मिल जाता है। फिर भी अतृप्ति वैसी की वैसी बनी रहती है--अछूती, अस्पर्शित।
धर्म का जन्म मनुष्य के भीतर इस महत घटना से होता है--बेचैनी की इस घटना से होता है। जैसे परदेश में हैं, जहां न कोई अपनी भाषा समझता, न कोई अपना है। जहां सब संबंध सांयोगिक हैं। जहां सब संबंध मन के मनाये हुए हैं; वास्तविक नहीं हैं। और जहां पानी का धोखा तो बहुत मिलता है, पानी नहीं मिलता--मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता जल का स्रोत, पास आते रेत ही रेत रह जाती है।
इस भटकाव को हम कहते हैं संसार। इस भटकाव में घर की याद आने लगी तो धर्म की शुरुआत हुई।
पानी पर तिरता है आईना
आंख झिलमिलाने लगी
हाथ भर-भरके देख लिए, जब पाया तब राख से भरे पाया। कभी हीरों से भरा लेकिन हीरे राख हो गए। सोने से भरा, सोना मिट्टी हो गया। संबंधों से भरा, तथाकथित प्रेम से भरा और सब अंततः मूल्यहीन सिद्ध हुआ। और अब हाथ को और भरने की आकांक्षा न रही।
पात-पात डोलती है प्रार्थना
सांझ गुनगुनाने लगी।
तो जिस दिन बाहर से आंख हटने लगती है, उसी दिन:
पात-पात डोलती है प्रार्थना
सांझ गुनगुनाने लगी
तो अब घर जाने का समय करीब आ गया।
प्रार्थना, जो बाहर से घर की तरफ लौटने लगे और अभी घर नहीं पहुंचे--बीच का पड़ाव है। जो संसार में हैं उनके हृदय में प्रार्थना नहीं उठती। जो परमात्मा में पहुंच गए, उनको प्रार्थना की जरूरत नहीं रह जाती। प्रार्थना सेतु है बाहर से भीतर आने का; परदेश से स्वदेश आने का; विभाव से स्वभाव में आने का।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन, तू योगी हो।
तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञाताओं से भी श्रेष्ठ है, सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, ऐसा योगी अर्जुन बने, ऐसा कृष्ण का आदेश है। तीन से श्रेष्ठ कहा है और चौथा बनने का आदेश दिया है। तीनों बातों को थोड़ा-थोड़ा देख लेना जरूरी है।
तपस्वियों से श्रेष्ठ कहा योगी को। साधारणतः कठिनाई मालूम पड़ेगी। तपस्वी से योगी श्रेष्ठ? दिखाई तो ऐसा ही पड़ता है साधारणतः कि तपस्वी श्रेष्ठ मालूम पड़ता है, क्योंकि तपश्चर्या प्रकट चीज है और योग अप्रकट। तपश्चर्या दिखाई पड़ती है और योग दिखाई नहीं पड़ता है। योग है अंतर्साधना, और तपश्चर्या है बहिर्साधना।
अगर कोई व्यक्ति धूप में खड़ा है घनी, भूखा खड़ा है, प्यासा खड़ा है, उपवासा खड़ा है, शरीर को गलाता है, शरीर को सताता है--सबको दिखाई पड़ता है। क्योंकि तपस्वी मूलतः शरीर से बंधा हुआ है। जैसे भोगी शरीर से बंधा होता है; दिखाई पड़ता है उसका इत्र-फुलेल; दिखाई पड़ता है उसके शरीरों की सजावट; दिखाई पड़ते हैं गहने; दिखाई पड़ते हैं महल; दिखाई पड़ता है शरीर का सारा का सारा शृंगार। ऐसे ही तपस्वी का भी सारा का सारा शरीर-विरोध प्रकट दिखाई पड़ता है। लेकिन ओरिएंटेशन एक ही है; दोनों का केंद्र एक ही है--भोगी का भी शरीर है और तथाकथित तपस्वी का भी शरीर है।
हम चूंकि सभी शरीरवादी हैं, इसलिए भोगी भी हमें दिखाई पड़ जाता है और त्यागी भी दिखाई पड़ जाता है। योगी को पहचानना मुश्किल है, क्योंकि योगी शरीर से शुरू नहीं करता। योगी शुरू करता है अंतस से।
योगी की यात्रा भीतरी है, और योगी की यात्रा वैज्ञानिक है। वैज्ञानिक इस अर्थों में है कि योगी साधनों का प्रयोग करता है, जिनसे अंतस चित्त को रूपांतरित किया जा सके।
पर आंखों के फूटने से वासना नहीं फूटती है। आंखों के चले जाने से वासना नहीं जाती है। अंधे की भी कामवासना उतनी ही होती है, जितनी गैर-अंधे की होती है। अगर अंधों के पास कामवासना न होती, तो अंधे सौभाग्यशाली थे; पुण्य का फल था उन्हें। जन्मांध जो है, उसकी भी कामवासना होती है; तो आंख फोड़ लेने से कोई कैसे कामवासना से मुक्त हो जाएगा?
लेकिन योगी? योगी आंख नहीं फोड़ता। आंख के पीछे वह जो ध्यान देने वाली शक्ति है, उसे आंख से हटा लेता है।
रास्ते पर गुजरती है एक स्त्री, और मेरी आंखें उससे बंधकर रह जाती हैं। अब दो रास्ते हैं। या तो मैं आंख फोड़ लूं; आंख फोड़ लूं, तो आप सबको दिखाई पड़ेगा कि आंख फोड़ ली गई। या मैं आंख मोड़ लूं; तो भी दिखाई पड़ेगा कि आंख मोड़ ली गई। या मैं भाग खड़ा होऊं और कहूं कि दर्शन न करूंगा, देखूंगा नहीं, तो भी आपको दिखाई पड़ जाएगा। लेकिन मेरी आंख के पीछे जो ध्यान की ऊर्जा है, अगर मैं उसे आंख से हटा लूं, तो दुनिया में किसी को नहीं दिखाई पड़ेगा, सिर्फ मुझे ही दिखाई पड़ेगा।
योग अंतर-रूपांतरण है।
भोगी भोजन खाए चला जाता है; जितना उसका वश है, भोजन किए चला जाता है। त्यागी भोजन छोड़ता चला जाता है। लेकिन योगी क्या करता है? योगी न तो भोजन किए चला जाता है, न भोजन का त्याग करता है; योगी रस का त्याग कर देता है, स्वाद का त्याग कर देता है। जितना जरूरी भोजन है, कर लेता है। जब जरूरी है, कर लेता है। जो आवश्यक है, कर लेता है। लेकिन स्वाद की वह जो लिप्सा है, वह जो विक्षिप्तता है, जो सोचती रहती है दिन-रात, भोजन, भोजन, भोजन, उसे छोड़ देता है।
लेकिन यह दिखाई न पड़ेगा। यह तो योगी ही जानेगा, या जो बहुत निकट होंगे, वे धीरे-धीरे पहचान पाएंगे--योगी कैसे उठता, कैसे बैठता, कैसी भाषा बोलता। लेकिन बहुत मुश्किल से पहचान में आएगा।
तपस्वी दिखाई पड़ जाएगा, क्योंकि तपस्वी का सारा प्रयोग शरीर पर है। योगी का सारा प्रयोग अंतसचेतना पर है।
तप दिखाई पड़ने से क्या प्रयोजन है? तपस्वी को बाजार में खड़ा होने की जरूरत ही क्या है? यह प्रश्न तो अपना और परमात्मा के बीच है; यह मेरे और आपके बीच नहीं है। आप मेरे संबंध में क्या कहते हैं, यह सवाल नहीं है। मैं आपके संबंध में क्या कहता हूं, यह सवाल नहीं है। मेरे संबंध में परमात्मा क्या कहता है, वह सवाल है। मेरे संबंध में मैं क्या जानता हूं, वह सवाल है।
योगी की समस्त साधना, अंतर्साधना है।
गीता दर्शन
Wednesday, July 20, 2022
दासता ही दुख है
अर्धनारीश्वर
Tuesday, April 5, 2022
भगवान, क्या हम आपकी बातों को कभी भी नहीं समझेंगे, या कि वह सौभाग्य का दिन भी कभी आएगा?
एक प्रश्न पूछा है कि हम शांत कैसे हो जाएं? आप कहते हैं, शांति द्वार है; आप कहते हैं, शून्य द्वार है, तो हम शांत कैसे हो जाएं? शून्य कैसे हो जाएं? निर्विकल्प दशा को कैसे उपलब्ध हो जाएं?
बहुत सरल है निर्विकल्प दशा को उपलब्ध करना। अत्यंत सरल, उससे सरल कोई बात ही नहीं है। लेकिन ये जो तीन बातें मैंने पहली कहीं, ये बड़ी कठिन हैं। और इन तीन को जो नहीं कर पाता वह उस अत्यंत सरल बात को भी नहीं कर पाता। वह चौथी सीढ़ी है। इन तीन को पार करके ही उसे पार किया जा सकता है। वह तो बहुत सरल है। कठिनाई है इन तीन बातों की--विश्वास को, अनुकरण को, आदर्श को त्यागने में बड़ी कठिन, बड़ा आर्डुअस, बड़ा श्रम है। लेकिन चौथी बात बहुत सरल है। जो इन तीन बातों को कर ले, चौथी बात करनी ही नहीं पड़ती, बड़ी सरलता से हो जाती है। उस सूत्र के संबंध में अंत में थोड़ी सी बात आपको समझाऊं। लेकिन इन तीन को किए बिना वह नहीं हो सकेगा।
जैसे कोई हमसे पूछे कि हम फूल कैसे पैदा करें? मैं कहूंगा, फूल पैदा करना बड़ी सरल बात है। फूल पैदा करने में कुछ करना ही नहीं पड़ता। लेकिन बीज लगाने में बड़ी मदद करनी पड़ती है। पानी सींचने में, खाद डालने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। पौधे की सम्हाल करने में, बागुड़ लगाने में बहुत श्रम उठाना पड़ता है। फिर जब सब सम्हल जाती है बात, बीज अंकुर बन जाता, खाद मिल जाती, पानी मिल जाता, चारों तरफ सुरक्षा हो जाती है पौधे की, तो फूल तो अपने आप आ जाते हैं, फूल का आना कोई कठिन है? कुछ भी करना पड़ता है फूल को लाने में? फूल तो अपने आप आटोमेटिक, पौधा सम्हल जाए, फूल आ जाते हैं। लेकिन आप कहें कि पौधे की तो बाकी बातचीत छोड़िए, हमको तो सिर्फ फूल लाना है, तब मामला बहुत कठिन हो जाता है। आप कहें कि यह तो सब ठीक है, विश्वास हमें करने दो, आदर्श हमें मानने दो, अनुकरण हमें करने दो, जैन, हिंदू, मुसलमान हमें बना रहने दो, बाकी चित्त शांत करने का, शून्य करने का कोई रास्ता हो तो बता दें। तो आप ऐसी बात कर रहे हैं कि पौधा तो हम लगाएंगे नहीं, बीज हम डालेंगे नहीं, पानी हम सींचेंगे नहीं, यह तो छोड़ो, ये बातें छोड़ दो, हमें दो इतना बता दो कि फूल कैसे आते हैं? फिर फूल नहीं आते।
चित्त की निर्विकल्प दशा, शून्य दशा, ध्यान दशा बहुत सरल है। लेकिन सीढ़ियां जो उस तक पहुंचाती हैं वे बड़ी कठिन मालूम होती हैं। और वे भी कठिन इसलिए नहीं हैं कि वे कठिन हैं, आप में साहस नहीं है जरा सा भी, इसलिए वे कठिन हो गई हैं। साहस हो, एक क्षण की देर नहीं है।
मैं एक नगर में था। उस नगर के कलेक्टर ने मुझे फोन किया और कहा कि मैं अपनी मां को भी चाहता हूं कि आपके सुनने के लिए लाऊं, लेकिन मेरी मां की उम्र नब्बे के करीब पहुंच गई, और आपकी बातों से मैं परिचित हूं, तो मैं डरता हूं कि इस बुढ़िया को लाना कि नहीं लाना? क्योंकि वह तो चौबीस घंटे माला जपती रहती है, राम-राम जपती रहती है। सोती है तो भी हाथ में माला लिए ही सोती है। तीस वर्ष से यह क्रम चलता है, तो मैं डरता हूं इस बुढ़ापे में आपकी बातें सुन कर कहीं उसको आघात और चोट न लग जाए, कहीं वह विचलित न हो जाए व्यर्थ ही और अशांत न हो जाए, तो मैं लाऊं या न लाऊं? उसकी उम्र नब्बे वर्ष।
मैंने उनसे कहा, अगर उम्र कुछ कम होती तो मैं कहता, दुबारा आऊंगा तब ले आना। उम्र नब्बे वर्ष है इसलिए ले ही आना, क्योंकि दुबारा मिलना हो सके इसका कोई पक्का भरोसा नहीं।
वे अपनी मां को लेकर आए। मैंने देखा उनकी मां माला लिए ही आई हुई थी। हाथ में माला वह चलती ही रहती है। बात सुनने के बाद वे चले गए, दूसरे दिन आए और मुझसे कहने लगे, मैं बहुत हैरान हो गया हूं। आपने तो ऐसी बातें कहीं कि मुझे लगा कि जैसे मेरी मां को जान कर ही आप कह रहे हैं। मुझे लगा मुझसे गलती हो गई जो मैं आपको बता कर अपनी मां को लाया। आप तो जैसे मेरी मां को ही सारी बातें कह रहे हों, ऐसा मुझे लगने लगा। और मैं बहुत डरा हुआ रहा। लौटते में कार में मैंने अपनी मां को पूछा कि तुम्हें चोट तो नहीं लगी, कुछ बुरा तो नहीं लगा? मेरी मां कहने लगी, बुरा? चोट? उन्होंने कहा, माला से कुछ भी नहीं होगा, मुझे बात बिलकुल ठीक लगी, तीस साल का मेरा अनुभव भी कहता है कि कुछ भी नहीं हुआ, मैं माला वहीं छोड़ आई।
इतना साहस। तो मैंने उनसे कहा, तुम्हारी मां तुमसे ज्यादा जवान है। साहस व्यक्ति को युवा बनाता है। छोड़ने का हममें जरा भी साहस नहीं है। इसलिए हम अटके खड़े रह जाते हैं। और व्यर्थ बातें भी छोड़ने का साहस नहीं है, तब तो बहुत कठिनाई हो जाती है।
शून्यता पा लेनी बहुत सरल है, साहस चाहिए।
जगत अनित्य है।
अनित्य का अर्थ होता है, जो है भी और प्रतिक्षण नहीं भी होता रहता है। अनित्य का अर्थ नहीं होता कि जो नहीं है। जगत है, भलीभांति है। उसके होने में कोई संदेह नहीं है। क्योंकि यदि वह न हो, तो उसके मोह में, उसके भ्रम में भी पड़ जाने की कोई संभावना नहीं। और अगर वह न हो, तो उससे मुक्त होने का कोई उपाय नहीं।
जगत है। उसका होना वास्तविक है। लेकिन जगत नित्य नहीं है, अनित्य है। अनित्य का अर्थ है, प्रतिपल बदल जाने वाला है। अभी जो था, क्षणभर बाद वही नहीं होगा। क्षणभर भी कुछ ठहरा हुआ नहीं है।
इसलिए बुद्ध ने कहा है : जगत क्षण सत्य है। बस, क्षणभर ही सत्य रह पाता है। हेराक्लतु ने यूनान में कहा है, यू कैन नाट स्टेप ट्वाइस इन द सेम रिवर, एक ही नदी में दो बार उतरना संभव नहीं है। नदी बही जा रही है। ठीक ऐसे ही कहा जा सकता है, यू कैन नाट लुक ट्वाइस द सेम वर्ल्ड, एक ही जगत को दोबारा नहीं देखा जा सकता। इधर पलक झपकी नहीं कि जगत दूसरा हुआ जा रहा है।
इसलिए बुद्ध ने तो बहुत अदभुत बात कही है। बुद्ध ने कहा कि है शब्द गलत है। है का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। सभी चीजें हो रही हैं। है की अवस्था में तो कोई भी नहीं है। जब हम कहते हैं, यह व्यक्ति जवान है, तो है का बड़ा गलत प्रयोग हो रहा है। बुद्ध कहते थे, यह व्यक्ति जवान हो रहा है। गति है, प्रोसेस है। स्थिति कहीं भी नहीं है। एक आदमी को हम कहते हैं, यह का है। कहने से ऐसा लगता है कि का होना कोई स्थिति है, जो ठहर गई है, स्टेगनेंट है। नहीं, बुद्ध कहते थे, यह आदमी का हो रहा है। है की कोई अवस्था ही नहीं होती। सब अवस्थाएं होने की हैं।
पहली बार जब बाइबिल का अनुवाद बर्मी भाषा में किया जा रहा था, तो बहुत कठिनाई हुई। क्योंकि बर्मी भाषा बर्मा में बौद्ध धर्म के पहुंचने के बाद धीरे—धीरे विकसित हुई है, तो बौद्ध चिंतन की जो आधारशिलाएं हैं, वे बर्मी भाषा में प्रवेश कर गईं। तो बर्मी भाषा में 'है' शब्द के लिए कोई ठीक—ठीक शब्द नहीं है। जो भी शब्द हैं, उनका मतलब होता है, हो रहा है। अगर कहें नदी है, तो बर्मी भाषा में उसका जो रूपांतरण होगा, वह होगा कि नदी हो रही है। और सब तो ठीक था, लेकिन बाइबिल के अनुवाद करने में ईश्वर का क्या करें? गॉड इज, ईश्वर है। बर्मी भाषा में करें, तो उसका हो जाता है कि ईश्वर हो रहा है। बड़ी अड़चन थी।
और बुद्ध कहते थे, कुछ भी नहीं है, सब हो रहा है। और ठीक कहते थे। यह वृक्ष आप देखते हैं; हम कहेंगे, वृक्ष है। जब तक आप कह रहे हैं, तब तक वृक्ष हो गया कुछ और। एक नई कोंपल निकल आई होगी। एक पुरानी कोंपल और पुरानी पड़ गई होगी। एक फूल थोड़ा और खिल गया होगा। एक गिरता फूल गिर गया होगा। जड़ों ने नए पानी की बूंदें सोख ली होंगी, पत्तों ने सूरज की नई किरणें पी ली होंगी। जब आप कहते हैं, वृक्ष है, जितनी देर आपको कहने में लगती है, उतनी देर में वृक्ष कुछ और हो गया। है जैसी कोई अवस्था जगत में नहीं है। सब हो रहा है—जस्ट ए प्रोसेस।
उपनिषद यही कह रहे हैं।
उपनिषद का ऋषि कह रहा है, जगत अनित्य है
नित्य कहते हैं उसे, जो है, सदा है। जिसमें कोई परिवर्तन कभी नहीं, जिसमें कोई रूपांतरण नहीं होता। जो वैसा ही है, जैसा सदा था और वैसा ही रहेगा।
अगर वैज्ञानिक से पूछें, तो वह कहता है, सात साल में आपके शरीर में एक टुकड़ा भी नहीं बचता वही जो सात साल पहले था। सात साल में सब बह जाता है, शरीर नया हो जाता है। जो आदमी सत्तर साल जीता है, वह दस बार अपने पूरे शरीर को बदल लेता है। एक—एक सेल बदलता जाता है —प्रतिपल।
आप सोचते हैं कि आप एक दफा मरते हैं, आपका शरीर हजार दफे मर चुका होता है। एक—एक शरीर का कोष्ठ मर रहा है, निकल रहा है शरीर के बाहर। भोजन से रोज नए कोष्ठ निर्मित हो रहे हैं। पुराने कोष्ठ बाहर फेंके जा रहे हैं—मल के द्वारा, और—और मार्गों से शरीर अपने मरे हुए कोष्ठों को बाहर फेंक रहा है।
आपने खयाल नहीं किया होगा, नाखून काटते हैं, दर्द नहीं होता; बाल काटते हैं, दर्द नहीं होता। आपने खयाल नहीं किया होगा कि ये डेड पार्ट्स हैं, इसलिए दर्द नहीं होता। अगर ये शरीर के हिस्से होते, तो काटने से तकलीफ होती। ये मरे हुए हिस्से हैं।
शरीर के भीतर जो कोष्ठ मर गए हैं, उनको फेंका जा रहा है बाहर—बालों के द्वारा, नाखूनों के द्वारा, मल के द्वारा, पसीने के द्वारा। प्रतिपल शरीर अपने मरे हुए हिस्सों को बाहर फेंक रहा है और भोजन के द्वारा नए हिस्सों को जीवन दे रहा है। शरीर एक सरिता है, लेकिन भ्रम तो यह पैदा होता है कि शरीर है।
आज से तीन सौ साल पहले तक पता भी नहीं था कि शरीर के भीतर खून गति करता है। तीन सौ साल पहले तक खयाल था कि शरीर के भीतर खून भरा हुआ है। क्योंकि शरीर के भीतर जो खून की गति है, उसका हमें पता तो चलता ही नहीं। और शरीर में खून नदी की तेज धार की तरह चल रहा है। जो आपके पैर में था, वह क्षणभर बाद आपके सिर में पहुंच जाता है। तीव्र परिभ्रमण चल रहा है खून का। उस परिभ्रमण का भी उपयोग यही है कि वह आपके मरे हुए सेल्स को शरीर के बाहर निकालने के लिए स्रोत का काम करता है, धारा का काम करता है। वह मरे हुए हिस्सों को बाहर फेंकने की कोशिश में लगा रहता है।
इस जगत में भ्रांति भर पैदा होती है कि चीजें हैं। इस जगत में कोई चीज क्षणभर भी वही नहीं है, जो थी। सब बदला चला जा रहा है। इस परिवर्तन को ऋषि ने कहा है, अनित्यता।
इस अनित्यता को कहने का कारण है, क्योंकि अगर हमें यह स्मरण आ जाए कि जगत का स्वभाव ही अनित्य है, तो हम जगत में कोई भी ठहरा हुआ मोह निर्मित न करें। अगर जगत का स्वभाव ही अनित्य है, अगर सब चीजें बदल ही जाती हैं, तो हम आग्रह छोड़ देंगे चीजों को ठहराए रखने का। जवान फिर यह आग्रह न करेगा कि मैं जवान ही बना रहूं, क्योंकि यह असंभव है। यह हो ही नहीं सकता। असल में जवानी सिर्फ के होने की तरफ एक रास्ता है, और कुछ नहीं। जवानी सिर्फ बूढ़े होने की कोशिश है, और कुछ भी नहीं। जवानी बुढ़ापे के विपरीत नहीं, उसी की धारा का अंग है। दो कदम पहले की धारा है, बुढ़ापा दो कदम बाद की। उसी सरिता में जवानी का घाट भी आता है, उसी सरिता में बुढ़ापे का घाट भी आ जाता है।
अगर हमें यह खयाल में आ जाए कि इस जगत में सभी चीजें प्रतिपल मर रही हैं, तो हम जीने का जो आग्रह है पागल, वह भी छोड़ दें। क्योंकि जिसे हम जन्म कहते हैं, वह मृत्यु का पहला कदम है। असल में जिसे मरना नहीं है, उसे जन्मना नहीं चाहिए। उसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। जन्मे, कि मरेंगे। जन्मे, उसी दिन मरने की यात्रा शुरू हो गई। द फस्ट स्टेप हैज बीन टेकन। जन्म मृत्यु का पहला कदम है, मृत्यु जन्म का आखिरी कदम है। अगर इसे प्रवाह की तरह देखेंगे, तो कठिनाई न होगी। अगर स्थितियों की तरह देखेंगे, तो जन्म अलग है, मौत अलग है। जवानी अलग है, बुढ़ापा अलग है।
लेकिन ऋषि कहता है, जगत एक अनित्य प्रवाह है। यहां जन्म भी मृत्यु से जुड़ा है और जवानी भी बुढ़ापे से जुडी है। यहां सुख दुख से जुड़ा है। यहां प्रेम घृणा से जुड़ा है। यहां मित्रता शत्रुता से जुड़ी है। और जो भी चाहता है कि चीजों को ठहरा लूं वह दुख और पीड़ा में पड़ जाता है।
आदमी की चिंता यही है कि जहा कुछ भी नहीं ठहरता, वहां वह ठहराने का आग्रह करता है। अगर मुझे यश है, तो मैं सोचता हूं मेरा यश ठहर जाए। अगर मेरे पास धन है, तो मैं सोचता हूं मेरे पास धन ठहर जाए। अगर मेरे पास जो भी है, मैं चाहता हूं वह ठहर जाए। अगर मुझे कोई प्रेम करता है, तो मैं चाहता हूं यह प्रेम चिर हो जाए। सभी प्रेमी की यही आकांक्षा है कि प्रेम शाश्वत हो जाए। इसलिए सभी प्रेमी दुख में पड़ते हैं। क्योंकि इस जगत में कुछ भी शाश्वत नहीं हो सकता, प्रेम भी नहीं।
यहां सभी बदल जाता है। जगत का स्वभाव बदलाहट है। इसलिए जिसने भी चाहा कि कोई चीज ठहर जाए वह दुख में पड़ेगा। क्योंकि हमारी चाह से जगत नहीं चलता। जगत का अपना नियम है। वह अपने नियम से चलता है।
Friday, April 1, 2022
मैं एक स्कूल-अध्यापक हूं, पुरोहित, राजनेता, और पंड़ित का एक तरह का पनीला—मिश्रण, जिस सबसे आपको चिढ़ है। क्या मेरे लिए भी कोई आशा है? फिर मैं छप्पन वर्ष का हूं—क्या में बाकी की बची जिंदगी भी धैर्य पूर्वक यूं ही बिता दूं। और उम्मीद करू की अगली बार मेरा भाग्य अच्छा होगा?
Thursday, March 31, 2022
परमात्मा कहां हैं?
लोग मेरे पास आते हैं, और वह कहते हैं: ‘हम परमात्मा को जानना चाहते है—परमात्मा कहां हैं?’ अब यह प्रश्न ही अर्थ हीन है? वह कहां नहीं है? तुम पूछते हो कि वह कहां है, तुम्हें बिलकुल ही अंधा होना चाहिए। क्या तुम उसे देख नहीं सकते हो? केवल वही तो है, वृक्षों में, पक्षीयों में, पशुओं में, पहाड़ों में, जल में, नब में, सब जगह वहीं तो है। एक स्त्री में एक पुरुष में, पिता में माता में, बेटे में कहां नहीं हैं। उसी ने तो इतने सारे रुप ले लिए है। हर तरफ वही तो है। वह हर जगह से तुम्हें, पुकार रहा है, और तुम सुनते ही नहीं हो। तुमने अपनी आंखें हर तरफ से बंद कर ली है। तुमने अपनी आंखों पर पट्टियां बाँध ली है। तुम बस किसी और देखते ही नहीं हो।
तुम एक बहुत ही संकरे ढंग से, बड़े ही केंद्रीभूत तरीके से जी रहे हो। यदि तुम धन की और देख रहे होते हो, तुम बस धन की तरफ देखते हो; फिर तुम किसी और तरफ नहीं देखते हो। यदि तुम शक्ति की तलाश में होते हो, तुम केवल शक्ति की और ही देखते हो, तुम किसी और तरफ नहीं देखते। और स्मरण रखना : धन में परमात्मा नहीं है—क्योंकि धन तो मनुष्य निर्मित है, और परमात्मा तो मनुष्य निर्मित हो ही नहीं सकता। जब मैं कहता हूं कि परमात्मा हर जगह है, स्मरण रखना कि उन चीजों को, जिन्हें मनुष्य ने निर्मित किया है, इसमें शामिल नहीं करना है। परमात्मा मनुष्य-निर्मित नहीं हो सकता। परमात्मा धन में नहीं है। धन तो मनुष्य का एक बड़ी चालाकी भरा आविष्कार है। और ईश्वर शक्ति में भी नहीं है, वह भी मनुष्य का एक पागलपन है। किसी पर अधिपत्य जमाने का विचार ही विक्षिप्त है। यह विचार ही कि ‘मैं सत्ता में रहूं और दूसरे सत्ता-विहीन रहे,’ एक पागल आदमी का विचार है, एक विनष्टकारी विचार है।
परमात्मा राजनीति में नहीं है और परमात्मा धन में भी नहीं है। न ही परमात्मा महत्वकांक्षा में ही है। लेकिन परमात्मा हर उस चीज में है, जहां मनुष्य ने उसे नष्ट नहीं किया। जहां मनुष्य ने कोई अपनी ही रचना नहीं कि है। आधुनिक जगत में यह सर्वाधिक कठिन बातों में से एक है। क्योंकि चारों तरफ से तुम इतनी मनुष्य-निर्मित चीजों से धिरे हुए हो। क्या तुम बस इस तथ्य को देख नहीं पाते?
जब तुम एक वृक्ष के समीप बैठे होते हो, परमात्मा को महसूस करना आसान है। जब तुम कोलतार की बनी सड़क पर बैठे होते हो, तुम उस कोलतार की सड़क पर परमात्मा को वहां न पाओगे। यह बहुत सख्त है। तब तुम किसी आधुनिक शहर में होते हो, चारों और बस सीमेंट और कंक्रीट की इमारतें होती हैं, इस कंक्रीट और सीमेंट के जंगल में तुम परमात्मा को नहीं खोज सकते। तुम इसे नहीं महसूस कर सकते। क्योंकि मनुष्य निर्मित चीजें विकसित नहीं होती, यही तो सारी समस्या है। मनुष्य निर्मित चीजें विकसित नहीं होती। वे प्राय मृत है। उनमें कुछ जीवन नहीं होता। ईश्वर निर्मित चीजें विकसित होती है, पहाड़ तक बढ़ते है। हिमालय अभी भी बढ़ रहा है। ऊंचे और ऊंचे होता जा रहा है। एक वृक्ष उगता है, एक बच्चा विकसित होता है।
मनुष्य-निर्मित चीजें बढ़ती नहीं, महानतम चीजे भी। एक पिकासो का चित्र भी कभी बढ़ेगा नहीं। तब सीमेंट, कंक्रिट के जंगल तो क्या बढ़ेगें? बीथो वन का संगीत तक कभी विकसित नहीं होगा, तब प्रोधौगिकी का, मनुष्य-निर्मित यंत्रों का तो कहना ही क्या?
देखो! जहां कहीं भी तुम वृद्धि देखो, वहां ईश्वर है—क्योंकि केवल ईश्वर ही विकसित होता है, कुछ और नहीं। हर चीज में बस ईश्वर ही बढ़ता है। जब वृक्ष में कोई पत्ता उग रहा होता तो वह ईश्वर ही है। जब कोई पक्षी गीत गा रहा होता है, तब ईश्वर ही गा रहा है। जब कोई पक्षी उड़ान भर रहा होता है, तब परमात्मा उड़ान भर रहा होता है। जब एक छोटा बच्चा खिलखिलाकर हंस रहा होता है तब परमात्मा ही खिलखिला रहा होता है। जब तुम किसी स्त्री या पुरूष की आंखों से आंसुओं को बहते देखते हो, यह ईश्वर ही रो रहा होता है।
जहां कहीं भी तुम जीवंतता पाओं, हां; ईश्वर वहीं है। ध्यान पूर्वक सुनो। समीप आओ। ध्यान पूर्वक महसूस करो। सावधान हो जाओ। तुम पवित्र भूमि पर हो।
तंत्रा-विज्ञान- (सरहा के गीत)
ओशो
Friday, May 14, 2021
एक और मित्र ने पूछा है कि आपने कहा कि व्यक्ति जैसा भाव करता र्ह, वैसा ही बन जाता है। तो क्या मुक्त होने के भाव को गहन करने से वह मुक्त भी हो सकता है?
Thursday, May 13, 2021
सेक्स की मांग जो इंसान के दिल में है, और अश्लीलता की मांग, इन दोनों में थोड़ा वैचारिक...
आग्रह आक्रमण है
Tuesday, May 11, 2021
is it fair to take Sanyaas because you cannot solve your personal problems?
पिछले जन्मों का कर्म
एक व्यर्थ की धारणा हमें सिखा दी गई है कि तुम्हें दु:खी होना ही पड़ेगा, क्योंकि पिछले जन्मों का कर्म तुम्हें भोगना है। यह धारणा अगर मन में बैठ गई कि मैं पिछले जन्मों के कर्मों को भोग रहा हूं, तो सुख का उपाय कहां है? इतने—इतने जन्म! कितने—कितने जन्म! चौरासी कोटि योनियां! इनमें कितने पाप किए होंगे, थोड़ा हिसाब तो लगाओ! इन सारे पापों का फल भोगना है। सुख हो कैसे सकता है! दुख स्वाभाविक मालूम होने लगेगा। ये आदमी को दु:खी रखने की ईजादें हैं।
मैं तुमसे कहता हूं: कोई पाप नहीं किए हैं, कोई कर्म का फल नहीं भोगना है। तुम अभी जागे ही नहीं, तुम अभी हो ही नहीं, पाप क्या खाक करोगे! पाप बुद्ध कर सकते हैं। लेकिन बुद्ध पाप करते नहीं।
अकबर की सवारी निकलती थी और एक आदमी अपने मकान की मुंडेर पर चढ़ गया और गालियां बकने लगा। सम्राट को गालियां! तत्क्षण पकड़ लिया गया। दूसरे दिन दरबार में मौजूद किया गया। अकबर ने पूछा: तू पागल है! क्या कह रहा था? क्यों कह रहा था? उसने कहा मुझे क्षमा करें, मैंने कुछ कहा ही नहीं। मैंने शराब पी ली थी। मैं बेहोश था। मैं था ही नहीं! अगर आप मुझे दंड देंगे, तो ठीक नहीं होगा, अन्याय हो जाएगा। मैं शराब पीए था।
अकबर ने सोचा और उसने कहा: यह बात ठीक है; दोष शराब का था, दोष तेरा नहीं था। तू जा सकता है। मगर अब शराब मत पीना। शराब पीने का दोष तेरा था। शराब पीने के बाद जो कुछ तेरे मुंह से निकला, उसमें तेरा हाथ नहीं, यह बात सच है।
आज भी अदालत पागल आदमी को छोड़ देती है, अगर पागल सिद्ध हो जाए। क्यों? क्योंकि पागल आदमी का क्या दायित्व? किसी पागल ने किसी को गोली मार दी। अदालत क्षमा कर देती है, अगर सिद्ध हो जाए कि पागल है। क्योंकि पागल आदमी को क्या दोष देना, उसे होश ही नहीं है!
तुम होश में रहे हो? ये जो चौरासी कोटि योनियां जिनके संबंध में तुम शास्त्रों में पढ़ते हो, तुम होश में थे? तुम्हें एकाध की भी याद है? अगर तुम होश में थे, तो याद कहां है? तुम्हें एक बार भी तो याद नहीं आती कि तुम कभी वृक्ष थे, कि तुम कभी एक पक्षी थे, कि तुम कभी जंगल के सिंह थे। तुम्हें याद आती है कुछ? शास्त्र कहते हैं; तुम्हें याद नहीं। और तुम गुजरे हो चौरासी कोटि योनियों से।
तुम बेहोश थे, तुम मूर्च्छित थे। मूर्च्छा में जो भी किया गया, उसका क्या मूल्य है? परमात्मा अन्याय नहीं कर सकता। इस दुनिया की अदालतें भी इतना अन्याय नहीं करतीं, तो परमात्मा तो परम कृपालु है, वह तो महाकरुणावान है। सूफी कहते हैं—रहीम है, रहमान है, करुणा का स्रोत है। इस जगत की अदालतें, जिनको हम करुणा का स्रोत कह नहीं सकते, वे भी क्षमा कर देती हैं मूर्च्छित आदमी को।
मैं तुमसे कहता हूं बार—बार: तुम जागो, उसके बाद ही तुम्हारे कृत्यों का लेखा—जोखा हो सकता है। यह मैं एक अनूठी बात कह रहा हूं, जो तुमसे कभी नहीं कही गई है। मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं। मुझे चौरासी कोटि योनियों के पाप नहीं काटने पड़े और मैं उनके बाहर हो गया हूं। तुम भी हो सकते हो। तुम्हें भी काटने की झंझट में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है। और काट तुम पाओगे नहीं, वह तो सिर्फ दु:खी रहने का ढंग है। वह तो दुख को एक व्याख्या देने का ढंग है। वह तो दुख में भी अपने को राजी कर लेने की व्यवस्था, आयोजन है। क्या करें, अगर दुख है तो जन्मों—जन्मों के पापों के कारण है। जब कटेंगे पाप, जब फल मिलेगा, तब कभी सुख होगा—होगा आगे कभी।
ऐसा ही तुम पहले भी सोचते रहे, ऐसा ही तुम आज भी सोच रहे हो, ऐसा ही तुम कल भी सोचोगे, अगले जन्म में भी सोचोगे। जरा सोचो, फर्क क्या पड़ेगा? अगले जन्म में तुम कहोगे कि पिछले जन्मों के पापों का फल भोग रहा हूं। और अगले जन्म में भी तुम यही कहोगे। तुम सदा यही कहते रहोगे, तुम सदा यही कहते रहे हो। तुम दुख से बाहर कब होओगे? और तुम्हें किसी एक जन्म की याद नहीं है। तुम्हें—पिछले जन्मों की तो फिक्र छोड़ो—तुम्हें अभी भी याद नहीं है कि तुम क्या कर रहे हो। तुम अभी भी होश में कहां हो? तुम्हारे पास होश का दीया कहां है?
सिर्फ बुद्ध—पुरुष अगर पाप करें, तो उत्तरदायी हो सकते हैं। मगर वे पाप करते नहीं, क्योंकि जाग्रत व्यक्ति कैसे पाप करे? अब तुम मेरी बात समझो। जाग्रत व्यक्ति कैसे पाप करे? और सोया व्यक्ति, मैं कहता हूं, कैसे पुण्य करे? जैसे अंधा आदमी तो टटोलेगा ही, ऐसा मूर्च्छित आदमी तो गलत करेगा ही। जैसे अंधा आदमी टेबल—कुर्सी से टकराएगा ही। दरवाजे से निकलने के पहले हजार बार उसका सिर दीवारों से टकराएगा; स्वाभाविक है। आंख वाला आदमी क्यों टकराए? आंख वाला आदमी दरवाजे से निकल जाता है। आंख वाले आदमी को दीवारें बीच में आती ही नहीं, न कुर्सियां, न टेबलें, कुछ भी बीच में नहीं आता। न वह टटोलता है, न वह पूछता है कि दरवाजा कहां है? सिर्फ दरवाजे से निकल जाता है। हां, आंख वाला आदमी अगर दीवार से टकराए, तो हम दोष दे सकते हैं, कि यह तुम क्या कर रहे हो? मगर आंख वाला टकराता नहीं, और जिसको हम दोष देते हैं, वह अंधा है।
Saturday, May 8, 2021
बुद्ध ने कहा मेरी मूर्तियां मत बनाना...
.... तो जिन्होंने मूर्तियां
बनायीं उन्होंने बुद्ध
की आज्ञा तोड़ी।
लेकिन बुद्ध ने
यह भी कहा कि जो
ध्यान को उपलब्ध
होगा, समाधि जिसके
जीवन में खिलेगी,
उसके जीवन में
करुणा की वर्षा
भी होगी।
तो
जिन्होंने मूर्तियां बनायीं उन्होंने
करुणा के कारण बनायीं। बुद्ध के
चरण-चिह्न खो
न जाएं, और
बुद्ध के चरण-चिह्नों की छाया अनंत काल
तक बनी रहे।
कुछ
बात ही ऐसी थी कि
जिस आदमी ने कहा मेरी
मूर्तियां मत बनाना,
हमने अगर उसकी मूर्तियां
न बनाई होतीं
तो बड़ी भूल हो जाती।
जिन्होंने कहा था
हमारी मूर्तियां बनाना,
उनकी हम छोड़ भी देते,
न बनाते, चलता।
बुद्ध ने कहा था मेरी
पूजा मत करना,
अगर हमने बुद्ध
की पूजा न की होती,
तो हम बड़े चूक जाते।
यह
सौभाग्य की घड़ी कभी-कभी,
सदियों में आती है, जब
कोई ऐसा आदमी
पैदा होता है जो कहे
मेरी पूजा मत करना। यही
पूजा के योग्य
है। जो कहता है मेरी
मूर्ति मत बनाना,
यही मूर्ति बनाने
के योग्य है।
सारे जगत के मंदिर इसी
को समर्पित हो
जाने चाहिए। .
बुद्ध
ने कहा मेरे
वचनों को मत पकड़ना, क्योंकि
जो मैंने कहा
है उसे जीवन
में उतार लो।
दीये की चर्चा
से क्या होगा,
दीये को सम्हालो।
शास्त्र मत बनाना,
अपने को जगाना।
लेकिन जिस आदमी
ने ऐसी बात कही, अगर
इसका एक-एक वचन लिख
न लिया गया
होता, तो मनुष्यता
सदा के लिए दरिद्र रह
जाती। कौन तुम्हें
याद दिलाता ' कौन
तुम्हें बताता कि
कभी कोई ऐसा भी आदमी
हुआ था, जिसने
कहा था मेरे शब्दों को
अग्नि में डाल देना, और
मेरे शास्त्रों को
जलाकर राख कर देना, क्योंकि
मैं चाहता हूं
जो मैंने कहा
है वह तुम्हारे
भीतर जीए, किताबों
में नहीं? लेकिन
यह कौन लिखता?
तो
निश्चित ही जिन्होंने
मूर्तियां बनायीं, बुद्ध की
आज्ञा तोड़ी। लेकिन
मैं तुमसे कहता
हूं उन्होंने ठीक
ही किया। बुद्ध
की आज्ञा तोड़
देने जैसी थी।
नहीं कि बुद्ध
ने जो कहा था, वह
गलत था। बुद्ध
ने जो कहा था, बिलकुल
सही कहा था। बुद्ध से
गलत कहा कैसे
जा सकता है २ बुद्ध
ने बिलकुल सही
कहा था, मेरी
मूर्तियां मत बनाना,
क्योंकि कहीं मूर्तियों
में तुम मुझे
न भूल जाओ,
कहीं मूर्तियों में
मैं खो न जाऊं, कहीं
मूर्तियां इतनी ज्यादा
न हो जाएं कि मैं
दब जाऊं। तुम
सीधे ही मुझे देखना।
लेकिन
हम इतने अंधे
हैं कि सीधे तो हम
देख ही न पाएंगे। हम तो टटोलेंगे। टटोलकर ही
शायद हमें थोड़ा
स्पर्श हो जाए। टटोलने के
लिए मूर्तियां जरूरी
हैं। मूर्तियों से
ही हम रास्ता
बनाएंगे। हम उस
परम शिखर को तो देख
ही न सकेंगे
जो बुद्ध के
जीवन में प्रगट
हुआ। वह तो बहुत दूर
है हमसे। आकाश
के बादलों में
खोया है वह शिखर। उस
तक हमारी आंखें
न उठ पाएंगी।
हम तो बुद्ध
के चरण भी देख लें,
जो जमीन पर हैं, तो
भी बहुत। उन्हीं
के सहारे शायद
हम बुद्ध के
शिखर पर भी कभी पहुंच
जाएं, इसकी आशा
हो सकती है।
तो
मैं तुमसे कहता
हूं जिन्होंने आशा
तोड़ी उन्होंने ही
आज्ञा मानी। जिन्होंने
वचनों को सम्हालकर
रखा, उन्होंने ही
बुद्ध को समझा।
लेकिन तुम्हें बहुत
जटिलता होगी, क्योंकि
तर्क बुद्धि तो
बड़ी नासमझ है।
ऐसा
हुआ। एक युवक मेरे पास
आता था। किसी
विश्वविद्यालय में अध्यापक
था। बहुत दिन
मेरी बातें सुनीं,
बहुत दिन मेरे
सत्संग में रहा।
एक रात आधी रात आया
और कहा, जो तुमने कहा
था वह मैं पूरा कर
चुका। मैंने अपने
सब वेद, उपनिषद,
गीता कुएं में
डाल दीं। मैंने
उससे कहा, पागल!
मैंने वेद-उपनिषद
को पकड़ना मत,
इतना ही कहा था। कुएं
में डाल आना,
यह मैंने न कहा था।
यह तूने क्या
किया?
वेद-उपनिषद को
न पकड़ो तो ही वेद-उपनिषद समझ
में आते हैं।
वेद- उपनिषद को
समझने की कला यही है
कि उनको पकड़
मत लेना, उनको
सिर पर मत ढो लेना।
उनको समझना। समझ
मुक्त करती है।
समझ उससे भी मुक्त कर
देती है जिसको
तुमने समझा। कुएं
में क्यों फेंक
आया? और तू सोचता है
कि तूने कोई
बड़ी क्रांति की,
मैं नहीं सोचता।
क्योंकि अगर वेद-उपनिषद व्यर्थ
थे, तो आधी रात में
कुएं तक ढोने की भी
क्या जरूरत थी
2 जहां पड़े थे पड़े रहने
देता। कुएं में
फेंकने वही जाता
है, जिसने सिर
पर बहुत दिन
तक सम्हालकर रखा
हो। कुएं में
फेंकने में भी आसक्ति का
ही पता चलता
है। तुम उसी से घृणा
करते हो जिस से तुमने
प्रेम किया हो।
तुम उसी को छोड़कर भागते
हो जिससे तुम
बंधे थे।
एक
संन्यासी मेरे पास
आया और उसने कहा, मैंने
पत्नी-बच्चे सबका
त्याग कर दिया।
मैंने उससे पूछा,
वे तेरे थे कब? त्याग
तो उसका होता
है जो अपना हो। पत्नी
तेरी थी? सात चक्कर लगा
लिए थे आग के आसपास,
उससे तेरी हो गई थी?
बच्चे तेरे थे?
पहली तो भूल वहीं हो
गई कि तूने उन्हें अपना
माना। और फिर दूसरी भूल
यह हो गई कि उनको
छोड़कर भागा। छोड़ा
वही जा सकता है जो
अपना मान लिया
गया हो। बात कुल इतनी
है, इतना ही जान लेना
है कि अपना कोई भी
नहीं है, छोड़कर
क्या भागना है!
छोड़कर भागना तो
भूल की ही पुनरुक्ति है।
जिन्होंने
जाना, उन्होंने कुछ
भी छोड़ा नहीं।
जिन्होंने जाना, उन्होंने
कुछ भी पकड़ा नहीं। जिन्होंने
जाना, उन्हें छोड़ना
नहीं पड़ता, छूट
जाता है। क्योंकि
जब दिखाई पड़ता
है कि पकड़ने
को यहां कुछ
भी नहीं है,
तो मुट्ठी खुल
जाती है।
बुद्ध
की मृत्यु हुई-तब तक
तो किसी ने बुद्ध का
शास्त्र लिखा न था, ये
धम्मपद के वचन तब तक
लिखे न गये थे-तो
बौद्ध भिक्षुओं का
संघ इकट्ठा हुआ।
जिनको याद हो, वे उसे
दोहरा दें, ताकि
लिख लिया जाए।
.
बड़े शानी भिक्षु
थे, समाधिस्थ भिक्षु
थे। लेकिन उन्होंने
तो कुछ भी याद न
रखा था। जरूरत
ही न थी। समझ लिया,
बात पूरी हो गई थी।
जो समझ लिया,
उसको याद थोड़े
ही रखना पड़ता
है। तो उन्होंने
कहा कि हम कुछ कह
तो सकते हैं,
लेकिन वह बड़ी दूर की
ध्वनि होगी। वे
ठीक-ठीक वही शब्द न
होंगे जो बुद्ध
के थे। उसमें
हम भी मिल गये हैं।
वह हमारे साथ
इतना एक हो गया है
कि कहां हम,
कहां बुद्ध, फासला
करना मुश्किल है।
तो
अज्ञानियों से पूछा
कि तुम कुछ कहो, इतनी
तो कहते हैं
कि मुश्किल है
तय करना। हमारी
समाधि के सागर में बुद्ध
के वचन खो गये। अब
हमने सुना, हमने
कहा कि उन्होंने
कहा, इसकी भेद-रेखा नहीं
रही। जब कोई स्वयं ही
बुद्ध हो जाता है, तो
भेद-रेखा मुश्किल
हो जाती है।
क्या अपना, क्या
बुद्ध का ' अज्ञानियों
से पूछो।
अज्ञानियों
ने कहा, हमने
सुना तो था, लेकिन समझा
नहीं। सुना तो था, लेकिन
बात इतनी बड़ी
थी कि हम सम्हाल न
सके। सुना तो था, लेकिन
हम से बड़ी थी घटना,
हमारी स्मृति में
न समाई, हम
अवाक और चौंके
रह गये। घड़ी
आई और बीत गई, और
हम खाली हाथ
के खाली हाथ
रहे। तो कुछ हम दोहरा
तो सकते हैं,
लेकिन हम पक्का
नहीं कह सकते कि बुद्ध
ने ऐसा ही कहा था।
बहुत कुछ छूट गया होगा।
और जो हमने समझा था,
वही हम कहेंगे।
जो उन्होंने कहा
था, वह हम कैसे कहेंगे?
तो
बड़ी कठिनाई खड़ी
हो गई। अज्ञानी
कह नहीं सकते,
क्योंकि उन्हें भरोसा
नहीं। ज्ञानियों को
भरोसा है, लेकिन
सीमा-रेखाएं खो
गई हैं।
फिर
किसी ने सुझाया,
किसी ऐसे आदमी
को खोजो जो दोनों के
बीच में हो। बुद्ध के
साथ बुद्ध का
निकटतम शिष्य आनंद
चालीस वर्षों तक
रहा था। लोगों
ने कहा, आनंद
को पूछो! क्योंकि
न तो वह अभी बुद्धत्व
को उपलब्ध हुआ
है और न वह अज्ञानी
है। वह द्वार
पर खड़ा है। इस पार
संसार, उस पार बुद्धत्व, चौखट पर खड़ा है,
देहली पर खड़ा है। और
जल्दी करो, अगर
वह देहली के
पार हो गया, तो उसकी
भी सीमा-रेखाएं
खो जाएंगी।
आनंद
ने जो दोहराया,
वही संगृहीत हुआ।
आनंद की बड़ी करुणा है
जगत पर। अगर आनंद न
होता, बुद्ध के
वचन खो गये होते। और
बुद्ध के वचन खो गये
होते, तो बुद्ध
का नाम भी खो गया
होता।
एस धम्मो सनंतनो
ओशो
Popular Posts
-
यह प्रश्न उन्होंने इतनी बार पूछा है कि मुझे शक है , तुम्हें अपनी मां से यौन-संबंध करना है कि अपनी बेटी से , किससे करना है ? यह प्रश्न ...
-
मत करो स्मरण! लेकिन जिसे तुम जानते हो, उससे पूरी तरह असंतुष्ट तो हो जाओ। जहां तुम खड़े हो, उस जमीन को तो व्यर्थ समझ लो। तो तुम्हारे पैर आतुर ...
-
To Join Osho Hindi / English Message Group in Whatsapp, Please message on +917069879449 (Whatsapp) #Osho Or follow this link http...
-
याद घर बुलाने लगी! इन थोड़े-से शब्दों में सारे धर्म का सार है--याद घर बुलाने लगी। जहां हम हैं, वहां हम तृप्त नहीं। जो हम हैं उससे हम तृप्त न...
-
तुम्हारा परमात्मा तुम्हारा ही प्रतिबिंब है। जब तक तुम हो तब तक तुम्हारा परमात्मा तुम्हारी ही छाया होगा। तुम्हारे मंदिरों में तुम्हारी ह...
-
The ignorance of those who sit under dazzling electric lights in temples is simply amazing. They are not needed at all, because only tha...
-
Man may have lived far away in a forest, or on a mountain, or in a cave, or on the bank of a river : he may have lived anywhere for that m...
-
एक व्यर्थ की धारणा हमें सिखा दी गई है कि तुम्हें दु:खी होना ही पड़ेगा, क्योंकि पिछले जन्मों का कर्म तुम्हें भोगना है। यह धारणा अगर मन में बैठ...
-
तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञाताओं से भी श्रेष्ठ है, सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, ऐसा योगी अर्जुन बने, ऐसा कृष्ण का आ...
-
सूत्र है- ‘रसो वै सः।’सीधा साधा अर्थ है : ‘वह रसरूप है।’ लेकिन अनुवाद में तुम देखते हो फर्क हो गया: ‘भगवान रसरूप है।’ ‘व...