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Monday, August 10, 2015

‘ओम जैसी किसी ध्वनि का मंद-मंद उच्चारण करो।’ जैसे-जैसे ध्वनि पूर्णध्वनि में प्रवेश करती है, वैसे-वैसे तुम भी।


ध्वनि का उच्चारण एक सूक्ष्म विज्ञान है। पहले तुम्हें उसका उच्चारण जोर से करना है, बाहर-बाहर करना है; ताकि दूसरे सुन सकें। जोर से उच्चार शुरू करना अच्छा है। क्यों? क्योंकि जब तुम जोर से उच्चार करते हो तो तुम भी उसे साफ-साफ सुनते हो। जब तुम कुछ कहते हो तो दूसरों से कहते हो; वह तुम्हारी आदत बन गई है। जब तुम बात करते हो तो दूसरों से करते हो। इसलिए तुम अपने को भी तभी सुनते हो जब दूसरों से बात करते हो। तो एक स्वाभाविक आदत से आरंभ करना अच्छा है।

ओम ध्वनि का उच्चार करो, और फिर धीरे  धीरे उस ध्वनि के साथ लयबद्ध अनुभव करो। जब ओम का उच्चार करो तो उससे भर जाओ। और सब कुछ भूलकर ओम ही बन जाओ, ध्वनि ही बन जाओ। और ध्वनि बन जाना बहुत आसान है, क्योंकि ध्वनि तुम्हारे शरीर में, तुम्हारे मन में, तुम्हारे समूचे स्नायु संस्थान में गूंजने लग सकती है। ओम की अनुगूंज को अनुभव करो। उसका उच्चार करो और अनुभव करो कि तुम्हारा सारा शरीर उससे भर गया है, शरीर का प्रत्येक कोश उससे गंज उठा है।

उच्चार करना लयबद्ध होना भी है। ध्वनि के साथ लयबद्ध होओ; ध्वनि ही बन जाओ। और तब तुम अपने और ध्वनि के बीच गहरी लयबद्धता अनुभव करोगे; तब तुममें उसके लिए गहरा अनुराग पैदा होगा। यह ओम की ध्वनि इतनी सुंदर और संगीतमय है! जितना ही तुम उसका उच्चार करोगे उतने ही तुम उसकी सूक्ष्म मिठास से भर जाओगे। ऐसी ध्वनियां हैं जो बहुत तीखी हैं और ऐसी ध्वनियां हैं जो बहुत मीठी हैं। ओम बहुत ही मीठी ध्वनि है और शुद्धतम ध्वनि है। उसका उच्चार करो और उससे भर जाओ।

जब तुम ओम के साथ लयबद्ध अनुभव करने लगोगे तो तुम उसका जोर से उच्चार करना छोड़ सकते हो। फिर ओंठों को बंद कर लो और भीतर ही भीतर उच्चार करो। लेकिन यह भीतरी उच्चार पहले जोर से करना है। शुरू में यह भीतरी उच्चार भी जोर से करना है, ताकि ध्वनि तुम्हारे समूचे शरीर में फैल जाए, उसके हरेक हिस्से को, एक-एक कोशिका को छुए। उससे तुम नवजीवन प्राप्त करोगे, वह तुम्हें फिर से युवा और शक्तिशाली बना देगा।

तुम्हारा शरीर भी एक वाद्य-यंत्र है, उसे लयबद्धता की जरूरत है। जब शरीर की लयबद्धता टूटती है तो तुम अड़चन में पड़ते हो। और यही कारण है कि जब तुम संगीत सुनते हो तो तुम्हें अच्छा लगता है। तुम्हें अच्छा क्यों लगता है? संगीत थोड़े से लय ताल के अतिरिक्त क्या है? जब तुम्हारे चारों तरफ संगीत होता है तो तुम अच्छा क्यों महसूस करते हो? और शोरगुल और अराजकता के बीच तुम्हें बेचैनी क्यों लगती है? कारण यह है कि तुम स्वयं संगीतमय हो। तुम वाद्य यंत्र हो; और वह यंत्र प्रतिध्वनि करता है।

अपने भीतर ओम का उच्चार करो और तुम्हें अनुभव होगा कि तुम्हारा समूचा शरीर उसके साथ नृत्‍य करने लगा है। तब तुम्‍हें महसूस होगा कि तुम्‍हारा सारा शरीर उसमें स्‍नान कर रहा है; उसका पोर-पोर इस स्नान से शुद्ध हो रहा है। लेकिन जैसे जैसे इसकी प्रतीति गहरी हो, जैसे जैसे यह ध्वनि ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे भीतर प्रवेश करे, वैसे वैसे उच्चार को धीमा करते जाओ। क्योंकि ध्वनि जितनी धीमी होगी, वह उतनी ही गहराई प्राप्त करेगी। वह होम्योपैथी की खुराक जैसी है; जितनी छोटी खुराक उतनी ही गहरी उसकी पैठ। गहरे जाने के लिए तुम्हें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाना होगा।

भोंडे और कर्कश स्वर तुम्हारे हृदय में नहीं उतर सकते, वे तुम्हारे कानों में तो प्रवेश करेंगे, हृदय में नहीं। हृदय का मार्ग इतना संकरा है और हृदय स्वयं इतना कोमल है कि सिर्फ बहुत धीमे, लयपूर्ण और सूक्ष्म स्वर ही उसमें प्रवेश पा सकते हैं। और जब तक कोई ध्वनि तुम्हारे हृदय तक न जाए तब तक मंत्र पूरा नहीं होता है। मंत्र तभी पूरा होता है जब उसकी ध्वनि तुम्हारे हृदय में प्रवेश करे, तुम्हारे अस्तित्व के गहनतम, केंद्रीय मर्म को स्पर्श करे। इसलिए उच्चार को धीमा और धीमा करते चलो।

और इन ध्वनियों को धीमा और सूक्ष्म बनाने के और भी कारण हैं। ध्वनि जितनी सूक्ष्म होगी उतने ही तीव्र बोध की जरूरत होगी उसे अनुभव करने के लिए। ध्वनि जितनी भोंडी होगी उतने ही कम बोध की जरूरत होगी। वह ध्वनि तुम पर चोट करने के लिए काफी है; तुम्हें उसका बोध होगा ही। लेकिन वह हिंसात्मक है। अगर ध्वनि संगीतपूर्ण, लयपूर्ण और सूक्ष्म हो तो तुम्हें उसे अपने भीतर सुनना होगा। और उसे सुनने के लिए तुम्हें बहुत सजग, बहुत सावधान होना होगा। अगर तुम सावधान न रहे तो तुम सो जा सकते हो। और तब तुम पूरी बात ही चूक जाओगे।

किसी मंत्र या जप के साथ, ध्वनि के प्रयोग के साथ यही कठिनाई है कि वह नींद पैदा करता है। वह एक सूक्ष्म ट्रैंक्वेलाइजर है, नींद की दवा है। अगर तुम किसी ध्वनि को निरंतर दोहराते रहे और उसके प्रति सजग न रहे तो तुम सो जाओगे। क्योंकि तब यांत्रिक पुनरुक्ति हो जाती है। तब ओम-ओम यांत्रिक हो जाता है। और पुनरुक्ति ऊब पैदा करती है। नींद के लिए ऊब बुनियादी तौर से जरूरी है; तुम ऊब के बिना नहीं सो सकते। अगर तुम उत्तेजित हो तो तुम्हें नींद नहीं आएगी।

 तंत्र सूत्र

ओशो

मीरा

कहानी मैंने सुनी है कि मीरा जब वृंदावन पहुंची तो वृंदावन में जो कृष्ण का सबसे प्रमुख मंदिर था, उसका जो पुजारी था, उसने तीस वर्षों से किसी स्त्री को नहीं देखा था। वह बाहर नहीं निकलता था और स्त्रियों को मंदिर में आने की मनाही थी। द्वारपाल थे, जो स्त्रियों को रोक देते थे। कैसी अजीब दुनिया है! कृष्ण का भक्त और कृष्ण के मंदिर में स्त्रियों को न घुसने दे! और कृष्ण का जीवन किसी पलायनवादी संन्यासी का जीवन नहीं है, मेरे संन्यासी का जीवन है! सोलह हजार स्त्रियों के बीच यह नृत्य चलता रहा कृष्ण का! अगर नर्क ही जाना है तो कृष्ण जितने गहरे नर्क में गये होंगे, तुम क्या जाओगे! कैसे जाओगे? इतनी सुविधा तुम न जुटा पाओगे। इतनी लंबी सीढ़ी न लगा पाओगे। सोलह हजार पायदान। अरे, एकाध पायदान, दो पायदान बिठाल लिये उतने में तो जिन्दगी उखड़ जाती है! एकाध-दों नर्क के द्वार खोज लिये, उतना ही तो काफी है! उन्हीं दोनो के बीच मैं ऐसी घिसान, ऐसी पिटान हो जाती है! सोलह हजार स्त्रियां!

मगर यह सज्जन जो पुरोहित थे, इनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी महात्मा की तरह। प्रतिष्ठा का कुल कारण इतना था कि वे स्त्री को नहीं देखते थे। हम अजीब बातों को आदर देते हैं! हम मूढूताओं को आदर देते हैं। हम रुग्णताओं को आदर देते हैं। हम विक्षिप्तताओं को आदर देते हैं। हमने कभी किसी सृजनात्मक मूल्य को आदर दिया ही नहीं। हमने यह नहीं कहा कि इस महात्मा ने एक सुंदर मूर्ति बनायी थी, कि एक सुंदर गीत रचा था, कि इसने सुंदर वीणा बजायी थी, कि बांसुरी पर आनंद का राग गाया था। नहीं, यह सब कुछ नहीं; इसने स्त्री नहीं देखी तीस साल तक। बहुत गजब का काम किया था!

मीरा आयी। मीरा तो इस तरह के व्यर्थ के आग्रहों को मानती नहीं थी। फक्कड़ थी। वह नाचती हुई वृंदावन के मंदिर में पहुंच गयी। द्वारपालों को सचेत कर दिया गया था, क्योंकि मंदिर का प्रधान बहुत घबड़ाया हुआ था कि मीरा आयी है, गांव में नाच रही है उसके गीत की खबरें आ रही हैं, उसकी मस्ती की खबरें आ रही हैं, कृष्ण की भक्त है, जरूर मंदिर आएगी, तो द्वार पर पहरेदार बढ़ा दिये थे। नंगी तलवारें लिये खड़े थे, कि रोक देना उसे। भीतर प्रवेश करने मत देना। दीवानी है, पागल है, सुनेगी नहीं, जबरदस्ती करनी पड़े तो करना मगर मंदिर में प्रवेश नहीं करने देना।….. यही सज्जन, मालूम होता है स्वामीनारायण संप्रदाय में पैदा हो गये हैं श्री प्रमुख स्वामी के नाम से। यह स्त्रियां नहीं देखते। हवाई जहाज पर चलते हैं तो इनके चारों तरफ एक बुर्का उढ़ा दिया जाता है। क्योंकि एयर होस्टेस वगैरह, उनको देखकर कहीं इनको भ्रम हो जाए कि उर्वशी, मेनका अप्सराएं आ गयीं, क्या हो रहा है! क्या इन्द्र डर गया श्री प्रमुखस्वामी से? छोटे-मोटे स्वामी नहीं, श्री प्रमुख स्वामी! नाम भी क्या चुना है! यह वही सज्जन मालूम होते हैं।

मीरा नाचती गयी। द्वार पर नाचने लगी, भीड़ लग गयी। नाच ऐसा था, ऐसा रस भरा था कि मस्त हो गये द्वारपाल भी भूल ही गये कि रोकना है। तलवारें तो हाथ में रहीं मगर स्मरण न रहा तलवारों का। और मीरा नाचती हुई भीतर प्रवेश कर गयी। पुजारी पूजा कर रहा था, मीरा को देखकर उसके हाथ से थाल छूट गया पूजा का। झनझनाकर थाल नीचे गिर पड़ा। चिल्लाया क्रोध से ऐ स्त्री, तू भीतर कैसे आयी? बाहर निकल! मीरा ने जो उत्तर दिया, बड़ा प्यारा है।

मीरा ने कहा, मैंने तो .सुना था कि एक ही पुरुष है-परमात्मा कृष्ण-और हम सब तो उसकी ही सखियां हैं, मगर आज पता चला कि दो पुरुष हैं। एक तुम भी हो। तो तुम सखी नहीं हो! तुम क्या यह शृंगार किये खड़े हो, निकलो बाहर! इस मंदिर का पुरोहित होने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं। यह पूजा की थाली अच्छा हुआ तुम्हारे हाथ से गिर गयी। यह पूजा की थाली तुम्हारे हाथ में होनी नहीं चाहिए। तुम्हें अभी स्त्री दिखायी पड़ती है? तीस साल से स्त्री नहीं देखी तो तुम मुझे पहचान कैसे गये कि यह स्त्री है? यूं न देखी हो, सपनों में तो बहुत देखी होंगी! जो दिन में बचते हैं, वे रात में देखते हैं। इधर से बचते हैं तो उधर से देखते हैं। कोई न कोई उपाय खोज लेते हैं। और मीरा ने कहा कि यह जो कृष्ण की मूर्ति है, इसके बगल में ही राधा की मूर्ति है—यह स्त्री नहीं है? और अगर तुम यह कहो कि मूर्ति तो मूर्ति है, तो फिर तुम्हारे कृष्ण की मूर्ति भी बस मूर्ति है, क्यों मूर्खता कर रहे हो? किसलिए यह पूजा का थाल और यह अर्चना और यह धूप-दीप और यह सब उपद्रव, यह सब आडंबर? और अगर कृष्ण की मूर्ति मूर्ति नहीं है, तो फिर यह राधा? राधा पुरुष है? तो मेरे आने में क्या अड़चन हो गयी? मैं सम्हाल लूंगी…..अब इस मंदिर को, तुम रास्ते पर लगो!

मीरा ने ठीक कहा।

जीवन को अगर कोई पलायन करेगा तो परिणाम बुरे होंगे। पराङ्मुख मत होना। जीओ जीवन को, क्योंकि जीने से ही मुक्ति का अपने- आप द्वार खुलता है।

ओशो 

उपद्रव का कारण

मैं संसार के छोड़ने के पक्ष में नहीं हूं। मन को: ही रूपांतरित करना है। और तुम्हारे सूत्र साफ कह रहे हैं कि मन कारण है। काश, हमने यह समझा होता और मन को ही कारण समझकर रूपांतरित किया होता, तो आज इस देश की ऐसी दुर्गति न होती। यह इतना पाखंडी न होता जितना यह पाखंडी है। शायद पृथ्वी पर कोई ऐसा पाखंड नहीं है जैसा हमारे देश में है। धन का विरोध करेगे-और सारे शास्त्र समझा रहे हैं कि धन का दान करो; दान ही पुण्य है, दान ही धर्म है। और धन है पाप! पाप से कैसे पुण्य हो जाता है, यह भी बडे आश्चर्य की बात है!

फिर हिन्दू कहते हैं कि दान देना तो ब्राह्मण को। क्या ब्राह्मण से पाप करवाना है? और जैन कहते हैं कि दान देना तो जैन ऋषि मुनियों को। और बौद्ध कहते हैं, दान देना तो बौद्ध भिक्षुओं को। और धन को तीनों कहते हैं पाप। और पाप के लिए ही दान मांग रहे हैं। और इसकी भी वर्जना करते हैं कि दूसरों को दान मत देना, क्योंकि वह दान व्यर्थ जाएगा। धन है पाप तो एक बात तो यह है कि अगर धन पाप है तो ब्राह्मण को पाप करने का उपाय मत देना भूलकर मत देना। भ्रष्ट करना है ब्राह्मणों को! मगर हम भी अंधे हैं। धन को पाप भी मानते हैं और धन को दान भी करते हैं-और दान को पुण्य मानते हैं। अब पाप से पुण्य को निकाल रहे हैं। जालसाजी कर रहे हो। षड्यंत्र रच रहे हो। इसलिए इस देश में… सबसे ज्यादा धनलोलुप हम हैं, सबसे ज्यादा कामलोलुप हम हैं। खजुराहो और कोणार्क जैसे मंदिर हमने बनाये, दुनिया में किसी जाति ने नहीं बनाये। और हमारे शास्त्रों में पंडितों ने इस तरह की अश्लील कहानियां लिखी हैं कि कोई फिल्म इतनी अश्लील न बनी है, न बन सकती है। मगर धर्म के नाम पर चलती हो बात तो अंगीकार है, तो स्वीकार है।

हमने धर्म के नाम पर वेश्यावृत्ति चलायी, देवदासिया बनायीं। देवदासी हो गयी करेगी वेश्यागिरी, लेकिन मंदिर में करेगी अब। मंदिर को भी वेश्यालय बना दिया। और अब यह काम पुण्य का हो गया। अब इसमें कुछ पाप न रहा। हम पापों को पुण्यों में बदलने में बड़े होशियार हैं।

मगर इस सबके पीछे जाल का, इस सारे उपद्रव का कारण क्या है? कारण यह है कि हम ठीक-ठीक समझ नहीं पाये। जिन्होंने जाना उन्होंने कुछ और कहा और जिन्होंने हमें समझाया उन्होंने कुछ और कहा। इस सूत्र के अनुवाद में भी, चिदानंद, तुम खयाल करो तो तुम्हें पता चल जाएगा कि कहां से भ्रांतिया घुस जाती हैं। सूत्र का अनुवाद है : ‘मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। जो मन विषयों में आसक्त होगा, वह बंधन का और जो विषयों से पराङ्मुख होगा, वह मोक्ष का कारण होगा।’ यह पराङ्मुख कहां से आ गया? मूल सूत्र में कहीं भी नहीं है। मूल सूत्र है.

मन एव मनुष्यानां कारणं बंधमोक्षयो::।
संस्कृत जानना भी जरूरी नहीं… मैं तो संस्कृत जानता नहीं.. ‘मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन है।’
बन्धाय विषयासक्तं…….
‘विषय में आसक्त रहना बंधन है।’

मुक्ले निर्विषय स्मृतम्।
‘और जब तुम्हारी स्मृति विषय से मुक्त हो जाए, शून्य हो जाए, तो मोक्ष।’

ओशो 

कुछ मत छोड़ो, कहीं भागो मत।

कुछ मत छोड़ो, कहीं भागो मत। इसलिए मैं अपने संन्यासी को कहता हूं : जहां हो वहीं जागो। भागने वाले जाग नहीं पाते। भागने वाले तो भयभीत हैं, कायर हैं। मगर हम कायरों को भी बड़े प्यारे नाम दे देते हैं, उनको कहते हैं रणछोडदासजी! रण छोड़ भागे..!

मेरे गांव में एक मंदिर था रणछोड़दासजी का मंदिर। मैंने उस गांव के पुजारी को जाकर कहा कि देख, इस मंदिर का नाम बदल! उसने कहा, क्यों? नाम कैसा प्यारा है : रणछोडदासजी! मैंने कहा, तूने कभी सोचा भी कि रणछोड़दासजी का मतलब क्या हुआ? भगोड़े! जिन्होंने पीठ दिखा दी जीवन को। वह थोड़ा चौंका, उसने कहा कि तुझे भी उलटी-सीधी बातें सूझती हैं! मुझे जिन्दगी हो गयी पूजा करते इस मंदिर में, मैंने कभी यह सोचा ही नहीं कि रणछोड़दासजी का यह मतलब होता है! बात तो तेरी ठीक, मगर अब तो दूर दूर तक इस मंदिर की ख्याति है : रणछोड्दासजी का मंदिर। नाम बदला नहीं जा सकता है। मगर तूने एक अड़चन मेरे लिए पैदा कर दी। यह शब्द तो गलत है। कोई अगर युद्ध के क्षेत्र से पीठ दिखा दे, तो हम कायर कहते हैं उसे, और जीवन के संघर्ष से पीठ दिखा दे तो उसको हम महात्मा कहते हैं! कैसा बेईमानी का गणित है!

मुझसे लोग पूछते हैं कि आपके संन्यासी कैसे हैं, क्योंकि न घर छोड़ते, न द्वार छोड़ते, न दुकान छोड़ते, न बाजार छोड़ते! मैं उनसे कहता हूं : मेरे संन्यासी ही संन्यासी हैं। क्योंकि छोड़ना है मन और कुछ भी नहीं छोड़ना है। काटनी हैं जडें मन एव मनुष्यानां कारणं बंधमोक्षयो: :। और क्या सिर पटकते रहते हो उपनिषदों पर, कुछ भी तुम्हारी समझ में नहीं आया। अब यह उपनिषद् सीधा सीधा कह रहा है कि मन है कारण, पत्नी कारण नहीं है। पत्नी को छोड़कर भाग जाओगे, कुछ भी न होगा। फिर कहीं किसी और को पत्नी बनाकर बैठ जाओगे। न होगी पत्नी, शिष्या होगी, सेविका होगी नाम कुछ भी रख लेना मगर वही मन और वही जाल। लेबिल बदल जाएंगे मगर भीतर जो भरा है सो भरा है।

मन एव मनुष्‍यावां कारणं बंधमोक्षयों:। बन्‍धाय विषयासक्‍तं मुक्‍त्यै निर्विषयं स्‍मृतम्।।

अर्थात मन ही मनुष्‍यों के बंधन और मोक्ष का कारण है।
      जो मन विषयों में आसक्‍त होगा, वह बंधन तथा जो विषयों से
            पराड्मुख होगा, वह मोक्ष का कारण होगा।

 
मन का अर्थ होता है : मनन की प्रक्रिया, मनन की क्षमता, सोच-विचार की संभावना। मिट्टी तो क्या खाक सोचेगी! मिट्टी तो सोचना भी चाहे तो क्या सोचेगी? कौन है जो मनुष्य के भीतर सोचता और विचारता? कौन है जो मनुष्य के भीतर मनन बनता है? वह चैतन्य है। इसलिए मन सिर्फ मिट्टी से ज्यादा नहीं है और भी कुछ है; मिट्टी के जो पार है रु उसके भी जो पार है, उसकी तरफ इंगित है, इशारा है। मनन की प्रक्रिया तो चैतन्य की संभावना है। चैतन्य हो तो ही मनन हो सकता है। इसलिए कोमा में विक्षिप्त पड़े हुए मनुष्य को मनुष्य नहीं कहना चाहिए। वहा तो मनन की क्रिया ही नहीं हो रही है, मनन की क्रिया ही समाप्त हो गयी है। वहां तो मिट्टी का आकाश से संबंध टूटा-टूटा है, उखड़ा-उखड़ा है-बीच की सीढ़ी ही गिर गयी है।

तो मन है सीढ़ी। एक छोर लगा है मिट्टी से और दूसरा छोर छू रहा है अमृत को। सीढ़ी एक ही है। जिस सीढ़ी से तुम नीचे आते हो, उसी से ऊपर भी जाते हो। ऊपर और नीचे आने के लिए दो सीढ़ियों की जरूरत नहीं होती। सिर्फ दिशा बदल जाती है। यूं भी हो सकता है कि तुम सीढ़ी पर चढ़ते हुए आधी यात्रा पूरी कर लिये हो और एक सोपान पर खड़े हो, और दूसरा आदमी सीढ़ी से उतर रहा है, वह भी उसी सोपान पर खड़ा है; दोनों एक ही सोपान पर हैं-एक चढ़ रहा है, एक उतर रहा है-एक ही सोपान पर हैं फिर भी बहुत भिन्न हैं। क्योंकि एक चढ़ रहा है, एक उतर रहा है। एक ही जगह हैं, मगर उनका एक ही कोटि में स्थान नहीं बनाया जा सकता। एक उतर रहा है, गिर रहा है, एक चढ़ रहा है, ऊर्ध्वगामी हो रहा है।

मन तो सीढी है। अगर विषयों से आसक्त हो जाए तो उतरना शुरू हो जाता है। विषय अर्थात पृथ्वी, मिट्टी। और अगर विषयों से अनासक्त हो जाए तो चढ़ना शुरू हो जाता है। सीढ़ी वही है। जो विषयों में जीता है, वह तेज-रोज नीचे की तरफ ढलान पर खिसलता जाता, फिसलता जाता।

और ध्यान रहे, खिसलना आसान है, फिसलना आसान है। उतार हमेशा आसान होते हैं। क्योंकि गुरुत्वाकर्षण ही खींच लेता है, तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता। चढ़ाव कठिन होते हैं। जैसे कोई गौरीशंकर पर चढ़ रहा हो। जैसे-जैसे ऊंचाई पर पहुंचता है वैसे-वैसे कठिनाई होती है। तब छोटा-सा भार भी बहुत भार मालूम होता है। एक छोटा-सा झोला भी कंधे पर लटकाकर चढ़ना मुश्किल होने लगता है। तो जैसे-जैसे यात्री ऊपर पहुंचता है वैसे-वैसे वजन उसे छोड़ने पड़ते हैं। वही अनासक्ति है-वजन छोड़ना। जमीन पर चल रहे हो तो ढोओं जितना ढोना हो; लदे रहो गधों की भांति, कोई चिंता की बात नहीं, लेकिन अगर चढ़ना है पहाड़, तो फिर छाटना होगा, फिर असार को छोड़ना होगा और ऐसी भी घड़ी आएगी जब सब छोड़ना होगा। अंतिम शिखर पर जब पहुंचोगे तो सब छोड़कर ही पहुंचोगे।

सीढ़ी वही है। एक में बोझ बढ़ता जाता है, एक में निबोंझ बढ़ता जाता है। एक में विषय बढ़ते जाते हैं, एक में घटते जाते हैं। एक में विचारों का जाल फैलता जाता है, एक में क्षीण होता चला जाता है। इसलिए यह सूत्र ठीक कहता है कि मन ही कारण है संसार का और मन ही कारण है मोक्ष का मन ही बांधता है, मन ही मुक्त करता है। आदमी प्रज्ञावान हो तो मन से ही रास्ता खोज लेता है अ-मन का। अ-मन शब्द बड़ा प्यारा है। नानक ने इसका बहुत उपयोग किया है,कबीर ने भी। समाधि को अ-मनी दशा कहा है। उर्दू और उर्दू से संबंधित भाषाओं में अमन का अर्थ होता है : शाति। वह भी प्यारी बात है! क्योंकि जैसे-जैसे ही मन से तुम पार जाने लगोगे, अ-मन होने लगोगे, वैसे-वैसे जीवन में शांति की फुहार, बरखा होने लगेगी। फूल खिलेंगे मौन के। आनंद के स्वर फूटेंगे। जीवन के झरने बहेंगे।

ओशो 

Sunday, August 9, 2015

जिसको प्रेम का कोई अनुभव नहीं है, वह अगर प्रेम के संबंध में कुछ कहे, उसका मूल्य क्या?

और अक्सर ऐसा होता है कि जिनके जीवन में प्रेम का कोई अनुभव नहीं है, वे प्रेम के संबंध में काफी चर्चा करते हैं। कारण है उसका, क्योंकि चर्चा से ही वे मन को भरते हैं। प्रेम तो है नहीं जीवन में, प्रेम की चर्चा करके ही थोड़ा बहुत रस ले लेते हैं।

अक्सर प्रेम की कविताएं लिखने वाले वे ही लोग होते हैं, जिनके जीवन में प्रेम का कोई अनुभव नहीं होता। सब्‍स्‍टीटयूट है, वह कविता जो है। वह जो प्रेम में उन्होंने किया होता, वह नहीं कर पाए हैं, वह शब्दों में कर रहे हैं। इसलिए आप प्रेम की कविता पढ़ कर उस कविता के लिखने वाले कवि से मिलने मत चले जाना, नहीं तो बड़ी निराशा होगी। वहां बिलकुल दूसरा ही आदमी आप पाएंगे।

जीवन सिर्फ बुद्धि से समझ में आने वाला होता, दूर खड़े हो कर, तो फिर दर्शक भी जीवन को जान लेते, फिर भोक्ता होने की कोई जरूरत न थी। फिर तो राहगीर भी किनारे से गुजर कर जिंदगी को पहचान लेते, फिर तो जिंदगी में डुबकी लगाने की और एकरस होने की कोई जरूरत न होती। लेकिन राहगीर कुछ भी नहीं जान पाते। वे जो किनारे खड़े हुए लोग हैं, उनको ऊपर ऊपर की चीजें दिखाई पड़ती हैं, भीतर जो घट रहा है, वह आंखों से चूक जाता है।

साधना सूत्र
ओशो 

हिंदू मुस्लिम भाई-भाई


सभी धर्मों का अध्ययन करना जरूरी है, लेकिन चुनाव स्वयं का होना चाहिए, कोई दूसरा चुनाव न करे। अच्छी दुनिया पैदा हो सकती है। सब धर्म वैसे ही पढ़ाए जाएं और खुला छोड़ दिया जाए व्यक्ति को कि वह अपनी खोज कर ले। और वह जो भी खोज ले, उसका स्वागत हो।

इसके गहरे परिणाम होंगे। इससे एक तो धर्म के प्रति जो बगावत पैदा हो जाती है, वह पैदा नहीं होगी। दुनिया से नास्तिक कम हो जाएंगे। नास्तिकता पैदा होती है जबर्दस्ती थोपी गई आस्तिकता की प्रतिक्रिया में। दुनिया से नास्तिकता कम हो जाएगी। दुनिया से तालमेल न बैठने वाली व्यवस्था क्षीण हो जाएगी। जिससे तालमेल बैठेगा, वही हम चुनेंगे। एक रस पैदा होगा, एक प्रेम पैदा होगा। जो हमने चुना है, वह हमारी निजी खोज होगी। जो मेरी खोज है, उसमें मुझे रस होता है। जो मेरा आविष्कार है, उसमें मुझे आनंद होता है। उसके लिए मैं सब कुछ दांव पर लगा सकता हूं। और जब तक हम सब दांव पर लगा न सकें अपने धर्म के लिए, तब तक हमारे जीवन में कोई क्रांति घटित नहीं होती।

तीसरा, एक-एक घर में अनेक धर्मों के लोग हो जाएंगे। दुनिया से दंगे फसाद समाप्त हो सकते हैं। एक ही उपाय है कि एक घर में कई धर्मों के लोग हों, बस। और कोई उपाय नहीं है। कि बाप ईसाई हो, कि बेटा जैन हो, कि पत्नी मुसलमान हो, कि एक बहू बौद्ध हो, कि एक बहू कन्‍फ्यूशियन हो एक घर में अनेक धर्मों के लोग हों, तो दंगा नहीं हो सकता। किससे लड़ने जाइएगा? अगर हिंदू मुस्लिम दंगा हो जाए तो क्या करिएगा फिर? आपकी पत्नी मुसलमान है, वह मुसलमान के साथ खड़ी होगी; आपका बेटा बौद्ध है, वह बौद्ध के साथ खड़ा होगा, आपका भाई जैन है, वह जैन के साथ खड़ा होगा-घर में कैसे पाकिस्तान काटिएगा बहुत मुश्किल हो जाएगा।

जब तक पूरा का पूरा घर एक धर्म में है, तब तक दुनिया से दंगे-फसाद बंद नहीं हो सकते। क्योंकि आप बच सकते हैं आसानी से। जिनसे आपका लगाव है, वे सब आपके धर्म के हैं। जिनसे आपका संबंध है, प्रेम है, वे सब आपके धर्म के हैं। लेकिन अगर एक घर में दस धर्मों के लोग हैं, तो आपका अपनी पत्नी से प्रेम है और वह मुसलमान है, तो आप मुसलमान से लड़ नहीं सकते।

चाहे कोई कितना ही चिल्लाए हिंदू मुस्लिम भाई- भाई, और कोई कितना ही कहे अल्लाह-ईश्वर तेरे नाम-सब व्यर्थ है, इन बातों से कुछ होने वाला नहीं है। जब तक कि एक-एक घर की प्रेम की व्यवस्था में अनेक धर्म प्रविष्ट न हो जाएं, तब कहने की जरूरत न होगी कि हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई, वे होंगे।

यह तो कहना पड़ता है इसलिए कि वे नहीं हैं। यह झूठ है, यह सरासर व्यर्थ है, यह ऊपर से थोपा हुआ है। और चालबाजी है। और राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं है।

साधना सूत्र
ओशो 

अपने मार्ग की शोध करो— यह सूत्र का अर्थ है.....


……ड़रो मत, भयभीत मत होओ। और जरूरी नहीं है कि जिस धर्म में आप संयोग से पैदा हुए हैं और जो संस्कार आप पर डाल दिए गए हैं, वे आपके काम के हों। यह भी जरूरी नहीं है। काम के भी न हों, खतरनाक भी हों, बाधा भी हों, क्योंकि…….इसे थोड़ा सोचें।

मीरा है; नाचती है, गाती है। उसकी समाधि नृत्य बन गई है। आप महावीर को नाचता हुआ सोच सकते हैं कि नाच रहे हैं महावीर? तो बहुत बेतुका लगेगा। सोचने में ही बेतुका लगेगा कि महावीर और नाच रहे हैं। जंचेगी नहीं बात, कल्पना भी करनी मुश्किल है। अभी तक किसी ने सपना भी नहीं देखा कि महावीर नाच रहे हैं, मोर मुकुट बांधे हुए हैं। वे बड़े बेतुके लगेंगे, बड़े हास्यास्पद मालूम होंगे। लेकिन मीरा अगर न नाचे, और बैठ जाए महावीर की तरह, पत्थर की मूर्ति बन कर वृक्ष के नीचे, तो भी न जंचेगी। मीरा का व्यक्तित्व, महावीर के व्यक्तित्व से अलग है। उसका मोक्ष नृत्य के मार्ग से ही आएगा। महावीर का मोक्ष मौन, शांत, स्थिर हो कर ही आएगा। और दोनों मोक्ष की तरफ जाएंगे, लेकिन अपने-अपने ढंग से जाएंगे।

कृष्ण और क्राइस्ट को साथ साथ खड़ा करके सोचो तो बड़ी मुश्किल होती है। जीसस को मानने वाले कहते हैं कि क्राइस्ट कभी हंसे नहीं। क्योंकि जगत में इतनी पीड़ा है, इतना दुख है- कैसे हंसे? परमज्ञानी कैसे हंसेगा? और इधर कृष्ण हैं कि नाच रहे हैं, बांसुरी बजा रहे हैं, गोपियों के साथ रास चल रहा है। तो जीसस का मानने वाला सोच ही नहीं सकता कि कृष्ण कोई परमज्ञानी हो सकते हैं। क्योंकि यह इतनी प्रसन्नता परमज्ञानी को शोभा नहीं देती। और कृष्ण का मानने वाला यह नहीं सोच सकता कि यह उदास, लंबे चेहरे वाला आदमी जीसस, यह परमज्ञानी हो सकता है। ऐसी उदासी, मुर्दगी, यह परमज्ञानी को शोभा नहीं देती। परमज्ञानी तो आनंद से भरपूर हो जाना चाहिए।

लेकिन क्राइस्ट भी पहुंचते हैं अपने रास्ते से। जगत की पीड़ा के साथ जो अपने को तादात्म्य कर लेता है, सारे जगत की पीड़ा जो अपने ऊपर ले लेता है, जो अपने को भूल ही जाता है और सारे जगत की पीड़ा से एक हो जाता है, वह भी पहुंचता है। वह भी एक मार्ग है।
 
और जो सारी पीड़ा को भूल ही जाता है, आनंद में इतना लीन हो जाता है कि इस जगत में पीड़ा है, इसका जिसे पता भी नहीं चलता है, जो इस अस्तित्व के उत्सव के साथ एक रस हो जाता है, जो रास में डूब जाता है, वह भी पहुंच जाता है। लेकिन पहुंचने के रास्ते अलग अलग हैं।

अब मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि अगर आपका रास्ता नृत्य का हो और आप महावीर के मानने वालों के घर में पैदा हो गए, तो आप मुश्किल में पड़ेंगे। क्योंकि आपका कहीं तालमेल नहीं बैठेगा। मीरा के घर में पैदा हो गए, तब तो ठीक, नहीं तो आपका कोई तालमेल नहीं बैठेगा। आप हमेशा पाएंगे कि आप कहीं न कहीं, कोई मेल ही नहीं बैठ रहा है। और चेतन मन में आप समझेंगे कि आप जैन हैं, और आपके पूरे व्यक्तित्व का ढांचा जो है, वह किसी भक्त का है, तो आप अड़चन में पड़ेंगे। अगर आप महावीर जैसे व्यक्तित्व के आदमी हैं और कहीं कृष्ण को मानने वालों के घर में पैदा हो गए, तो ऊपर से आपको लगेगा कि ठीक है और भीतर से लगेगा सब गलत है। तो आप पाखंडी हो जाएंगे। जो आप करेंगे, वह आपके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाएगा, इसलिए वास्तविक, प्रामाणिक नहीं होगा। और जो आप करना चाहेंगे, वह आप कर न सकेंगे, क्योंकि वह आपके संस्कार से विपरीत पड़ जाएगा।

साधना सूत्र

ओशो 

मार्ग के खोज की स्वतंत्रता

न तो आज जमीन पर हिंदू हैं, न मुसलमान, न बौद्ध। आज कैदी हैं। कोई हिंदू कैदखाने में है, कोई मुसलमान कैदखाने में है, कोई जैन कैदखाने में है।

कैदखाना इसलिए कहता हूं कि आपने कभी सोचा ही नहीं कि आपको जैन होना है, कि हिंदू होना है, कि मुसलमान होना है। आपने चुना नहीं है। यह आपकी गुलामी है। लेकिन गुलामी इतनी सूक्ष्म है कि आपको पता नहीं चलता, क्योंकि आपके होश में नहीं डाली गई है। जब आप बेहोश थे, तब यह गुलामी, यह जंजीर आपके हाथ में पहना दी गई। जब आपको होश आया तो आपने जंजीर अपने हाथ में ही पाई। और इसे जंजीर भी नहीं कहा जाता है। इसे आपके मां बाप ने, परिवार ने, समाज ने समझाया है कि यह आभूषण है! आप इसको सम्हालते हैं, कोई तोड़ न दे। यह आभूषण है और बड़ा कीमती है, आप इसके लिए जान लगा देंगे।

एक बड़े मजे की घटना घटती है। अगर हिंदू धर्म पर खतरा हो तो आप अपनी जान लगा सकते हैं। आप हिंदू धर्म, मुसलमान या ईसाई, किसी भी धर्म के लिए मर सकते हैं, लेकिन जी नहीं सकते। अगर आपसे कहा जाए कि जीवन हिंदू की तरह जीयो, तो आप जीने को राजी नहीं हैं। मुसलमान की तरह जीयो, जीने को राजी नहीं हैं। लेकिन अगर झगड़ा-फसाद हो तो आप मरने के लिए राजी हैं! वह आदमी हिंदू धर्म के लिए मरने के लिए राजी है, जो हिंदू धर्म के लिए जीने के लिए कभी राजी नहीं था! क्या मामला है?

कहीं कोई रोग है, कहीं कोई बीमारी है। जीने के लिए हमारी कोई उत्सुकता नहीं है। मार-काट के लिए हम उत्सुक हो जाते हैं। क्योंकि जैसे ही कोई हमारे धर्म पर हमला करता है, हमें होश ही नहीं रह जाता। वह हमारा बेहोश हिस्सा है, जिस पर हमला किया जा रहा है।

इसलिए जब भी हिंदू-मुसलमान लड़ते हैं, तो आप यह मत समझना कि वे होश में लड़ रहे हैं। वे बेहोशी में लड़ रहे हैं। बेहोशी में वे हिंदू-मुसलमान हैं, होश में नहीं हैं। इसलिए कोई भी उनके अचेतन मन को चोट कर दे, तो बस वे पागल हो जाएंगे। न तो हिंदू लड़ते हैं, न मुसलमान लड़ते हैं-पागल लड़ते हैं। कोई हिंदू मार्का पागल है। कोई मुसलमान मार्का पागल है। यह मार्कों का फर्क है, लेकिन पागल है।




और आपके भीतर धर्म उस समय डाला जाता है, जब तर्क की कोई क्षमता नहीं होती।

इसलिए मैं कहता हूं कि यह सबसे बड़ा पाप है। और जब तक यह पाप बंद नहीं होता, जब तक हम प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की खोज की स्वतंत्रता नहीं देते, तब तक दुनिया धार्मिक नहीं हो सकेगी। क्योंकि धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए।



साधना सूत्र

ओशो 

13—मार्ग की शोध करो।

13—मार्ग की शोध करो।
 थोड़ा रुको और विचार करो।

तुम मार्ग पाना चाहते हो, या तुम्हारे मन में ऊंची स्थिति प्राप्त करने,
ऊंचे चढ़ने और एक विशाल भविष्य निर्माण करने के स्वप्न हैं, सावधान!
मार्ग के लिए ही मार्ग को प्राप्त करना है—तुम्हारे ही चरण उस पर चलेंगे, इसलिए नहीं।

14—अपने भीतर लौटकर मार्ग की शोध करो।

15—बाह्य जीवन में हिम्मत से आगे बढ़कर मार्ग की शोध करो।
जो मनुष्य साधना—पथ में प्रविष्ट होना चाहता है,
उसको अपने समस्त स्वभाव को बुद्धिमत्ता के साथ उपयोग में लाना चाहिए।
प्रत्येक मनुष्य पूर्णरूपेण स्वयं अपना मार्ग, अपना सत्य, और अपना जीवन है।
और इस प्रकार उस मार्ग को ढूंढो। उस मार्ग को जीवन और अस्तित्व के नियमों,
प्रकृति के नियमों एवं पराप्राकृतिक नियमों के अध्ययन के द्वारा ढूंढो।
ज्यों—ज्यों तुम उसकी उपासना और उसका निरीक्षण करते जाओगे,
उसका प्रकाश स्थिर गति से बढ़ता जाएगा।
तब तुम्हें पता चलेगा कि तुमने मार्ग का प्रारंभिक छोर पा लिया है।
और जब तुम मार्ग का अंतिम छोर पा लोगे,
तो उसका प्रकाश एकाएक अनंत प्रकाश का रूप धारण कर लेगा।
उस भीतर के दृश्य से न भयभीत होओ और न आश्चर्य करो।
उस धीमे प्रकाश पर अपनी दृष्टि रखो। तब वह प्रकाश धीरे— धीरे बढ़ेगा।
लेकिन अपने भीतर के अंधकार से सहायता लो और समझो कि जिन्होंने प्रकाश देखा ही नहीं है,
वे कितने असहाय हैं और उनकी आत्मा कितने गहन अंधकार में है।

साधना सूत्र 

ओशो 

तस्मै श्री गुरुवे नम:।


मनुष्य के जीवन की तीन अवस्थाएं हैं। एक जागरण, एक स्वप्न, एक सुषुप्ति और चौथी समाधि। जागरण का संबंध ब्रह्मा से है। क्योंकि जागकर तुम काम धाम में लगते हो; निर्माण में लगते हो, सृजन में लगते हो। यह बनाना, वह बनाना, मकान बनाना, दुकान चलाना, धन कमाना! स्वप्न में तुम संवारने में लगते हो; जो-जो दिन में रह गया है-अधूरा, स्‍वप्‍न में तुम्हारे संवरता है। इसलिए हर आदमी के स्वप्न अलग-अलग होते हैं।

मनोवैज्ञानिक लोगों की जानकारी के लिए उनके स्‍वप्‍नों का निरीक्षण करते हैं। उनके स्‍वप्‍नों को जानना चाहते हैं। क्योंकि स्वप्न बताते हैं, क्या क्या अधूरा है; कहां-कहां सम्हाल की जरूरत है! अब जो आदमी रात-रात धन ही के सपने देख रहा है, वह खबर दे रहा है एक बात की कि उसकी जिंदगी में धन की कमी है। जिसकी कमी है, उसके स्वप्न होते हैं। जिसको कोई कमी नहीं रह जाती, उसके स्वप्न तिरोहित हो जाते हैं। उसको स्वप्न बचते ही नहीं। बुद्धपुरुष स्वप्न नहीं देखते। क्या है देखने को वहां! जिसके स्वप्न में स्त्रिया ही स्त्रियां तैर रही हैं, अप्सराएं उतरती हैं, उर्वशिया और मेनकाएं उतरती हैं, उसका अर्थ है कि उसके जीवन में अभी स्त्री के अनुभव से तृप्ति नहीं हुई, या पुरुष के अनुभव से तृप्ति नहीं हुई, अभी वहा अतृप्ति है, वासना दमित पड़ी है, इसलिए वासना सपने में सिर उठा रही है। सपना कहता है - यहां सम्हालों! यहां कमी है।

मनोवैज्ञानिक कहता है कि तुम्हारा सपना मैं जान लूं तो तुम्हें जान लूं। क्योंकि तुम्हारी कमी पता चल जाये, तो मैं तुमसे कह सकूं कि कहा भरी; गड्डा कहां है; कहां मुश्किल आ रही है। और तीसरी अवस्था है सुषुप्ति। सुषुप्ति यानी महेश, मृत्यु। छोटी सी मृत्यु रात घट जाती है, जब स्‍वप्‍न भी खो जाते हैं, तुम भी नहीं बचते। तुम कहां चले जाते हो, कुछ पता नहीं! होते ही नहीं। सब शून्य हो जाता है।

और चौथी अवस्था को हमने ‘तुरीय’ कहा है। तुरीय का अर्थ ही होता है, सिर्फ चौथी अवस्था। उस शब्द  का और कोई अर्थ नहीं होता; चौथी-इतना ही अर्थ होता है-द फोर्थ, तुरीय, समाधि।

जो व्यक्ति सुषुप्ति में जाग जाता है, सपने चले गये, गहरी नींद आ गई, सपने बिलकुल नहीं हैं, लेकिन होश का दिया जल रहा है, उसको समाधि मिलती है। उस चौथी अवस्था में परब्रह्म का साक्षात्कार होता है।

सद्गुरु के पास तुम जब जाते हो, तो पहले तो तुम जाग्रत अवस्था में जाते हो, जिसको तुम जागरण कहते हो। उसमें कुतूहल होता है। अगर उसके पास रुके थोड़ी देर, तो विद्यार्थी बने बिना नहीं लौटोगे। उसमें सपने होते हैं। ज्ञान क्या है? सिवाय सपने के और कुछ भी नहीं है! पानी पर खींची गई लकीरें, कि कागज पर खींची गई लकीरें-ज्ञान सिर्फ सपना है।

अगर और रुक गये, तो सब सपने मिट जाते. हैं, ज्ञान मिट जाता है; ध्यान का आविर्भाव होता है। ध्यान सुषुप्ति है। अगर और रुके रहे, तो सुषुप्ति भी खो जाती है; फिर बोध का, बुद्धत्व का जन्म होता है। और जब बुद्धत्व का जन्म होता है, तब तुम जान पाते हो कि जो गुरु बाहर था, वही तुम्हारे भीतर है। जो तुम्हारे भीतर है, वही समस्त में व्याप्त है। वही परब्रह्म फूलों में है, वही पक्षियों में है, वही पत्थरों में है, वही लोगों में है-वही सबमें व्याप्त है। सारी तरंगें उसी एक सागर की हैं। और जिन्होंने इस अनुभव को जान लिया, वे धन्यभागी हैं। वे ही धार्मिक हैं। वे न हिंदू हैं, न मुसलमान, न ईसाई, न बौद्ध, न जैन-वे सिर्फ धर्मिक हैं।

और मैं चाहूंगा कि मेरे पास जो लोग इकट्ठे हुए हैं, वे सिर्फ धर्मिक हों। ये हिंदू मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी की बीमारियां विदा करो। ये सब बीमारियां हैं। आ गये हो अगर वैद्य के पास, तो इन सारी बीमारियों से मुक्त हो जाओ; स्वस्थ बनो। और तब तुम्हारे भीतर नमन उठेगा।’तस्मै श्री गुरुवे नम:।’ और तब तुम्हारे भीतर पहली दफा अहोभाव में, धन्यवाद में नमन उठेगा। तुम पहली बार झुकोगे इस विश्व के प्रति, इस अस्तित्व के प्रति। तुम्हारा प्राण गद्गद् हो उठेगा कृतज्ञता से, अनुग्रह से। तुम्हारे जीवन में एक सुगंध उठेगी, जो समर्पित हो जायेगी अस्तित्व के चरणों में।

मेरा स्वर्णिम भारत

ओशो 

सद्गुरु के पास जाने के चार ढंग

एक तो है कुतूहलवश; यूं ही जिज्ञासा से कि देखें, क्या है! देखें, क्या हो रहा है! देखें, क्या कहा जा रहा है! वह सबसे उथला पहलू है।

दूसरा पहलू है विद्यार्थी का, कि कुछ सीखकर आयें; कुछ सूचनाएं ग्रहण करें; कुछ शान संगृहीत करें। वह थोडा गहरा है, मगर बहुत गहरा नहीं। चमड़ी जितनी गहरी, बस इतना गहरा है। तुम कुछ सूचनाएं इकट्ठी करोगे और लौट जाओगे।

 तीसरा पहलू है शिष्य का। जिज्ञासु को जोड़ो ब्रह्मा से। विद्यार्थी को जोड़ो विष्णु से। शिष्य को जोड़ो महेश से।
शिष्य वह है, जो मिटने को तैयार है। विद्यार्थी वह है, जो अपने को सजाने-संवारने में लगा है। थोड़ा ज्ञान और, थोड़ी जानकारी और, थोड़ी पदविया और, थोड़ी डिग्रियां और। थोड़े सर्टिफिकेट, थोड़े प्रमाणपत्र, थोड़े तगमे!

जिज्ञासु तो वह है, जो अपने को संवारने में लगा है। और जो कुतूहल से भरा है, उसने तो अभी यात्रा ही शुरू की; अभी तो ब्रह्मा का ही काम शुरू हुआ; बीज बोया गया। अभी सृजन की शुरुआत हुई। विद्यार्थी जरा आगे बढ़ा, उसमें दो पत्ते टूटे; अंकुर फूटे। शिष्य वह है, जो मिटने को तैयार है, मरने को तैयार है; जो कहता है कि गुरु के लिए सब कुछ समर्पित करने को तैयार हूं। उस तैयारी से शिष्य बनता है।

सभी विद्यार्थी शिष्य नहीं होते। विद्यार्थी की उत्सुकता शान में होती है; शिष्य की उत्सुकता ध्यान में होती है। ज्ञान से तुम्हारा अहंकार भरता है और संवरता है। ध्यान से तुम्हारा अहंकार मरता है और मिटता है।

 और चौथी अवस्था है भक्त की। भक्त का अर्थ होता है, जो मिट ही चुका। शिष्य ने शुरुआत की; भक्त ने पूर्णता कर दी। भक्त जान पाता है परब्रह्म की अवस्था को। जो गुरु के सामने मिट ही गया; मिटने को भी कुछ न बचा अब जो यह भी नहीं कह सकता कि मैं मिटना चाहता हूं जो इतना भी नहीं है—वही भक्त है। और जहां भक्ति है, वहां परात्पर ब्रह्म का साक्षात्कार है।

मेरा स्वर्णिम भारत

ओशो
 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुविष्‍णू: गुरुदेंवो महेश्वर:।


ये तो तीन चरण हुए। फिर जो अनुभूति तुम्हारे भीतर इन तीन चरणों से होगी…। ये तो तीन द्वार हुए। इनसे प्रवेश करके मंदिर की जो प्रतिमा का मिलन होगा, वह चौथा, तुरीय, चौथी अवस्था-गुरु: साक्षात् परब्रह्म। तब तुम जानोगे कि जिसके पास बैठे थे, वह कोई व्यक्ति नहीं था। जिसने सम्हाला, मारा-पीटा-तोड़ा, जगाया -वह तो कोई व्यक्ति नहीं था। वह तो था ही नहीं; उसके भीतर परमात्मा ही था।

और जिस दिन तुम अपने गुरु के भीतर परमात्मा को देख लोगे, उस दिन अपने भीतर भी परमात्मा को देख लोगे। क्योंकि गुरु तो दर्पण है, उसमें तुम्हें अपनी ही झलक दिखाई पड़ जायेगी। आंख निर्मल हुई कि झलक दिखाई पड़ी।

तीन चरण हैं, चौथी मंजिल है। और सद्गुरु के पास चारों चरण पूरे हो जाते हैं।’
तस्मै श्री गुरुवे नम: ‘।…


इसलिए गुरु को नमस्कार। इसलिए, गुरु को नमन। इसलिए, झुकते हैं उसके लिए।

और पूर्णिमा का दिन ही चुना है उसके लिए, सत्य वेदान्त, क्योंकि हमारा जीवन दिन की तरह नहीं है-रात की तरह है। और रात में सूरज नहीं उगा करते। रात में चांद उगता है। हम हैं रात-अंधेरी रात। और गुरु हमारे जीवन में जब आ जाता है, तो जैसे पूर्णिमा की रात आ गई। जैसे पूनम का चांद उतर आया। चंद्रमा प्रतीक है बहुत-सी चीजों का। एक तो यह कि वह रात में रोशनी देता है। और तुम अंधेरी रात हो, और तुम्हें चांद चाहिए-सूरज नहीं। सूरज का क्या करोगे! सूरज से तो तुम्हारा मिलन ही नहीं होगा। तुम तो अंधेरी रात हो, तुम्हें तो सूरज की कोई खबर नहीं। तुम्हें तो चांद ही मिल सकता है।

और चांद की कई खुबियां हैं। पहली तो खूबी यह कि चांद की रोशनी चांद की नहीं होती; सूरज की होती है। दिनभर चांद सूरज की रोशनी पीता है, और रातभर सूरज की रोशनी को बिखेरता है। चांद की कोई अपनी रोशनी नहीं होती। जैसे तुम एक दिया जलाओ और दर्पण में से दिया रोशनी फेंके। दर्पण की कोई रोशनी नहीं होती; रोशनी तो दिये की है। मगर तुम्हारा अभी दिये से मिलना नहीं हो सकता। और अभी दिये को देखोगे, तो जल पाओगे। आंखें जल जायेंगी। अभी रोशनी को सामने से तुम सीधा देखोगे, सूरज को, तो आंखें फूट जायेंगी। यूं ही अंधे हो-और आंखें फूट जायेंगी!

अभी परमात्मा से तुम्हारा सीधा मिलन नहीं हो सकता। अभी तो परमात्मा का बहुत सौम्य रूप चाहिए, जिसको तुम पचा सको। चंद्रमा सौम्य है। रोशनी तो सूरज की ही है। गुरु में जो प्रगट हो रहा है, वह तो सूरज ही है, परमात्मा ही है। मगर गुरु के माध्यम से सौम्य हो जाता है।

चंद्रमा की वही कला है, कीमिया है। वह उसका जादू है-कि सूरज की रोशनी को पीकर और शीतल कर देता है। सूरज को देखोगे, तो गर्म है, उत्तप्त है; और चांद को देखोगे, तो तुम शीतलता से भर जाओगे। सूरज पौरुष है, पुरुष है। चंद्रमा स्त्रैण है, मधुर है, प्रसादपूर्ण है। परमात्मा तो पुरुष है, कठोर है, सूरज जैसा है। उसको पचाना सीधा सीधा, आसान नहीं। उसे पचाने के लिए सद्गुरु से गुजरना जरूरी है। सद्गुरु तुम्हें वही रोशनी दे देता है, लेकिन इस ढंग से कि तुम उसे पी लो। जैसे सागर से कोई पानी पिये, तो मर जाये। हालाकि कुंए में भी जो पानी है, है सागर का ही। मगर बदलियों में उठकर आता है। नदियों में झरकर आता है। पहाड़ों पर से गिरकर आता  तो सागर का ही। पानी तो सब सागर का है। गंगा में हो, कि यमुना में हो, कि नर्मदा में हो, कि तुम्हारे कुंए में हो, किसी पहाड़ के झरने में हो -है तो सब सागर का, लेकिन सागर का पानी पियोगे तो मर जाओगे लेकिन झरने में कुछ बात है, कुछ राज है; उसी पानी को तुम्हारे पचाने के योग्य बना देता है!

सद्गुरु की वही कला है। उसके भीतर से परमात्मा गुजरकर सौम्य हो जाता है, स्त्रैण हो जाता है; मधुर हो जाता है; प्रीतिकर हो जाता है। उसके भीतर से तुम्हारे पास आता है, तो तुम पचा सकते हो। और एक बार पचाने की कला आ गई, तो गुरु बीच से हट जाता , गुरु तो था ही नहीं, सिर्फ यह तो रूपांतरण की एक प्रक्रिया थी। जिस दिन तुमने पहचान लिया गुरु की अंतरात्मा को, उस दिन तुमने सूरज को पहचान लिया। तुमने चांद में सूरज को देख लिया; फिर रात मिट गई, फिर दिन हो गया।

इसलिए गुरु पूर्णिमा को हमने चुना है प्रतीक की तरह। ये सारे प्रतीक हैं। इन प्रतीकों का एक पहलू और खयाल में ले लो।

मेरा स्वर्णिम भारत

ओशो 

बस होना है. Just Be!

मैं याद करता हूं एक पहाड़ी पर एक साधु खड़ा था। अभी सुबह ही थी और सूरज की किरणों का जाल फैलना शुरू ही हुआ था। कुछ मित्र घूमने निकले थे। उन्होंने एकांत में खड़े उस साधु को देखा। उन्होंने आपस में सोचा, वह वहां क्या करता होगा? किसी ने कहा, ‘कभी कभी उसकी गाय वन में खो जाती है, शायद वह ऊंचाई पर खड़ा होकर उसे ही खोजता है।’

पर दूसरे मित्र सहमत न हुए। एक ने कहा ‘उसे देख ऐसा नहीं लगता कि वह कुछ खोजता है। उसे देख लगता है कि वह किसी की प्रतीक्षा में है। कोई मित्र साथ आया होगा और वह पीछे छूट गया है, वह उसी की प्रतीक्षा कर रहा है।’

पर दूसरे इससे भी सहमत न हुए। तीसरे ने कहा: ‘न वह कुछ खोज रहा है, न प्रतीक्षा कर रहा है। वह प्रभु के चिंतन में लीन है।’ उनमें सहमति न हो सकी।

 वे निर्णय के लिए साधु के पास गए।

 प्रथम ने साधु से पूछा ‘क्या आप अपनी गाय खोज रहे हैं?’
 उस निर्जन में खड़े व्यक्ति ने कहा ‘नहीं।’

 दूसरे ने पूछा ‘क्या आप किसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं?’
 उस एकाकी खड़े व्यक्ति ने कहा ‘नहीं।’

 तीसरे ने पूछा ‘ क्या आप प्रभु का चिंतन कर रहे हैं?’
  वह फिर भी बोला ‘ नहीं।’

वे तीनों हैरान हुए। उन्होंने सम्मिलित ही पूछा ‘फिर आप क्या कर रहे हैं?’

 वह साधु बोला ‘कर कुछ भी नहीं रहा हूं। मैं केवल खड़ा ही हूं आई एम जस्ट स्टैंडिंग, मैं बस हूं ही, आई एम जस्ट एञ्जिस्टिंग।’

ऐसे ही बस होना है। कुछ भी नहीं करना है। सब छोड़ देना है और रह जाना है। फिर कुछ होगा जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता है। वह अनुभूति ही, जो शब्दों में नहीं आती है, सत्य की, स्वयं की, परमात्मा की अनुभूति है।

साधना पथ

ओशो 

‘स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो। - 2

हिंदुओं ने संन्‍यासियों को स्‍वामी कहा-इस कारण कि उसने सारा स्‍वामित्‍व छोड़ दिया और अब एक ही जगह उसने अपने स्वामित्व को बनाने की चेष्टा की है, वह उसकी स्वयं की आत्मा है। वह अपना मालिक है। इसलिए हिंदुओं ने अपने संन्यासियों को स्वामी कहा है।

बुद्ध ने अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा है। उलटा लगता है। लेकिन बुद्ध ने इसलिए अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा, कि इस दुनिया में सभी को स्वामी होने का खयाल है। यहां सभी स्वामी हैं, कोई इसका, कोई उसका। यह शब्द गंदा हो गया। तो मैं तुम्हें भिक्षु कहूंगा। भिक्षु तो मैं इसलिए कहूंगा कि इस दुनिया में हालत उलटी है, यहां सब भिखारी अपने को स्वामी कह रहे हैं, इसलिए मैं स्वामी को भिखारी कहूंगा।

बुद्ध ने कहा कि इस दुनिया में जब सब मामला ही उलटा है और लोग शीर्षासन कर रहे हैं, तो तुम्हें मुझे पैर के बल खड़ा करना पड़ेगा। यहां सब भिखारी अपने को स्वामी मान रहे हैं, तब तुमको स्वामी कहने से बड़ी भांति पैदा होगी, इसलिए मैं तुमको भिक्षु कहूंगा। क्योंकि तुम अपने स्वामी हो। और भिक्षु अपने को स्वामी कह रहे हैं, इसलिए उचित है कि स्वामी अपने को भिक्षु कहें।

पर बात एक ही है, इरादा एक ही है, कि आंतरिक मालकियत उपलब्ध हो।

साधना सूत्र

ओशो 

‘स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो।’


मालकियत! इसलिए हिंदू संन्यासियों ने संन्यासी का नाम स्वामी चुना है। लेकिन कैसा स्वामित्व? मकान का, धन का, दुकान का स्वामित्व? नहीं, क्योंकि वह तो सिर्फ धोखा है। तुम बनते हो गुलाम और स्वामी होने का खयाल रखते हो! तुम बनते हो दास और सोचते हो कि सम्राट हो गए!

सुना है मैंने, मुसलमान फकीर फरीद एक गांव से गुजरता था। और एक आदमी एक गाय को रस्सी से बांध कर घर की तरफ ले जाता था। तो फरीद रुक गया उसकी ऐसी आदत थी , उसने अपने शिष्यों से कहा, घेर लो इस आदमी को और इस गाय को, और तुम्हें मुझे कुछ शिक्षा देनी है। तो वह आदमी थोड़ा चौंका। उसने कहा कि मुझे घेरने की क्या जरूरत है? उसने कहा कि तुम चुप रहो, तुमसे हमें कुछ करना नहीं, सिर्फ मेरे शिष्यों को शिक्षा देनी है। और फरीद ने कहा कि शिष्यो, मैं पूछता हूं इन दोनों में मालिक कौन है? गाय या यह आदमी? शिष्यों ने कहा कि आप भी क्या पूछते हैं? जाहिर है कि आदमी मालिक है। क्योंकि गाय उसकी संपत्ति है और गले में उसने उसके फंदा डाला है। तो फरीद ने कहा कि मैं तुमसे दूसरा सवाल पूछता हूं अगर हम बीच की रस्सी काट दें और गाय भाग खड़ी हो, तो गाय के पीछे यह आदमी दौड़ेगा कि गाय आदमी के पीछे दौड़ेगी? उन्होंने कहा कि निश्चित ही यह आदमी गाय के पीछे दौड़ेगा। तो गाय इस आदमी को नहीं खोजेगी? यह आदमी गाय को खोजेगा? तो फिर मालिक कौन है? तो फरीद ने कहा कि यह रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह इस आदमी के गले में है।

वस्तुएं हमारे गले में फंदा कस लेती हैं। जिनके हम मालिक होते हैं, उनके हम गुलाम हो जाते हैं। जिसके भी आप मालिक होंगे, उसके गुलाम हो जाएंगे।

जरा खयाल करें! हमारे मुल्क में पति अपने को स्वामी कहते हैं। उनसे बड़ा गुलाम खोज सकते हैं आप? स्वामी हैं वे। पत्नी जब उनको पत्र लिखती है तो उसमें स्वामी लिखती है और नीचे दस्तखत करती है, आपकी दासी।

और सब भलीभांति जानते हैं कि कौन दास है और कौन मालिक है। किसी को जरा भी संदेह नहीं है उस मामले में। स्त्रियां होशियार हैं, वे राजी हैं, कि ठीक, दस्तखत ही करने हैं दासी के! चलेगा। लेकिन असलियत में कौन मालिक है? पति तब तक गुलाम रहेंगे, जब तक वे मालिक होने का खयाल रखते हैं। जब तक उनको खयाल है कि पत्नी के स्वामी होना है, तब तक वे शब्दों में स्वामी बने रहें, वे गुलाम रहेंगे।

जो भी मालिक बनने की दूसरे के ऊपर कोशिश करेगा, वह गुलाम हो जाएगा। सब तरह की मालकियत बाहर की दुनिया में गुलामी लाती है।

साधना सूत्र

ओशो 

धार्मिक पागल

एक महिला मेरे पास आई और उसने कहा कि कोई भी तरह बचाओ, मेरे पति धार्मिक हो गए हैं। हम घर भर मुसीबत में पड़ गए हैं। फिर वे साधारण पति भी न थे, सरदार थे। मैंने कहा कि क्या कर रहे हैं वे? ऐसी क्या तकलीफ आ गई? तो वह कहने लगी कि दो बजे रात से उठ कर कीर्तन करते हैं, तो कोई सो ही नहीं पा रहा है। बच्चों की परीक्षा करीब आ रही है, बच्चे सिर पीट रहे हैं। मगर वे हैं धार्मिक और वे दो बजे रात से कीर्तन करते हैं।

तो मैंने उनके पति को बुलाया। मैंने कहा कि यह क्या कर रहे है? वे कहने लगे कि ब्रह्म-मुहूर्त में कीर्तन करता हूं! दो बजे रात ब्रह्म-मुहूर्त! वे कहने लगे कि ब्रह्म-मुहूर्त में सबको उठना ही चाहिए, इसमें बाधा का क्या सवाल है? मुझसे बोले कि आप उन लोगों की बातो में मत पड़ना, सब अधार्मिक हैं, दुष्ट हैं कीर्तन में बाधा डालते हैं, धार्मिक कार्य में अड़चन खड़ी करते हैं।

अब वे सारे घर की निंदा में हैं। और जिससे भी कहेंगे कि ब्रह्म-मुहूर्त में कीर्तन करो, तो किसी की हिम्मत नहीं है उनसे कहने की कि आप बंद करो। क्योंकि कौन अधार्मिक बनेगा! तो मैंने उनसे कहा कि ऐसा करो, बंद न करो, ब्रह्म-मुहूर्त को थोड़ा नीचे सरकाओ। दो बजे जरा ज्यादा ब्रह्म-मुहूर्त है, थोड़ा तीन बजे करो। फिर और सरका कर चार बजे करना, फिर पांच बजे करना। कहने लगे कि आप क्या कहते हैं? कहां तक इसको सरकाना है?
मैंने कहा कि मैं ब्रह्म-मुहूर्त उसको कहता हूं जब तुम्हारे भीतर छिपे हुए ब्रह्म की आख खुले। और किसी उपाय को मैं ब्रह्म-मुहूर्त नहीं कहता। तुम सोए रहना, जब नींद अपने आप खुले। अभी तुम अलार्म भर कर उठते हो, यह ब्रह्म-मुहूर्त नहीं है, अलार्म-मुहूर्त है। तुम इसको बंद करो। जब तुम्हारे भीतर जो ब्रह्म छिपा है, उसकी जब नींद खुले, तब तुम ब्रह्म-मुहूर्त समझना। वे कहने लगे, आप मुझे भ्रष्ट कर देंगे! मैं तो फिर नौ बजे के पहले उठ ही नहीं सकता। तो मैंने कहा, जब तुम नहीं उठ सकते, तो बच्चों का भी थोड़ा ध्यान करो। और तुम्हें अध्यात्म की खोज पैदा हो गई, उनको अभी पैदा नहीं हुई, उनको क्यों परेशान कर रहे हो? और तुम्हारी वजह से ये बच्चे अध्यात्म से सदा के लिए सचेत हो जाएंगे। ये बच्चे कभी भूल कर धर्म की तरफ न जाएंगे। तुम इसके जिम्मेवार रहोगे। क्योंकि तुम उनकी जिंदगी खराब किए दे रहे हो। जब भी कोई धर्म की बात करेगा, ये समझेंगे कि दो बजे रात का ब्रह्म-मुहूर्त है। इस बात में पड़ना ही नहीं। और तुम इनको निंदित कर रहे हो और पागल तुम हो। और तुम कह रहे हो कि ये तुम्हें अशांत करते हैं, बाधा डालते हैं; अशांत तुम इन्हें कर रहे हो।
 
यह जो धर्म है, यह करीब-करीब विक्षिप्त लोग इसमें बड़े आकर्षित होते हैं। क्योंकि धार्मिकता की आड़ में विक्षिप्तता को छिपाना इतना आसान है कि जिसका हिसाब नहीं। और हजार तरह के रोग लोग धर्म की आड़ में छिपा लेते हैं। अगर आपको गंदा रहने में रस है- और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसे कुछ लोग हैं, जिनको शरीर की गंदगी में वासना हैं-तो फिर आप कोई ऐसा मार्ग चुन लें। कोई जैनों के साधु हो जाएं, जिसमें नहाने वगैरह की मनाही है। तो फिर आप गंदगी में जो मजा लेंगे! और आपके पास अगर कोई भी थोड़ा स्वच्छ आदमी आ गया, तो आप उसको निंदा से देख सकते हैं। नहाया धोया तो वासनातुर है, क्योंकि शरीर की इतनी सजावट कर रहा है। नहाना  धोना शरीर की सजावट है। गंदे होना, दातुन न करना, मुंह से बास निकल रही हो, ये पुण्य कर्म हैं!

पागल इस तरह के लोग हैं। पश्चिम में इनका इलाज होता है। यहां वे कोई तरकीब खोज कर धार्मिक हो जाते हैं। पश्चिम में कोई आदमी अगर ऐसी हरकत करे, तो उसका इलाज होने के लिए फौरन वे चिकित्सक के पास ले जाएंगे, मनोवैज्ञानिक के पास ले जाएंगे, कि इसमें कुछ गड़बड़ हो गई। लेकिन यहां कोई गड़बड़ नहीं हुई। यहां उसको हम स्वीकार कर लेंगे।

साधना सूत्र

ओशो 


शांति को खोजना, जिसमें कोई विघ्‍न न डाल सके

 इसका यह अर्थ हुआ कि विघ्‍न से बच कर मत खोजना, विघ्‍न के बीच ही खोजना। बच्चा शोर न भी मचा रहा हो, तो और मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर लेना और कहना कि तुम सब शोर मचाओ, मैं ध्यान करता हूं। और जिस दिन तुम पाओ कि बच्चे शोर कर रहे हैं और तुम्हारा ध्यान चल रहा है, उस दिन तुम समझना कि यह तुम्हारा है। पहाड़, हिमालय मत खोजना, ठीक बीच बाजार में बैठ कर ध्यान करना। क्योंकि पहाड़ धोखा दे सकता है। पहाड़ शांति देता है, इसलिए धोखा दे सकता है। पहाड़ से बचना, बाजार में ही शांति खोजना। जिस दिन बाजार में ही तुम शांति को पा लोगे, उस दिन अब तुमसे कोई भी छीन न सकेगा। क्योंकि जो छीन सकता था, उसी के बीच तुमने पा लिया है।

इसलिए घर छोड़ कर मत भागना। गृहस्थ होते हुए संन्यासी हो गए अगर तुम, तो ही संन्यास सच्चा है। अगर घर छोड़ा, पत्नी छोड़ी, बच्चे छोड़े, धन छोड़ा, और फिर तुम संन्यासी हुए, तो संन्यास जो है, आरोपित है, झूठा है, कंडीशनल है। अगर पत्नी फिर वापस दे दी जाए, तो वह एक रात में तुम से तुम्हारे संन्यास को छीन लेगी। और जल्दी छीन लेगी। देर न लगेगी।

इसीलिए तथाकथित संन्यासी बड़ा ड़रा रहता है। कहीं स्त्री न छू जाए, ड़रा हुआ है। क्यों ड़रा हुआ है इतना? इतना भयभीत संन्यास कहां ले जाएगा? इतना निर्बल संन्यास क्या परिणाम लाएगा? इससे आत्मा सबल हुई कि निर्बल हो गई? यह हम कभी सोचते ही नहीं!  एक आदमी स्त्री को छूने से ड़रता है। हम सोचते हैं, बड़ा आत्मवान है। और स्त्री को छूने से ड़र रहा है! स्त्री छू जाए तो उनका ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है! यह तो हद की निर्बल आत्मा हो गई। इस निर्बल आत्मा की क्या उपलब्धि है? ऐसे कहता रहता है कि स्त्री तो हड्डी—मांस का ढेर है। और छूने से ड़रता भी है! तो यह जो ऊपर ऊपर कह रहा है, यह केवल आयोजन है अपने को समझाने का, भीतर रस मौजूद है। छू ले तो रस का जन्म हो जाए। रस का जन्म हो जाए तो उसे लगेगा कि भीतर पतन हो गया है।

लेकिन कोई स्त्री किसी पुरुष में रस पैदा नहीं करती और न कोई पुरुष किसी स्त्री में रस पैदा करता है। रस होता है, तो उसे बाहर खींच लेती है। यह सहारा है आत्‍मदर्शन का। अगर आपके भीतर वासना है, तो स्त्री की मौजूदगी उस वासना को बाहर ले आती है। तो स्त्री सिर्फ दर्पण का काम कर रही है, स्त्री सिर्फ निदान कर रही है, वह एक डायग्नोसिस कर रही है कि आपके भीतर क्या छिपा है। उससे भागना क्या! उसे सदा पास रखना अच्छा है, क्योंकि पता चलता रहे कि भीतर क्या है। और उसके पास रहते अगर वासना खो जाए, तो ब्रह्मचर्य उपलब्ध हुआ, तो शक्ति उपलब्ध हुई, जो आंतरिक है।

साधना सूत्र
ओशो 

महावीर के पास एक बहुत बडा धनिक आया...

 …एक नगर सेठ। और उसने आ कर महावीर को कहा कि मुझे सामयिक खरीदनी है, मुझे ध्यान खरीदना है। और जो भी आप मूल्य कहें, मैं चुकाने को तैयार हूं। महावीर ने कहा, यह असंभव है, ध्यान खरीदा नहीं जा सकता। खरीदने वाली वृत्ति वाला व्यक्ति ध्यान को समझ भी नहीं सकता, पाना तो बहुत दूर है। तुम्हारा सब धन भी नहीं खरीद सकेगा। उस धनी ने कहा कि शायद तुम्हें पता नहीं कि कितना धन मेरे पास है! तुम बोलो, उससे दुगुना भी दूंगा। तुम सिर्फ बोलो भर कि इतना लगेगा।

वह आदमी एक ही भाषा जानता होगा -धन की। और उसने जीवन में सब धन से खरीदा था, तो उसकी कुछ गलती नहीं है, क्षमा योग्य है। उसने सब खरीद लिया था। सुंदर स्त्री चाहिए तो धन से मिल गई थी। बड़ा महल चाहिए तो धन से मिल गया था। बड़ा चिकित्सक चाहिए तो धन से मिल गया था। धन से क्या नहीं खरीदा जा सकता? उसने सब खरीद लिया था। तो उसने सोचा होगा कि ध्यान भी ऐसी क्या बला है जो धन से न मिल जाए! जब सब धन से मिलता है, तो यह भी मिल जाएगा।

लेकिन तकलीफ असल में ध्यान पाने की थी ही नहीं। गांव का एक गरीब आदमी ध्यानी हो गया था, उसी के गांव का! और महावीर ने कहा था कि यह उपलब्ध हो गया ध्यान को। इससे अड़चन थी। महावीर को पता चल गया था कि धनी को अड़चन क्या हो रही है। तो महावीर ने कहा कि तू ऐसा कर, कि तेरे गांव में ही एक गरीब आदमी है, उसको ध्यान उपलब्ध हो गया है, तू उसी से खरीद ले, तू उसी के पास चला जा। और वह गरीब आदमी है, शायद पैसे के लोभ में आ जाए। तू उससे खरीद ले, शायद बेच दे। तो उसने कहा कि इसमें क्या दिक्कत है, यह तो बिलकुल आसान है। अगर वह ध्यान न बेचे, तो मैं उस गरीब आदमी को पूरा का पूरा ही खरीद सकता हूं। इसमें कोई अड़चन ही नहीं।

अब उसकी भाषा बिलकुल ठीक है, क्योंकि जब हम पूरे गरीब आदमी को ही खरीद सकते हैं, तो ध्यान में क्या रखा है। मगर गरीब आदमी खरीद लिया जाए तो भी ध्यान नहीं खरीदा जा सकता। वह गरीब आदमी उठा कर, जंजीरों में डाल कर, घर में भी पटक दिया जाए, तो भी ध्यान जंजीरों में नहीं पड़ जाएगा। भाषा की मुश्किल है। वह धन की भाषा ही समझता है।
 
वह गया उस गरीब आदमी के पास। और उसने कहा, जो तुझे चाहिए तू बोल, मैं सब देने को तैयार हूं लेकिन ध्यान मुझे दे दे। और अगर तूने ध्यान न दिया, तो मैं सैनिक ले कर आया हूं तुझे उठा लेंगे। उस गरीब आदमी ने कहा कि तुम मुझे उठा लो, वही आसान है। ध्यान मैं तुम्हें कैसे दूं? ध्यान कोई वस्तु है, जो मैं तुम्हें दे दूं! ध्यान तो अनुभव है। तुम मुझे ले चलो, लेकिन मेरे अनुभव को कैसे मैं तुम्हें दे दूं? अनुभव तो तुम्हें तुम्हारा ही करना पड़ेगा। एक शक्ति है, जो दूसरे से मिल सकती है। और एक शक्ति है, जो स्वयं के अनुभव से ही मिल सकती है। जो दूसरे से मिलती है, उसके साथ अशांति रहेगी, क्योंकि उसके साथ भय रहेगा। जो दूसरे ने दी है, वह दूसरा छीन सकता है। और जो दूसरे ने दी है, वह मेरी है नहीं- चाहे मैंने चुराई हो, चाहे मैंने फुसला कर मांगी हो, चाहे दान में प्राप्त की हो, चाहे शक्ति के दवाब से ली हों-किंतु वह मेरी नहीं है, वह किसी दूसरे की है। और जो दूसरे की है, वह दूसरे की ही रहती है, इसलिए भय लगा रहता है। भय पीछे पीछे सरकता रहता है।
भय से अशांति पैदा होती है। जो छिन सकता है, उससे चिंता पैदा होती है। और फिर जितनी बाहर की शक्ति इकट्ठी होती जाती है, उतना ही उसके अनुपात में भीतर की निर्बलता दिखाई पड़ती है। इससे अशांति पैदा होती है।

इसलिए कोई गरीब आदमी इतनी गरीबी का अनुभव नहीं करता, जितना अमीर आदमी कर सकता है, अगर उसमें अक्ल हो। नालायक हो, बे अक्ल हो तो उसे पता ही नहीं चलता। थोड़ी सी भी बुद्धि हो तो अमीर आदमी को जिस तरह की गरीबी का पता चलता है, उस तरह की गरीबी का पता गरीब आदमी को कभी नहीं चल सकता। क्योंकि कंट्रास्ट नहीं है, तुलना नहीं है। अमीर आदमी के पास धन का ढेर लग जाता है और भीतर वह देखता है, हृदय भिखारी का पात्र है, वहां कुछ भी नहीं है। गरीब आदमी के हाथ में भी भिक्षा का पात्र है, भीतर भी भिक्षा का पात्र है। तुलना में विरोध नहीं है। उसे पता नहीं चलता कि वह कितना गरीब है। कितना गरीब है आदमी, यह अमीर हो कर ही पता चलता है।

इसलिए मैं निरंतर कहता हूं कि महावीर जब साम्राज्य को छोड़ कर गरीब होते हैं, बुद्ध जब सम्राट के सिंहासन से उतर कर रास्ते के भिखारी बनते हैं, तो उन्हें जिस गरीबी का अनुभव हुआ है, वह किसी दूसरे भिखारी को नहीं हो सकता है। उनकी गरीबी में अमीरी का बड़ा हाथ है, उनकी गरीबी शाही है, उसमें सम्राट होने का अनुभव छिपा है। और उन्होंने सम्राट हो कर जान लिया कि इससे भी भीतर की गरीबी नहीं मिटती, बल्कि प्रकट हो कर दिखाई पड़ती है।

तो जितनी बाहर की शक्ति इकट्ठी होगी, उतनी भीतर की निर्बलता प्रकट हो कर दिखाई पड़ेगी। उससे चिंता पैदा होगी। इसलिए ध्यान रहे, गरीब आदमी उतना चिंतित नहीं होता, जितना अमीर आदमी चिंतित होता है।

साधना सूत्र

ओशो 

बड़े से बड़ा चमत्कार

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि फलां साधु के पास जाते हैं, तो हाथ में ताबीज प्रकट हो जाता है, भस्म प्रकट हो जाती है। ये मदारी से प्रभावित हो कर लौटे हैं, अध्यात्म से प्रभावित हो कर नहीं लौटे हैं। यह जो शक्ति है, यह जो ताबीज या भस्में प्रकट कर रहा है, उसकी भी जो गहरे में आकांक्षा है, वह अध्यात्म नहीं है। जो प्रभावित हो रहा है, उसका भी जो प्रभावित होने में जो कारण है, वह अध्यात्म नहीं है। वे सब शक्ति के प्रदर्शन से प्रभावित हो रहे हैं। कि किसी साधु के छूने से कोई बीमार ठीक हो जाता है, तो भी हम जो प्रभावित हो रहे हैं, वह अध्यात्म नहीं है। वह कुछ और है। बाहर की भाषा हमारी समझ में आती है।

लेकिन हम बुद्ध जैसे व्यक्ति को न पहचान पाएंगे। न तो उनके छूने से कोई बीमार ठीक हो रहा है, न वह किसी बीमार को ठीक कर रहे हैं छू कर। और कभी अगर ऐसा हो भी जाता है, तो भी बुद्ध यह नहीं कहते कि ऐसा मैंने किया है। वे यही कहते हैं कि संयोग की होगी बात, तुम्हारे कर्मफल ऐसे होंगे कि यह बात होने के करीब होगी। वे यह नहीं कहते, मैंने किया है। वे यही कहते हैं, ऐसा हो गया है, इस पर ज्यादा ध्यान मत दो। न धन है, न पद है, न चमत्कार है, तो बुद्ध को आप पहचानेंगे कैसे? आपके पहचानने के सारे रास्ते ही समाप्त हो गए।

मैं एक यात्रा में था। मेरे कंपार्टमेंट में एक सज्जन और थे। हम दोनों ही थे। स्वभावत: उन्हें चुप रहना मुश्किल हो गया, कुछ बात चलानी चाही। लेकिन मैंने हां-ना में उत्तर दिए, तो बात ज्यादा चली नहीं। तो फिर उन्होंने पान निकाला कि आप पान लें, मैंने कहा कि पान मैं खाता नहीं। तो फिर उन्होंने सिगरेट निकाली कि आप सिगरेट लें, मैंने कहा कि सिगरेट मैं पीता नहीं। तो उन्होंने कहा, यह बताइए कि आपसे मैत्री बनाने का कोई उपाय है या नहीं। क्योंकि अगर मैं पान लेता तो मैत्री बनती, सिगरेट लेता तो मैत्री बनती। मैंने उनसे पूछा कि पान और सिगरेट के अतिरिक्त आपको मैत्री बनाने का कोई और उपाय पता है या नहीं? उनकी भाषा खतम हो गई थी। वे जो उपाय कर सकते थे, वह समाप्त हो गया, तो लगा कि अब कोई संबंध निर्मित नहीं हो सकता।
बुद्ध से आप कैसे संबंध निर्मित करेंगे? क्योंकि शक्ति की सारी भाषा व्यर्थ है। अगर आप शून्य को भी शक्ति मानते हों! जानते हों कि किसी का शून्यवत हो जाना इस जगत में सबसे बड़ा चमत्कार है। ना-कुछ हो जाना इस जगत में सबसे बड़ी घटना है। क्योंकि क्षुद्रतम आदमी भी मानता है कि मैं कुछ हूं। क्षुद्रतम आदमी भी मानता है कि मैं कुछ हूं तो इस जगत में मैं कुछ हूं यह मानना तो सामान्य बात है। लेकिन यह अनुभव कर लेना कि मैं ना-कुछ हूं शून्यवत हूं बड़े से बड़ा चमत्कार है।

जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी, जो उसे लोगों की दृष्टि में ना-कुछ जैसा बना देगी।’

एक बहुत मजे की बात है। बाहर से जो शक्ति मिलती है, स्वभावत: उसका दिखावा बाहर होता है। तुम भीतर कमजोर होते हो, लेकिन बाहर लोगों की आंखें चौंधिया जाती हैं। जब तुम राष्ट्रपति हो जाते हो, तो सारे लोग तुम्हारे चरणों में झुकने लगते हैं। सारे लोग तुम्हारा जयजयकार करने लगते हैं। सारे लोग मान लेते हैं कि हां, तुम्हारे पास शक्ति है। तुम भीतर बिलकुल निर्बल और कमजोर होते हो। तुम भीतर जानते हो कि कोई शक्ति नहीं है, लेकिन सारा जगत देखता है कि शक्ति घटित हो रही है। जो शक्ति बाहर से मिलती है, बाहर के लोग उस शक्ति का अनुभव भी कर पाते हैं, क्योंकि वह उन्हीं की दी गई है। तुम सिर्फ दर्पण हो, जिसमें उन्हीं की शक्ति प्रतिबिंबित हो रही है और उन्हीं पर वापस लौट रही है। जो उन्होंने दिया है, वह उन्हें दिखाई भी पड़ता है।
लेकिन जो शक्ति भीतर से पैदा होती है, साधारणत: बाहर के लोगों को वह दिखाई नहीं पड़ती। वह केवल उनको ही दिखाई पड़ सकती है, जिनको भीतर का कोई अनुभव है। अन्यथा बाकी लोगों को दिखाई नहीं पड़ती।
महावीर तुम्हारे पास से निकल जाएं, तो तुम यह मत सोचना कि तुम पहचान लोगे। गामा निकलेगा, तुम बिलकुल पहचान लोगे। एक सम्राट निकलेगा, तुम बिलकुल पहचान लोगे। एक बुद्ध निकलेगा, तुम नहीं पहचान पाओगे। क्योंकि बुद्ध की शक्ति किसी ऐसे स्रोत से आ रही है, जिसको देखने की तुम्हारे पास आख भी नहीं है। उलटा होगा, जब बुद्ध तुम्हारे पास से निकलेंगे, तुमको लगेगा कि यह कुछ भी नहीं हैं, ना कुछ हैं। बड़ी कठिनाई होगी तुम्हें पहचानने में। और पहचानने का अर्थ होगा कि तुम्हारा जीवन रूपांतरित होगा, तो ही तुम पहचान पाओगे।

इसलिए बुद्ध को पहचानना सस्ता नहीं है। बुद्ध को पहचानने में तुम्हें बदलना पड़ेगा। इसके पहले कि तुम पहचान सको, तुम्हें नया होना पड़ेगा, तब तुम पहचान पाओगे। लेकिन कौन इतनी झंझट करता है! कि बुद्ध को पहचानने की जरूरत भी क्या है जिसमें हमको बदलना पड़े? हम जैसे हैं, वैसे ही बुद्ध हमारी पहचान में नहीं आएंगे। हम चूक जाएंगे।

हां, लेकिन राजनेताओं को, धनपतियों को, सेनापतियों को हम पहचान लेंगे। हम जैसे हैं, वैसे में ही वे पहचान में आ जाएंगे। क्योंकि हमारे और उनके बीच कोई भी फर्क नहीं है। हम एक ही जगत के अंग हैं। हमारी उनकी भाषा एक है, हमारा उनका अस्तित्व एक है। और जो भी उनके पास है, वह हमारा दिया हुआ है। इसलिए हम उसे भलीभांति पहचानते हैं, वह हमारी ही संपदा है।

तो यह सूत्र कहता है, ‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो। और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी, जो उसे लोगों की दृष्टि में ना-कुछ जैसा बना देगी।’

साधना सूत्र
ओशो 

‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।’


किस शक्ति की? निश्चित ही, इस शक्ति की नहीं, जो धन से, पद से, शास्त्र से, उधार शान से मिलती है। उस शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो, जो किसी से भी नहीं मिलती, जो तुमसे पैदा होती है। जो मिलती ही नहीं, जन्मती है। जिसको खरीद लाने का बाजार से कोई उपाय नहीं है, जो तुम्हारी आत्मा का स्फुरण है। जो तुम्हारे भीतर जन्मती है। और तुम्हारे भीतर से बाहर की तरफ जाती है। बाहर से भीतर की तरफ नहीं आती। तब आप समझ जाएंगे कि अभीप्सा और शक्ति को इसमें क्यों जोड़ा है।

अभीप्सा का अर्थ है, भीतर की आकांक्षा। और शक्ति भी भीतर ही छिपी है, वहीं से पैदा होती है। तब ही तुम वस्तुत: शक्तिशाली हो पाओगे। इसलिए हमने वर्धमान को महावीर कहा। कोई ऐसा नहीं कि कोई गामा से महावीर लड़ते तो जीत जाते। ऐसा कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी हम गामा को महावीर नहीं कह सकते। क्योंकि शरीर तो शक्तिशाली है, लेकिन भीतर की आत्मा तो वैसी ही दुर्बल है। और शरीर कितनी देर चलेगा? गामा क्षय रोग से मरा। और आखिरी दिन बड़े कष्ट के रहे।

यह आप जान कर हैरान होंगे कि पहलवान सभी खतरनाक बीमारियों से मरते हैं। और आखिरी दिन पहलवानों के बहुत दुखद होते हैं। क्योंकि जो भी शक्ति थी वह शरीर की थी। और शरीर की शक्ति को ही उन्होंने समझा कि अपनी है। और जब शरीर क्षीण होने लगता है तब उनको लगता है कि यह तो धोखा था। और शरीर तो क्षीण होगा। और पहलवान का शरीर जल्दी क्षीण होता है, क्योंकि उसने शरीर के साथ जबर्दस्ती की। सब पहलवानी जबर्दस्ती है। जिसको हम कसरत कहते हैं, वह श्रम नहीं है, वह जबर्दस्ती है।

तो पहलवान जबर्दस्ती कर रहा है शरीर के साथ। तो उसकी मांसपेशियां उभर आएंगी। क्योंकि वह इतना जोर डाल रहा है मांसपेशियों पर, इतना खून जबर्दस्ती बहा रहा है उनमें से कि वे उभर आएंगी। इसलिए कोई पहलवान ज्यादा उम्र का नहीं होता, जल्दी मर जाता है। क्योंकि जो शरीर साठ साल काम दे सकता था, वह अब चालीस साल ही काम देगा। आपने बीस साल की शक्ति का हिंसात्मक रूप से उपयोग कर लिया। पहलवान जल्दी मरते हैं। और पहलवानों के आखिरी दिन बड़े दीन और दुखी हो जाते हैं। क्योंकि जैसे ही वार्धक्य आना शुरू होता है वैसे ही उन्हें पता लगता है कि हम तो कमजोर ही थे। तो शक्ति का जो भ्रम पैदा हो रहा था, वह शरीर से हो रहा था।

हमने वर्धमान को महावीर कहा है। इसलिए कहा है कि एक ऐसी जगह से वीर्य की ऊर्जा पैदा हो रही है, जो कभी भी छीनी न जा सकेगी। अंतर्भाव हुआ है, शक्ति जगी है। किसी भी साधन पर निर्भर नहीं है। न धन पर, न पद पर, न शरीर पर। निर्भर ही नहीं है। स्वतंत्र है, अपनी है, तो इसको हमने आत्म-शक्ति कहा है। जो अपनी है, वह आत्म-शक्ति है। जो किसी भी ढंग से पराए से मिलती है, जिसके होने में पराए के सहारे की जरूरत पड़ती है, वह शक्ति का धोखा है।

‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।’

इस शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो, बाकी शेष शक्तियों पर से ध्यान हटा लो। क्योंकि उन पर ध्यान देने का अर्थ है कि इस शक्ति का विकास न हो सकेगा। और जब तक तुम निर्भर रहोगे दूसरों पर, तब तक तुम पाओगे कि तुम रोज रोज कमजोर होते गए हो। सभी निर्भर लोग कमजोर हो जाते हैं। निर्भरता कैसी भी हो, कमजोरी लाती है।

और हम सब निर्भर हैं। और हमने अनेक तरह के उपाय कर रखे हैं, जिनमें निर्भरता से हम शक्तिशाली होने के भ्रम में होते हैं। निर्भरता धोखा है। उससे शक्ति का आभास होता है, लेकिन शक्ति कभी उपलब्ध नहीं होती।

साधना सूत्र

ओशो 

10—शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।

10—शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो।
 और जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा,
वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि
में ना—कुछ जैसा बना देगी।
11—शांति की अदम्य अभीप्सा करो।
जिस शांति की कामना तुमको होगी,
वह ऐसी पवित्र शांति है,
जिसमें कोई विध्‍न न डाल सकेगा।
और जिस शांति के वातावरण में
आत्मा उसी प्रकार विकसित होगी, जैसे
शांत सरोवर में पवित्र कमल विकसित होता है।
 12—स्वामित्व की अपूर्व अभीप्सा करो।
 परंतु ये संपत्तियां केवल शुद्ध आत्मा की हों
और इसलिए सभी शुद्ध आत्मा इसके समानरूप से स्वामी हों
और इस प्रकार ये सभी की (जब वे संयुक्त हों) संपत्ति हों।

साधना सूत्र 

ओशो 

Friday, August 7, 2015

बुद्ध के चार वचन

बुद्ध ने कहा, जितने तुम यहां लोग हो, उतनी ही बातें सुन रहे हो। दूसरे दिन सुबह आनंद ने पूछा कि यह बात मेरी कुछ समझ में आयी नहीं। जब आप कहनेवाले एक हैं और शब्द आपके हम सुन रहे हैं, तो वही शब्द तो सुनेंगे न जो आपने कहे हैं। बुद्ध ने कहा, पागल, तू यूं समझ! कल रात—तू जा पता लगा ले—कल रात की सभा में जब मैंने यह कहा तो मेरे जो भिक्षु थे उन्होंने एक बात समझी, एक चोर भी आया था, उसने दूसरी बात समझी; एक वेश्या भी आयी थी, उसने तीसरी बात समझी।

बुद्ध का नियम था कि रोज रात को प्रवचन के अंत में वे कहते थे, अब जाओ, दिन का अंतिम कार्य पूरा करो। भिक्षुओं ने समझा कि अब जाएं और ध्यान करें; क्योंकि वह दिन का अंतिम कार्य था। समाधिस्थ हों और फिर उसी समाधि में डूबते डूबते निद्रा में डूब जाएं। ध्यान करते करते नींद में उतर जाना सारी नींद को समाधि बना देता है। तो छह घंटे सोओ, आठ घंटे सीओ, वे आठ घंटे परम समाधि में गये। तुमने उनका उपयोग कर लिया। तुमने नींद को भी व्यर्थ न जाने दिया। लोग, तो यहां जागरण को भी व्यर्थ जाने दे रहे हैं, तुमने नींद का भी उपयोग कर लिया। तुमने नींद के समय में भी अमृत ढाल लिया। तो मेरे भिक्षुओं ने, बुद्ध ने कहा, समझा कि अब हम उठें, वे उठे कि अब जाएं ध्यान करें, सोने का समय हो गया। चोर एकदम से चौंका, उसने कहा कि मैं भी कहां की बातों में पड़ा हूं, अरे, जाऊं अपने काम में लग! और वेश्या ने कहा कि अदभुत हैं ये बुद्ध भी! इन्हें कैसे पता चल गया कि मैं भी आयी हुई हूं? क्या कहते हैं कि जाओ, अपने काम में लगो! अब अपना आखिरी काम करो! वेश्या अपने धंधे पर गयी, चोर अपने धंधे पर गया, भिक्षु अपने धंधे पर चले गये।

बुद्ध ने आनंद से कहा, तू न माने तो जाकर पूछ ले। आनंद बड़ा जिज्ञासु था! वह अंत तक विद्यार्थी बना रहा। बहुत साथ रहा बुद्ध के, लेकिन शिष्यत्व सधा उसका बुद्ध की मृत्यु के बाद। कभी कभी निकटता भी बाधा हो जाती है। आदमी बड़ा अजीब है! कभी कभी दूरी सहयोगी हो जाती है, निकटता बाधा हो जाती है। वह चचेरा भाई था बुद्ध का। यही खतरा हो गया। चचेरा भाई ही नहीं था, बड़ा भाई भी था। तो वह अकड़ उसमें बनी ही रही कि अरे, है तो मेरा ही भाई! और फिर मैं बड़ा भाई! दोनों साथ पढ़े, दोनों साथ बढ़े; शिकार खेला, लड़े झगड़े; कभी उसने बुद्ध को चारों खाने चित्त भी कर दिया होगा। भाई ही थे! एक ही महल में बड़े हुए थे। फिर बुद्ध जब ज्ञान को उपलब्ध हुए, तब भी उसने अपनी अकड़ न छोड़ी। आया, तो झुका तो, लेकिन झुकने के पहले उसने कहा कि तू सुन; सिद्धार्थ, तू सुन जब तक मैं तेरा भिक्षु नहीं हुआ हूं तब तक मैं तेरा बड़ा भाई हूं तू मेरा छोटा भाई है; तब तक मैं जो कहूं उसको सुन और मैं जो कहूं उसको मान। फिर तो मैं भिक्षु हो जाऊंगा, तेरा शिष्य हो जाऊंगा, फिर पुराना नाता तो समाप्त हो जाएगा, फिर मैं तेरी सुनूंगा और तेरी मानूंगा। इसके पहले कुछ बातें तय हो जानी चाहिए। देख, ये मेरी कुछ शर्तें हैं;

पहली शर्त तो यह कि भिक्षु हो जाने के बाद मुझे कभी तू अपने से दूर न भेज सकेगा। यह मेरी आज्ञा है। तू मेरा छोटा भाई है, तुझे माननी ही होगी। तू मुझे कभी भेज न सकेगा दूर। तू यह न कह सकेगा कि आनंद, अब तू जा और कहीं प्रचार कर, प्रसार कर। मैं तो साथ ही रहूंगा। दूसरी बात, मैं तो उसी कमरे में सोऊंगा जिसमें तू सोएगा। मैं रत्ती पल को भी दूर नहीं सोना चाहता। तीसरी बात, मैं जो भी पूछूंगा, उसका तुझे उत्तर देना होगा। जैसा तू औरों से कहता है कि सालभर बाद पूछना, कि दो साल चुप रहो, फिर पूछना, यह मेरे साथ न चलेगा। आखिर मैं तेरा भाई! आखिर तेरा बड़ा भाई! और चौथी बात कि अगर आधी रात को भी मैं किसी को ले आऊं, तो तुझे मिलना पड़ेगा। क्योंकि मैं तेरे साथ रहूं लोग मुझसे प्रार्थना करेंगे कि मिलवा दो; अगर मुझे लगा कि किसी को मिलवाना जरूरी है, तो तू मुझे रोक न सकेगा। आधी रात जगाकर भी, तो भी तू यह न कह सकेगा कि यह क्या करते हो? यह चार तू वचन दे दे; फिर मैं दीक्षा ले लेता हूं फिर मैं समर्पण कर देता हूं।

तो बुद्ध ने ये चार वचन दिये। उनकी करुणा, इसलिए चार वचन दिये कि चल, इस बहाने ही सही, मगर तू दीक्षित तो हो, फिर पीछे निपट लेंगे। मगर वह अकड़ जो बनी रही, बनी रही। बुद्ध के जीते जी न मिटी। वह जिज्ञासु ही रहा, विद्यार्थी ही रहा; ज्यादा से ज्यादा नाता उसका उतना ही बना। उसने पूछा जाकर आम्रपाली नाम की वेश्या के पास गया जो रात आयी थी और उसने पूछा कि क्या तेरे मन में ऐसा हुआ था? आम्रपाली ने कहा, यह तो हद हो गयी। एक तो उन्हें कैसे पता चला कि मैं आयी हूं! और यह कैसे पता चला कि मेरे मन में भी यह विचार उठे! सच कहते हैं वे! यही विचार उठे। जैसे ही उन्होंने कहा कि जाओ, अब रात्रि का अंतिम कार्य करो, मैं एकदम कपड़े झाड्कर खड़ी हो गयी, मैंने कहा, मैं भी कहा रात गंवाए दे रही हूं प्यारी रात है, ग्राहक आ गये होंगे। आम्रपाली बड़ी सुंदरी थी, नगरवधू थी। दूर दूर से राजा और सम्राट उसके द्वार पर आते थे। वह अपने रथ पर बैठी और वापिस गयी। और सच में वहां मेहमान खडे थे आकर। गुहार मची थी कि आम्रपाली कहां है? आज कहां गयी आम्रपाली?

आनंद ने जब उससे जाकर यह पूछा कि क्या तेरे मन में ऐसा हुआ था? और उसने कहा, ‘हां हुआ था’, तो आनंद के साथ साथ वह खुद आयी बुद्ध के चरणों में, उसने दीक्षा ले ली। उसने कहा कि आपने रात भी मुझे पहचान लिया और पकड़ लिया। और इतना ही नहीं कि बाहर से पहचाना और पकड़ा, भीतर से भी पहचाना और पकड़ा। अब इन चरणों के सिवाय मेरे लिए कहीं और कोई शरण नहीं है। अब कहीं नहीं जाना है। अब सब धंधा समाप्त; अब सब काम समाप्त। मुझ अपात्र को स्वीकार कर लें।

आनंद तो उस चोर के पास भी गया। और वह चोर भी दीक्षित हो गया। और आनंद ने बुद्ध से कहा कि आपने भी हद कर दी! कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे यह जो जिज्ञासा हुई कि मैं जा जाकर पूछूं इस चोर से, इस वेश्या से वह भी आपकी ही तरकीब रही हो। क्योंकि ये दोनों आ गये और डूब गये! और मैं तो अभी भी किनारे पर खड़ा हूं सो किनारे पर खडा हूं! भौंचक्का, कि यह क्या हुआ, कैसे हुआ?

वह आखिर तक भौंचक्का रहा।

प्रत्यक्ष तो सिर्फ आत्मा ही हो सकती है। शेष सब में तो मन आ जाएगा। इसलिए यह सूत्र प्यारा है : मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष, लब्ध! क्या अदभुत बात है। लब्ध अर्थात सदा उपलब्ध। ऐसा एक क्षण भी न था जब तुम परमात्मा न थे। ऐसा एक भी क्षण कभी नहीं होगा जब तुम परमात्मा न होओगे। अभी भी तुम परमात्मा हो जानो, न जानो! पहचानो, न पहचानो! भूलो, भटकी, मगर बदल नहीं सकते। लाख उपाय करो, तुम जो हो सो हो।

ओशो 
‘लगन महूरत झूठ सब’ प्रवचन माला से

सातवां सूत्र, ‘जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो।’


बड़ा उलटा है। दो अर्थों में उलटा है। एक तो, हम सदा उसकी इच्छा करते हैं, इच्छा ही उसकी होती है, जो हमारे भीतर नहीं है। इच्छा का अर्थ ही यह होता है कि जो हमारे पास नहीं है, जिसका अभाव है, उसकी ही इच्छा होती है। इच्छा का अर्थ ही यह हुआ कि अभी हमारे पास नहीं है, कल हो सके। कल हो सकेगा, इसकी वासना ही तो इच्छा है।

यह सूत्र कहता है, ‘जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो।’

तो पहली तो बात कि जो तुम्हारे भीतर नहीं है, उसकी इच्छा मत करना। और हमारी सारी इच्छाएं तो उसी की हैं, जो हमारे भीतर नहीं है। हम तो उसी को मांग रहे हैं, जो हमारे पास नहीं है। और यह तर्कयुक्त भी है कि हम उसी को मांगें, जो पास नहीं है। जो पास है ही, उसे मांगने का क्या अर्थ? इसलिए पहली तो बात यह है कि इच्छा, जो भीतर है, उसकी होती ही नहीं। इसलिए सूत्र बड़ा उलटा है।

और दूसरे इसलिए भी यह सूत्र बड़ा गहरा और उलटा है कि जीवन में मिलता केवल वही है, जो हमारे पास था। वह तो कभी मिलता ही नहीं, जो हमारे भीतर था ही नहीं। कुछ भी हम पा लें, वह बाहर ही रह जाएगा। और जो बाहर ही रह जाएगा, वह हमें मिला कहां? वह हमसे छीना जा सकता है। कितना ही कोई धन इकट्ठा कर ले, उसकी चोरी हो सकती है, उस पर डाका पड़ सकता है। और न चोरी हो, न डाका पड़े, न राज्य समाजवादी हो, कुछ भी न हो, तो भी मौत छीन लेगी। मौत के क्षण में, जो भी आपने चाहा था, इकट्ठा किया था, वह आपके हाथ से गिर जाएगा। वह आपके पास था, लेकिन आपका नहीं हुआ था। आपका हो जाता, तो कोई भी उसे छीन न सकता था। इसलिए धर्म की दृष्टि में संपदा का अर्थ है, वह जो आपसे छीनी न जा सके। जो आपसे छीनी जा सके, उसका नाम विपदा है। क्योंकि उसको बचाओ, उसका कष्ट भोगो बचाने का। उसे दूसरों से छीनो, झपटो, उसका कष्ट भोगो। और सारा कर लेने के बाद भी ड़रे रहो, चौबीस घंटे कंपते रहो कि वह छिन न जाए। और फिर आखिर में वह छिने भी। तो धर्म कहता है कि इसको संपत्ति नासमझ कहते होंगे, यह विपत्ति है।

संपत्ति तो वही है जो तुम्हारे पास से छीनी न जा सके। तो ही अपनी है, तो ही अपनी कहने का कोई अर्थ है। लेकिन ऐसी क्या संपत्ति होगी जो आपसे न छीनी जा सके? अगर ऐसी कोई संपत्ति है, तो वह आपके भीतर मौजूद ही होगी, तो ही। जो भी हम बाहर से डालेंगे, वह वापस लिया जा सकता है। जो हमारे स्वभाव के साथ ही उपलब्ध हुआ है, वही हमसे नहीं छीना जा सकता। जो हमारी आत्मा में ही बसा है, वही हमसे नहीं छीना जा सकता। जो तुमसे छीनी न जा सके, उस सत्ता का नाम ही आत्मा है।

साधना सूत्र

ओशो 

जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो।

सूत्र:

7—जो तुम्हारे भीतर है, केवल उसी की इच्छा करो।
क्योंकि तुम्हारे भीतर समस्त संसार का प्रकाश है,
वही प्रकाश जो साधना—पथ को प्रकाशित कर सकता है।
यदि तुम उसे अपने भीतर नहीं देख सकते,
तो उसे कहीं और ढूंढना व्यर्थ है।
8—जो तुमसे परे है, केवल उसी की इच्छा करो।
वह तुमसे परे है,
क्योंकि जब तुम उसे प्राप्त कर लेते हो,
तो तुम्हारा अहंकार नष्ट हो चुका होता है।
9—जो अप्राप्य है, केवल उसी की इच्छा करो।
वह अप्राप्य है, क्योंकि
पास पहुंचने पर वह बराबर दूर हटता जाता है।
तुम प्रकाश में प्रवेश करोगे,
किंतु तुम ज्योति को स्पर्श कदापि न कर सकोगे।

साधना सूत्र 

ओशो 

Thursday, August 6, 2015

किसी के लिए मरना आसान है; किसी के लिए जीना बहुत कठिन है।

अभी उस दिन एक युवती मेरे पास आई। वह भारतीय है और एक अमेरिकी लड़के के प्रेम में पड़ गई है। प्रेम होने के बाद दोनों विवाह करने की सोचने लगे। तभी लड़का बीमार पड़ा और पता चला कि उसे ऐसा कैंसर है जिसका कोई इलाज नहीं है। मृत्यु निश्चित थी। वह ज्यादा से ज्यादा दो—चार साल का मेहमान था। तो लड़के ने लड़की को बहुत समझाया कि जब मृत्यु निश्चित है तो वह अपना जीवन नष्ट न करे, विवाह का विचार छोड़ दे। लेकिन लड़के ने मनाने की जितनी कोशिश की - यह है मन का ढंग -उतनी ही लड़की विवाह करने पर तुल गई।

ऐसे मन विरोधों में काम करता है। अगर उस लड़के की जगह मैं होता तो मैं विवाह करने की जिद करता। तब वह लड़की विवाह से भागती; तब वह विवाह असंभव था। तब वह लड़की मुझे कहीं नहीं दिखाई देती। लेकिन प्रेम के कारण, और साथ ही मन की चालों को न समझने की मूर्खता के कारण, लड़के ने लड़की को विवाह के विरुद्ध बहुत समझाया। कोई भी व्यक्ति उसकी जगह होता तो वही करता। और क्योंकि उसने जिद की तो लड़की ने इसको अंतःकरण की बात मान ली; उसने विवाह करने की जिद ठानी।

आखिरकार उनका विवाह हो गया। अब विवाह के बाद वह लड़की सतत मृत्यु से घिरी रहती है। वह दुखी है, वह उस लड़के को प्रेम नहीं कर सकती। किसी के लिए मरना आसान है; किसी के लिए जीना बहुत कठिन है। मरना बहुत आसान है। शहीद होना बड़ी सरल बात है; क्योंकि यह क्षणभर की बात है, इसलिए शहीद होना बहुत सरल है। एक क्षण में तुम शहीद हो जा सकते हो। अगर तुम मुझे प्रेम करते हो और मैं तुमसे कहूं कि इस मकान से कूद जाओ तो तुम कूद जा सकते हो, क्योंकि तुम मुझे प्रेम करते हो। लेकिन अगर मैं कहूं कि ठीक है, अब तीस वर्षों तक ‘ मेरे साथ रहो तो वह बहुत कठिन होगा। बहुत कठिन।

एक क्षण में शहीद हुआ जा सकता है। किसी व्यक्ति या चीज के लिए मर जाना संसार में सबसे सरल काम है; लेकिन किसी के लिए जीना सर्वाधिक कठिन है।

ओशो 

  

उतने ही मार्ग हैं जितने यात्री हैं

तुम्हारा मन कंप्यूटर जैसा है। उसमें सूचनाएं भर दी गई हैं, मूल्यांकन भर दिए गए हैं। तुम कुछ मूढ़ धारणाओं से, परंपराओं से बंधे हो; तुम उन्हें आसानी से नहीं हटा सकते। यही कारण है कि धर्म महज शब्द रह गया है। बहुत थोड़े से लोग धार्मिक हो सकते हैं; क्योंकि बहुत थोड़े से लोग अपने संस्कारों से बगावत कर सकते हैं। सिर्फ क्रांतिकारी चित्त ही धार्मिक हो सकता है—ऐसा चित्त जो किसी चीज को सीधे देख सके, उसकी तथ्यता को देख सके और तब निर्णय करे।

लेकिन अपने ढंग ढांचे को महसूस करो, उसे समझो। यह कठिन नहीं है। पहली बात कि अगर तुम आत अनुभव करते हो तो तुम बौद्धिक ढंग के व्यक्ति हो। और अगर तुम निश्चित अनुभव करते हो, श्रद्धावान हो, तो दूसरी विधियों का प्रयोग करो, जो बुनियाद में श्रद्धा की मांग करती हो। और याद रहे, कभी भी दोनों तरह की विधियों का प्रयोग मत करो। उससे तुम और भी भ्रांत हो जाओगे। कुछ भी गलत नहीं है; दोनों तरह की विधियां सही हैं। रामकृष्ण भी सही हैं; बुद्ध भी सही हैं।

स्मरण रहे, इस संसार में अनेक रास्ते सत्य तक जाते हैं। किसी एक मार्ग को एकाधिकार नहीं है। यहां तक कि परस्पर विरोधी मार्ग, सर्वथा विरोधी मार्ग भी एक ही मंजिल पर पहुंचते हैं। कोई एक मार्ग नहीं है। अगर तुम गहरे जाओगे और ज्ञान को उपलब्ध करोगे तो तुम्हें पता चलेगा कि उतने ही मार्ग हैं जितने यात्री हैं। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को उस बिंदु से यात्रा शुरू करनी है जहां वह खड़ा है। कहीं कोई बना बनाया मार्ग नहीं है। असल में तुम स्वयं चलकर अपना मार्ग निर्मित करते हो। कहीं कोई बना बनाया मार्ग नहीं है; कहीं कोई राजपथ नहीं है।

लेकिन प्रत्येक धर्म लोगों पर इस धारणा को लादने की चेष्टा करता है कि रास्ता तैयार है; तुम्हें सिर्फ चलने की जरूरत है। यह गलत बात है। आंतरिक यात्रा जमीन पर चलने की बजाय आकाश में उड़ने जैसी ज्यादा है। पक्षी उड़ता है; आकाश में कहीं पदचिह्न नहीं छूटते। आकाश शून्य का शून्य बना रहता है। पक्षी उड़ता है; लेकिन कोई पदचिह्न नहीं छूटते, जिनका अनुसरण दूसरे पक्षी कर सकें। आकाश सदा रिक्त है, खाली है। दूसरे पक्षी को अपना मार्ग आप बनाना होगा।

तंत्र सूत्र
 ओशो

"Why did you save me?"

 
Once I was sitting by the side of the Ganges in Allahabad alone, in a very lonely spot,and I saw a man jump into the river. I thought he must be taking a bath, but then he started shouting, "Help! Save me!"he was drowning. I don't believe in saving anybody, but I thought that this is a totally different case. So I jumped in after him and I pulled him out. It was hard, he was a very big and fat fellow, but somehow I brought him out. And he started being very angry with me. 
 
He said, "Why did you save me?"
 
   I said, "This is something! You were shouting, `Save me, help me!'
 I am not a person to save anybody, but there was nobody else here, and I thought that this is a totally different context. But why are you getting angry?"He said, "I was really going to commit suicide.""Then," I said, "why did you start shouting, `Save me, help me'? You should have committed suicide I would not have disturbed you. I was simply sitting silently, I
was not interfering with you."He said, "What to do? I wanted to commit suicide, and with a total decisiveness I had jumped in. But when the cold water touched me, I forgot all that, and when I started drowning and came up, I don't know how, but I started shouting, `Help me, save me!'"I said, "Don't be worried. Come here."
 
He said, "What do you mean?"
 
I said, "You just come close to me." He came. I pushed him back into the water. He went under once and started shouting again, "Save me, help me! What are you doing?"I said, "Now I am not going to be worried. I did wrong the first time please forgive me for that time. Now I will simply sit here and see you commit suicide." He said, "This is not" and it was difficult to say anything because he was going down and up
 
"This is not a joke! Just save me. I don't want to commit suicide!" Somebody else jumped in  and saved him. I said, "You are doing something wrongbecause that fellow wants to commit suicide." And that fellow said, "No, I have dropped the idea. It is too difficult, I will find some easier way. This going under water and coming up it is too much for me.
 
Osho

उन्नति की आकांक्षा


उन्नति की आकांक्षा भी वैसी ही घातक है, शायद उससे भी ज्यादा, जितनी उत्तेजना की आकांक्षा है। पर बड़ा अजीब लगेगा, क्योंकि हम तो सोचते हैं कि अध्यात्म भी तो आखिर उन्नति की आकांक्षा है! कि हम आनंद चाहते हैं, कि मुक्ति चाहते हैं, कि परमात्मा को चाहते हैं यह भी तो उन्नति की आकांक्षा है।

लेकिन एक बुनियादी फर्क समझ लेना जरूरी है।

एक तो उन्नति है, जो आपकी चाह से आती है। और एक उन्नति है, जो आपकी चाह से नहीं आती, जब आपमें चाह नहीं होती, तब आती है। एक तो उन्नति है, जो आपकी चेष्टा से आती है, और आपकी चेष्टा से आई हुई उन्नति आपसे बड़ी नहीं होगी। हो भी नहीं सकती। आपका ही कृत्य आपसे बड़ा नहीं हो सकता। कृत्य हमेशा कर्ता से छोटा होता है। आप जो भी करेंगे, वह आपसे छोटा काम होगा। होगा ही। आप अपने से बड़ा काम कर कैसे सकते हैं? और जब आप ही करने वाले हैं तो काम आपसे बड़ा नहीं होगा। कितना ही बड़ा काम हो, आप उससे बड़े ही रहेंगे। कितना ही सुंदर कोई चित्र बनाए, चित्रकार चित्र से बड़ा रहेगा। और कितना ही कोई मधुर संगीत पैदा कर ले, संगीतज्ञ संगीत से बड़ा रहेगा। जो आप करते हैं, वह आपसे बड़ा नहीं हो सकता। कृत्य सदा कर्ता से छोटा होगा।

यह तो बड़ी कठिन बात हो गई। इसका तो मतलब हुआ कि अगर आप कोई आध्यात्मिक उन्नति भी कर लें, तो वह आपसे बड़ी नहीं हो सकती। जो आप हैं, आपसे छोटी होगी। तब तो आप एक बड़े चक्कर में हैं। आप अपने से छूट नहीं सकते, आप रहेंगे ही और सदा बड़े रहेंगे, जो भी आप पा लें। अगर आपको परमात्मा भी मिल जाए  ध्यान रखना, मैं कह रहा हूं कि अगर आपकी कोशिश से आपको परमात्मा मिल जाए तों आपसे छोटा होगा। होगा ही, क्योंकि आपकी कोशिश से मिला है, आपसे बड़ा नहीं हो सकता। इसलिए आप परमात्मा को कोशिश से नहीं पा सकते, क्योंकि वह आपसे बड़ा है। तो उसको पाने का एक दूसरा उपाय है, कोशिश को छोड़ कर उसे पाया जा सकता है।

यह सूत्र कहता है, ‘उन्नति की आकांक्षा को दूर करो। फूल के समान खिलों और विकसित होओ। फूल को अपने खिलने का भान भी नहीं होता।’

कली कब फूल बन जाती है, पता भी नहीं चलता।
 ‘किंतु वह अपनी आत्मा को वायु के समक्ष उन्मुक्त करने को उत्सुक रहता है।’

कली सिर्फ उत्सुक होती है खुलने को। खुलने की कोई चेष्टा नहीं करती। कोई व्यायाम, कोई प्राणायाम, कोई योगासन, कली कुछ भी नहीं करती। कली सिर्फ आतुर होती है, सिर्फ प्यासी होती है। उसके भीतर जो सुगंध है, वह हवाओं में लुट जाए। वह आतुरता भी चेष्टा नहीं बनती, प्रतीक्षा ही रहती है। कली सिर्फ प्रतीक्षा करती है, सुबह सूरज उगेगा, हवाएं आएंगी, और कली फूल बन जाएगी। लेकिन कोई चेष्टा नहीं होती कि वह फूल बन जाए, कि किसी स्कूल में भरती हो, कि किसी गुरु के पास जाए, कहीं सीखे, कोई उपाय सीखे, कोई विधि, कोई तंत्र मंत्र, वह कुछ नहीं करती वह सिर्फ प्रतीक्षा करती है।

‘तुम भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को शाश्वत के प्रति खोल देने को उत्सुक रहो। परंतु उन्नति की आकांक्षा नहीं, शाश्वत ही तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे सौंदर्य को आकृष्ट करे।’

साधना सूत्र

ओशो 

‘उत्तेजना की इच्छा को दूर करो। इंद्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो।’


क्या शिक्षा? इंद्रियों को मारो मत, इंद्रियों को जिलाओं, इंद्रियों को ज्यादा संवेदनशील बनाओ। प्रत्येक इंद्रिय शुद्धतम अनुभव कर सके, तो प्रत्येक इंद्रिय से परमात्मा का अनुभव होगा। तब उसका स्वाद भी लिया जा सकता है।

यह बात बड़ी व्यर्थ मालूम पड़ेगी कि परमात्मा का स्वाद! और आप कहेंगे कि आप क्या कह रहे हैं! हमने तो सदा यही कहा है कि परमात्मा का दर्शन होता है। उसका कारण यह नहीं है कि परमात्मा का स्वाद नहीं होता। उसका कारण यह है कि दुनिया के अधिकतम साधकों ने आंखों को शुद्ध करके ही उसकी खोज की है। और कोई कारण नहीं है। चूंकि आंखें शुद्ध करके खोज की है, इसलिए उन्होंने कहा साक्षात्कार, दर्शन। हमने तो अपनी पूरी खोज का नाम ही दर्शन रख दिया है। पर यह आंखों के कारण आदमी आँख केंद्रित है।

और ऐसा इसी मुल्क में नहीं है, सारी दुनिया में है। पश्चिम में भी वे अनुभवी को सिअर कहते हैं, देखने वाला। लेकिन क्यों? कोई भी नहीं कहता स्वाद लेने वाला। कोई भी नहीं कहता श्रवण करने वाला! कोई भी नहीं कहता परमात्मा की गंध! उलटा लगेगा। लेकिन अगर आख देख सकती है तो नाक क्यों नहीं सूंघ सकती? और आख के देखने में हमें कोई अड़चन नहीं मालूम पड़ती। और अगर मैं कहूं परमात्मा का स्वाद, तो अड़चन मालूम पड़ेगी। उसका कारण सिर्फ इतना है कि आदमी की बाकी सब इंद्रियां, आँख की बजाय, ज्यादा जल्दी स्थूल हो जाती हैं।

आँख मनुष्य के शरीर में सबसे तरल इंद्रिय है। ऐसा समझें कि आख मनुष्य के शरीर में सबसे कम शरीर का हिस्सा है, अशरीरी है। और इसलिए जब हम किसी की आंखों में झांकते हैं तो उसमें पूरी तरह झांक लेते हैं। इसलिए बहरा आदमी उतना नहीं खोता, अंधा आदमी बहुत खो देता है। आख के बंद होते ही अस्सी प्रतिशत अनुभव बंद हो जाते हैं। बाकी इंद्रियों से हम बीस प्रतिशत अनुभव लेते हैं, आख से अस्सी प्रतिशत अनुभव लेते हैं। इसलिए बहरे आदमी पर आपको उतनी दया नहीं आती, जितनी अंधे आदमी पर दया आती है। उसका कारण है। क्योंकि वह कितना खो रहा है! आख के खोते ही अस्सी प्रतिशत अनुभव खो जाते हैं। इसलिए आँख केंद्रित होने की वजह से हमने कहा, ईश्वर का दर्शन।

लेकिन यह जरूरी नहीं है। अगर आप अपनी स्वाद की इंद्रिय को शुद्ध कर लें, तो स्वाद से भी उसका स्वाद मिलेगा। अगर आप अपने हाथ के अनुभव को शुद्ध कर लें, तो उसका स्‍पर्श भी होगा। आप किसी भी इंद्रिय को शुद्ध कर लें, तो आपको उसकी प्रतीति उसी इंद्रिय से हो जाएगी। अगर आप अपनी सारी इंद्रियों को शुद्ध कर लें, तो परमात्मा आप पर सब तरफ से बरस पड़ेगा। साधना इंद्रिय शुद्धि है। और इंद्रिय शुद्धि का सूत्र है

 ‘उत्तेजना की इच्छा को दूर करो, इंद्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो।’

क्या है निरीक्षण? कि जितनी उत्तेजना, उतनी इंद्रिय मरती है। जितनी कम उत्तेजना, उतनी इंद्रिय जीतती है, जगती है, सजग होती है। ‘आत्म विद्या का पाठ इसी प्रकार प्रारंभ किया जा सकता है और इसी प्रकार तुम सीढ़ी की पहली पटिया पर अपना पैर जमा सकते हो।’

जिसका हमें अनुभव करना है, वह भीतर छिपा है। और उत्तेजना की खोज होती है बाहर। तो जितनी उत्तेजना, उतने ही हम अपने से दूर निकल जाते हैं। इसलिए मजे की बात है कि आदमी चाँद पर उतर जाता है और अपने भीतर उतरने की उसे कोई भी फिक्र नहीं है। वह भी उत्तेजना की तलाश है। लेकिन कैसी भी उत्तेजना हो…।

चांद पर पहुंचने की आकांक्षा कितनी पुरानी है! जब से मनुष्य है, तब से चांद पर पहुंचने की आकांक्षा है। और बच्चे पैदा होते से ही चांद की तरफ हाथ बढ़ाने लगते हैं। आदमी अनंत काल से सोच रहा है चांद पर पहुंच जाए। लेकिन आपको पता है कि क्या हुआ? जब पहली दफा आदमी चांद पर उतरा, तो सारी दुनिया में भारी उत्तेजना थी, विशेष कर अमरीका में, क्योंकि उनका आदमी उतरा था, तो और भी ज्यादा उत्तेजना थी। सारे लोग अपने टेलीविजन लगाए बैठे हुए थे। लेकिन दो घंटे के बाद उत्तेजना खतम हो गई। आदमी उतर गया, लोगों ने टेलीविजन बंद कर दिए। फिर उनकी रूटीन, रोज की दुनिया शुरू हो गई। चौबीस घंटे चर्चा रही और बात समाप्त हो गई! हजारों वर्ष से जिस उत्तेजना के लिए आदमी आतुर था, वह दो घंटे में खतम हो गई! चांद पर पहुंच गया, अब क्या है? एक क्षण को लगा कि कोई बड़ी घटना घट रही है, फिर सब ठीक हो गया, फिर दुनिया अपने रास्ते पर चलने लगी। इतनी बड़ी विजय की यात्रा, इतने कल्पों तक जिसका स्वप्न देखा हो, वह भी दो घंटे में पुरानी पड़ जाती है!

आदमी का मन हर चीज को पुरानी कर देता है। और दूर हम कितने ही निकल जाएं, जितने दूर जाते हैं, उतना ही भीतर का अनुभव मुश्किल होता जाता है।

साधना सूत्र

ओशो 

उत्तेजना हर चीज को साधारण कर देती है

……जब कि जगत बिलकुल असाधारण है। जो फूल आपको वृक्ष पर दिखाई पड़ रहा है, वैसा फूल कभी नहीं खिला था। वह फूल बिलकुल नया है। उस तरह का दूसरा फूल पूरी पृथ्वी पर खोजना असंभव है। उस तरह का फूल कभी इतिहास में न हुआ और न कभी आगे होगा। ऐसे अद्वितीय फूल के होने की घटना को भी हमारी आंखें साधारण कर देती हैं, कह देती हैं कि ठीक है, गुलाब का फूल है, हजारों देखे हैं।
वह जो हजारों देखे हैं, उनकी वजह से आंखें अंधी हो गई हैं, और यह जो सामने मौजूद है, यह दिखाई नहीं पड़ता। उन हजारों से इस फूल का क्या संबंध है?

इमर्सन ने लिखा है कि इस गुलाब के फूल को देख कर मुझे खयाल आया कि इस गुलाब के फूल को तो कोई भी पता नहीं है हजारों फूलों का-न आने वाले फूलों का, न जा चुके फूलों का-यह गुलाब का फूल तो परमात्मा के लिए सीधा मौजूद है। और यह फूल इसीलिए आनंदित है, क्योंकि कोई तुलना नहीं है। लेकिन जब मैं इसे देखता हूं तो हजारों फूल जो मैंने देखे हैं, बीच में आ जाते हैं। आंखें धुंधली हो जाती हैं, यह फूल की अनूठी घटना व्यर्थ हो जाती है। इससे न कोई सौंदर्य का अनुभव होता, और न हृदय के कोई तार हिलते, न कोई में आ कंपता।
हम एक असाधारण जगत में जी रहे हैं। यहां चारों तरफ विराट मौजूद है न मालूम कितने रूपों में। यहां परम-सौंदर्य घटित हो रहा है, परम संगीत बज रहा है, नाद का कोई अंत नहीं है। लेकिन हम बहरे अंधे की तरह इस सबके बीच से गुजर जाते हैं। हमें कुछ भी छूता नहीं। हम मरी हुई लाशें हैं। हमने अपनी इंद्रियों को कब्रें बना लिया है। हम उनके भीतर घिरे हैं, ताबूत की तरह बंद हैं। हम गुजर रहे हैं  हमें कुछ छूता नहीं, कुछ अनुभव नहीं होता। और हम पूछते हैं, आनंद कहां है? और हम पूछते हैं, परमात्मा कहां है? और वह चारों तरफ मौजूद है। बाहर  भीतर उसके अतिरिक्त कोई भी नहीं है। और ऐसा कोई क्षण नहीं है, जो आनंद का क्षण न हो। लेकिन अनुभव करने वाला चाहिए। और अनुभव करने वाले को हम उत्तेजना में मार डालते हैं।


 साधना सूत्र

ओशो 

उत्तेजना की इच्छा को दूर करो

अनुभव से उत्तेजना समाप्त हो जाती है, इसलिए अनुभव से सुख दुख बन जाते हैं। जो सुख आपको नहीं मिला है अभी तक, वही सुख मालूम पड़ता है। जब मिल जाएगा, वही दुख हो जाएगा। मिला कि दुख हुआ। मिलते ही सुख दुख हो जाते हैं, क्योंकि उत्तेजनाएं और बड़ी उत्तेजनाओं की मांग करती हैं। और आपके अनुभव की इंद्रियां शिथिल होती चली जाती हैं। एक घड़ी ऐसी आती है कि आप कुछ भी अनुभव नहीं कर पाते हैं। क्योंकि आपकी सब इंद्रियों के अनुभव की जो संवेदनशीलताए हैं, वे सब जड़ हो गई होती हैं। फिर आप परमात्मा की खोज में लगते हैं!

जब आदमी का हो जाता है.. .मैं बूढ़ा आदमी उसको कहता हूं उम्र से नहीं बूढ़ा आदमी उसको कहता हूं जिसने उत्तेजनाओं की दौड़ में अपनी सारी इंद्रियों को जड़ कर लिया है। यह जवानी में भी हो सकता है, यह बचपन में भी हो सकता है। आज अमरीका में बचपन में हुआ जा रहा है। अब इतनी देर नहीं लगती, बुढ़ापे तक रुकने की जरूरत नहीं है। अगर आपको इतनी सुविधाएं मिलें उत्तेजना की, तो आप बचपन में ही जड़ हो जाएंगे। और जब सब तरफ से इंद्रियां जड़ हो जाती हैं, तब आदमी खोज करता है- आनंद कहां है? आत्मा कहां है? परमात्मा कहां है? बड़ी मुश्किल है, क्योंकि उनकी खोज के लिए तो इंद्रियों की संवेदना की क्षमता शुद्ध होनी चाहिए।

अगर महावीर और बुद्ध अपने राजमहलों को छोड़ कर भाग जाते हैं, यह घटना बहुत ऊपरी है। भीतरी घटना तो यह है कि वह उत्तेजना की जगह को छोड़ कर हट रहे हैं, ताकि इंद्रियों की शुद्धि और उनकी नैसर्गिकता को पुन: पाया जा सके। जंगल की तरफ भाग रहे हैं, उसका अर्थ है कि निसर्ग की तरफ भाग रहे हैं, प्रकृति की तरफ भाग रहे हैं। ताकि अनुभव करने के जो द्वार हैं हमारे भीतर, उन पर जितना कूड़ा—करकट और कचरा इकट्ठा हो गया है, वह हट जाए। वह जब हट जाएगा और हम सूक्ष्मतर होने लगेंगे, तभी हम उसको सुन पाएंगे, जो केवल सूक्ष्म इंद्रियों से ही सुना जा सकता है। और उसको देख पाएंगे, जो केवल सूक्ष्म आंखों से ही देखा जा सकता है। इसी संबंध में यह सूत्र है। पहला सूत्र, ‘ उत्तेजना की इच्छा को दूर करो।’
 
हटाओ उत्तेजना की इच्छा को। इसका यह अर्थ नहीं है कि यह सूत्र इंद्रिय विरोधी है। सच तो यह है कि आपकी उत्तेजना की इच्छा ही इंद्रियों की हत्या है। यह सूत्र इंद्रियों की शुद्धिकरण का सूत्र है, उनका विरोधी नहीं है। अगर आप स्वाद से उत्तेजना को हटा दें, तो रूखी रोटी में भी वैसा स्वाद उपलब्ध हो सकेगा, जो राजमहलों के भोग में उपलब्ध नहीं हो सकता। क्योंकि स्वाद रोटी पर, भोजन पर निर्भर नहीं करता, स्वाद लेने वाले पर निर्भर करता है। आप पर निर्भर करता है कि आप कितना अनुभव कर सकते हैं, कितना गहरा उतर सकते हैं अनुभव में।

उत्तेजना की इच्छा को दूर किए बिना कोई भी व्यक्ति साधना के जगत में प्रवेश नहीं कर सकता। क्योंकि साधना का अर्थ ही है कि अब हम स्थूल को छोड़ते हैं और सूक्ष्म की तलाश पर निकलते हैं। लेकिन सूक्ष्म की तलाश करनी तो आपको होगी! आप सूक्ष्म को अनुभव भी कर सकते हैं या नहीं? आपके पास वह क्षमता भी है जिससे सूक्ष्म का मेल हो सके?

साधना सूत्र

ओशो 

उत्तेजना की दौड़

आसाम में अब भी तांत्रिकों का एक छोटा समुदाय सांप को पाल कर रखता है। क्योंकि और सभी तरह के जहर नशा नहीं लाते, सिर्फ सांप से जीभ पर कटाएं, तो थोड़ा बहुत नशा आता है।

उत्तेजना की दौड़ में हम धीरे  धीरे जड़ होते चले जाते हैं। जितनी तेज उत्तेजना हम लेंगे, उतनी ही हमारी इंद्रियों की क्षमता अनुभव करने की कम हो जाती है। फिर और ज्यादा चाहिए, फिर और ज्यादा चाहिए। और इस दौड़ का कोई अंत नहीं है। आखिर में यह दौड़ इंद्रियों को बिलकुल पत्थर बना देती है।

अगर आप भोजन में बहुत तेज उत्तेजनाएं पसंद करते हैं, तो बहुत शीघ्र ही आपके स्वाद की क्षमता मर जाएगी। कितनी ही मिर्च आप लें, बेस्वाद मालूम पड़ेगा। मिर्च का रस क्या है? तेज उत्तेजना है स्वाद को जगाने के लिए। लेकिन जिसे हम जगाने के लिए लेते हैं, वही मारने का कारण हो जाता है। अगर आप बिना मिर्च के भोजन लें, तो आपको लगेगा कि आप मिट्टी खा रहे हैं। भोजन का जो स्वाद है, वह आपको आता ही नहीं अब। आपकी स्वाद की क्षमता कम हो गई। यह उलटा लगेगा। स्वाद की दौड़ में स्वाद की क्षमता कम हो जाती है। जो स्वाद बुद्ध और महावीर को भोजन से मिला होगा, वह आपको नहीं मिल सकता।

इसलिए मैं तो निरंतर कहता हूं कि जिनको हम आप त्यागी कहते हैं, उन जैसा परम  भोगी खोजना मुश्किल है। क्योंकि उनका जो भी अनुभव है, शुद्धतम है। अगर बुद्ध पानी भी पीएंगे, तो उसमें भी जो स्वाद ले पाएंगे, वह आप शराब में भी न ले पाएंगे। क्योंकि जितनी उत्तेजना कम दी गई है इंद्रियों छ को, उतनी ही इंद्रियां ज्यादा सक्षम रहती हैं और सूक्ष्म को पकड़ने में कुशल होती हैं।

अगर आप जोर से बैंड़ बाजे के सुनने के आदी रहे हों, तो फिर पक्षियों की धीमी सी आवाज आपको सुनाई नहीं पड़ेगी। लेकिन उनका भी गीत है। फिर झींगुर की सन्नाटे में आने वाली आवाज का आपको पता भी नहीं चलेगा, उसका भी गीत है। फिर हवाएं जो वृक्षों से गुजरती हैं, उनकी जो सरसराहट है, उसका भी संगीत है, लेकिन वह आपको सुनाई नहीं पड़ेगा। लेकिन ये भी उत्तेजनाएं काफी हैं। हृदय के भीतर जो गीत की गज उठती है, वह तो आपको पता ही नहीं चलेगी। और आपके अंतस आलोक में अंतस आकाश में जो नाद प्रतिध्वनित होता है ओंकार का, वह तो आपको कभी पता न चलेगा। और जिसने अपने हृदय के नाद को नहीं सुना, उसने कुछ भी नहीं सुना। वह वंचित ही रह गया संगीत के परम माधुर्य से।

साधना सूत्र

ओशो 

व्यक्तिगत उन्नति की बलवती कामना

सूत्र:

5—उत्तेजना की इच्छा को दूर करो।
 इंद्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो,
क्योंकि आत्म—विद्या का पाठ इसी प्रकार आरंभ किया जा सकता है
और इसी प्रकार तुम इस सीडी की पहली पटिया पर अपना पैर जमा सकते हो।

6—उन्नति की आकांक्षा को दूर करो।
 फूल के समान खिलो और विकसित होओ।
फूल को अपने खिलने का भान नहीं रहता,
किंतु वह अपनी आत्मा को वायु के समक्ष
उन्मुक्त करने को उत्सुक रहता है।

तुम भी उसी प्रकार अपनी आत्मा को
शाश्वत के प्रति खोल देने को उत्सुक रहो।

परंतु उन्नति की आकांक्षा नहीं,
शाश्वत ही तुम्हारी शक्ति और तुम्हारे सौंदर्य को आकृष्ट करे।
क्योंकि शाश्वत के आकर्षण से तो तुम पवित्रता के साथ आगे बढ़ोगे, पनपोगे,
किंतु व्यक्तिगत उन्नति की बलवती कामना
तुमको केवल जड़ व कठोर बना देगी।

साधना सूत्र 
ओशो 

Monday, August 3, 2015

ओशो का नजरिया

मुल्ला नसीरुद्दीन की कब्र

मुल्‍ला नसरूद्दीन काल्‍पनिक चरित्र नहीं है। वह सूफी था। और उसकी मजार अभी तक है। लेकिन वह ऐसा आदमी था कि अपनी कब्र में जाकर भी उसने मज़ाक करना न छोड़ा। उसने ऐसी वसीयत लिखवाई कि उसकी कब्र का पत्‍थर मात्र एक दरवाजा हो, जिसपर ताला लगा हो। और चाबियां समुंदर में फेंक दी हों।

अब यह अजीब है। लोग उसकी कब्र देखने जाते है। और उस दरवाजे के चारों और घूमते है। क्‍योंकि दीवालें है ही नहीं, सिर्फ द्वार खड़ा है बिना दीवालों के। और द्वार पर ताला पडा है। मुल्‍ला कब्र में पडा हंसता होगा।

मैंने नसरूदीन से जितना प्रेम किया है उतना किसी से नहीं किया होगा। वह उन लोगों में से एक है जिन्‍होंने धर्म और हास्‍य को एक किया। नहीं तो वे हमेशा एक दूसरे की और पीठ किये हुए खड़े है। नसरूदीन ने उनकी पुरानी शत्रुता छोड़ने के लिए उन्‍हें विवश किया। जब धर्म और हास्‍य मिलते है। जब ध्‍यान हंसता है और हंसना ध्‍यान बन जाता है तब चमत्‍कार घटता है—चमत्‍कारों का चमत्‍कार।

ओशो

राज दरबार में

एक बार जगमगाती हुई पगड़ी पहन कर नसरूदीन दरबार में दाखिल हुआ। वह जानता था कि राजा उसे पसंद करेगा। और वह पगड़ी को उसे बेचने में सफल हो सकता है।

‘’मुल्‍ला, तुमने इस शानदार पगड़ी की क्‍या कीमत चुकाई।
‘’हजार स्‍वर्ण मुद्राएं सरकार।‘’

वजीर मुल्‍ला की चाल को समझते हुए राजा के कान में फुसफुसाया: कोई बुद्धू ही इस पगड़ी की इतनी कीमत दे सकता है।

तुमने इतनी ज्‍यादा कीमत क्‍योंकर चुकाई। हजार स्‍वर्ण मुद्राओं की पगड़ी कभी सूनी नहीं।

बादशाह सलामत मैंने इसलिए दीं क्‍योंकि मैं जानता था पूरी दुनियां में एक ही बादशाह है, जो इसकी कीमत दे सकता है। राजा ने उसकी प्रशंसा से प्रसन्‍न होकर नसरूदीन को दो हजार स्‍वर्ण मुद्राएं दे दी।

बाद में मुल्‍ला ने वज़ीर को बताया: ‘’तुम्‍हें पगडियों की कीमत पता होगी लेकिन मुझे राजाओं की कमजोरी पता है।‘’

तस्‍करी


नसरूदीन गधे पर बैठ कर पर्शिया से ग्रीस बार-बार जाता था। और हर बार वह घास की गठरियां ले जाता था। सरहद के संतरी घास को उघाड़ कर बारीकी से छानबीन करते लेकिन उसमे कुछ भी नहीं मिलता। लौटते समय वह खाली हाथ लौटता।

संतरी पूछते, ‘’तुम क्‍या ले जा रहे हो नसरूदीन।‘’

‘’मैं एक तस्‍कर हूं।‘’

नसरूदीन की अमीरी बढ़ती गई और वह ईजिप्‍त जाकर बस गया। वर्षों बाद कस्‍टम का एक अधिकारी उसे मिला और उसने पूछा :’’मुल्ला अब जबकि तुम ग्रीस और पर्शिया के इलाके से बहार हो, इतनी शान औ शौकत से रह रहे हो। तुम क्‍या चुराकर ले जाते थे जिसे हम कभी पकड़ नहीं पाये।
गधे, नसरूदीन ने कहा।

ओशो 

नसरूद्दीन और ज्ञानी


दरबार में नसरूद्दीन के खिलाफ मुकदमा चल रहा था। दार्शनिक, तर्कशास्‍त्री और कानून के विद्वानों को नसरूदीन की जांच करने के लिए बुलाया गया था। मामला संगीन था। क्‍योंकि नसरूदीन ने कबूल किया था कि वह गांव-गांव घूमकर कहता था कि तथा कथित ज्ञानी लोग अज्ञानी, अनिश्‍चय में जीन वाले और संभ्रमित होते है।

उस पर इल्‍जाम लगाया गया कि वह राज्‍य की सुरक्षा का सम्‍मान नहीं कर रहा है।

सम्राट ने कहा, ‘’तुम पहले बोलों।‘’

मुल्‍ला ने कहा, ‘’पहले कागज और कलम ले आओ।‘’

कागज और कलम मंगवाये गये।

‘’इनमें से सात लोगों को ये दे दो और उनसे कहो कि वे सब एक सवाल का जवाब लिखें, ‘’रोटी क्‍या है?’’
उन सबने अपने-अपने कागज पर लिखा। वे कागज सम्राट को दिये गये और उसने उन्‍हें पढ़कर सुनाया:

पहले ने लिखा—रोटी एक भोजन है।

दूसरे ने लिखा—वह आटा और पानी है।

तीसरे ने लिखा—खुदा की भेट है।

चौथे ने लिखा—सींका हुआ आटा है।

पांचवें ने लिखा—आप किस चीज को रोटी कहते है इस पर निर्भर है।

छठे ने लिखा—एक पोषक तत्‍व।

सांतवे ने लिखा—कोई नहीं जानता कि रोटी क्‍या है।

नसरूद्दीन ने कहा: ‘’जब वे सब मिलकर यह तय नहीं कर पाये कि रोटी क्‍या है तब बाकी चीजों के बारे में निर्णय ले सकेंगे। जैसे मैं सही हूं या गलत। क्‍या आप किसी की जांच परख या मूल्‍यांकन करने का काम ऐसे लोगों को सौंप सकते है। क्‍या अजीब नहीं है कि उस चीज के बारे में एक मत नहीं हो सकता जिसे वे रोज खाते है। और फिर भी मुझे काफिर सिद्ध करने में सभी राज़ी हो गए। उनकी राय का क्‍या मूल्‍य है?

ओशो

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