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Monday, August 3, 2015

मुल्‍ला नसरूद्दीन

कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।

ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।

मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे।
विद्वानों की कलम की बहुत सी स्‍याही नसरूद्दीन को कागज पर उतारने पर खर्च हुई है। जबकि नसरूदीन के पास उनके लिए कोई वक्‍त नहीं है। सूफी, जो कि विश्‍वास रखते है कि गहरी अंत: प्रज्ञा ज्ञान की पथप्रदर्शक है, इन कहानियों को ध्‍यान विधियों की तरह इस्‍तेमाल करते है। वे साधकों से कहते है कि इनमें कुछ मनपसंद कहानियों को चुनकर उन पर मनन करो और उन्‍हें जज़्ब करो। इस तरह उच्‍चतर प्रज्ञा में तुम्‍हारा प्रवेश होगा।
मुल्‍ला नसरूदीन को ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति मानने की गलती न करें तो ही इसके मिथक को समझा जा सकता है। मुल्‍ला की लोकप्रियता का राज रही है। कि वह हर इंसान के भीतर बसता है। वह मानवीय मन का ही एक साकार रूप है। मुल्‍ला के लतीफ़ों को समझने के लिए कोई बड़ी दार्शनिक विद्वता नहीं चाहिए। एक ही बात आवश्‍यक है—अपने आप पर हंसने की क्षमता।

मुल्‍ला: दरवेशों का मुखिया और परिपूर्ण सदगुरू था। कई लोग कहते है, मैंने सीखना चाहा लेकिन यहां मुझे सिर्फ पागलपन मिला। फिर भी गहरी समझ को कहीं और खोजेंगे तो पायेंगे।

संसद की छवि गर्व करने लायक नहीं है: –अटल बिहारी वाजपेयी



प्रधानमंत्री ने का कि जनमानस में सदन की जो तस्‍वीर उभर रही है। वह ऐसी नहीं है जिस पर सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते गर्व किया जा सके। वाजपेयी ने लोकसभा के मानसून सत्र के समापन संबोधन में (2001) यह बात कहीं।



ओशो-
‘’और क्‍योंकि मैंने अपने एक वक्‍तव्‍य में यह कहा कि भारतीय संसद करीब-करीब मंदबुद्धि है तो मुझे एक नोटिस थमा दिया गया, ‘’ आपने देश की महानतम संस्‍था का अपमान किया है……….




‘’मैंने उत्‍तर दिया: मैं संसद में आने को तैयार हूं, और पूरी ताकत से दोहराने के लिए तैयार हूं जो भी मैंने कहा है। और यह संसद का अपमान नहीं है। अगर आपको लगता है कि यह अपामान है तो मैं अपने थेरेपिस्‍ट, मनोचिकित्‍सक ले आता हूं, या फिर आप अपने थेरेपिस्‍ट और मनोचिकित्‍सक ले आइये और संसद के प्रत्‍येक सदस्‍य का निरीक्षण्‍ करते है कि वह मंद बुद्धि है या नहीं। बिना निरीक्षण किये आप नहीं कह सकते है कि मैंने अपमान किया है।‘’
ओशो
द मसाया


भगवान बुद्ध का भिक्षुओं को डाटना

एक दिन बहुत से भिक्षु बैठे बात कर रहे थे। पहली बात तो यह है कि भिक्षु बैठकर गपशप करें,यहीं भिक्षु के लिए योग्‍य नहीं। भिक्षु चुप बैठे, यही योग्‍य है। भिक्षु उतना ही बोले जीतना अनिवार्य हो। अपरिहार्य हो, भिक्षु होने के बाद बहुत बातें छोड़नी है, उनमें व्‍यर्थ की चर्चा भी छोड़नी है। नहीं तो फिर सांसारिक और संन्‍यासी में फर्क क्‍या रहा?

तो पहली तो बात बहुत से भिक्षु बैठे बातें कर रहे थे। भिक्षु जब बैठे, चुप बैठे,मौन बैठे , सन्‍नाटे में डूबे, शून्‍य में उतरें। भिक्षु का अर्थ ही है, समाधि की तलाश। गपशप से तो समाधि की तलाश नहीं होगी। तुम भी सोचना तुम भी संन्‍यासी हो, तुम बैठकर अगर व्‍यर्थ की बातें करते हो, तो विचारकरना, इन बातों से क्‍या होगा? और अगर ये बातें वैसी ही है जैसी होटलों में लोग कर रहे है बैठकर, अगर ये बातें वैसी ही है जैसी क्लब घरों में चल रही है। दुकानों पर चल रही है, बजार में चल रही है तो फिर तुममें और उनमें कोई फर्क नहीं है। तुम्‍हारी बात से तुम्‍हारा पता चलता है। बात ऐसे ही थोडे आ जाती है। बात तो फल है। नीम के वृक्ष में कड़वे फल लगते है, वह नीम की बात। आम में मीठे आम लगते है यह आम की बात। तुम कैसी बात करते हो, उसका थोड़ा विचार करना सोचना क्‍या बात करते हो? उस बात से पता चल जाएगा कि तुम्‍हारे भीतर जहर बह रहा है कि अमृत।
भिक्षु बात क्‍या कर रहे है। कि संसार में सुख, सबसे बड़ा सुख क्‍या है? अगर संसार में सुख ही था तो छोड़कर आये क्‍यों? जब संसार में दुःख ही दुःख रह जाए, तभी तो कोई संन्‍यस्‍त होता है। जब यह समझ में आ जाये कि यहां कुछ भी नहीं है। खाली पानी के बबूले है, आकाश में बने इंद्रधनुष है, आकाश कुसुम है यहां कुछ भी नहीं है। तभी तो कोई संन्‍यासी होता है। संन्‍यास का अर्थ ही है, संसार व्‍यर्थ हो गया है—जानकर, अनुभव से अपने ही साक्षात्‍कार से। ये भिक्षु ऐसे ही भाग कर चले आए होंगे। किसी की पत्‍नी मर गयी होगी। संन्‍यासी हो गया। किसी का दिवाला निकल गया तो संन्‍यासी हो गया। अब तुम देखना बहुत से लोग संन्‍यासी होंगे। फिर कुछ और बचता भी नहीं।

जो नहीं मिला, यह भी अहंकार मानने को तैयार नहीं होता। अहंकार कहने लगता है, अंगूर खट्टे है। छलांग लगाती है लोमड़ी बहुत,अंगूर के गुच्‍छे ऊपर है, नहीं पहुंच पाती। नहीं पहुंच पाती, यह भी स्‍वीकार करने का मन नहीं होता। तो ये बैठे होंगे भिक्षु, ये सब संन्‍यासी हो गए है, इनके कारण गलत रहे होंगे। यह संन्‍यास ठीक बुनियाद पर खड़ा हुआ संन्‍यास नहीं है। ये हारे थके लोग है। जीवन में संघर्ष में टिक नहीं पाएँ, संन्‍यासी हो गए है—कहकर कि संसार बेकार है, रख क्‍या है। लेकिन अब भी मन तो वहीं वही जाता है। बैठते होंगे जब एकता में तो चर्चा वहीं की उठती होगी। से चर्चा उठी है। तो भगवान बुद्ध चोंके होंगे। उन्‍होंने कहा, भिक्षुओं भिक्षु होकर भी यह सब तुम क्‍या कर रहे हो। यह तो चर्चा तुम जो कर रहे हो। भिक्षुओं जैसी नहीं। पहले तो चुप होना उचित था। अगर चर्चा ही करनी थी तो परमात्‍मा की चर्चा करनी चाहिए थी। और उनकी चर्चा का विषय क्‍या था। विषय था- संसार में सुख क्‍या है? यह भी बड़ा सूचक है। जब भिक्षु संसार के सुख की बातें कर रहा हो तो उसका मतलब है कि वह संसार से कच्‍चा चला आया, अभी मन वहीं भटक रहा है।

किसी ने कहां नहीं, राज-सुख के सामन दूसरा सुख नहीं। अब एक बात पक्‍की है कि इस आदमी ने राज्‍य सुख नहीं जाना है। जिसने जाना है, वह बुद्ध तो छोड़कर आ गए है, जिसने जाना है, वह महावीर तो त्‍याग कर आ गए है। इस आदमी ने राज्‍य सुख नहीं जाना है। इसने दूर से राजाओं की डोली उठते देखी है, राजाओं की शोभा यात्रा निकलते देखी है। जुलूस निकलते देखा है। राजमहल दूर से देखे है, सड़क से खड़े होकर, चमकते हुए कँगूरे राज महलों के स्‍वर्ण मंडित राजमहल इसने देखे है। मकर दूर से, राजमहल के भीतर क्‍या घटता है, इसका इसे कुछ पता नहीं है। इसकी वासना में राजमहल बसे है, यह भी चाहता था हो जाए, और अगर आज कोई इसको राजमहल देने को राज़ी हो तो ये संन्‍यास छोड़कर खड़ा हो जायेगा। कि मैं आया। यह एक बार भी लौटकर फिर संन्‍यास की तरफ नहीं देखेगा। अभागे आदमी है, बुद्ध पुरूषों के पास बैठकर भी राज्‍य सुख की बात कर रहे है। सोच रहे है कि राज में सुख होगा।

राज सुख के सामने दूसरा सुख नहीं है। और किसी ने कहा, काम सुख; अरे काम सुख के सामने राज सुख में क्‍या रखा है। असली सुख तो स्‍त्री में है। या असली सुख पुरूष में है। यह आदमी काम वंचित है। इसने कामवासना को दबा लिया है। इसने कामवासना का दंश नहीं जाना, पीड़ा नहीं जानी, इसने कामवासना का जहर नहीं जाना। यह ऐसे ही भाग आया है। स्‍त्री इसे मिली नहीं होगी। इसके मन में वासना अधूरी रह गयी है—जड़ें रह गयी है। पत्‍ते ऊपर-ऊपर काट डाले है। नए अंकुर निकल रहे है। और फिर किसी ने कहा,यश बड़ी चीज है। और फिर किसी ने कहा भोजन; और फिर किसी ने कहा; वस्‍त्र। यह सब साधारण लोग है। जो गलत कारणों से संसार छोड़कर आ गए है। इन्‍होंने संसार छोड़ा नहीं, ये संसार में अब भी है। इनके वस्‍त्र बदल गये है।
 
इसलिए मैं तुमसे संसार छोड़ने को कहता ही नहीं हूं। मैं कहता हूं, तुम वहीं रहो, वहीं जागे हुए जीओं। क्‍योंकि दुनिया में बहुत भगोड़े है। अगर उन्‍हें मौका मिल जाए भागने का, कोई बहाना मिल जाए भागने का, तो वे भाग खड़े होंगे। मैं तुम्‍हें को नहीं कहता, में कहता हूं वहीं रहो,अंगूर चख-चख कर व्‍यर्थ हो जाने दो, खट्टे हो जाने दो। अपने आप गिर जाने दो। ताकि तुम्‍हारे जीवन का स्‍वाद ही तुम्‍हें कह दे, अनुभव तुम्‍हें कह दे अनुभव तुम्‍हारी निष्‍पति बन जाए। फिर भागना कहां है। संसार अपने से गिर जाए।

ऐसे विवाद छिड़ गया। जहां वासना है, वहां विवाद है। जहां विचार है,वहां विवाद है। अगर संन्‍यास किसी ने ठीक-ठीक अर्थों में लिया हो तो विवाद समाप्‍त हो जाता है। क्‍या विवाद है। निर्विवाद एक बात दिखाई पड़ गई। कि संसार व्‍यर्थ हे। फिर ये सब संसार के ही नाम है—राजपद कहो, धन कहो, यश कहो,मान कहो—ये सब संसार के ही अलग-अलग पहलू है, विवाद कहां है? और तब बुद्ध भगवान अचानक आ गये। खड़े होकर पीछे उन्‍होंने भिक्षुओं की बातें सुनी। चोंके!  फिर कहा, भिक्षुओं, भिक्षु होकर भी यह सब तुम क्‍या कह रहे हो। यह सारा संसार दुख में है। इसमें तुम बता रहे हो। कोई कह रहा है राज्‍य-सुख कोई कहता है, काम सुख दुःख में है। इसमे तुम बता रहे हो, कोई कहा रहा भोजन-सुख। स्‍वाद सुख; यह सब तुम जो कह रहे हो क्‍या कह रहे हो? यह सुनकर मुझे आश्‍चर्य है। अगर इस सब में सुख है तो तुम यहां आ क्‍यों गये। सुख भी आभास है। बुद्ध ने कहा, दुःख सत्‍य है। ओर सुख नहीं है ऐसा नहीं। पर संसार में नहीं है। संसार का अर्थ ही है जहां सुख दिखायी पड़ता है। और है नहीं। जहां आभास होता है प्रतीति होती है। इशारे मिलते है कि है। लेकिन जैसे-जैसे पास जाओ,पता चलता है, नहीं है।

फिर सुख कहां है? बुद्ध ने कहा, बुद्धोत्‍पाद में सुख है। तुम्‍हारे भीतर बुद्ध का जन्‍म हो जाए, तो सुख है। तुम्‍हारे भीतर बुद्ध का अवतरण हो जाए तो सुख है। बुद्धोत्‍पाद, यह बड़ा अनूठा शब्‍द है। तुम्‍हारे भीतर बुद्ध उत्‍पन्‍न हो जाएं। तो सुख है। तुम जाब जाओ तो सुख है। सोने में दुःख है, मूर्च्‍छा में दुःख है। जागने में सूख है। धर्म श्रवण सुख है। तो सबसे परम सुख तो है, बुद्धोत्‍पाद; कि तुम्‍हारे भीतर बुद्धत्‍व पैदा हो जाए। अगर अभी यह नहीं हुआ तो नंबर दो का सुख है—जिनका बुद्ध जाग गया उनका बात सुनने में सुख है। धर्म श्रवण में सुख है। तो सुनो उनकी जो जाग गए है। जिन्‍हें कुछ दिखायी पड़ा है। गुणों उनकी। लेकिन उसी सुख पर रूक मत जाना,सुन सुनकर अगर रूक गए तो एक तरह का सुख तो मिलेगा,लेकिन वह भी बहुत दूर जाने वाला नहीं है। इसलिए बुद्ध ने कहा समाधि में सुख है। बुद्धोत्‍पाद में सुख है, यह तो परम व्‍याख्‍या हुई सुख की। फिर यह भी तो हुआ नहीं है। तो उनके वचन सुनो,उनके पास उठो-बैठो जिनके भीतर यह क्रांति घटी है। जिनके भीतर यह सूरज निकला है। जिनका प्रभात हो क्या है। जहां सूर्योदय हुआ है, उनके पास रमो, इसमें सुख है। मगर इसमें ही रूक मत जाना। ध्‍यान रखना कि जो उनको हुआ है, वह तुम्‍हें भी करना है। उस करने के उपाय का नाम समाधि है। सुनो बुद्धों की और चेष्‍टा करो बुद्धों जैसे बनने की। उस चेष्‍टा का नाम समाधि है। उस चेष्‍टा का फल है, बुद्धोत्‍पाद। सुनो बुद्धों के वचन,फिर बुद्धों जैसे बनने की चेष्‍टा में लगना—ध्‍यान,समाधि,योग। और जिस दिन बन जाओ, उस दिन परम सुख।
तब भगवान ने ये सुत्र कहे थे:

सुखो बुद्धानं उप्‍पदो सुखा सद्धम्‍मदेसना।
सुखा संघस्‍स सामगी समग्‍गनं तपो सुखो।।
(बुद्धों का उत्‍पन्‍न होना सुख दायी, सद धर्म का उपदेश सुखदायी, संध में एकता सुखदायी…..।)
ओशो

Sunday, August 2, 2015

स्मृतिभ्रंश

तुमने कभी खयाल किया?.. तुम अगर रिश्वत ले लेते हो, तो मजबूरी, क्या करें, तनख्वाह से काम नहीं चलता। लेना तुम चाहते नहीं, लेकिन मजबूरी है, बाल-बच्चे हैं, घर-द्वार है, चलाना है। जानते हो, गलत है–मगर इतना भी तुम जानते हो कि अपराध तुमने नहीं किया, तुम क्या करो, समाज ने मजबूर कर दिया है। दूसरा जब रिश्वत लेता है तब अपराध है। तब तुम बस शोरगुल मचाते हो। वस्तुत : तुम्हारा शोरगुल उतना ही बड़ा होता है जितनी तुमने भी रिश्वत ली होती। अपनी भूल को छोटा करने के लिए तुम दूसरे की भूल को बड़ा-बड़ा करके दिखाते हो। तुम संसार में सबकी निंदा करते रहते हो। वही तुम भी करते हो, अन्यथा तुम भी नहीं कर रहे हो।
दूसरे का बेटा असफल हो जाता है, तुम समझते हो, बुद्धिहीन, तुम्हारा बेटा असफल हो जाता है तो शिक्षक की शरारत!

मेरे पास मां-बाप आ जाते हैं, वे कहते हैं, हमारा बेटा फेल कर दिया, जरूर कोई साजिश है। जो भी फेल होता है, वह कहता है साजिश है, लेकिन दूसरे जो फेल हुए हैं, उनकी बुद्धि ही नहीं तो क्या करेंगे! तुम क भी गौर करना, मोह तुम्हारी आंख से न्याय को छीन लेता है। काम, क्रोध, मोह, स्मृति भ्रंश। स्मृति  भ्रंश बड़ा महत्वपूर्ण शब्‍द है। बुद्ध ने जिसे सम्यक स्मृति कहा है, यह उसकी विपरीत अवस्‍था है-स्मृति भ्रंश उसकी विपरीत अवस्‍था है। जिसको गुरजिएफ ने सैल्फ- रिमेम्बरिंग कहा है, आत्म-स्मरण, स्मृति भ्रंश उसकी विपरीत अवस्‍था है। जिसे कृष्णमूर्ति अवेयरनेस कहते हैं, स्मृति भ्रंश उसकी विपरीत अवस्था है। जिसको नानक ने, कबीर ने सुरति कहा है, स्मृतिभ्रंश उसकी उलटी अवस्‍था है।

सुरति स्मृति का ही रूप है। सुरतियोग का अर्थ है : स्मृतियोग—ऐसे जीन कि होश रहे, प्रत्येक कृत्य होश हो, उठो तो जानते हुए, बैठो तो जानते हुए।

एक छोटा सा प्रयोग करो। आज जब तुम्हें फुर्सत मिले घंटेभर की, तो अपने कमरे में बैठ जाना द्वार बंद करके और एक क्षण को सारे शरीर को झकझोरकर हो होश को जगाने की कोशिश करना बस एक क्षण को तुम बिलकुल परिपूर्ण होश से भरे हो बैठे हो, आसपास आवाज चल रही है, सड़क पर लोग चल रहे हैं, हृदय धड़क रहा है, सांस ली जा रही है तुम सिर्फ होश मात्र हो -एक क्षण के लिए। सारी स्थिति के प्रति होश से भर जाना, फिर उसे भूल जाना, फिर अपने काम में लग जाना। फिर घंटे भर बाद दुबारा कमरे में जाकर, फिर द्वार बंद करके, फिर एक क्षण को अपने होश को जगाना-तब तुम्हें एक बात हैरान करेगी कि बीच का जो घंटा था, वह तुमने बेहोश में बिताया, तब तुम्हें अपनी बेहोशी का पता चलेगा कि तुम कितने बेहोशी हो। पहले एक क्षण को होश को जगाकर देखना, झकझोर देना अपने को, जैसे तूफान आए और झाड़-झकझोर जाए, ऐसे अपने को झकझोर डालना, हिला डालना। एक क्षण को अपनी सारी शक्‍ति को उठाकर देखना-क्या है, कौन है, कहां है! ज्यादा देर की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि एक क्षण से ज्यादा तुम न कर पाओगे। इसलिए एक क्षण काफी होगा। बस एक क्षण करके बाहर चले जाना, अपने काम में लग जाना दुकान है, बाजार है, घर है भूल जाना। जैसे तुम साधारण जीते हो, घंटेभर जी लेना। फिर घंटे भर बाद कमरे में जाकर फिर झकझोरकर अपने को देखना। तब तुम्हें तुलनात्मक रूप से पता चलेगा कि ये दो क्षण अगर होश के थे, तो बीच का घंटा क्या था! तब तुम तुलना कर पाओगे। मेरे कहने से तुम न समझोगे, क्योंकि हो होश को मैं समझा सकता हूं शब्‍दों में, लेकिन हो होश तो एक स्वाद है। मीठा, मीठा कहने से कुछ न होगा। वह तो तुम्हें मिठाई का पता है, इसलिए मैं मीठा कहता हूं तो तुम्हें अर्थ पता हो गया। मैं कहूं स्मृति, सुरति उससे कुछ न होगा, उसका तुम्हें पता ही नहीं है। तो तुम यह भी न समझ सकोगे कि स्मृतिभ्रंश क्या है। होश को जगाना क्षण भर को, फिर घंटे भर बेहोशी, फिर क्षण भर को होश को जगाकर देखना—तुम्हारे सामने तुलना आ जाएगी, तुम खारे और मीठे को पहचान लोगे। वह जो घंटा बीच में बीता, स्मृतिभ्रंश है। वह तुमने बेहोशी में बिताया—जैसे तुम थे ही नहीं, जैसे तुम चले एक यंत्र की भांति, जैसे तुम नशे में थे—और तब तुम्हें अपनी पूरी जिंदगी बेहोशी मालूम पड़ेगी।


मन बेहोशी है, स्मृतिभ्रंश है। और स्वभावत : इन सबका जोड़ सर्वनाश है।

ओशो 

हम वही सुन लेते हैं जो हम सुनना चाहते हैं

दो साधु एक रास्ते से गुजरते थे। एक साधु दूसरे से कुछ बोल रहा था। उसे दूसरे ने कहा कि यहां सुनाई भी नहीं पड़ेगा मुझे कुछ। यह बाजार इतना शोरगुल है! यह ज्ञान की बात यहां मत करो, एकांत में चलकर करेंगे।
वह साधु वहीं खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक रुपया निकाला और आहिस्ता से रास्ते पर गिरा दिया। खननखन की आवाज हुई, भीड़ इकट्ठी हो गई। पहले साधु ने पूछा कि मैं समझा नहीं, यह तुमने क्या किया। उसने रुपया उठाया, जेब में रखा और चल पड़ा। उसने कहा,’’ इतना भरा बाजार है, इतना शोरगुल मच रहा है, लेकिन रुपये की जरा सी खनन, न की आवाज–इतने लोग आ गए। ये रुपये के प्रेमी है। नरक में भी भयंकर उत्पात मचा हो और अगर रुपया गिर जाए तो ये सुन लेंगे’’ ।

हम वही सुन लेते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। उस साधु ने कहा,’’ अगर तुम परमात्मा के प्रेमी हो तो यहां भी, बाजार में भी परमात्मा के संबंध में मैं कुछ कहूंगा तो तुम सुन लोगे’’ । कोई दूसरा बाधा नहीं डाल रहा है। हम वही सुनते हैं जो हम सुनना चाहते हैं। हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं। हमें उसी से मिलन हो जाता है जिससे हम मिलना चाहते हैं। इस जीवन में व्यवस्था को ठीक से जो समझ लेता है वह फिर दूसरे को दोष नहीं देता।

ध्यान रखना : कामना तुम्हें कभी सत्य को न देखने देगी। सत्य को देखना हो तो कामना- रहित  चित्त चाहिए।
इस बगीचे में कोई चित्रकार आए तो कुछ और देखेगा। कोई लकड़हारा आ जाए तो कुछ और देखेगा। कोई फूलों को बेचनेवाला माली आ जाए तो कुछ और देखेगा। तीनों एक ही जगह आएंगे, लेकन तीनों के दर्शन अलग-अलग होंगे।

ओशो 

साधु क्या ड़रेगा असाधु से?

इस जगत में कुछ भी आकस्मिक नहीं है। इस जगत में जो कुछ भी है, व्यवस्थाबद्ध है। यह जगत एक परिपूर्ण व्यवस्था है। अगर तुम्हारा चोर से साथ है तो किन्हीं न किन्हीं रास्तों से तुमने चोर को बुलाया होगा। बीज बोए होंगे, तभी तो फसल काटोगे। चोर से साथ होने का एक ही अर्थ है कि तुम्हारे भीतर कहीं चोर है। समान समान से मिलना चाहता है। शराबी से दोस्ती हो गई है, क्योंकि तुम्हारे भीतर शराबी है। हत्यारे से नाता बन गया है, क्योंकि तुम्हारे भीतर हत्या करने की भावना और कामना छिपी है। हिंसा भीतर हो तो हिंसक से दोस्ती बन जाएगी। अहिंसा भीतर हो तो हिंसक से दोस्ती बन ही न पाएगी, तालमेल न बैठेगा–छोड़ना ही पड़ेगा, बनना ही मुश्किल हो जाएगा।
 
मैंने सुना है, महावीर के समय में एक बहुत बड़ा डाकू हुआ। वह महावीर से बहुत डरता था। वह बूढा हो गया था। उसने अपने बेटे शिक्षा दी कि देख, और सब करना, इस एक आदमी के आसपास मत जाना। यह खतरनाक है, यह अपने धंधे का बिलकुल दुश्मन है। इसके पास गए कि मिटे। तो अगर कभी भूल-चूक से भी तू गुजरता हो और महावीर बोलता हो, तो अपने कानों में अंगुलियां डाल लेना। इसी तरह बामुश्किल मैंने अपने को बचाया है। निश्वित ही इस डाकू से भीतर साधु छिपा रहा होगा, अन्यथा कौन महावीर से बचता है! इसको हर क्या है? यह जानता है कि महावीर ठीक हैं। लेकिन भूल-चूक हो गई। बेटा आखिर बेटा ही था; बाप तो बहुत कुशल पुराना डाकू था, वह बचाता रहा अपने को। बेटा एक दिन जा रहा था रास्ते से। द्यैकइ बाप ने मना किया था, इसलिए मन में आकर्षण भी हो गया कि एकाध शब्द सुन लेने में क्या हर्ज है। ऐसा थोड़ी कि कुछ एकाध शब्द सुन लोगे और सब बदल जाएगा।
तो महावीर बोलते थे, द्वार पर कहीं दूर खड़े होकर एक वाक्य सुना, लेकिन फिर बाप की याद आयी, अंगुलियां कान में डाल लीं। भाग खड़ा हुआ। पर एक वाक्य कान में पड़ गया। महावीर से किसी ने पूछा था कोई प्रश्र, और वे जवाब देते थे। पूछा था प्रेत-योनि के संबंध में, कि प्रेत होते हैं तो कैसे होते हैं, देव होते हैं तो कैसे होते हैं।
फिर वर्षों बीत गए, यह डाकू पकड़ा गया। सम्राट के घर डाका डाला था। सम्राट इसके बाप से परेशान था; बात मर गया, बेटे से परेशान था। और कभी कोई बात पकड़ी न जा सकी थी, उनके खिलाफ जुर्म हाथ में न था, रंगे हाथ वे कभी पकड़े न गए थे। सम्राट ने अपने मनोवैज्ञानिकों से सलाह ली कि इससे सारी बातें निकलवा लेनी हैं; जब हाथ में पड़ गया है तो छोड़ नहीं देना है। कैसे निकलवाए इससे सारी बातें? तो मनोवैज्ञानिकों ने एक उपाय सोचा। उन्होंने इसे खूब शराब पिलाई। शराब पिलाकर महल की जो सुंदरतम स्त्रियां थी, उनको इसके चारों तरफ नृत्य करने को कहा। यह आदमी बीच में बैठा है नशे में सरोबोर, वे स्त्रियां नाचने लगीं। ऐसा सुंदर महल इसने कभी देखा न था। वे स्त्रियां इसे अप्सराएं मालूम होने लगीं। नशा! इसे शक होने लगा कि मैं इस लोक में हूं कि परलोक मैं पहुंच गया हूं। इसने किसी को पूछा। तो मनोवैज्ञानिकों ने यही तो उपाय किया था। उन्होंने कहा कि तुम मर गए हो, स्वर्ग में आ गए हो। और अब तुम अपने जीवनभर में तुमने जो भी पाप किए हैं, उन सब का ब्यौरा दे दो, ताकि परमात्मा उन्हें माफ कर दे। उसकी कृपा अनंत है, भयभीत मत हो। तुम अपना एक-एक पाप बोल दो। जो पाप तुम छिपाओगे वही बच रहेगा, जो तुम बता दोगे उससे तुम्हारा छुटकारा हो जाएगा। तब जरा डाकू चौंका : ‘’ सब पाप बता दे!’’ तब उसे याद आया, उस दिन का महावीर का वचन कि देवलोक में देवता होते हैं तो उनकी छाया नहीं पड़ती। तो उसने गौर से देखा कि अगर यह देवलोक है…। स्त्रियों की छाया पड़ रही थी, वह सम्हल गया। उसे लगा कि यह सब धोखा है, नशे में हूं। उसने एक भी पाप के संबंध में कुछ भी न कहा। अपने पुण्य की बातें बताई जो उसने कभी भी न किए थे। उसने कहा,’’ पाप तो कभी किए ही नहीं, मैं करूं भी क्या? परमात्मा क्षमा कर सकता है, लेकिन मैंने किए नहीं। पुण्य ही पुण्य किए हैं’’। सम्राट को उसे छोड़ देना पड़ा। वह जाल काम न आया। वह जैसे ही वहां से छूटा, सीधा महावीर के पास पहुंचा, उनके पैरों में गिर गया, और कहने लगा,’’ तुम्हारे एक वचन ने मेरे प्राण बचाए। अब मैं तुम्हें पूरा-पूरा ही सुन लेना चाहता हूं। इतना ही सुना था, वह भी कुछ बड़ी काम की बात न थी, लेकिन काम पड़ गई। सत्संग काम आ गया। वह भी ऐसी चोरी- चोरी द्वार पर खड़े होकर, एक वाक्य सुना था कि देवताओं की छाया नहीं पड़ती। तब तो सोचा भी न था कि इसकी कोई सार्थकता हो सकेगी, लेकिन काम पड़ गया, मेरे प्राण बचे। तुमने मुझे बचाया। भयंकर नशे में मुझे डुबाया था और सारा इंतजाम किया था और मैं फंस ही गया था और मैं तैयार ही था बोलने को, ताकि क्षमा कर दिया जाऊं। अब तुम मुझे पूरा ही बचा लो। इस सम्राट से तुमने बचाया, अब तुम मुझे मृत्यु से भी बचा लो। इस मौत से तुमने मुझे बचाया, अब तुम मुझे सारी मौतों से बचा लो। अब मैं तुम्हारी शरण हूं। साधु का एक वचन भी सुन लिया जाए तो असाधु के जीवन में रूपांतरण शुरू हो जाता है—बीज पड़ गया। साधु क्या ड़रेगा असाधु से? ड़रे तो असाधु हरे।
 
मैं तुमसे नहीं कहता कि तुम बुरे लोगों का साथ छोड़ देना। मैं तो तुमसे यह कहूंगा कि तुम उन्हें बुरे देखोगे तो तुम बुरे रह जाओगे। तुम अगर उन्हें बुरे मानोगे तो तुम्हारी बुराई कभी मिट न सकेगी। तुम तो एक साथ छोड़ दो—भीतर के अपने मन को—और तत्क्षण तुम पाओगे : संसार में कोई बुरा न रहा। चोर में भी तब तुम्हें परमात्मा ही छिपा हुआ दिखाई पड़ेगा। हत्यारे में भी तब तुम्हें उसकी ही ज्योति झिलमिलाई दिखाई पड़ेगी। और तुमसे भयभीत होने लगेगा असाधु, क्योंकि तुम असाधुता की मौत सिद्ध होने लगोगे। तुम्हारी छाया जहां पड़ेगी, वहां से अंधकार हटेगा। निश्वित ही तुम्हारा असाधु से साथ छूट जाएगा। मैं छोड़ने को नहीं कहता हूं–छूट जाएगा। तुम्हें छोड़ना न पड़ेगा–असाधु भाग खड़ा होगा, या असाधु रूपांतरित हो जाएगा।

ओशो 

वर्तमान मन की मृत्यु है

वर्तमान मन की मृत्यु है। भविष्य और अतीत मन का जीवन है। न तो अतीत है–जा चुका, न भविष्य है–अभी आया भी नहीं। मन जीता ही,’’ नहीं’’ में है। मन का स्वभाव नकार है—अनस्तित्व, अभाव। मन नास्तिक है। इसलिए मन से कोई कभी आस्तिक नहीं हो पाता। मन के आस्तिक तुम्हें बहुत दिखाई पड़ेंगे–मंदिरों-मस्जिदों में बैठे हैं, पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन पूजा-पाठ वे कर नहीं रहे हैं, उनका मन कहीं और भी आगे गया है। कोई स्वर्ग को मांगता होगा, कोई पुण्य के फल मांगता होगा। कोई परलोक के सुख मांगता होगा, कोई इसी लोक के सुख मांगता होगा, लेकिन मन कहीं और जा चुका है।

मन न हो, तो पूजा। मौन पूजा होगी। मन न हो, तो पूजा होगी, तो प्रार्थना होगी, तो ध्यान होगा। जहां मन नहीं वहीं मंदिर शुरू होता है–मन की मौत पर।

ओशो 

जो नहीं हुआ शायद, हो जाए!

उमरखैयाम की बड़ी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं कि मैंने ज्ञानियों से पूछा कि आदमी अब तक थका नहीं, किस सहारे जीता है? आदमी अब तक विषाद को उपलब्ध नहीं हुआ, किस सहारे जीता है? ज्ञानि उत्तर न पाए। फकीरों से पूछा। फकीर भी उलझे हुए मालूम पड़े। तब कोई राह न देखकर, उमरखैयाम कहता है कि एक रात मैंने आकाश से पूछा कि तूने तो सभी को चलते देखा, सदियों-सदियों, युगों-युगों से, कितने लोग उठे, आशाओं और सपनों से भरे कितने लोग धूल में गिरे, तूने तो सबको देखा, सब के अरमान मिट्टी में मिलते देखे, तुझे तो पता चल गया होगा अब तक, आदमी किसके सहारे चलता है! अब तक थकता नहीं, रुकता नहीं!

तो आकाश ने कहा,’’ आशा के सहारे’’ ।

तुम्हारा असली आकाश आशा है–जो नहीं हुआ शायद, हो जाए! जो किसी को नहीं हुआ शायद तुम्हें हो जाए। जो कभी किसी को नहीं हुआ, शायद…।  भविष्य को किसने जाना है? सिकंदर हार जाते हैं, लेकिन तुम चले जाते हो, चलते चले जाते हो। दिन में भी तुम सपने देखते हो, रात में ही नहीं। राह पर चलते हो तब भी सपने देखते हो। दुकान पर बैठते हो, बाजार में उठते हो, बैठते हो तब भी सपने देखते हो। सपने तुम्हारे भीतर एक सतत कम है। और इन्ही सपनों के कारण वह नहीं दिखाई पड़ता, जो है। सपनों की धूल तुम्हारी आंख को दबाए है। सत्य को जानने के लिए कुछ भी नहीं करना है–सिर्फ असत्य से मुक्त हो जाना है। सत्य को जानने के लिए कुछ भी नहीं करना है–सिर्फ जो नहीं है, उसे देख लेना है कि नहीं है। द्वार साफ है। परदा उठा हुआ है। परदा कभी था ही नहीं।

 ओशो 

‘’बालक ध्रुव नारद के भक्त थे, नारद नारायण के भक्त थे’’

 इसका अर्थ हुआ कि भगवान तक सीधे पहुंचना कठिन होगा, सदगुरु चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि भगवन से सीधा- सीधा मिलना कठिन होगा, मध्यस्थ चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि कोई बीच में चाहिए जो तुम जैसा भी हो और भगवान जैसा भी हो, तो सेतु बन सकेगा। कोई ऐसा चाहिए जिसका एक हाथ तुम्हें पकड़े हो और एक हाथ जिसका परमात्मा पकड़े हो। एक हा थ तुम्हारे जैसा और एक हाथ परमात्मा जैसा! जो परमात्मा और मनुष्य के बीच में कहीं हो—संक्रमण हो, द्वार हो। परमात्मा बहुत बड़ा है। आदमी बहुत छोटा है। दोनों में तालमेल कैसे बैठे? कोई चाहिए जो परमात्मा जैसा बड़ा हो, आदमी जैसा छोटा भी हो।

गुरु इस दुनिया में सबसे बड़ा विरोधाभास है, सबसे बड़ा पैराडाक्स। अगर तुम गुरु को एक तरफ से देखो, अपनी तरफ से, तो तुम्हारे जैसा है। अगर तुम दूसरी तरफ से देखो तो परमात्मा जैसा है। इसलिए तो कोई भी अपने गुरु के लिए तर्क नहीं कर सकता, न प्रमाण जुटा सकता है। क्योंकि तुम्हारे तर्क और प्रमाण कुछ भी सिद्ध न कर सकेंगे उसके लिए, जिसको दूसरी तरफ से देखने की क्षमता न हो। वह कहेगा, हमारे जैसा ही तुम्हारा गुरु है, जैसी हमें भूख लगती है उसे लगती है, धूप आए तो हमें पसीना आता है, उसे आता है।
इन बातों से बचेन के लिए फिर कपोल- कल्पनाएं शुरू होती हैं। जैन कहते हैं, महावीर को पसीना नहीं आता। पागल हैं। बिलकुल पागलपन की बात है। जैन कहते हैं, महावीर को चोट करो तो खून नहीं निकलता, दूध निकलता है।

ये क्यों कहानियां गढ़ी गई हैं? ये भक्त यह कह रहे हैं कि हमारा भगवान आदमियों जैसा नहीं है। मगर तुम्हें यह सिद्ध करना पड़ रहा है कि पसीना नहीं आता, उससे साफ है कि पसीना आता होगा। तो काहे के लिए चिंता करते? दूसरे सिद्ध करते हैं कि पसीना आता है, खून ही निकलता है, दूध कहीं निकला है! भक्तों ने अपने गुरुओं को अलौकिक सिद्ध करने की बड़ी चेष्टाएं की हैं। उनकी चेष्टा को समझो सहानुभूतइ से तो सार्थक मालूम होती है। उनकी चेष्टा ही यही है, वे यह कह रहे हैं कि तुम हमारे गुरु को साधारण मनुष्य मत समझो। ठीक ही कह रहे हैं, लेकिन जिस भाषा में कह रहे हैं वह बिलकुल गलत है। और उनकी भाषा के कारण दूसरों के सामने महावीर का, या उनके गुरु का परमात्म- रूप तो प्रगट नहीं होता, उनका ऐतिहासिक रूप तक संदिग्ध हो जाता है।


गुरु बड़ी भारी विरोधाभासी अवस्था है, अगर बुद्धि से देखा तो आदमी जैसा, अगर हृदय से देखा तो परमात्मा जैसा। इसलिए श्रद्धा की आंख हो जो गुरु परमात्मा से जोड़ने का कारण हो जाता है।

ओशो 

कल संध्या दर्शन के समय दो विकल्प थे। मैंने चरणस्पर्श करने का निर्णय इसलिए लिया कि बहुत समय बाद क्षणभर को अपने प्रीतम को निकट से देखूंगा, लेकिन वह क्षण आया तो ऊपर आपकी ओर देखा ही न गया। और अब रोता हूं, रोता हूं। ऐसा क्यों हो जाता है आपके निकट?


देखने के लिए सिर उठाना जरूरी थोड़े ही है सिर झुकाकर भी देखा जाता है। असली देखना तो सिर झुकाकर ही देखना है। नाहक रोओ मत। और जिसने सिर झुकाकर देख लिया, फिर सिर उठाकर देखने का कोई सवाल ही नहीं। इसलिए न उठा होगा सिर। आंखों से थोड़े ही देखना होता है, अन्यथा देखना बड़ा आसान हो जाता। आखें तो सभी की खुली हैं, अंधा कौन है? आंखों से ही देखना होता तो सभी कुछ हो जाता। देखना कुछ आंखों से ज्यादा गहरी बात है, हृदय की है। और हृदय तभी देख पाता है जब झुकता है। फिर उठने की खबर किसको रह जाती है! नहीं, कुछ भूल हो गई है। तुम अपने रोने को नहीं समझ पा रहे हो। तुमने व्यर्थ का एक बौद्धिक उलझाव और समस्या खड़ी कर ली है। तुम्हारी व्याख्या में कहीं भूल हो गई हैं, अन्यथा तुम खुश  होते, अन्यथा तुम्हारा रोना आनंद का रोना हो जाता। फिर से देखना। यह घटना बहुत बार घटेगी, इसलिए समझ लेना जरूरी है। बहुत बार ऐसा होता है, जब हृदय से कुछ घटता है तो भी बुद्धि पीछे से आकर व्याख्या करती है। हृदय तो व्याख्या करता नहीं, अव्याख्य है, घटता है कुछ, भोगता है, लेकिन काट- पीटकर विश्लेषण नहीं करता। हृदय के पास विश्लेषण है ही नहीं। हृदय तो जोड़ना जानता है, तोड़ना नहीं। हृदय तो अनुभव कर लेता है, लेकिन फिर अनुभव के पीछे खड़े होकर उसका बौद्धिक विश्लेषण नहीं करना जानता। तो जैसे ही अनुभठ हो गया, बुद्धि झपट्टा मारती है, जैसे कहीं लाS पड़ी हो तो चीले झपट्टा मारती हैं, गिद्ध झपट्टा मारते हैं, हृदय ने जो अनुभव किया, जैसे ही अनुभव हो गया, अतीत में चला गया, अनुभव मर चुका, वैसे ही बुद्धि झपट्टा मारती है, बुद्धि की चील झपट्टा मारती है, पकड़कर मुर्दा चील की चीर- फाड़ करती हैं-पोस्टमार्टम! उसमें हिसाब लगाती है, क्या हुआ! और सब गड़बड़ हो जाता है। क्योंकि बुद्धि को तो अनुभव हुआ न था, जिसको अनुभव हुआ था उसने व्याख्या न की और जिसको अनुभव नहीं हुआ वह व्याख्या करता है।

ओशो 

जल्दी में मत पड़ना। जल्दी ही तनाव पैदा कर देती है।

मैंने सुना है, एक गांव में एक ग्रामीण किसान बैल को जोतकर अपने हल को चला रहा था। वह कोड़ा भी फटकारता जाता बैल पर और कभी कहता,’’ हीरा! जोर से’’ , कभी कहता,’’ मोती! जोर से’’ , कभी कहता,’’ चंदा! जोर से’’ , कभी कहता,’’ सरज। जोर से’’ । एक आदमी खड़ा देख रहा था। उसने कहा,’’ इस बैल के कितने नाम हैं?’’ उस किसान ने कहा,’’ नाम तो इसका एक ही है–हीरा।’’

“तो बाकी इतने नाम किसलिए लेते हो?’’
तो उसने कहा,’’ इसकी हिम्मत बढ़ाने को। इसकी आखें तो बंधी हैं, यह समझता है और भी बैल लगे हैं। यह हिम्मत से चला जाता है’’ ।

बस इतना ही मेरा काम है—”हीरा! जोर से, मोती! जोर से।’’ लगे, तुम अकेले नहीं हो। एक बार हिम्मत आ जाए तो तुम्हारी आंख की पट्टी खोल देंगे, कहेंगे,’’ तुम ही चल रहे थे’’ । तीसरी बात : जल्दी मत करा। धैर्य बड़ी से बड़ी शि क्षा है धर्म के मार्ग पर। क्योंकि जिसको हम खोजने चले हैं, वह इतना विराट है कि तुमने अगर जल्दी मांग की, तो तुम्हारी मांग के कारण ही न मिल पाएगा। मौसमी फूल हम बो देते हैं, दो- चार- छह सप्ताह में फूल आ जाते हैं। लेकिन अगर चिनार के वृक्ष लगाने हों, देवदार के वृक्ष लगाने हों, तो वर्षों लगते हैं। आकाश को छूनेवाले वृक्ष लगाने हों तो उनकी जड़ें भी पाताल तक पहुचनी चाहिए।

परमात्मा आखिरी मंजिल है, उसके पार फिर कुछ भी नहीं। इतनी विराट मंजिल को पाने चले हो, और इतने कृपण हो धैर्य के संबंध में, इतनी जल्दबाजी करते हो! तुमने देखा भक्तों को, घर- घर में मंदिर बनाकर बैठे हैं, जल्दी से घंटी बजा लेते हैं, फूल चढ़ा देते हैं। उनके हाथ- पैर देखो, इतनी जल्दी में हैं वे कि उनके ये कृत्य देखकर ही भगवान उनसे न मिलेगा! बुलाने में भी तो थोड़ा सलीका हो। उसे पुकारो, थोड़ा सोचो भी कि किसे पुकारा है! थोड़ा सौजन्य तो सीखो! इतना बड़ा निमंत्रण भेज रहे हो, जरा सोच- समझकर पाती लिखी!
लेकिन बड़ा अधैर्य है! तुम अगर अपने अधैर्य पर विचार करोगे तो तुम्हें अपना सारा कृत्य बचकाना मालूम पड़ेगा। कोई रोज गीता पढ़ लेता है, कोई पूजा कर लेता है, कोई फूल चढ़ा देता है, कोई मंदिर में सिर झुका आता है—लेकिन क्या कर रहे हो तुम? और फिर इससे तुम आशा बांधने लगते हो कि अभी तक मिला नहीं, अभी तक स्थायी आनंद नहीं मिला, अभी तक परमात्मा का कोई दर्शन नहीं हुआ! नहीं, यह भक्त का ढंग नहीं।

हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बेनियाजी तेरी आदत ही सही।

देर लगाना तेरी आदत हो, कोई हर्जा नहीं, हम भी सब्र की आदत डाल लेंगे, और क्या! अगर तू देर करता है, ठीक। जितनी देर तू कर सकता है, उससे ज्यादा देर धैर्य रखने की हम आदत डाल लेंगे।

जल्दी में मत पड़ना। जल्दी ही तनाव पैदा कर देती है। जल्दी के कारण ही मन बेचैनी पैदा हो जाती है। धीरज से चलो! अनंत- अनंत काल मौजूद है। मन में बेचैनी पैदा हो जाती है। धीरज से चलो! अनंत- अनंत काल मौजूद है। कहीं कोई जल्दी नहीं है। समय की अनंत धारा मौजूद है, न कोई छोर है न कोई ओर है, न कोई प्रारंभ है न कोई अंत है। इस शाश्वत में तुम व्यर्थ ही परेशान हुए जा रहे हो। तुम दौड़- धूप किसलिए कर रहे हो? तुम्हारी दौड़- धूप से कुछ जल्दी न हो जाएगा। जल्दी की जरूरत नहीं।

जरा वृक्षों को देखो, कैसे अलसाए हुए हैं! चादतारों को देखो, कैसे चुपचाप गतिमान हैं! कहीं पहुंचने की कोई जल्दी तुम्हें अस्तित्व में दिखाई पड़ती है? अस्तित्व ऐसा शांत है जैसे पहुंच ही हुआ हो, पहुंचने की जल्दी मालूम ही नहीं होती। ऐसा ही भक्त भी है, उसने अस्तित्व की भाषा समझ ली है। वह कोई जल्दी में नहीं है। वह कोई प्रार्थना इसलिए नहीं करता कि भगवान प्रार्थना करने से मिलेगा–प्रार्थना उसका आनंद है। वह पूजा इसलिए नहीं करता कि ठीक है, पूजा करने से मिलता है तो चलो पूजा किए लेते हैं। यह कोई साधन नहीं है पूजा, यह साध्य है। वह अहोभाव से भरा है, आनंद से भरा है, कैसे अपने आनंद को प्रगट करें, किस भाषा में परमात्मा से कहें कि तेरे अनंत आशीषों की वर्षा मेरे ऊपर है! तुतलाकर–पूजा की भाषा में, भजन की, कीर्तन की भाषा में कह देता है कि तेरी अनंत अनुकंपा मेरे ऊपर है! प्रार्थना से वह कुछ पाना नहीं चाहता।
और मजा यही है कि जिसने प्रार्थना से कुछ पाना न चाहा, उसे सब मिला। और जिसने प्रार्थना में भी पाने का जहर डाल दिया, उसकी प्रार्थना भी मर गई, और कुछ मिलने की तो बात ही न रही।

ओशो 

आपके सान्निध्य में ध्यान की गहराई का कुछ अनुभव होता है, लेकिन वह अवस्था स्थायी नहीं रहती। उसे स्थायी करने की दिशा में कृपया हमारा मार्गदर्शन करें!

आपके सान्निध्य में ध्यान की गहराई का कुछ अनुभव होता है…।’’ जो मेरे सान्निध्य में होता है, वह मेरे कारण नहीं होता, होता तो तुम्हारे ही कारण है। जो तुम्हारे भीतर नहीं हो सकता, वह किसी के भी सान्निध्य में नहीं हो सकता। हां, मेरे सान्निध्य में सुविधा मिल जाती होगी–स्वयं से थोड़ा छूटने की, स्वयं के बंधन थोड़े ढीले करने की। मेरे सान्निध्य में थोड़ा-सा तुम अपनी पुरानी आदतों को किनारे हटा देते होओगे, बस! होता तो तुम्हारे ही भीतर है।

इसलिए जो मेरे सान्निध्य में होता है, अब यह एक नया उपद्रव खड़ा मत कर लेना कि घर जाकर न होगा। मन तरकीबें खोजता है। मन कहता है,’’ वहां हो गया था, उनके कारण हो गया था’’ । पाप मुझे लगेगा ऐसे। तुम अगर नरक गए तो मैं जिम्मेदार होऊंगा। यहां तुम्हें जो थोड़ा-सी झलक मिल जाती है, उसमें मेरा कुछ हाथ नहीं है; सिर्फ तुम मेरी थोड़ी सुन लेते हो, इतनी ही तुम घर पर भी सुनना, बात हो जाएगी। इतना तुम थोड़ा-सा मुझे द्वार-दरवाजा देते हो, थोड़ा अपने को किनारे कर लेते हो, थोड़ा अपने को बीच से हटा लेते हो–कुछ होता है। घर पर भी इतना ही हटा लेना। यह तुम्हारे ही किए हो रहा है। छोटे बच्चे का कोई हाथ पकड़ लेता है और चला देता है–चलता तो बच्चा ही है भीतर। दूसरे के हाथ से थोड़ा सहारा मिल जाता है, हिम्मत बढ़ जाती है, अनुभठ आ जाता है। मगर ये हाथ जिंदगीभर पकड़ लेने को नहीं है। नहीं तो इससे घसिटना ही बेहतर था, कम-से-कम खुद तो घसिटते थे, अब यह एक और उपद्रव साथ लगा; एक दूसरे के हाथ, अब यह और मजबूरी हुई, और परतत्रता हुई। नहीं, ऐसे किसी पर निर्भर मत हो जाना। मेरा तो सारा आयोजन यहां यही है कि तुम परम मुक्त हो सको; उसमें तुझसे भी मुक्त होना सम्मिलित है। अगर मुझसे बंध जाओ तो तुम तो और लंगड़े हो जाओगे; तुम वैसे ही लंगड़ा रहे हो, तुम वैसे ही पंगु हो, यह तो और पक्षाघात हो जाएगा।

यहां थोड़ी-सी झलक लो, उसे झलक ही मानता; फिर उसे अपने एकांत में गहराना, ताकि तुम्हें यह भी अनुभव आ सके कि वह झलक तुम्हारे भीतर से ही आई थी। किसी के हाथ का सहारा मिला था–धन्यवाद! लेकिन इससे ज्यादा निर्भरता न हो। ऐसे ही है जैसे कि कोई बच्चे को तैराक पानी में डाल देता है, हाथ-पैर तड़फड़ाता है बच्चा–हाथ-पैर तडुफडाना ही तैरने की श्दुरुआत है। अकेला शायद उतर भी न पाता पानी में, डरता, घबड़ाता; पर कोई तैरनेवाला पास में खड़ा है, हिम्मत…हिम्मत साथ दे गई। जो हुआ है वह तो भीतर हो रहा है। दो-चार बार पानी में तैराक डालेगा, बच्चे के हाथ-पैर सुघड़ हो जाएंगे, फिर कोई जरूरत न रह जाएगी, फिर उसे खुद ही हिम्मत आ जाएगी। फिर तो वह दूर सागर भी पार कर ले सकता है।

ओशो 

ध्यान में बड़ा आनंद आ रहा है, लेकिन यह टिकेगा?’

आपके सान्निध्य में ध्यान की गहराई का कुछ अनुभव होता है, लेकिन वह अवस्था स्थायी नहीं रहती। उसे स्थायी करने की दिशा में कृपया हमारा मार्गदर्शन करें!
स्थायी करना ही क्यों चाहते हो? स्थायी की भाषा ही सांसारिक है। क्षणभर को रहती है, उतनी देर अहोभाव से नाचे, उतनी देर कृतज्ञता से नाचे। उस क्षण में यह नया उपद्रव क्यों भीतर ले आते हैं कि स्थायी करना है? जो मिला है उसकी भी पात्रता नहीं है! अहोभाग्य कि पात्र न था, क्षणभर को उसके दर्शन हुए। नाचे! गुनगुनाए! आनंदित हों! दूसरा क्षण इसी क्षण में निकलेगा, आएगा कहां से? कल आज से ही पैदा होगा। अगर आज गीत से भरा था, तो कल इन्हीं गीतों से जन्मेगा। अगर आज तुम्हारे पैर में थिरक थी और पूंघर बंधे थे, तो कल पर भी उनकी छाया पड़ेगी। स्वभावत: कल तुम्हारे थर की आवाज और सुदृढ़ हो जाएगी; बांसुरी और भी गहरी बजेगी; मस्ती और भी गहरी उतरेगी!

कल आएगा कहां से? इसलिए तुम कल की चिंता ही छोड़ दो। सभी की यही तकलीफ है, क्योंकि संसार का यह गणित है: जो न हो उसकी चिंता करो; जो मिल जाए उसकी चिंता करो कि कहीं खो न जाए! गरीब परेशान है कि धन मिल जाए; धनी परेशान है कि कहीं खो न जाए! दोनों परेशान हैं। परेशानी जैसे हमारी आदत है। जैसे हम कुछ भी करें, परेशानी से हम न बचेंगे, परेशानी तो हम घूम-फिरकर पैदा कर ही लेंगे।

रोज कोई-न-कोई मेरे पास आकर कहता है कि’’ ध्यान में बड़ा आनंद आ रहा है, लेकिन यह टिकेगा?’’ क्यों आनंद को खराब कर रहे हो? कल जब आएगा तब कल को देख लेंगे”। और आज अगर तुम आनंदित हो सकते हो, कल भी तुम ही तो रहोगे न? और आज अगर तुम आनंदित हो सकते हो, तो कल की ईंटें आज के ऊपर ही रखी जाएंगी, कल का भवन आज के ऊपर ही खड़ा होगा। तुम कृपा करके कल को भूलो!

कल, मन का उपद्रव है। कल तुम्हारा आज को खराब कर देगा। यह क्षण अगर शांति का त तुम डूबो डुबकी लो तुम रस-विभोर हो ओ तुम भूल ही ओ समय को। इसी से आने वाला क्षण उभरेगा–और भी गहरा, और भी ताजा, और भी मदहोश! और एक बार तुम्हें यह समझ में आ जाए तो भविष्य की चिंता छूट ही जाती है।
स्थायी करने का मोह भविष्य की चिंता है। क्षण काफी है। एक क्षण से ज्यादा किसको कब कितने क्षण मिलते हैं? एक बार एक ही क्षण तो मिलता है तुम्हें। अगर एक क्षण में तुम्हें आनंदित होने की कला आ गई, तो सारा जीवन आनंदित हो जाएगा। जिसको एक बूंद रंगने की कला आ गई, वह सारे सागर को रंग लेगा। एक-एक बूंद ही तो हाथ में पड़ती है, उसको रंगते जाना। दो बूंद इकट्ठी भी तो नहीं मिलतीं कि अड़चन आए कि हम तो केवल एक बूंद को ही रंगना जानते हैं, दो बूंदें एक साथ आ गईं तो हम क्या करेंगे!

ओशो 

अनंत धैर्य!

सब्र ही भक्ति की पात्रता है, अनंत धैर्य! तुम अगर एक क्षण को भी उसके अनंत धैर्य से भर जाओ, तो उसी क्षण उपलब्धि हो जाएगी। उपलब्धि में परमात्मा बाधा नहीं है, तुम्हारा धैर्य बाधा है। इसलिए विरह से भी आसक्ति हो जाती है। भक्त विरह के गीत गाता है। वह विरह के आसपास भी सजावट कर लेता है। वह अपने रोने को भी सम्हालकर रखता है। वह अपने रुदन को भी, अपनी आहों को भी प्रार्थना बना लेता है। वह अपने रुदन के, अपने आंसुओ के ईंटों से ही अपने मंदिर को बना लेता है। वह उससे भी राजी है। वह यह नहीं कहता कि देखो, मैं कितना रो रहा हूं। वह यह कहता है कि और रुलाओ मुझे। देखो, कितना हलका हो गया हूं रो-रोकर! कितना रूपांतरित हुआ हूं! तुम जल्दी मत करना। कोई जल्दी नहीं है। तुम मुझे पूरा बदलकर ही आना! वह आने की बात ही परमात्मा पर छोड़ देता है; अपने हृदय को खोल देता है, प्रतीक्षा करता है।

भक्ति प्रतीक्षा है, प्रयास नहीं। भक्ति समर्पण है, संकल्प नहीं। और भक्ति से बड़ी कोई कीमिया नहीं है; क्योंकि भक्ति का मूल आधार ही, सांसारिक मन का आत्मघात हो जाता है। सांसारिक मन कहता है, करने से कुछ होगा। भक्ति कहती है, करने से कुछ भी नहीं हुआ। सांसारिक मन कहता है: अहंकार! नये-नये नाम रखता है; कभी कहता है, संकल्प की शक्ति; कभी कहता है, हिम्मत, साहस, व्यक्तित्व, आत्मा–हजार नाम रखता है, लेकिन सबके भीतर तुम अहंकार को छिपा हुआ पाओगे, सबके भीतर’’ मैं” माजूद है,’’ मैं” की कम-ज्यादा मात्रा मौजूद है। और वही बाधा है।

भक्त कहता है,’’ मैं” नहीं, तू। जब मैं ही नहीं हूं तो क्या विरह और क्या मिलन?’’ मिलन हो गया! जहां’’ मैं” मिटा वही मिलन हो गया। और जिसे विरह में परमात्मा दिखाई पड़ गया, उसके मिलन की तो बात ही न पूछो! वह बात तो बात करने की न रही। उसके संबंध में कुछ भी न कहा जा सकेगा।

ओशो 

विरहासक्ति

भक्त का भाव यही है कि तू जो कराए, रुलाए, दूर रखे, हंसाए कि पास रखे, तृप्त करे कि अतृप्ति की आग जलाए, वर्षा बनकर आए कि प्यास बनकर उठे–तेरी मर्जी पर मेरा होना है! तो भक्त यह नहीं कहता कि मेरी मर्जी मान और प्रगट हो। वह कहता है, तेरा अप्रगट होना भी प्यारा है, हम इसे ही प्यार कर लेंगे। हम तेरी अनुपस्थिति में भी नाचेंगे और गुनगुनाएंगे! और जब तक तुम उसकी अनुपस्थिति को प्रेम न कर पाओगे, तब तक वह उपस्थित न हो सकेगा। यही भक्त की कसौटी है। इसलिए विरहासक्ति…।

विरह से भी आसक्ति हो जाती है। आंसुओ से भी प्रेम हो जाता है। तुमने भक्त को रोते देखा हो, वह दुख में नहीं रो रहा है। उसके आंसू खुशी के आंसू हैं। उसके आंसू फलों जैसे हैं, चांदत्तारों जैसे हैं। उसके आंसुओ में फिर से झांको। उसकी आंखों में कोई शिकायत नहीं है, अनुग्रह का भाव है : ‘’ तूने रुलाया, यह भी क्य कुछ कम है! क्योंकि बहुत आखें हैं, बिना रोये ही रह जाती हैं। बहुत आखें हैं जिन्हें आंसुओ का सौभाग्य ही नहीं मिलता। तूने दूर रखा, तडुफाया, इसी तडुफ से तो भक्ति का जन्म हुआ। इसी से तो तेरे पास आने की महत आकांक्षा जगी, अभीप्सा पैदा हुई। तो दूर रखने में भी तेरा कोई राज होगा। तेरी मर्जी पूरी हो’’ ! जीवन को देखने के दो ढंग हैं। एक धार्मिक व्यक्ति का ढंग है, वह कांटों में भी फूल खोज लेता है। और एक अधार्मिक व्यक्ति का ढंग है, वह फूलों में भी कांटे खोज लेता है। देखने पर सब कुछ निर्भर है।

ओशो

जीवन का विरोधाभास

संभावना है अनंत तुम्हारी। अपनी संभावना को सत्य बनाया जा सकता है। संकल्प करो! इस अभीप्सा को उठने दो! इस अभीप्सा पर सब निछावर करो, तो देर नहीं लगेगी। और एक बार स्वाद आ जाए उस मलयगिरि की सुगंध का, उस पवन का, तब तुम हैरान होओगे कि कैसे इतने दिन उलझे रहे! कैसे इतने दिन छोटे  छोटे खेल  खिलौनों में पड़े रहे! कैसे पत्थर इकट्ठे करते रहे! तुम्हें हैरानी होगी  अपने पर हैरानी होगी, अपने अतीत पर हैरानी होगी। और तुम्हें चारों तरफ लोगों को देख कर हैरानी होगी कि लोग क्यों उलझे हैं! ज्ञानियों को यही सबसे बड़ी हैरानी रही है। खुद अपना अतीत बेबूझ हो गया कि हम इतने दिन तक कैसे चूके! और फिर चारों तरफ लोगों को चूकते देखते हैं, उन्हें भरोसा ही नहीं आता! समझ में नहीं पड़ता कि लोग कैसे चूके जा रहे हैं! जिसको खोजते हैं, उसी को चूक रहे हैं  और अपने ही कारण चूक रहे हैं!

कौन है ऐसा इस जगत् में, जो आनंद नहीं चाहता। और कौन है ऐसा इस जगत् में जो आनंद उपल्‍बध कर पाता है। बड़ी मुश्किल से कभी एक  आध   करोड़ में। क्या हो जाता है। आनन्द सब चाहते हैं, मगर जो करते हैं वह आनंद के विपरीत है। पश्‍चिम जाना चाहते हैं और पूरब जाते हैं। दिन को लाना चाहते हैं और रात को बनाते हैं।
ऐसा कौन है इस जगत् में जो अमृत नहीं पाना चाहता हैं अमृत बनाना चाहते हैं। और जहर ढालते हैं, जहर निचोड़ते हैं। कौन है इस जगत् में जो शाश्वत शांति में डूब नहीं जाना चाहता। मगर सारी चेष्टा अशांति और अशांति को पैदा करती है।

जरा अपने जीवन के विरोधाभास को देखो : तुम जो चाहते हो वही कर रहे हो। तुम जो चाहते हो उससे विपरीत कर रहे हो। यह विपरीत ही माया है। जिस दिन तुम जो चाहते हो वही करने लगो, उसी दिन जीवन में धर्म का प्रवेश हुआ। तुम संन्यस्त हुए। तुम दीक्षित हुए।

ओशो 

धनी पहूंचो आय!

खेत बिरानो देखि मृगा एक बन को रीझेव।
नित प्रति चुनि चुनि खाय बान में इक दिन बीधेव।।
उचकन चाहै बल करै मन ही मन पछिताय।
अब सो उचकि न पाइहौं धनी पहूंचो आय।।

जैसे हिरन रोज रोज आकर किसी जंगल में फल खा जाता है, कि किसी खेत में। फिर एक दिन बिंध गया। अब बहुत उचकना चाहता है, बल करना चाहता है कि निकल जाए, अब बहुत पछताता है कि मैं कहां फंस गया! छोटे से लोभ में अपनी स्वतंत्रता खोयी, अपना जीवन खोया! अब सो उचकि न पाइहौं, धनी पहूंचो आय। लेकिन अब खेत का मालिक आ गया है, अब भाग न पाऊंगा।

मौत ऐसे ही आती है खेत के मालिक की तरह। इस पृथ्वी पर मौत मालिक है यह उसी का खेत है। इसमें दो चार दिन तुम मजा ले सकते हो।
 
माया रंग कुसुम्म महा देखन को नीको।
मीठो दिन दुई चार अंत लागत है फीको।।

अखीर में तो मौत का ही स्वाद जीभ पर रह जाता है, सब स्वाद खो जाते हैं, सब विनष्ट हो जाता है। अंत में तो मौत ही मुंह में रह जाती है। यह पृथ्वी तो मृत्यु का खेत है। वही धनी है यहां। इसलिए कोई लाख उपाय करे, उससे बच नहीं पाता।

जाग जाओ इसके पहले कि धनी आ जाए। जाग जाओ उस बड़े धनी के प्रति, जो जीवन का धनी है, जो शाश्वत है, जो सनातन है, जो नित्य है। और उससे ही हम आए हैं और उसमें ही हमें वापस जाना है। मूलस्रोत ही गंतव्य है।

ओशो 

बोझ लयो पाषान, मोहि हर लागै भारी

लोग मेरे पास आते हैं। वे कहते हैं कि अगर हम रोज एक घंटा ध्यान करते रहें तो सब ठीक हो जाएगा? मैं उनसे कहता हूं : सब गड़बड़ हो जाएगा। क्योंकि एक घंटा ध्यान, और तेईस घंटे क्या करोगे। तेईस घंटे ध्यान के विपरीत करोगे, जो भी करोगे। और एक घंटा ध्यान करोगे। सब गड़बड़ हो जाएगा। सब अस्त—व्यस्त हो जाएगा। यह तो ऐसे ही हुआ कि एक घंटे वृक्ष को उखाड़ लिया जमीन से, फिर तेईस घंटे गडाया। सब जड़ें टूट जाएंगी।

अगर ध्यान ही करना हो तो घंटों में नहीं किया जाता, अनुपात से नहीं किया जाता, तराजुओं पर तौल कर नहीं किया जाता , बिना तौले किया जाता है। घंटों से नहीं होता हिसाब। ध्यान का रस चौबीस घंटे पर फैलना चाहिए। दुकान पर बैठे तो भी ध्यान। बाजार में चले तो भी ध्यान। भोजन किया तो भी ध्यान। रात सोए तो भी ध्यान, उठे तो भी ध्यान। ध्यान तुम्हारी श्वास बन जानी चाहिए।

आदमी चाहता है ध्यान भी संभाल लूं और इस संसार में जो मिलता है वह भी संभाल लूं। पद भी मिल जाए, धन भी मिल जाए, प्रतिष्ठा भी मिल जाए, ध्यान भी मिल जाए कुछ मेरे हाथ से चूक न जाए। दोनों दुनियाओं को संभाल लूं। फिर अड़चन खड़ी होती है। बोझ लयो पाषान, मोहि हर लागै भारी। हर लगता है फिर, क्योंकि बोझ भारी है। ये पत्थरों को लेकर बैठे, तो तुम तो डूबोगे ही, नाव भी डूबेगी। तुम पार न हो पाओगे। ये पत्थर छोड़ने होंगे।

और पत्थर को पकड़े क्यों हो? निश्‍चित ही तुम्हें अब भी पत्थरों में हीरे दिखाई पड़ते हैं, इसलिए पकड़े हो। पत्थर को कोई पत्थर सोचकर थोड़े ही पकड़ता है; पत्थर जानकर थोड़े ही पकड़ता है! पत्थर को हीरा जानता है, तो पकड़ता है।

ओशो 

तन सरवर के पार

तुम उनके पास जाते हो जो तुम्हें सोने की विधियां देते हैं, जो तुम्हें नींद के उपाय बताते हैं। जो तुमसे कहते हैं कि अच्छे सपने कैसे देखो। हजारों किताबें लिखी जाती है इस संबंध में। डेल कारनेगी की बड़ी प्रसिद्ध किताबें हैं ” हाउ टू विन फ्रंड्स एंड इन्‍फ्लूएंस पीपल ”।’’ मित्रता कैसे बढ़े, लोग कैसे जीते जाएं।’’ अभी अपने को जीता नहीं है, लोगों को जीतने चले! मगर लोग पढ़ते हैं। कहते हैं बाइबिल के बाद सबसे ज्यादा दुनिया में जो किताब बिकी है, वह यही है  डेल कारनेगी की किताब। बाइबिल के बाद! मतलब साफ है कि बाइबिल से ज्यादा बिक गई, क्योंकि बाइबिल खरीदता कौन है, मुफ्त बांटी जाती है। लोग बांटते ही रहते हैं बाइबिल। फिर हर ईसाई को रखनी ही पड़ती है घर में। न तो कोई कभी पढ़ता है, न कोई कभी पन्ने उलटता है। कौन पढ़ता है।

एक छोटे बच्चे से उसके पादरी ने पूछा कि तुमने अपना पाठ पूरा किया। बाइबिल पढ़ कर आए हो। क्या है बाइबिल में।
उस बच्चे ने कहा : सब मुझे मालूम है कि बाइबिल में क्या है।
उस पादरी ने कहा : सब तुम्हें मालूम है! सब तो मुझे भी नहीं मालूम।
क्या तुम्हें मालूम है।

उसने कहा कि मेरे पिताजी की लाटरी की टिकट है उसमें। मेरे छोटे भाई के बालों का गुच्छा है उसमें। मेरी मां ने एक ताबीज भी रखा हुआ है उसमें किसी हिमालय के आए हुए महात्मा ने दिया है। मुझे सब चीजें पता हैं कि उसमें क्या  क्या है।

कौन बाइबिल को देखता है! कौन बाइबिल को पढ़ता है! कौन खरीदता है! इस तरह की किताबें बिकती हैं: ” जीवन में सफल कैसे हों। सम्मान कैसे पाएं। धन कैसे पाएं। नेपोलियन हिल की प्रसिद्ध किताब है : ” हाउ टू ग्रो रिच ”। लाखों प्रतियां बिकी हैं।

ये सारे के सारे लोग तुम्हें विधियां दे रहे हैं कि और गहरी नींद कैसे सोओ, और मजे से कैसे सोओ, सेज फूलों की कैसे बने, सपने मधुर कैसे आएं, सपने रंगीन और टेक्नीकलर कैसे हों। अब ब्लैक और व्हाईट सपने बहुत देख चुके, अब सपनों में थोड़ा रंग डालो! थोड़े सपनों की कुशलता और कला सीखो। ये लौरिया गाने वाले लोग हैं।

इसलिए धनी धरमदास कहते हैं : अब हम सांची कहत हैं। अब तुम्हें भला लगे या बुरा, हम सच बात ही कह देते हैं कि तुम चाहो तो इसी वक्त, इसी क्षणठ उडियो पंख पसार। पंख तुम्हारे पास हैं। कारागह किसी और की बनाई हुई नहीं है! तुम्हारी अपनी बनायी हुई है। कोई पहरेदार नहीं है। तुम्हीं कैदी हो, और तुम्हीं पहरेदार हो। तुम जब तक अपने को गुलाम रखना चाहते हो रहोगे। जब तक अंधे रहना चाहते हो, रहोगे। जिस दिन निर्णय करोगे कि अब नहीं अंधे रहना है, उसी क्षण क्रांति शुरू हो जाएगी। सिर्फ तुम्हारे निर्णय की देर है। सिर्फ तुम्हारे संकल्प के जगने की देर है। और किसी चीज की कमी नहीं है।

अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार।
छुटि जैहो या रुख ते, तन सरवर के पार।।

और अगर उड़ सको, पंख फैला सको, अगर उसके आकाश को स्वीकार कर सको, अगर उसमें लचपच हो सको, अगर उसके रंग में पूरे सौ प्रतिशत रंगने का साहस हो, तो छुटि जैहो या दुःख ते… तो सारे दुःखों से मुक्त हो जाओगे।… तन सरवर के पार। तन के पार, सीमाओं के पार, देह के पार, मिट्टी के पार, मृण्मय के पार-चिन्मय की उपलब्धि हो जाएगी!

ओशो 

चिंता महत्वाकांक्षा का हिस्सा है

मैंने एक और स्त्री के संबंध में सुना है कि जब आपरेशन की टेबिल पर उसे लिटाया गया तो उसने डाक्टर से कहा कि चीरा जरा लंबा मारना। अपेंडिक्स निकाली जा रही थी। उसने कहा : लेकिन चीरा लंबा क्यों मारना। लोग तो कहते हैं कि चीरा जरा छोटा मारना कि पीछे उसका दिखावा न रह जाए, भद्दा न लगे। उसने कहा कि नहीं, तुम तो जितना बड़ा मार सको उतना मारना। क्योंकि मेरे पति को भी चीरा लगा है, उससे बड़ा होना चाहिए। क्योंकि वह हमेशा अकड़ बताते हैं कि देखो, कितना बड़ा चीरा लगा है! यह अकड़ मुझसे नहीं सही जाती।

आदमी के अहंकार अजीब हैं!

एक महिला मेरे पास आती थी। उसके पति ने मुझे फोन किया कि आप इसकी बातों का भरोसा मत करना। यह बढ़ा  चढ़ा कर बातें करती है। इसको फूंसी हो जाए तो यह बताती है कैंसर हो गया। इसकी बातों का आप भरोसा मत करना। मैं इसके साथ तीस साल से रह रहा हूं। लोग बीमारियां बढ़ा  चढ़ा कर बताते हैं! फिर बीमारियां भी वे जिनकी प्रशंसा होती हो। लोगों को चिंता नहीं है कि जीवन के असली सवाल क्या हैं।

गुरजिएफ कहता था : पहले अपनी ठीक ठीक व्यवस्था पकड़ो। तुम्हारे जीवन की चिंता क्या है। असली सवाल क्या है। और अगर तुम न पकड़ पाओ, तो फिर मुझे कहना। बड़ा कठिन है पकड़ना कि हमारी बुनियादी भूल क्या है। तुम सोचते हो क्रोध। अकसर क्रोध बुनियादी भूल नहीं होती, क्योंकि क्रोध तो केवल छाया है अहंकार की।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, हम क्रोध से कैसे मुक्त हों। मैं उनसे पूछता हूं : यह तुम्हारी असली बीमारी है कि लक्षण। वे कहते हैं: यही हमारी बीमारी है। इसी से हम परेशान हैं। बहुत दु:ख होता है और बड़ी बेइज्जती भी होती है। और क्रोध आ जाता है तो लोग समझते हैं कि क्रोधी हैं। तो मैने कहा, तुम क्रोध से परेशान नहीं हो। एक तो क्रोध होता ही है अहंकार के कारण। फिर यह तुम जो पूछने मुझसे आए हो कि क्रोध न हो, यह भी अहंकार के लिए है  ताकि लोगों में प्रतिष्ठा रहे, कि यह आदमी बड़ा विनम्र, बड़ा शांत, अक्रोधी, साधु! जिस अहंकार के कारण क्रोध पैदा हो रहा है उसी अहंकार के कारण तुम मेरे पास क्रोध का इलाज खोजने आए हो। और बीमारी दोनों के पीछे एक है। तो बीमारी हल कैसे होगी।

एक सज्जन मेरे पास आए। वे कहने लगे : बहुत चिंता मन में होती है, नींद भी नहीं आती। किसी तरह मेरी चिंता से मुझे छुटकारा दिलवा दें। मैंने तो सुना है कि ध्यान से चिंताएं मिट जाती हैं। मैंने उनसे पूछा कि जहां तक मैं समझता हूं, चिंता असली बात नहीं हो सकती। चिंता कभी असली बात नहीं होती। चिंता किस बात की होती है, वह मुझे कहो। चिंता अपने  आप तो नहीं होती। कोई चिंता ऐसे आकाश से तो नहीं उतरती। किस बात की है।  उन्होंने कहा: अब आप से क्या छिपाना! पहले डिप्टी मिनिस्टर था, फिर मिनिस्टर हो गया। आज दस साल से मिनिस्टर हूं। चीफ मिनिस्टर… मेरे पीछे के लोग चीफ मिनिस्टर हो गए। और मैं चीफ मिनिस्टर होने के पीछे पड़ा हूं, वह हल नहीं हो रहा है। वही मेरी चिंता है। आप मुझे चिंता से छुड़ा दें। एक दफे मेरी चिंता छूट जाए, तो मैं इन सब को दिखा दूं करके। क्योंकि इसी चिंता की वजह से मैं बीमार भी रहता हूं, अस्वस्थ भी रहता हूं। और जितनी ताकत लगानी चाहिए प्रतिस्पर्धा में, उतनी नहीं लगा पाता। दूसरे जो मेरे पीछे आए, वे आगे निकलते जा रहे हैं। और मैं जेल भी गया, बयालीस में भी गया, और उसके पहले भी गया।
और डण्डे भी खाए और सब तरह का कष्ट सहा। और अभी तक चीफ मिनिस्टर नहीं हुआ। और पीछे से लफंगे आए हैं, जो न कभी जेल गए, न कभी डण्डे खाए, न कोई कष्ट झेला, वे चीफ मिनिस्टर हो गए हैं। तो मैं क्या करूं।

मैंने उनसे कहा कि देखो, तुम कहीं और जाओ। क्योंकि जो मैं कहूंगा वह तुम झेल न सकोगे। महत्वाकांक्षा न छोड़ोगे तो चिंता नहीं छूट सकती। चिंता महत्वाकांक्षा का हिस्सा है। और महत्वाकांक्षा भी बहुत गहरे में बुनियादी नहीं है, अहंकार ही बुनियादी है। अपने रोगों को जरा पकड़ना, खोजना। तुम बड़े हैरान हो जाओगे कि तुम्हारे रोग वे नहीं हैं जैसे दिखाई पड़ते हैं। रोग के पीछे रोग हैं। उनके पीछे और रोग हैं। और जब तक बुनियाद न पकड़ ली जाए, तब तक कोई रूपांतरण नहीं होता।

ओशो 

तुम संन्यस्त भी हो जाते हो, तो भी रंगते नहीं

मुझे बचपन की याद है। मेरे घर में भी वही होता था। कोई फटा पुराना कपड़ा होता, वे संभाल कर रख देते कि इसको रख दो, होली पर काम आएगा। मैं उनसे कहता : फिर होली में जाने की जरूरत क्या है? होली के लिए तो तुम अगर ताजे नए कपड़े बनाते हो तो ही मैं जानेवाला हूं, नहीं तो नहीं जानेवाला हूं। फिर गए किसलिए? उनका रंग खराब करवाने को? अपने कपड़े खराब हैं ही, उनका रंग और खराब करवाया। और कपड़े फेंक दिए, झंझट मिटी। तो मैं होली पर जब जाता था तो ताजे कपड़े ही लेकर जाता था। नहीं तो मैं कहता था कि मैं निकलूंगा ही नहीं घर से, क्योंकि इसका कोई सार ही नहीं है। उनको क्यों धोखा देना? वे बेचारे बड़ी तैयारी किए होंगे। रंग घोल कर रखे होंगे, पिचकारी सजाई होगी। और ये कपड़े तुमने धुलवा कर रख दिए हैं, कलफ चढ़वा कर रख दिए हैं। ये बड़े साफ सुथरे मालूम हो रहे हैं। मगर मुझे पता है। उनका पता नहीं है, यह ठीक है। मगर उनको भी पता होगा, क्योंकि वे भी ऐसे ही कपड़े पहने हुए हैं।

तुम संन्यस्त भी हो जाते हो, तो भी रंगते नहीं। तुम्हारी चालबाजिया जारी रहती हैं। तुम अपना गणित बिठाए रखते हो। अपना ही गणित बिठाना है, तो फिर मुझसे संबंध नहीं जुडा। अपना गणित नहीं जीता है, इसीलिए तो आदमी संबंध जोड़ता है कि अपने सोचने से नहीं हो सका, अब किसी के साथ संबंध जोड़ लें। अब किसी का हाथ पकड़ लें और अब चल पड़े अज्ञात की दिशा में। मगर सौ प्रतिशत होना चाहिए।… लचपच रह्यो समाय। यह सौ प्रतिशत का अर्थ है: लचपच रह्यो समाय। ऐसा नहीं, ऊपर ऊपर नहीं। रंग ही जाओ  बाहर - भीतर! शरीर भी रंगे और आत्मा भी रंग जाए। फिर यहां वहां जाने की जरूरत नहीं रह जाती, कोई कारण नहीं रह जाता। जो रंग गया वह रंग गया।

और अगर तुम यहां-वहां जाते रहे तो खयाल रखना : जिस मात्रा में तुमने मुझे धोखे दिए हैं, उसी मात्रा में तुम मुझे चूक जाओगे। फिर मुझसे मत कहना पीछे। क्योंकि जुम्मेवारी तुम्हारी है। तुम अगर मेरे साथ पूरे नहीं हो तो तुम मुझे अपने साथ कैसे पूरा पाओगे? मैं तुम्हारे साथ उतना ही हो सकता हूं जितना तुम मेरे साथ हो। और उतनी ही तुम्हारी उपलब्धि होगी।

संग साथ या तो सौ प्रतिशत हो तो बदलाहट लाता है, नहीं तो व्यर्थ चला जाता है। नाहक की मेहनत हो जाती है।

ओशो 

कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल।


माया तो बदलती ही रहती है, बदलने में ही जीती है। बदलना उसका सार सूत्र है, जीवन की आधारशिला है। और तुम लाख उपाय करो, बचा न सकोगे। तुम्हारा किसी से प्रेम हो गया। तुम कितना उपाय करते हो कि अब यह प्रेम बना ही रहे, मगर यह बना नहीं रह सकता। यहां कोई चीज बनी नहीं रह सकती। यहां सब बनता है मिटने को। यहां सब बसता है उजडने को। कितने हमने उपाय किए हैं कि पत्थरों के महल बनाएं जो कभी न गिरे; वे भी गिर जाते हैं; वे भी समाप्त हो जाते हैं; वे भी एक दिन धूल हो जाते हैं, रेत हो जाते हैं। हमारा यहां बनाया हुआ कुछ भी टिक नहीं सकता। टिकना यहां स्वभाव नहीं है।

कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल.. यह हो ही नहीं सकता; क्योंकि माया का स्वभाव ही एक नहीं है, अनेक है। उसके मूल में एक है ही नहीं, अनेकता है।

 अगर थिर को पाना हो, शाश्वत को पाना हो, तो एक को खोजना पड़ेगा, मूल को खोजना पड़ेगा। उस मूल में ही विश्राम है। जो कभी न बदले, उसी में मुक्ति है। क्योंकि फिर निश्‍चितता है, फिर सुरक्षा है। फिर घर आ गया।

ओशो 

माया यानी मन का विस्तार

ऐसा समझो कि तुम फिल्म देखते हो, प्रभावित होते हो, आंदोलित हो जाते हो, दु:खी सुखी हो जाते हो। मगर अगर एक ही चित्र तुम्हारे सामने बना रहे परदे पर, तो क्या तुम सुखी दुःखी होओगे। एक ही चित्र बना रहे, चित्र बदले न, तो तुम कितनी देर तक समझोगे कि यह चित्र सही है। ज्यादा देर नहीं समझ पाओगे कि चित्र सही है। थोड़ी देर में ही समझ जाओगे, ऊब जाओगे, कि अब बस उठूं, अब घर जाऊं। अब यह एक ही चित्र है, कुछ हो ही नहीं रहा है।

वह जो कुछ हो रहा है, वही तुम्हें उलझाए रखता है। वह जो परिवर्तन है वही तुम्हें उलझाए रखता है। अगर जगत  एक क्षण को भी ठहर जाए, तो तुम जगत् से मुक्त हो जाओ। जगत बदलता रहता है नए नृत्य, नए रंग, नए ढंग, नए परिधान हैं।

तुम देखते हो न, हर चीज की फैशन बदलती रहती है। वह जगत् का हिस्सा है। लोग कपड़े बदल लेते हैं, गहने बदल लेते हैं, मकान बदल लेते हैं, नौकरियां बदल लेते हैं, पत्नियां बदल लेते हैं, पति बदल लेते हैं, बदलाहट बदलाहट… मन कहता है बदलो। मन डरता है किसी चीज से अगर ज्यादा देर साथ रह गए, तो कहीं भ्रम न टूट जाए। तो मन कहता है, बदलते रहो। मन सतत बदलने के लिए प्रेरणा देता रहता है, क्योंकि मन जी ही सकता है बदलाहट में। और माया भी जी सकती है बदलाहट में।

माया यानी मन का विस्तार। मन, जिसको हम भीतर कहते हैं-वह। और माया, मन का ही बाहर जो विस्तार है-वह। मन भीतर की माया। माया बाहर का मन। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परिवर्तन में सारा खेल है।
इस देश ने एक अनूठा प्रयोग किया था। उस प्रयोग का शायद तुम्हें खयाल भी न रहा हो। सदियों तक हमने एक प्रयोग किया था। वह प्रयोग यह था कि जिंदगी को इस तरह रखा था कि उसमें ज्यादा बदलाहट न हो। इसलिए हमने एक स्त्री से विवाह किया, तो उस पर जोर दिया कि बस अब एक ही स्त्री के साथ रहना है। जीवनभर… एक पत्नी, एक पति। लोग एक तरह के कपड़े पहनते थे तो सदियां बीत जाती थीं उसी तरह के कपड़े पहनते थे लोग अपने गांव में रहते थे, तो अपने गांव में ही रहे आते थे।

लाओत्सु ने लिखा है कि मैं जब बच्चा था तो नदी के उस पार दूसरा गांव था। वहां के कुत्ते भौंकते थे तो हमें सुनाई पड़ते थे। और वहा सांझ को भोजन पकाया जाता था तो मकानों के ऊपर से उठता हुआ धुआं भी हमें दिखाई पड़ता था। लेकिन किसी की उत्सुकता नहीं थी कि जाकर देखें कि कौन वहां रहता है। हम अपने गांव में मस्त थे वे अपने गांव में मस्त थे। लोग एक गांव में पैदा होते, वहीं मर जाते थे, वहीं जीते थे। यह एक अनूठा प्रयोग था। इस प्रयोग के पीछे बुनियादी कारण क्या था। बुनियादी कारण यह था : अगर जगत् में कम से कम परिवर्तन हों तो तुम जल्दी ही जगत् से मुक्त होने की आकांक्षा से भर जाते हो। अगर एक ही पत्नी के साथ तुम्हें जिंदगीभर रहना पड़े तो तुम कितनी देर तक चूकोगे, यह बात समझने से—मीठो दिन दुई चार, अंत लागत है फीको! कैसे बचोगे। तुम चकित होओगे जान कर कि इसके पीछे एक आध्यात्मिक प्रक्रिया थी। अमरीका में बहुत मुश्किल है यह जानना। क्योंकि चार दिन में तो पत्नी बदल जाती है। दो  चार दिन के बाद ही लगेगा न फीका। लेकिन दो चार दिन फिका लगने के पहले ही पत्नी बदल ली। तो हनीमून चलता ही रहता है। एक हनीमून से दूसरा हनीमून, दूसरे से तीसरा हनीमून। बदलाहट इतनी तेजी से होती रहती है कि भ्रांति टूटती नहीं।

अमरीका में लोग औसत रूप से तीन साल से ज्यादा एक धंधे में नहीं रहते। एक ही धंधे में रहोगे, ऊब ही जाओगे। ऊब बिल्कुल स्वाभाविक है। और जब ऊब होती है तो पता चलना शुरू होता है कि सब फिका है, सब व्यर्थ है। लेकिन धंधा हर तीन साल में बदल लिया। तीन साल ही अमरीका में धंधे बदलने का औसत है और तीन साल ही मकान बदलने का औसत है और तीन ही पत्नी  पति बदलने का औसत है। तीन साल से कुछ संबंध दिखता है मन का। तीन साल के बाद दिखता है, ऊब सघन हो जाती है और सपना टूटने के करीब आ जाता है। इसके पहले कि सपना टूटे, बदल लो। नया सपना देखना शुरू करो।

वही फिल्म रोज  रोज देखोगे, कितने दिन तक रोओगे? यह मुझे कहो। पहले दिन रो लोगे, दूसरे दिन रो लोगे, तीसरे दिन रो लोगे  कब तक रोओगे, यह मुझे कहो। दो -चार दिन के बाद तुम कहोगे : बहुत हो गया। अब क्या रोना है। फिल्म है, कहानी है, ठीक है। वही उपन्यास पढ़ोगे, कितने दिन तक उत्सुकता रहेगी।

हमने जीवन के हर पहलू पर यह प्रयोग किया था। हमने सदियों तक एक ही फिल्म देखी  ” रामलीला ”। सदियां आईं और गईं  और वही राम, और वही सीता और वही रावण, और फिर वही कहानी, और फिर वही कहानी। और हर वर्ष लोग देखते ही रहे, देखते ही रहे, देखते ही रहे। इसके पीछे कुछ कारण था। हमने चाहा था कि चीजें थोड़ी थिर हो जाएं, ता थिरता से भ्रांति साफ हो जाए।

कभी  कभी फिल्म में इंजिन बिगड़ जाए या प्रोजेक्टर खराब हो जाए, और फिल्म रुक जाती है। उसी वक्त तुम्हारी भाव  दशा भी रुक जाएगी। इधर फिल्म रुकी, उधर भाव  दशा रुकी।

बदलाहट के साथ ही मन जी सकता है।

ओशो 

ब्राह्मण

तुमने खयाल किया, जब सफेद परदे पर कोई फिल्म चल रही हो… तूफान आया है, भारी तूफान आया है, फिल्म में। झाड़  झंखाड़ गिरे जा रहे हैं, पहाड़ काँप  रहे हैं, भूकंप आया है, नावें डूब रही हैं, जहाज पानी में नष्ट हुए जा रहे हैं, भवन गिर रहे हैं  तब भी तुम सोचते हो, परदा काँप  रहा होगा इस तूफान के कारण। परदा कैंप भी नहीं रहा है। यह सारा तूफान, यह इतने बड़े मकानों का गिरना, यह महलों का भूमिसात हो जाना, यह पहाड़ों का कंपना, ये बड़े  बड़े दरख्त, इनकी जड़ें उखड़ जानी, यह लोगों का मरना, यह जहाजों का डूबना  यह सब हो रहा है। लेकिन क्या तुम सोचते हो जिस परदे पर यह हो रहा है, वह परदा जरा भी कैप रहा है। उसमें कंपन भी हो रहा है। उसमें कोई कंपन भी नहीं है। उसे पता ही नहीं है इस तूफान का। यह तूफान सिर्फ तुम्हारी कल्पना में हो रहा है। परदे के लिए हुआ ही नहीं।

ऐसा ही एक परदा तुम्हारे भीतर है, जिसको ज्ञानियों ने साक्षी कहा है। सफेद है परदा। उस पर कुछ भी नहीं हुआ, न कभी वहां कुछ हो सकता है। वहां सदा से शांति है। वहां सदा से शून्‍य विराजमान है। उसको अनुभव कर लेना, सत्य को अनुभव करना है। उसको जानना, ब्रह्मा को जानना है। उसको जानते ही, व्यक्ति ब्राह्मण हो जाता है। सपनों में खोए रहना  शुद्र। सत्य के प्रति जाग जाना ब्राह्मण। जो सपने में खोए हैं, वे सब शुद्र हैं। वे ब्राह्मण घर में पैदा हुए हों, इससे फर्क नहीं पड़ता। और जो जाग गए हैं, वे चाहे शुद्र  घर में पैदा हुए हैं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, ब्राह्मण हैं।

ओशो 

मीठो दिन दुई चार, अंत लागत है फीको।


जो अंत में फीका लगता था, वह प्रथम से ही फीका था। अंत में प्रकट हो रहा है वही, जो प्रथम से था। लेकिन प्रथम से तुमने कुछ और मान रखा था। फीका जो लग रहा है अंत में, वह फीका ही था। मिठास तुम्हारी मान्यता थी। तुमने डाल दी थी मिठास। तुमने कल्पना कर ली थी। और स्वभावत : तुम्हारी कल्पना यथार्थ को पराजित नहीं कर सकती। आज नहीं कल, यथार्थ से हारेगी। आज नहीं कल, यथार्थ की टक्कर को टूटना ही पड़ेगा। तुम कितना ही अपनी कल्पना को बल दो और कितनी ही ऊर्जा उसमें डालों, कल्पना टूटेगी ही, टूटेगी ही टूटेगी। कल्पना कल्पना है, कितनी देर तक झुठलाओगे?

और जब टूटती है कल्पना तो विषाद घेर लेता है। उसी विषाद से दो संभावनाएं निकलती हैं। एक संभावना तो यह है कि तुम जल्दी ही, जब तुम्हारा एक कल्पना का जाल टूटने लगे, एक आशा निरस्त हो, एक सपना गिरे, तुम जल्दी से दूसरा सपना बना लेना। वही आम आदमी करता है। सच तो यह है, एक गिर भी नहीं पाता और वह नया बनाने लगता है। ताकि गिरने के पहले ही नया बन जाए। पुराना मकान गिरे, इसके पहले नया बना लेता है। कहीं ऐसा न हो कि छप्पर के बिना छूट जाऊं। इधर एक सपना तिरोहित होने लगता है, उधर वह प्राण अपने दूसरे सपने में डालने लगता है। जब तक एक गिरता है, दूसरा निर्मित हो जाता है। इसलिए तो एक वासना समाप्त नहीं होती कि तुम दूसरी वासना की जकड़ में आ जाते हो। ऐसे वासना से वासना, सपने से सपना, आदमी बदलता चलता है। और इसी बहाने आदमी जीता है। यह जीना बिल्कुल झूठा है। क्योंकि तुम कितने ही सपने बदलो, सब सपने टूट जाएंगे, अंत में फीके हो जाएंगे।

एक और जीवन का ढंग है, जो कभी  कभी सौभाग्यशालियों को उपलब्ध होता है। बार  बार सपनों को टूट कर आदमी यह निर्णय करता है कि अब और नहीं, अब बस काफी है।… का सोवै दिन —रैन! बहुत सो लिए और बहुत सपना देख लिए, अब जागने की घड़ी आ गई, अब जागेंगे! अब और सपना नहीं बनाएंगे! और सपना न बनाना ही धर्म है। नई वासना निर्मित न करना ही धर्म है। यही धर्म में दीक्षा है अब बिना सपने के जिएंगे।
कठिन है बिना सपने के जीना। बहुत कठिन है। वही कीमत है, जो सत्य को पाने के लिए चुकानी पड़ती है। अब बिना आशा के जिएंगे। अब बिना भविष्य के जिएंगे। अब कल की बात ही नहीं सोचेंगे आज ही जिएंगे, अभी जिएंगे। अब जो परमात्मा करवाएगा वह करेंगे और जो परमात्मा दिखाएगा वह देखेंगे। हम अपनी कोई मंन्‍शा न रखेंगे। हम भीतर कोई छिपी आकांक्षा न रखेंगे कि ऐसा हो। जैसा होगा, जैसा है, उसको ही जानेंगे, उसको ही जिएंगे। हम अपनी तरफ से कोई प्रक्षेपण न करेंगे। हम फिल्म को हटा लेंगे। अब हम सूने परदे को देखेंगे, सफेद परदे को देखेंगे। सफेद परदा है, उस परदे पर चलती हुई रंगीन छायाएं नहीं हैं।

उस सफेद परदे के अनुभव का नाम समाधि है।

ओशो 

माया रंग कुसुम्म, महा देखन को नीको!

इस जगत् में तुमने जो भी पाया है, जो भी मिला है या जिसको भी मिलने की तुमने आस बना रखी है  सब फूल के कच्चे रंग जैसा है। देखने में सुंदर लगता है, दूर से सुहावना मालूम पड़ता है। दूर के ढोल सुहावने हैं। जैसे जैसे पास आओगे, वैसे  वैसे ही सब व्यर्थ हो जाता है। धन चाहा था, धन मिल गया और पाते ही पाया कि व्यर्थ हो गया। पद चाहा था, पद मिल गया। प्रेम चाहा था, प्रेम मिल गया। घर बसाना था, घर बसा लिया। मिला क्या। सार निचोड़ क्या है?  हाथ में क्या लगा?  हाथ खाली के खाली हैं। एक धोखे से दूसरा धोखा, दूसरे धोखे से तीसरा धोखा। धोखे बदलते रहे हो, लेकिन हाथ खाली के खाली हैं। जो सफल हैं उनके हाथ भी खाली हैं। और ऐसा मत सोचना कि तुम असफल हो, इसलिए हाथ खाली हैं। सिकंदरों के हाथ भी खाली हैं।

माया रंग कुसुम्म, महा देखन को नीको!

 देखने में बड़ा प्यारा लगता है इंद्रधनुष जैसा! कितना प्यारा, सतरंगा! आकाश में जैसे सेतु बना हो! लेकिन पास जाओ, मुट्ठी बांधो, तो कुछ भी हाथ न लगेगा। कोई रंग हाथ न लगेगा। कुछ भी हाथ न लगेगा। हाथ खाली का खाली रह जाएगा। इंद्रधनुष सिर्फ दिखाई पड़ता है, है नहीं। देखने में ही है जैसे रात के सपने हैं, देखने में ही हैं। देखने के बाहर उनकी कोई और सच्चाई नहीं है। जिसकी सच्चाई सिर्फ देखने में ही है, उसे माया समझना। और जिसकी सच्चाई तुम्हारे देखने के पार है। तुम चाहे देखो और चाहे न देखो, जो है। तुम चाहे मानो और चाहे न मानो, जो है। तुम जानो चाहे न जानो, जो है जिसकी सच्चाई, जिसका यथार्थ, तुम्हारे जानने पर निर्भर नहीं है, वही सत्य है।

ओशो 

सत्य मुफ्त मिल जाए!

अर्थशास्त्र का एक सीधा—सा नियम है कि जिस बात की मांग होगी उसकी द्यतइr होगी। मांगो भर, कोई न कोई उसे उत्पादन करने के लिए तत्पर हो जाएगा। हर तरह की चीज के उत्पादन हो जाते हैं। बाजार में मांग होनी चाहिए, फिर उत्पादक मिल जाता है।

मनुष्य की सबसे बड़ी मांग यह है कि हमें कुछ करना न पड़े, परमात्मा मुफ्त हो। मोक्ष बस कुछ न किए मिल जाए। इंच भर सरकना न पड़े। एक कदम उठाना न पड़े जीवन के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलना न पड़े, और सत्य मिल जाए। सत्य मुफ्त मिल जाए। जब तुम कहते हो, सत्य मुफ्त मिल जाए, तो सत्य मुफ्त देनेवाले लोग तुम्हें मिल जाते हैं। पंडित और पुजारी तुम्हें धोखा दे पाए हैं तुम्हारे ही कारण। नहीं तो कौन तुम्हें धोखा दे पाएगा। तुम आंख बंद किए प्रकाश देखना चाहते हो, दिखानेवाले मिल जाते हैं। फिर तुम जो देखते हो वह सिर्फ सपना है। वह सिर्फ तुम्हारी कल्पना है। तुमने जो परमात्मा देखा है, तुमने जो आत्मा देखी है बस कल्पना का जाल है। यथार्थ को देखने के लिए तो सारे अंधविश्वासों की परिधिया तोडनी पड़ेगी, सारे विश्वास छोड़ देने पड़ेंगे। और अथक श्रम करना होगा, ताकि तुम्हारे भीतर पड़ी हुई चेतना सजग हो। का सोवै दिन—रैन, विरहिनी जाग रे, खूब सो लिए बहुत सो लिए। जागने में श्रम तो होगा ही। क्योंकि नींद की आदतें पुरानी हैं, लंबी हैं, अति प्राचीन हैं।

नींद ही तुम्हारा अतीत है जन्मों जन्मों का अतीत। तो नींद बड़ी वजनी है, और जागरण की किरण तो बड़ी छोटी होगी। नींद तो तूफान की तरह है, और जागरण तो छोटे से दीए की तरह होगा। अगर तुमने सहारा नहीं दिया जागरण को, तो दीया बुझ जाएगा, कभी भी बुझ जाएगा, जल भी न पाएगा। और आदमी का अहंकार ऐसा है कि यह मानने का मन नहीं होता कि मेरा दीया जला नहीं है। इसलिए तुम्हें धोखा देनेवाले लोग मिल जाते हैं, जो तुमसे कहते हैं.: तुम्हारा दीया जला ही हुआ है। तुम्हें कुछ करना नहीं है। तुम्हें कहीं जाना नहीं है। तुम्हें कुछ होना नहीं है। तुम तो बस इस जीवन दृष्टि को पकड़ लो, इस शास्त्र को पकड़ लो, इस सिद्धांत को पकड़ लो शेष सब हो जाएगा।

तुम करना नहीं चाहते, इसलिए तुम बदले नहीं। कल भी तुम बंधे थे, आज भी तुम बंधे हो, कल भी तुम बंधे होओगे। सत्य की कीमत चुकानी ही पड़ती है। इस जगत् में कुछ भी मुफ्त नहीं है।
ओशो

Saturday, August 1, 2015

तुलना में दुख है, तुलना में ईर्ष्या है, तुलना में हिंसा है।



छोड़े तुलना! किसी से मत तौलें अपने को। कोई अर्थ भी नहीं है, कोई उपाय भी नहीं है। राजी हो जाएं, जैसे हैं। और एक ही बात की फिक्र लें कि जो मैं हूं जैसा हूं वह पूरा का पूरा मेरे सामने कैसे प्रकट हो जाए। यहां हम इसी बात की खोज करेंगे। न तो मैं आपको बनाना चाहता हूं बुद्ध, न राम, न कृष्ण। कोई जरूरत नहीं है, वे हो चुके। मैं आपको बनाना चाहता हूं वही, जो आप हो सकते हैं। जो बीज आपमें है, वही अंकुरित हो। दूसरे से भी आपको आगे पीछे नहीं रखना चाहता। कोई किसी से आगे पीछे नहीं है। हर एक आदमी अपनी जगह है। आप अपनी ही जगह पर खिल सकें, जो भी सुगंध छिपाई है आपने अपने हृदय में, वह बाहर आ सके। मैं आपको आप ही बनाना चाहता हूं।

कल सुबह हम ध्यान करेंगे। दस—दस मिनिट के चार चरण होंगे। पहले चरण में श्वास—जितनी तीव्र हो सके, लोहार की धौंकनी की भांति, श्वास ही श्वास रह जाए।  दूसरे दस मिनिट के चरण में भावों का रेचन। जो भी भीतर दबा पड़ा है—रुदन, आंसू चीख, चिल्लाहट, क्रोध, हिंसा—सबको बाहर फेंक देना। और विचार ही नहीं करना, शरीर के द्वारा बाहर फेंक देना। शरीर जो करना चाहे, उस क्षण में उसे करने देना, ताकि सब भार गिर जाए।  तीसरे चरण में ‘हूं मंत्र का प्रयोग—इतने जोर से कि आकाश गूंजने लगे। बाहर फेंकना है, ‘हूं’ की चोट और हुंकार। इस हुंकार का परिणाम होता है कुंडलिनी पर हथौड़े की तरह। भीतर कुंडलिनी पर चोट पड़ती है, और कुंडलिनी की शक्ति ऊपर उठनी शुरू हो जाती है। यह अनुभव प्रकट होगा। जैसे ही चोट पडनी शुरू होगी, आपको लगेगा कि भीतर शक्ति के तेज तूफान ऊपर की तरफ उठने शुरू हो गए। और उनके उठते ही आप दूसरे जगत में प्रवेश करने लगते हैं।
चौथे चरण में दस मिनिट का होगा मौन—पूर्ण मौन, जिसमें परम—सत्ता से मिलन होगा।

साधना सूत्र

ओशो 

‘महत्वाकांक्षा को दूर करो।’

पहला सूत्र है, जो गुरु कहेगा। अगर इतने चरण पूरे हुए तो संसार के सारे गुरुओं ने जो कहा है, वह पहला सूत्र है,

‘महत्वाकांक्षा को दूर करो।’
क्या है महत्वाकांक्षा? कुछ होने की वासना। कुछ होने की वासना कि राष्ट्रपति हो जाऊं, कि प्रधानमंत्री हो जाऊं, कि राकफेलर हो जाऊं, कि आइंस्टीन हो जाऊं, या कि बुद्ध या महावीर हो जाऊं। कुछ होने की वासना, कुछ होने का पागलपन।

पहला सूत्र है, ‘महत्वाकांक्षा को दूर करो।’

क्यों? क्योंकि जब तक तुम कुछ होना चाहते हो, तब तक तुम वह न हो पाओगे, जो तुम होने को पैदा हुए हो। जब तक तुम कुछ होना चाहते हो, तब तक तुम अपने स्वरूप को न पा सकोगे। क्योंकि तुम्हारा जो स्वरूप है, वह तो तुम हो ही, वह तुम्हें होना नहीं है। और जो भी तुम होना चाहते हो-वह वंचना होगी, वह अपने से भागना होगा, वह अपने से बचना होगा। ऐसा समझो कि एक गुलाब का फूल, कमल का फूल होना चाहता है। वह हो नहीं सकता। लेकिन भ्रम में जी सकता है और नष्ट हो सकता है। और नष्ट होने में यह होगा कि वह गुलाब का फूल भी न हो पाएगा, कमल का फूल तो हो नहीं सकता।

तुम जो हो, परमात्मा तुम्हें वैसा ही स्वीकार करता है, अन्यथा तुम होते ही नहीं। तुम जैसे हो, परमात्मा तुम्हें वैसा ही स्वीकार करता है, अन्यथा वह तुम्हें बनाता ही नहीं। वह दोहराता नहीं, पुनरुक्ति नहीं करता। बुद्ध कितने ही प्यारे हों, फिर भी दुबारा नहीं बनाता। दुबारा तो बनाते ही वे कारीगर हैं, जिनकी प्रतिभा इतनी कम है कि नए को नहीं खोज पाते। परमात्मा प्रत्येक को अनूठा और नया बनाता है। एक एक को अद्वितीय बनाता है। राम कितने ही प्यारे हों, लेकिन दुबारा? और सोचो, अगर बहुत राम पैदा होने लगें तो बहुत बेमानी हो जायेंगे, उबाने वाले भी हो जाएंगे। और अभी राम के दर्शन की इच्छा होती है, फिर उनसे भागने की इच्छा होगी। बस राम एक काफी हैं। एक से ज्यादा में बात बासी हो जाती है। परमात्मा बासापन पसंद नहीं करता।
तो तुम्हें इसलिए पैदा नहीं किया है कि तुम राम बन जाओ, कि कृष्ण बन जाओ, कि बुद्ध बन जाओ।

 तुम्हें पैदा किया है, कुछ जो तुम्हीं बन सकते हो और कोई भी नहीं बन सकता है। न पहले कोई बन सकता था, न बाद में बन सकेगा। अगर तुम चूक जाते हो, तो अस्तित्व से वह घड़ी चूक जाएगी। वह तुम्हीं बन सकते थे, तुम्हारे अतिरिक्त कोई और उस नियति को नहीं पा सकता था।

ओशो 

इसके पहले कि तुम्हारी आत्मा सदगुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके...

मैं एक घर में मेहमान था। पिता ने अपने बेटे को बुलाया और मुझसे कहा कि मिलिए इनसे, आप हैं मेरे सुपुत्र! सुपुत्र शब्द बहुत अच्छा है, लेकिन जिस ढंग से उन्होंने कहा, उसका मतलब था कुपुत्र! ये खड़े हैं मेरे सुपुत्र, उन्होंने मुझे बताया। फिर अपने सुपुत्र से बोले, क्या खड़े देख रहे हो? पैर छुओ।

 कभी कभी तो छुरी से भी ऐसे घाव नहीं किए जा सकते जैसे शब्द से किए जा सकते हैं। यह बेटा अपने बाप को कभी भी क्षमा नहीं कर पाएगा। बहुत कठिन है मां बाप को क्षमा कर देना, बहुत मुश्किल है। क्योंकि मां बाप को पता ही नहीं कि वे क्या बोल रहे हैं। और कोई डर भी नहीं है। बच्चे का डर क्या है? कुछ भी बोल रहे हैं। आपको पता नहीं है आप क्या बोल रहे हैं अपनी पत्नी से, क्या बोल रहे हैं अपने पति से, किस तरह बोल रहे हैं आप अपने नौकर से, किस भांति आप बोल रहे हैं अपने मित्र से, आप क्या कर रहे हैं अपने चारों तरफ! थोड़ा पहचानने की जरूरत है।

इस शिविर के काल में अच्छा हो चुप रहना। और जब भी शब्द बोलें, तो सोच कर बोलना कि इस शब्द से किसी को भी चोट न पहुंचे। आप पाएंगे कि आपके शब्दों का गुण धर्म बदल गया। और आप पाएंगे कि आपके भीतर की चेतना की स्थिति बदलने लगी। एक निर्णय कर लेना है कि कम से कम शब्द बालेंगे। अनिवार्य होगा तो बोलेंगे। बिलकुल अनिवार्य होगा। अगर एक वाक्य में काम चल जाएगा, तो एक ही वाक्य बोलेंगे। और अगर एक शब्द में काम चल जाएगा, तो एक ही शब्द में चला लेंगे। अगर हाथ के इशारे से चल जाएगा, तो फिर शब्द का उपयोग न करेंगे। और अगर मौन से ही चल जाएगा, तो श्रेष्ठतम है। फिर भी अगर किसी शब्द का उपयोग करना पड़े, तो उतने ही शब्दों का उपयोग करना, जिनसे किसी को चोट न पहुंच रही हो।

कोई आदमी ध्यान में खड़ा है। आप सिर्फ हंसते हुए उसके पास से निकल जाते हैं। आपके मन का भाव होता है कि क्या पागलपन कर रहे हैं! आपने हिंसा की। और हो सकता है कि आपका यह भाव, वह भी आदमी नासमझ हो और पकड़ ले। और यह भी हो सकता है कि जो घटना उसके जीवन में घटने जा रही थी, वह न घट पाए। तो आप जिम्मेवार हो गए, आपने बड़ी हिंसा की। लोग एक दूसरे से कुछ भी कह देते हैं। वे कह देते हैं कि किस पागलपन में पड़े हो! ऐसे कहीं ध्यान हुआ है? जैसे कि उन्हें ध्यान हो गया हो और जैसे कि उन्हें पता हो कि कैसे ध्यान होता है। मगर कोई भी किसी से कुछ भी कह देता है। सोच समझ कर बोलना। एक एक शब्द को खयाल में ले कर बोलना। और तब तुम देखोगे कि तुम्हारा मन किस तरह की हिंसा में लीन है। और जब तक ऐसी स्थिति न आ जाए कि तुम्हारे शब्दों से हिंसा तिरोहित हो जाए, तब तक सूत्र कहता है, गुरु के सामने मत बोलना।


‘ इसके पहले कि तुम्हारी आत्मा सदगुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके, उसके पैरों को हृदय के रक्त से धो लेना उचित है।’

ओशो 

दुख संगृहीत करने की व्यवस्था

आप सदा यही पूछते रहते हैं कि दुख से कैसे छुटकारा हो? आपकी बातों से ऐसा लगता है कि जैसे दुख ने आपको पकड़ा है, और छुटकारा चाहिए। अगर दुख आपको पकड़े हुए है, तो फिर आप छूट न पाएंगे। फिर पकड़ ही आपके हाथ में नहीं है, दुख के हाथ में है। फिर तो आप विवश हैं, असहाय हैं। और जन्मों जन्मों से नहीं छूट पाए हैं, तो अब कैसे छूट जाइएगा?  मैं आपसे कहता हूं कि दुख ने आपको नहीं पकड़ा हुआ है, आप दुख को पकड़े हुए हैं। और अगर आप राजी हुए, तो आपको यह समझ में आ जाएगा। न केवल समझ में, बल्कि आप छोड़ कर भी अनुभव कर लेंगे कि यह छूटता है। और जब आप दुख को छोड़ने की कला में कुशल हो जाते हैं, तब आपको पता लगता है कि जो भी आप ढो रहे थे, उसके लिए आपके अतिरिक्त और कोई भी
जिम्मेवार नहीं था। और आपने जो भी भोगा है, कोई और कसूरवार नहीं है। यह आपकी मर्जी थी, आप दुख चाहते थे। जो हम चाहते हैं, वही होता है। और जो भी आप हैं, आप अपनी चाहो का फल हैं। न तो कोई परमात्मा जिम्मेवार है, न कोई भाग्य जिम्मेवार है; किसी को प्रयोजन नहीं है आपको दुखी करने के लिए।

सच तो यह है कि यह पूरा अस्तित्व आपको आनंदित करने के लिए तत्पर है। यह पूरा अस्तित्व चाहता है कि आपका जीवन एक उत्सव बन जाए। क्योंकि जब आप दुखी होते हैं, तो आप चारों तरफ दुख भी फेंकते हैं। जब आप दुखी होते हैं तो आपके घाव की दुर्गंध सारे अस्तित्व में पहुंचती है। और जब आप दुखी होते हैं तो यह अस्तित्व भी पीड़ा पाता है। यह सारा जगत आपके साथ पीड़ित होता है और आपके आनंद के साथ आनंदित होता है। कोई अस्तित्व की चाह नहीं है कि आप दुखी हों। क्योंकि यह तो अस्तित्व के लिए ही आत्मघात है। पर आप दुखी हैं और दुखी होने में आपने कुछ व्यवस्था बना रखी है। और उस व्यवस्था को जब तक आप न तोड़ दें, तब तक आप कभी भी आनंद की तरफ आख न खोल पाएंगे। आपकी व्यवस्था क्या है? मनुष्य की व्यवस्था क्या है दुख संगृहीत करने की? वह कैसे इकट्ठा करता है? यह समझ लें थोड़ा, तो शायद छोड़ने में आसानी हो।

ओशो 

आनंद की कीमत

आनंद खोजना चाहते हैं, लेकिन त्यागेंगे क्या? चुकाएंगे क्या? किस चीज से आनंद की खोज करना चाहते हैं? आपके पास क्या है, जो आप देंगे?  अगर आदमी एक कदम भी चलता है, तो उसे वह जमीन छोड़ देनी पड़ती है, जिस पर खड़ा था, तो ही आगे बढ़ पाता है। इस जगत में कोई गति नहीं है, अगर हम कुछ छोड़ने को राजी न हों। त्याग के बिना एक कदम भी नहीं उठता है। अगर हाथ में मिट्टी, कंकड़, पत्थर भरे हुए हैं और हीरे जवाहरात चाहिए तो छोड़ देने पड़ेंगे। कम से कम हाथ खाली करना पड़ेगा, व्यर्थ को हटा देना पड़ेगा, ताकि सार्थक उतर सके।

क्या है आपके पास?

आपके पास धन तो है नहीं, किसी के पास नहीं है- इसलिए मैं नहीं कहता कि आप धन छोड़ दें। जो नहीं है, उसे आप छोड़ेंगे भी कैसे? मैं आपसे नहीं कहता कि आप अपना जीवन दे दें, वह भी आपके पास नहीं है। जिसका आपको पता ही नहीं, वह आपके पास कैसे हो सकता है? और आप काँप रहे हैं प्रतिपल मृत्यु के भय से। अगर आप जीवन ही होते, तो आप मृत्यु से डरते क्यों?

जीवन की तो कोई मृत्यु नहीं होती। जीवन तो मृत्यु बन कैसे सकता है? लेकिन आप काँप रहे हैं मृत्यु से। प्रतिपल मौत आपको घेरे हुए है। सब तरह से आप अपने को बचाने की कोशिश कर रहे हैं कि मैं मिट न जाऊं, मर न जाऊं, समाप्त न हो जाऊं। जीवन भी आपके पास नहीं है। इसलिए मैं आपसे न कहूंगा कि जीवन दान कर दें। जो है ही नहीं, उसका आप दान भी कैसे करेंगे?

मैं तो आपसे वह मांगूंगा जो आपके पास है। और वह मांगूंगा जो सभी के पास है। जैसा मैंने कहा कि सभी की खोज है आनंद, ऐसी एक संपदा सभी के पास है-और वह है दुख। वह आपके पास काफी है, वह आपके पास जरूरत से ज्यादा है। जन्मों जन्मों से आपने उसके अतिरिक्त और कुछ इकट्ठा ही नहीं किया है। आपके पास राशियां लग गई हैं। गौरीशंकर छोटा पड़ जाए, आपने जो दुख के ढेर लगाए हैं, वे उससे बड़े हैं, वह भी शरमा जाए। और शायद हिलेरी और तेनसिह आपके दुख के ढेर पर चढ़ने में सफल न होंगे, वे बड़े हैं। वह जन्मों जन्मों की आपकी मेहनत है, आपने दुख के सिवाय कभी कुछ कमाया नहीं है। आप अभी भी कमा रहे हैं।
मैं आपसे चाहूंगा कि आप दुख छोड़ दें, आप दुख का त्याग कर दें। कोई आपसे दुख मांगता नहीं, मैं आपसे दुख मांगता हूं। और अगर आप दुख दे सकें, तो आनंद के लिए रास्ता निर्मित हो जाए। और अगर आप दुख छोड़ सकें, तो आपको पता लगे कि जो आप सोचते थे कि आप दुख में जी रहे हैं, वह आपकी भ्रांति थी। और दुख ने आपको नहीं पकड़ा था, आपने ही दुख को पकड़ा हुआ था। मगर एक बार छोड़े तो ही पता चले कि कौन किसको पकड़े हुए है।

ओशो

सार्वभौम खोज

यहां अगर कोई ज्ञानी आ गया हो-वापस लौट जाए। मैं उन्हीं के साथ काम कर सकूंगा, जिन्हें इस बात का बोध है कि वे अज्ञानी हैं। तुम्हारा शान बाधा बन जाएगा। फिर शान हो ही गया हो तो व्यर्थ श्रम उठाने की जरूरत नहीं है। इसलिए इसे ठीक से समझ लेना, कि तुम अगर बीमार हो तो मैं दवा दूंगा। तुम अगर अज्ञानी हो तो मैं शान की तरफ ले चलने की कोशिश करूंगा। तुम अगर अंधेरे में हो तो मैं तुम्हें प्रकाश का रास्ता बताऊंगा। लेकिन अगर तुम प्रकाश में ही खड़े हो, तो मेरा श्रम और अपना श्रम व्यर्थ मत करना। जो आदमी सोया हो उसे जगाना बहुत आसान है। जो आदमी जाग कर पड़ा हो और सोचता हो कि सोया है-उसे जगाना बहुत मुश्किल है।
दूसरी बात, जीवन सबका एक ही बात को खोज रहा है- कैसे दुख मिटे? कैसे आनंद उपलब्ध हो? एक ही तलाश है और एक ही प्यास है। वह वृक्ष भी अगर उठ रहा है जमीन से आकाश की तरफ, तो इसी तलाश में है। अगर पक्षी उड़ रहे हैं और पशु चल रहे हैं और आदमी जी रहा है-तलाश वही है। एक पत्थर भी अगर अस्तित्व में है, तो उसकी भी भीतरी खोज आनंद की है। तो दूसरी बात खयाल में ले लेना कि खोज क्या रहे हो? बहुत लोग परमात्मा को खोजने निकल पड़ते हैं, लेकिन परमात्मा की खोज मुश्किल है। मुश्किल इसलिए है कि परमात्मा के संबंध में कोई भी तो भीतर गहरी प्यास नहीं है। अपनी प्यास को पकड़ कर चले—स्व दिन शायद वही प्यास परमात्मा की प्यास बन जाए। लेकिन अभी नहीं है। अभी तो आप ठीक से समझ लें कि आपकी तलाश आनंद की तलाश है। शायद यह खोज आगे बड़े, और यह छोटी सी गंगोत्री से निकली गंगा आनंद की तलाश में चले। और धीरे-धीरे जैसे जैसे खोज गहरी हो, वैसे वैसे पता चले कि आनंद तो परमात्मा का ही एक नाम है। और शायद पता चले कि आनंद तो परमात्मा का ही एक गुण है। और शायद पता चले कि हमारी खोज सिर्फ आनंद की नहीं है, कुछ और ज्यादा की है। लेकिन प्रारंभिक खोज आनंद की है, परमात्मा की नहीं है।
कुछ लोग पहले से ही परमात्मा की बात में पड़ जाते हैं, तो कठिनाई हो जाती है। बीज बिना हुए वृक्ष होने की कोशिश शुरू हो जाती है। फिर अड़चन होती है। फिर दौड़-धूप बहुत होती है, परिणाम कुछ भी नहीं आता। और जब परिणाम नहीं आता, तो निराशा पकड़ती है, विषाद घेर लेता है।

तो एक बात-आनंद की तलाश के लिए यहां आए हैं। छोड़े परमात्मा को, जल्दी नहीं है। आप आनंद की खोज पर यात्रा शुरू करें और अंत परमात्मा की उपलब्धि पर होगा। लेकिन शुरुआत परमात्मा से मत करें। पहली सीढ़ी से ही चढ़ना उचित है, और क ख ग से ही शुरुआत करनी ठीक है। आनंद सबकी समझ में आता हैं-फिर वह नास्तिक हो तो भी, फिर वह हिंदू हो, या मुसलमान हो, या ईसाई हो, या जैन हो तो भी। ईश्वर को मानता हो, न मानता हो; धर्म में आस्था रखता हो या न रखता हो-कोई भी हो, आनंद की खोज सार्वभौम है। उससे ही शुरू करें, जो सबकी खोज है।

यह दुनिया में इतने धर्मों का विवाद न हो, हिंदू और मुसलमान और ईसाई की लड़ाई न हो, जैन और हिंदू के बीच कलह न हो- अगर हम सार्वभौम खोज को स्वीकार करें। लेकिन हम ईश्वर की खोज से शुरुआत करते हैं। और ईश्वर का हमें न कोई पता है और न ईश्वर को खोजने की कोई प्रबल आकांक्षा है, न हमें प्रयोजन है। तो शब्दों पर लड़ते हैं। तो जिस ईश्वर का हमें कोई पता नहीं, उसकी हम अलग अलग शाब्दिक व्याख्याएं करते हैं। फिर इन व्याख्याओं में विरोध होता है, फिर मंदिर और मस्जिद और गुरुद्वारे खड़े होते हैं और आदमी व्यर्थ ही परेशान होता है।

ओशो 

आध्यात्मिक साधना से कुछ उपलब्ध हो तो उसे छिपाए रखना

मुझे सूफी संत जुन्नैद का स्मरण आता है। एक दिन एक आदमी उसके पास आया और उसने कहा. ‘गुरुवर, मैं आपसे आपका गुप्त रहस्य जानने आया हूं। लोग कहते हैं कि आपके पास कोई स्वर्ण—रहस्य है और अब तक आपने उसे किसी को भी नहीं बताया है। आप मुझे वह बता दें; मैं उसके बदले में कुछ भी करने को राजी हूं।’
जुन्नैद ने कहा. ‘मैं इस रहस्य को तीस वर्षों से छिपाए हूं; तुम उसके लिए कितने समय तक इंतजार करने को तैयार हो? तुम्हें उसके लिए तैयारी करनी होगी। मैंने इस रहस्य को तीस वर्षों से छिपाए रखा है; लेकिन तुम्हें मैं बता दूंगा। लेकिन कितने समय तक तुम इसके लिए प्रतीक्षा कर सकते हो?’
वह आदमी डर गया, घबरा गया। उसने जुन्नैद से कहा कि आप ही बताएं कि मुझे कितने समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। जुन्नैद ने कहा कि कम से कम तीस वर्ष धीरज रखना होगा; ज्यादा समय नहीं कहता हूं। मैं बहुत की मांग नहीं कर रहा हूं।
उस आदमी ने कहा : ‘तीस वर्ष? मैं विचार करूंगा।’ जुन्नैद ने कहा कि तब तीस वर्षों के बाद भी मैं तुम्‍हें नहीं दूंगा। याद रहे, अभी तय करो तो ठीक, अन्‍यथा मुझे भी विचार करना पड़ेगा। और वह आदमी राजी हो गया।
कहते हैं कि वह आदमी कोई तीस वर्षों तक जुन्नैद के साथ रहा। तब अंतिम दिन आया और वह जुन्नैद के पास जाकर बोला कि अब अपना रहस्य मुझे बता दें। जुन्नैद ने कहा कि वह मैं तुम्हें इसी शर्त पर दे सकता हूं कि तुम उसे गुप्त रखो; किसी को बताओ नहीं। रहस्य को अपने साथ लिए मर जाना।
उस आदमी ने कहा. ‘तो आपने मेरी जिंदगी क्यों बर्बाद की? तीस साल मैंने इसीलिए तो इंतजार किया कि रहस्य मिलेगा तो उसे दूसरों को बताऊंगा, और अब आप यह शर्त लगाते हैं! तब जानने का क्या फायदा जब मैं उसे किसी को बता ही नहीं सकता? अगर यह शर्त है तो मुझे बताएं ही मत। यह तो तब मेरी समस्या बन जाएगी जो मेरा पीछा करेगी; कोई चीज जानते हुए भी मैं किसी को बता नहीं सकूंगा। उससे तो अच्छा है कि कहें ही मत। आपने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। अब तो थोड़े दिन बचे हैं, शांति से जीने दें। किसी चीज को जानते हुए औरों को न बताना मेरे लिए बड़ा कठिन होगा।’
इसलिए जब किसी आध्यात्मिक साधना से कुछ उपलब्ध हो तो उसे छिपाए रखना। उसका प्रचार मत करो; उसका उपयोग मत करो। उसे अछूता, शुद्ध रहने दो। तभी वह आंतरिक रूपांतरण के काम आएगा। अगर उसका बाहरी उपयोग करोगे तो वह व्यर्थ चला जाएगा।

ओशो 

कल्पना मत करो, प्रतीक्षा करो।

उपनिषद कहते हैं कि परमात्मा स्रोतहीन प्रकाश है। वह सूरज या ज्योतिशिखा की भाति नहीं है; उसका कहीं भी कोई स्रोत नहीं है, केवल प्रकाश है, रोशनी है—मानो वह ऊषाकाल है जब कि रात तो चली गई और सूर्य उदित नहीं हुआ है। दोनों के बीच जो ऊषाकाल है, यह वह है। या यह संध्या की गोधूलि है, जब सूर्य डूब गया है और रात अभी आई नहीं है। इसलिए उसे संध्या भी कहते हैं—दिन और रात की संधि—वेला।
और यही कारण है कि हिंदुओं ने ध्यान के लिए संध्या को उचित समय माना है। वे ध्यान को संध्या ही कहने लगे फिर। वह ठीक मध्य—वेला है; जब दिन जा चुका है और रात आने को होती है। क्यों? यह महज प्रतीक है। प्रकाश तो है, लेकिन स्रोतहीन। वही बात अंतस से घटित होगी—स्रोतहीन प्रकाश घटित होगा। उसकी कल्पना मत करो, उसकी प्रतीक्षा करो।
और आखिरी बात याद रखने की यही है उसकी कल्पना मत करो। तुम कुछ भी कल्पना कर सकते हो। इस लिए तुम्‍हें बहुत सी बातें बताना खतरनाक है, तुम उनकी कल्पना करने लगोगे। तुम आंखें बंद कर लोगे और कल्पना में देख लोगे कि तीसरी आंख खुल रही है। कल्पना से तुम प्रकाश भी देख लोगे। लेकिन यह कल्पना मत करो। कल्पना से बचो। आंखें बंद करो और प्रतीक्षा करो। जो भी आए, उसे अनुभव करो, उसके साथ सहयोग करो। लेकिन प्रतीक्षा करो। आगे की छलांग मत लो; अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हारे हाथ एक सपना आ सकता है-सुंदर आध्यात्मिक सपना-और कुछ नहीं।

लोग मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि हमने यह देखा और हमने वह देखा। लेकिन यह सब उनकी कल्पना है। यदि यह देखना सच होता तो वे रूपांतरित हो गए होते। मगर वे रूपांतरित नहीं हुए हैं। वे वही के वही लोग हैं; लेकिन एक नया आध्यात्मिक दंभ उनसे जुड़ गया है। उन्होंने कुछ सपने देख लिए हैं-सुंदर आध्यात्मिक सपने। किसी ने बांसुरी बजाते कृष्ण को देखा है; कोई प्रकाश देख रहा है; किसी की कुंडलिनी जाग रही है। ये चीजें वे देखते रहते हैं और वही के वही बने रहते हैं-मंदमति और मूढ़। कुछ भी उन्हें नहीं हुआ है। और वे वही के वही बने रहते हैं-क्रोधी, दुखी, बचकाने और मूढ़। कुछ भी उनका नहीं बदला है।
अगर सचमुच तुम्हें वह प्रकाश दिखाई पड़े जो तीसरी आंख से आता है तो तुम दूसरे ही व्यक्ति हो जाओगे। और तब तुम्हें किसी को भी बताने की जरूरत नहीं होगी। लोग जान लेंगे कि तुम दूसरे व्यक्ति हो गए हो। तुम इसे छिपा भी नहीं सकते; यह बात लोगों के अनुभव में आ जाती है। तुम जहां भी जाओगे वहा लोग महसूस करेंगे कि इस आदमी को कुछ हुआ है।

इसलिए कल्पना मत करो। प्रतीक्षा करो और चीजों को अपने आप ही घटित होने दो। तुम तो विधि का प्रयोग करो और प्रतीक्षा करो। आगे की छलांग मत लो।

अंधकार और मृत्यु

सदा वह करो जो तुम कर सकते हो।

उदाहरण के लिए, तुम अभी तुरंत बुद्ध की तरह अपने क्रोध के मालिक नहीं हो सकते हो। कैसे हो सकते हो? लेकिन अगर तुम श्वास की प्रक्रिया को बदल दो तो तुम उसके सूक्ष्म प्रभाव को, परिवर्तन को अनुभव कर लोगे। इसे करके देखो। अगर तुम कामवासना से भरे हो तो थोड़ी सी गहरी श्वासें लो और उनके प्रभाव को देखो; कामवासना तितर—बितर हो जाएगी।
अल्डुअस हक्सले की पत्नी लारा हक्सले ने एक सुंदर किताब लिखी है; उसमें उसने कुछ करने के सरल उपाय बताए हैं। लारा हक्सले कहती है कि अगर तुम्हें क्रोध आए तो तुम अपने चेहरे की मांस—पेशियों को खींचो, सख्त बनाओ। तुम यह काम अपने स्नानगृह में जाकर कर सकते हो, या महज मेज के नीचे झुककर कर सकते हो; ताकि तुम्हें कोई देख न सके। समझो कि कोई तुम्हारे सामने ही बैठा है और तुम्हें क्रोध आ गया है। तो स्नानघर में जाकर या
मेज के नीचे सिर करके अपने चेहरे को कसो और कसते ही जाओ। जब कसावट हद पर पहुच जाए अचानक ढील दे दो, और तब तुम्‍हें फर्क का अनुभव होगा; क्रोध जा चूकेगा। या यदि इतने पर भी न जाए तो इस प्रयोग को दुहराओ—दो बार करो, तीन बार करो।
इससे क्या होता है? अगर तुम चेहरे की मांस—पेशियों को कसते जाओ, और कसते ही चले जाओ, और उसे तनाव से भर दो, तो जो ऊर्जा क्रोध में लगी थी वही चेहरे में गति करने लगेगी। और चेहरे में गति करना बहुत आसान है। जब तुम क्रोध करते हो तो क्या होता है? तुम्हारा जी करता है कि किसी को मुक्के मारो, क्योंकि इस ऊर्जा का उपयोग करना है। और उपयोग कर सको तो ऊर्जा बिखर जाएगी और तुम्हारा चेहरा शिथिल और शांत हो जाएगा। और जो आदमी तुम्हारे सामने बैठा था उसे पता भी नहीं चलेगा कि तुम क्रोध में थे। ऐसा लगेगा कि तुम्हें कुछ भी नहीं हुआ है।
और एक बार तुम इन चीजों को जान लो तो तुम्हें अधिकाधिक बोध होगा कि ऊर्जा रूपांतरित की जा सकती है, उसकी दिशा बदली जा सकती है, उसे नियंत्रित किया जा सकता है, उसे राह दी जा सकती है और उसकी राह रोकी भी जा सकती है। तुम्हें यह बोध होगा कि ऊर्जा का उपयोग भिन्न—भिन्न ढंगों से किया जा सकता है। और जब तुम ऊर्जा का उपयोग सीख लोगे तो तुम उसके मालिक हो जाओगे। और तब किसी दिन यह तुम्हारे हाथ में होगा कि ऊर्जा का उपयोग न करके उसका संरक्षण करो।
यह प्रयोग, घूंसा तानने का प्रयोग, बुद्ध के काम का नहीं है। बुद्ध के काम का इसलिए नहीं है क्योंकि यह ऊर्जा का अपव्यय है। लेकिन यह तुम्हारे बहुत काम का है। कम से कम दूसरा तुम्हारे क्रोध का शिकार होने से बच जाता है, और इस तरह पैदा होने वाले एक दुश्चक्र का अंत हो जाता है। जब तुम किसी पर क्रोध करते हो तो दूसरा भी क्रोध करता है, और इसका कहीं अंत नहीं है। इससे तुम्हारी पूरी रात खराब हो जाती है; इस उपद्रव का असर सप्ताह भर रह सकता है। और तब इसके प्रभाव में तुम कई ऐसी चीजें कर गुजरोगे जिन्हें तुम कभी नहीं करना चाहते थे।
तो यह मत कहो कि यह महज शारीरिक प्रक्रिया है। तुम शारीरिक हो; इसके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता। तुम शरीर ही हो, इस तथ्य को इनकारा नहीं जा सकता। अपनी ऊर्जा का उपयोग करो, उसे इनकार करने की जरूरत नहीं है।
अगर तुम अपनी आंखें बंद करो तो कभी—कभी तुम्हें वहां थोड़ा तनाव, थोड़ी बेचैनी अनुभव हो सकती है। इस संबंध में कुछ बातें उपयोगी हो सकती हैं। एक तो यह कि जब आंखें बंद करो तो उसके संबंध में तनाव न लो; उन्हें शिथिल रहने दो। तुम आंखों को जबरदस्ती भी बंद कर सकते हो, तब तनाव पैदा होगा, तब तुम्हारी आंखें थक जाएंगी और तुम्हें भीतर बेचैनी महसूस होगी। पहले चेहरे को शिथिल होने दो, फिर आंखों को शिथिल होने दो और तब उन्हें बंद होने दो। मैं कहता हूं कि आंखों को बंद होने दो। मैं यह नहीं कहता कि उन्हें बंद करो। विश्राम में रहो। पलकों को गिरने दो और आंखों को बंद होने दो। उनके साथ जबरदस्ती मत करो। जबरदस्ती करना अच्छा नहीं है।
और अगर तुम्हें फर्क पता न चले तो ऐसा करो कि पहले आंखों को जबरदस्ती बंद म् करो। पहले पूरे चेहरे को तनाव से भर दो और तब आंखों को जबरदस्ती बंद करो। और फिर दूसरी बार उन्हें विश्रामपूर्वक बंद करो। तब तुम्हें फर्क पता चलेगा। तो कुछ भी करने में जबरदस्ती मत करो; वह तुम्हें थका डालेगी।
और दूसरी बात कि जब आंखें बंद हो जाएं और चेहरा शिथिल हो जाए, तो ऐसे देखो जैसे कि सब अंधकारमय है, तुम्हारे चारों ओर गहरा अंधकार है। भाव करो कि गहरी अंधेरी रात में तुम अंधकार ही अंधकार से, मखमली अंधकार से घिरे हो। इस अंधकार को महसूस करो। उससे तुम्हारी आंखों की गति बंद हो जाएगी; जब कुछ भी देखने को नहीं रहेगा तो आंखें ठहर जाएंगी। इसलिए अंधकार में होना उपयोगी है। यह काम तुम अंधेरे कमरे में कर सकते हो। आंखें खोलो और अंधकार को देखो, और फिर उन्हें बंद करके अंधकार को अनुभव करो। फिर आंखें खोलकर अंधकार को देखों; और फिर आंखें बंद कर अंधकार को भीतर महसूस करो।
अंधकार गहन रूप से आरामदायक है। अंधकार तुम्हारे बाहर है और अंधकार तुम्हारे भीतर है। और इसमें सब कुछ मृत मालूम देता है—मृत और अंधेरा। अंधकार और मृत्यु एक—दूसरे से परस्पर जुड़े हैं। यही कारण है कि हम मृत्यु को काले रंग से चित्रित करते हैं। दुनियाभर में लोग मृत्यु को काले रँग में चित्रित करते हैं।

ओशो 

मन के पार

जब तुम शराब पीते हो तो तुम्हारे मन को क्या होता है? शराब तो शरीर में जाती है, लेकिन मन प्रभावित होता है। जब तुम एल—एस डी लेते हो तो वह शरीर में जाती है, मन में नहीं; लेकिन मन प्रभावित होता है। या अगर तुम उपवास करो तो यह उपवास शरीर के तल पर होगा; लेकिन मन प्रभावित होगा।
इसी चीज को दूसरे छोर से देखो। जब कामुक विचार उठते हैं तो वे उठते मन के तल पर हैं, लेकिन शरीर तुरंत उनसे प्रभावित होता है। मन में काम—विषय की चितना शुरू होती है; और शरीर तैयार होने लगता है।
विलियम जेम्स का एक सिद्धात है। इस सदी के पूर्वार्द्ध में यह सिद्धात बेतुका मालूम पड़ता था, लेकिन एक अर्थ में यह सही है। विलियम जेम्स और दूसरे विज्ञानविद लैंग ने मिलकर इस सिद्धात को प्रस्तावित किया था और इसीलिए उसे जेम्स—लैंग सिद्धात कहते हैं।
आमतौर से हम कहते हैं कि जब तुम भयभीत होते हो तो तुम सुरक्षा के लिए भागते हो, या जब तुम क्रोध करते हो तो तुम्हारी आंखें लाल हो जाती हैं और तुम अपने दुश्मन पर चोट करने लगते हो। लेकिन जेम्स और लैग ने जो बात कही वह ठीक इसके विपरीत है। उन्होंने कहा कि चूंकि तुम भागते हो इसलिए तुम भयभीत होते हो और चूंकि तुम्हारी आंखें लाल हो जाती हैं और तुम शत्रु पर चोट करने लगते हो इसलिए तुम्हें क्रोध होता है।
कितनी विरोधी बातें हैं! जेम्स और लैंग ने कहा कि यदि ऐसा नहीं है तो हम क्रोध की एक ऐसी मिसाल देखना चाहेंगे जिसमें आंखें लाल न हों, शरीर प्रभावित न हो और शुद्ध क्रोध हो। अपने शरीर को प्रभावित मत होने दो और क्रोध करने की चेष्टा करो, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम क्रोध नहीं कर सकते।
जापान में वे अपने बच्चों को क्रोध पर काबू पाने का एक सरल उपाय सिखाते हैं। वे कहते हैं कि जब भी तुम्हें क्रोध हो, क्रोध के साथ सीधे कुछ मत करो; बस गहरी श्वास लेना शुरू करो। इसका प्रयोग करो और तुम क्रोध नहीं कर सकोगे। क्यों? क्यों सिर्फ गहरी श्वास लेने से क्रोध नहीं कर सकते? क्यों क्रोध करना असंभव हो जाता है?
इसके दो कारण हैं। तुम गहरी श्वास लेने लगते हो; लेकिन क्रोध के लिए श्वास की एक खास लय, उसका एक विशेष ढंग आवश्यक है। उस ढंग के बिना क्रोध संभव नहीं है। क्रोध करने के लिए जरूरी है कि श्वास एक विशेष लय में चले। असल में क्रोध के लिए श्वास का अराजक होना जरूरी है। इसलिए जब तुम गहरी श्वास लेते हो तो क्रोध का उभरना असंभव हो जाता है। अगर तुम सचेतन रूप से गहरी श्वास लेते हो तो क्रोध प्रकट नहीं हो सकता। क्रोध के लिए एक भिन्न ढंग की श्वास की गति जरूरी है। वह गति तुम्हें लानी नहीं पड़ती है, क्रोध ही उसे ले आता है। गहरी श्वास के साथ तुम क्रोध नहीं कर सकते।
और दूसरा कारण है कि मन बंट जाता है। जब तुम क्रोध करते हो और साथ ही गहरी श्वास लेने लगते हो तो तुम्हारा मन श्वास पर चला जाता है। अब शरीर क्रोध करने की अवस्था में नहीं रहा, क्योंकि मन की एकाग्रता किसी और चीज पर चली गई। ऐसी हालत में क्रोध करना कठिन है।
यही कारण है कि जापानी पृथ्वी पर सबसे संयमित लोग हैं—सर्वाधिक संयमित। बचपन से ही उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया जाता है। दुनिया में अन्यत्र ऐसी घटना देखने को नहीं मिलती है; लेकिन जापान में यह आम बात है। अब तो जापान में भी वह कम हो रहा है; क्योंकि जापान कम जापान होता जा रहा है। यह देश अधिकाधिक पाश्चात्य बनता जा रहा है और उसके पारंपरिक ढंग—ढांचे खोते जा रहे हैं। लेकिन ऐसी बात होती थी और आज भी हो रही है।
मेरे एक मित्र क्‍योटो में रहते थे। मुझे उनका एक पत्र मिला जिसमें उन्‍होंने कहा कि आज मुझे एक ऐसी सुंदर घटना देखने को मिली कि उससे मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। और जब मैं भारत वापस आऊंगा तो मैं आपसे समझना चाहूंगा कि ऐसी बात कैसे घटित होती है। एक आदमी को कार से धक्का लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा; लेकिन जब वह उठा तो उसने ड्राइवर को धन्यवाद दिया और तब अपनी राह ली। उसने ड्राइवर को धन्यवाद दिया! जापान में यह कठिन नहीं है। उसने कुछ गहरी श्वासें ली होंगी; तभी यह संभव है। तब तुम्हारा दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। और तब तुम उस आदमी को भी धन्यवाद दे सकते हो जो तुम्हारी हत्या करने जा रहा हो, या जिसने तुम्हारी हत्या का प्रयास किया हो।
तो शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाएं दो चीजें नहीं हैं, वे एक हैं। और तुम किसी भी छोर से दूसरे को बदलने की शुरुआत कर सकते हो। और कोई भी वैज्ञानिक विधि उपयोग में आ सकती है। उदाहरण के लिए तंत्र यह कर सकता है, क्योंकि तंत्र को शरीर पर गहरा भरोसा है। सिर्फ दर्शनशास्त्र धुंधला— धुंधला, हवाई और बातूनी है; वह और कहीं से भी शुरू कर सकता है। लेकिन कोई भी वैज्ञानिक पद्धति शरीर से ही शुरू कर सकती है, क्योंकि शरीर तुम्हारी पहुंच के भीतर है। अगर मैं तुमसे कुछ कहूं जो तुम्हारी पकड़ के बाहर हो तो तुम उसे सुन लोगे, उसे स्मृति में इकट्ठा कर लोगे; तुम उसकी चर्चा भी करोगे; लेकिन उससे कुछ भी नहीं होगा। तुम वही के वही होगे, तुम्हारी जानकारी बढ़ जाएगी, लेकिन तुम नहीं बढ़ोगे। तुम्हारा ज्ञान तो बढ़ता चला जाएगा; लेकिन तुम्हारे प्राण गरीब के गरीब रह जाएंगे, जहां के तहां पड़े रहेंगे। तुम्हें उससे कुछ भी नहीं होगा।
स्मरण रहे, शरीर तुम्हारे हाथ में है, तुम्हारी पहुंच के भीतर है। तुम उसके साथ अभी कुछ कर सकते हो और शरीर के जरिए मन को बदल सकते हो। और धीरे— धीरे तुम अपने शरीर के मालिक हो जाओगे। और तब तुम मन के भी मालिक हो जाओगे। और जब तुम मन के मालिक हो जाते हो तो धीरे—धीरे उसे रूपांतरित कर मन के भी पार जा सकते हो। जब शरीर बदलता है तो तुम शरीर के पार जाते हो, और जब मन बदलता है तो तुम मन के पार जाते हो।

ओशो 

दूसरों पर प्रभुत्व करने के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का उपयोग

स्मरण रहे, किसी पर प्रभुत्व करने के लिए ऊर्जा का उपयोग मत करो। यही कारण है कि बुद्ध, महावीर, जीसस निरंतर कहते रहे, जोर देकर कहते रहे कि जिस क्षण तुम आध्यात्मिक खोज पर निकलो, सबके लिए—शत्रुओं के लिए भी—प्रेम से भरकर निकलो। अगर तुम प्रेम से भरे रहोगे तो तुम उस आंतरिक हिंसा के खिंचाव से बच जाओगे जो मालकियत करना चाहता है। उस आंतरिक हिंसा का एंटीडोट सिर्फ प्रेम है। अन्यथा जब तुम्हें ऊर्जा प्राप्त होगी, जब तुम ऊर्जा से भर जाओगे, तो तुम दूसरों पर मालकियत करने लगोगे।
ऐसा रोज होता है; ऐसे अनेक लोग मेरे संपर्क में आए हैं। उन्हें मैं मदद देता हूं वे थोड़ी प्रगति करते हैं। और ज्यों ही उन्हें लगता है कि उन्हें ऊर्जा मिली, वे झट दूसरों पर प्रभुत्व जमाने लगते हैं। वे अब इस ऊर्जा का उपयोग करने लगते हैं।
ध्यान रहे, दूसरों पर प्रभुत्व करने के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का उपयोग मत करो। तुम नाहक अपनी शक्ति नष्ट करोगे। देर—अबेर तुम फिर चुक जाओगे, रिक्त हो जाओगे। और सहसा फिर तुम्हारा पतन हो जाएगा। और यह शुद्ध अपव्यय है।
लेकिन जब तुम्हें लगता है कि अब मैं कुछ कर सकता हूं तो अपने पर अंकुश रखना कठिन होता है। अगर तुम किसी बीमार को छूते हो और वह तुम्हारे छूते ही स्वस्थ हो जाता है तो अब तुम दूसरों को छूने से अपने को कैसे रोकोगे? अब तुम अपने को बस में न रख सकोगे। और बस में न रख सकोगे तो तुम ऊर्जा का अपव्यय करोगे। तुम्हें कुछ घटित हुआ है; लेकिन तुम जल्दी ही उसे गंवा दोगे और नाहक गंवा दोगे।
और मनुष्य का मन इतना चालाक है कि तुम सोच सकते हो कि मैं दूसरों का उपचार कर रहा हूं, दूसरों की मदद कर रहा हूं। वह मन की महज चालाकी हो सकती है। अगर तुम्‍हारे दिल में प्रेम नहीं है तो तुम दूसरों की बीमारी, दूसरों के स्वास्थ्य की फिक्र नहीं कर सकते। तुम्हें इससे कुछ मतलब नहीं है। सच तो यह है कि तुम्हें शक्ति मिल गई है और उपचार के जरिए तुम दूसरों पर प्रभुत्व पैदा करना चाहते हो। तुम भले कहते होओ कि मैं उनकी मदद कर रहा हूं; लेकिन तुम मदद के नाम पर दूसरों पर आधिपत्य जमा रहे हो। और उससे तुम्हारा अहंकार तृप्त होगा; वह तुम्हारे अहंकार के लिए भोजन बन जाएगा।
इसलिए सभी पुराने धर्मग्रंथ सावधान करते हैं। वे कहते हैं कि सावधान रहो; क्योंकि जब शक्ति आती है तो तुम एक खतरनाक जगह पर पहुंच जाते हो। तुम उसे फेंक दे सकते हो, गंवा दे सकते हो। इसलिए जब शक्ति प्राप्त हो तो उसे गुप्त ही रखो, उसके बारे में किसी को कुछ मत जानने दो।
जीसस ने कहा है कि अगर तुम्हारा दाहिना हाथ कुछ करे तो उसे बाएं हाथ को भी मत जानने दो। सूफी संत परंपरा में वे कहते हैं कि जब शक्ति आने लगे तो दूसरों के सामने प्रार्थना भी मत करो, दूसरों के सामने मस्जिद भी मत जाओ। क्यों? क्योंकि जब शक्ति के आने पर कोई प्रार्थना करता है और बहुत लोगों की मौजूदगी में करता है तो दूसरों को तुरंत पता चलने लगता है कि कुछ हो रहा है। तो सूफी कहते हैं कि तब तुम्हें रात के अंधेरे में, आधी रात में अपनी नमाज कहनी चाहिए जब सब सोए हों और किसी को पता न चले कि तुम्हें कुछ हो रहा है। किसी को बताओ भी मत कि तुम्हें क्या हो रहा है।
लेकिन मन बहुत बकवादी है। अगर तुम्हें कुछ घटित होगा तो तुम तुरंत दूसरों को इसका शुभ समाचार देने निकल पड़ोगे। लेकिन तभी चूक हो जाएगी। यह शक्ति का अपव्यय होगा। और अगर लोग तुमसे प्रभावित भी होंगे तो तुम्हें उसकी वाहवाही मिलेगी, और कुछ भी नहीं। वह कोई बढ़िया सौदा नहीं है।
अभी रुको। एक क्षण आएगा जब तुम्हारी ऊर्जा संगृहीत हो जाएगी, जब वह अखंड हो जाएगी, रूपांतरित हो जाएगी, तब तुम्हारे आस—पास तुम्हारे कुछ किए बिना ही बहुत कुछ घटित होगा। जब तुम अपने मालिक हो जाओगे तभी तुम दूसरों को अपना मालिक बनने में सहयोग दे सकोगे।

शिष्यों के लिए नियम

ये नियम शिष्यों के लिए हैं।
इन पर तुम ध्यान दो।
इसके पहले कि तुम्‍हारे नेत्र देख सकें,
उन्हें बहरे हो जाना चाहिए।
और इसके पहले कि तुम सदगुरुओं की उपस्थिति में बोल सकी,
तुम्हारी वाणी को चोट पहुंचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए।
इसके पहले कि तुम्हारी आत्मा सदगुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके,
उसके पैरों को हृदय के रक्त से धो लेना उचित है।

ओशो 

 
महत्वाकांक्षा को दूर करो।



महत्वाकांक्षा पहला अभिशाप है।
जो कोई अपने सहयोगियों से आगे बढ़ रहा है,
उसे यह मोहित करके अपने पथ से विचलित कर देती है।
सत्कर्मों के फल की इच्छा का यह सबसे सरल रूप है।
बुद्धिमान और शक्तिशाली लोग इसके द्वारा
बराबर अपनी उच्च संभावनाओं से स्‍खलित होते रहते हैं।
फिर भी यह बड़ी आवश्यक शिक्षा का साधन है।
इसके फल चखते समय मुंह में राख और धूल बन जाते हैं।
मृत्यु और वियोग के समान इससे भी अंत में यही शिक्षा मिलती है
कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से
परिणाम में निराशा ही प्राप्त होती है।

साधना सूत्र

अज्ञान की स्वीकृति

पहली बात, अपने संबंध में ठीक समझ लें। क्योंकि तुम्हारे से ही निकलेगा रास्ता और अंत में तुमसे ही पैदा होगी मंजिल।

तुम्हीं सब कुछ हो। बीज भी तुम्हीं हो, वृक्ष भी तुम्हीं बनोगे। और जब फूल खिलेंगे और सुगंध निकलेगी, तब उन फूलों में, उस सुगंध में भी तुम ही रहोगे। अपने संबंध में गलत समझ हो, तो सारा श्रम व्यर्थ हो जाता है।
पहली बात—पहली बात तो यह ठीक से समझ लो कि तुम्हें कुछ भी पता नहीं। काश, तुम्हें पता ही होता तो फिर मेरे पास आने की कोई भी जरूरत न थी। सूरज की एक किरण भी तुम्हें मिल जाए, तो सूरज तक पहुंचने का मार्ग खुल गया। क्योंकि उसी किरण को पकड़ कर तुम सूरज के मूल स्रोत तक पहुंच जाओगे। और सागर की एक बूंद भी तुम चख लो, तो तुमने सारा सागर चख लिया।

अगर तुम्हें थोड़ा भी पता हो जीवन का, तो फिर किसी से पूछने की कोई भी जरूरत नहीं है। वह जो थोड़ा सा पता है, उसके सहारे चलो। तो जैसे कोई आदमी एक छोटा सा दीया ले कर अंधेरे में चले, तो दो ही कदम पर प्रकाश पड़ता है; लेकिन जब वह दो कदम चल लेता है, तो दो कदम और आगे प्रकाश पड़ता है। फिर वह और दो कदम चल लेता है, तो दो कदम और आगे प्रकाश पड़ता है। दो कदम प्रकाश पड़ता हो जिस दीए से, उससे भी हजारों मील की यात्रा तय की जा सकती है। कोई हजारों मील के रास्ते को प्रकाशित करने की जरूरत नहीं है। हाथ में दीया हो छोटा, तो भी बड़े से बड़े अंधकारपूर्ण रास्ते को पार किया जा सकता है। दो कदम ही काफी हैं।
अगर तुम्हें थोड़ा भी पता हो अपने संबंध में तो मेरे पास आने की कोई भी जरूरत नहीं है। किसी के भी पास जाने की कोई जरूरत नहीं।

तो पहली बात तो यह ठीक से समझ लेना कि तुम्हें अपने संबंध में कुछ भी पता नहीं है अभी। और तुम जो भी जानते हो, वे सब शब्द हैं। शब्दों में न तो कोई प्राण होते हैं, न कोई अर्थ होता है। शब्द से ज्यादा असत्य इस जगत में और कुछ भी नहीं है।

अनुभव अनुभव में अर्थ है। मैं कितना ही कहूं जो मैं जानता हूं उसे मैं शब्दों में न डाल पाऊंगा। कभी भी कोई नहीं डाल पाया। और कभी कोई डाल भी नहीं पाएगा। क्योंकि जो मैं जानता हूं वह मेरा अनुभव है। और जब मैं उसे शब्द बनाता हूं तो तुम्हारे कानों में जो सुनाई पड़ता है, वह अनुभव नहीं है, वह कोरा शब्द है।

मैं कहता हूं परमात्मा। तुम सुन लेते हो। और मैं कहता हूं आत्मा। और वह भी सुन लिया जाता है। लेकिन न तो आत्मा से कुछ अर्थ प्रकट होता है और न परमात्मा से। शब्द सुनाई पड़ते हैं और बहुत बार सुन लेने पर ऐसा भ्रम भी पैदा हो जाता है कि हम समझ गए। शब्दों की समझदारी नासमझी का दूसरा नाम है।

तुम्हें कुछ भी पता नहीं, यह बात खयाल में ले लें। यह आधारभूत है। क्योंकि जो व्यक्ति यह समझ ले बिना कुछ जाने कि मैं जानता हूं उसके जानने का द्वार बंद हो जाता है। बीमार समझ ले कि स्वस्थ है, तो चिकित्सा की तलाश बंद हो जाती है। अज्ञानी को खयाल हो जाए ज्ञान का, तो अज्ञान जितना नहीं भटकाता था, उतना ज्ञान भटका देगा।

इस बात का खयाल आ जाए कि मुझे कुछ भी पता नहीं, तो यह शान की पहली किरण है। अब तुम ईमानदार हुए। अब तुमने कम से कम एक सच्ची बात स्वीकार की कि मुझे कुछ पता नहीं। तुमने अपने शास्त्र हटा कर रख दिए और तुमने अपने शब्दों को छोड़ दिया। और तुम ईमानदार हुए, प्रामाणिक हुए अपने प्रति कि न मुझे आत्मा का पता है, न मुझे मोक्ष का। मुझे पता ही नहीं कि जीवन क्या है?

यह अज्ञान की स्वीकृति शान का पहला चरण है।

ओशो 

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