इसका अर्थ हुआ
कि भगवान तक सीधे पहुंचना कठिन होगा, सदगुरु चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि भगवन
से सीधा- सीधा मिलना कठिन होगा, मध्यस्थ चाहिए। इसका अर्थ हुआ कि कोई बीच
में चाहिए जो तुम जैसा भी हो और भगवान जैसा भी हो, तो सेतु बन सकेगा। कोई
ऐसा चाहिए जिसका एक हाथ तुम्हें पकड़े हो और एक हाथ जिसका परमात्मा पकड़े हो।
एक हा थ तुम्हारे जैसा और एक हाथ परमात्मा जैसा! जो परमात्मा और मनुष्य के
बीच में कहीं हो—संक्रमण हो, द्वार हो। परमात्मा बहुत बड़ा है। आदमी बहुत
छोटा है। दोनों में तालमेल कैसे बैठे? कोई चाहिए जो परमात्मा जैसा बड़ा हो,
आदमी जैसा छोटा भी हो।
गुरु इस दुनिया में सबसे बड़ा विरोधाभास है, सबसे बड़ा पैराडाक्स। अगर तुम गुरु को एक तरफ से देखो, अपनी तरफ से, तो तुम्हारे जैसा है। अगर तुम दूसरी तरफ से देखो तो परमात्मा जैसा है। इसलिए तो कोई भी अपने गुरु के लिए तर्क नहीं कर सकता, न प्रमाण जुटा सकता है। क्योंकि तुम्हारे तर्क और प्रमाण कुछ भी सिद्ध न कर सकेंगे उसके लिए, जिसको दूसरी तरफ से देखने की क्षमता न हो। वह कहेगा, हमारे जैसा ही तुम्हारा गुरु है, जैसी हमें भूख लगती है उसे लगती है, धूप आए तो हमें पसीना आता है, उसे आता है।
इन बातों से बचेन के लिए फिर कपोल- कल्पनाएं शुरू होती हैं। जैन कहते हैं, महावीर को पसीना नहीं आता। पागल हैं। बिलकुल पागलपन की बात है। जैन कहते हैं, महावीर को चोट करो तो खून नहीं निकलता, दूध निकलता है।
ये क्यों कहानियां गढ़ी गई हैं? ये भक्त यह कह रहे हैं कि हमारा भगवान आदमियों जैसा नहीं है। मगर तुम्हें यह सिद्ध करना पड़ रहा है कि पसीना नहीं आता, उससे साफ है कि पसीना आता होगा। तो काहे के लिए चिंता करते? दूसरे सिद्ध करते हैं कि पसीना आता है, खून ही निकलता है, दूध कहीं निकला है! भक्तों ने अपने गुरुओं को अलौकिक सिद्ध करने की बड़ी चेष्टाएं की हैं। उनकी चेष्टा को समझो सहानुभूतइ से तो सार्थक मालूम होती है। उनकी चेष्टा ही यही है, वे यह कह रहे हैं कि तुम हमारे गुरु को साधारण मनुष्य मत समझो। ठीक ही कह रहे हैं, लेकिन जिस भाषा में कह रहे हैं वह बिलकुल गलत है। और उनकी भाषा के कारण दूसरों के सामने महावीर का, या उनके गुरु का परमात्म- रूप तो प्रगट नहीं होता, उनका ऐतिहासिक रूप तक संदिग्ध हो जाता है।
गुरु बड़ी भारी विरोधाभासी अवस्था है, अगर बुद्धि से देखा तो आदमी जैसा, अगर हृदय से देखा तो परमात्मा जैसा। इसलिए श्रद्धा की आंख हो जो गुरु परमात्मा से जोड़ने का कारण हो जाता है।
ओशो
गुरु इस दुनिया में सबसे बड़ा विरोधाभास है, सबसे बड़ा पैराडाक्स। अगर तुम गुरु को एक तरफ से देखो, अपनी तरफ से, तो तुम्हारे जैसा है। अगर तुम दूसरी तरफ से देखो तो परमात्मा जैसा है। इसलिए तो कोई भी अपने गुरु के लिए तर्क नहीं कर सकता, न प्रमाण जुटा सकता है। क्योंकि तुम्हारे तर्क और प्रमाण कुछ भी सिद्ध न कर सकेंगे उसके लिए, जिसको दूसरी तरफ से देखने की क्षमता न हो। वह कहेगा, हमारे जैसा ही तुम्हारा गुरु है, जैसी हमें भूख लगती है उसे लगती है, धूप आए तो हमें पसीना आता है, उसे आता है।
इन बातों से बचेन के लिए फिर कपोल- कल्पनाएं शुरू होती हैं। जैन कहते हैं, महावीर को पसीना नहीं आता। पागल हैं। बिलकुल पागलपन की बात है। जैन कहते हैं, महावीर को चोट करो तो खून नहीं निकलता, दूध निकलता है।
ये क्यों कहानियां गढ़ी गई हैं? ये भक्त यह कह रहे हैं कि हमारा भगवान आदमियों जैसा नहीं है। मगर तुम्हें यह सिद्ध करना पड़ रहा है कि पसीना नहीं आता, उससे साफ है कि पसीना आता होगा। तो काहे के लिए चिंता करते? दूसरे सिद्ध करते हैं कि पसीना आता है, खून ही निकलता है, दूध कहीं निकला है! भक्तों ने अपने गुरुओं को अलौकिक सिद्ध करने की बड़ी चेष्टाएं की हैं। उनकी चेष्टा को समझो सहानुभूतइ से तो सार्थक मालूम होती है। उनकी चेष्टा ही यही है, वे यह कह रहे हैं कि तुम हमारे गुरु को साधारण मनुष्य मत समझो। ठीक ही कह रहे हैं, लेकिन जिस भाषा में कह रहे हैं वह बिलकुल गलत है। और उनकी भाषा के कारण दूसरों के सामने महावीर का, या उनके गुरु का परमात्म- रूप तो प्रगट नहीं होता, उनका ऐतिहासिक रूप तक संदिग्ध हो जाता है।
गुरु बड़ी भारी विरोधाभासी अवस्था है, अगर बुद्धि से देखा तो आदमी जैसा, अगर हृदय से देखा तो परमात्मा जैसा। इसलिए श्रद्धा की आंख हो जो गुरु परमात्मा से जोड़ने का कारण हो जाता है।
ओशो
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