मैं एक यहूदी कहानी पढ़ रहा था। एक का व्यक्ति परमात्मा से प्रार्थना कर
रहा था। उसने कहा कि मेरा अ नामक पड़ोसी बहुत गरीब है, पिछले साल भी मैंने
आपसे उसके लिए प्रार्थना की थी, लेकिन आपने कुछ नहीं किया। और उसने कहा कि
मेरा दूसरा पड़ोसी ब अपंग है। और बीते वर्ष में मैंने उसके लिए भी आपसे
प्रार्थना की थी और उसके लिए भी आपने कुछ नहीं किया। और इस प्रकार वह
गिनाता चला गया। उसने अपने सभी पड़ोसियों की चर्चा की और अंत में कहा. अब
मैं इस वर्ष भी प्रार्थना करूंगा। अगर आप मुझे क्षमा कर दें तो मैं भी आपको
क्षमा कर सकता हूं।
लेकिन वह आदमी अपने से ही बातें कर रहा था। परमात्मा से की गई सब बातचीत एकालाप है, वहां दूसरा कोई नहीं है। तो यह तुम्हारी अपनी मर्जी की बात है। तुम क्या करते हो, उसके तुम मालिक हो।
यही कारण है कि तंत्र में जीवित गुरु के प्रति समर्पण पर इतना जोर दिया जाता है, क्योंकि तब तुम्हारा अहंकार चूर-चूर हो जाता है। और अहंकार का विसर्जन ही आधार है। वही आधार है और तभी उससे कुछ संभव है।
लेकिन मुझसे यह मत पूछो कि समर्पण कैसे करें? तुम कुछ नहीं कर सकते। या तुम सिर्फ एक चीज कर सकते हो : इसके प्रति जागरूक हो जाओ कि करके भी मैं क्या कर सकता हूं! करके मैंने क्या पाया! अपने करने के प्रति जागरूक बनो। तुमने बहुत कुछ पाया है, तुमने बहुत दुख पाया है, तुमने बहुत संताप पाया है। तुमने अपने करने से यही पाया है। और यही है जिसे अहंकार पा सकता है। इसके प्रति सजग होओ। तुमने जो दुख, समर्पण किए बिना, सक्रिय रूप से, विधायक रूप से अर्जित किया है, उसके प्रति होशपूर्ण बनो। तुमने अपने जीवन के साथ जो किया है, उसके प्रति जागरूक बनो।
यही बोध एक दिन इन चीजों को कचरेघर में फेंकने में और समर्पण करने में तुम्हें सहयोगी होगा। और स्मरण रहे, तुम किसी गुरु के प्रति समर्पण से रूपांतरित नहीं होते, समर्पण से रूपांतरित होते हो। गुरु प्रासंगिक नहीं है, वह सवाल नहीं है।
बहुत लोग मेरे पास आकर कहते हैं कि हम समर्पण करना चाहते हैं, लेकिन किसके प्रति समर्पण करें? वह बात ही नहीं है, तुम तब बात ही चूक गए। प्रश्न यह नहीं है कि किसको समर्पण करें। समर्पण करने से ही बात बन जाती है। किसके प्रति समर्पण किया, वह व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है। संभव है वहां कोई व्यक्ति न हो, संभव है वह व्यक्ति प्रामाणिक न हो, ज्ञानोपलब्ध न हो। यह भी संभव है कि वह कोई बदमाश हो।
लेकिन यह बात प्रासगिकनहीं है। तुमने समर्पण किया, यही बात सहयोगी है। क्योंकि अब तुम खुले हो, ग्राहक हो, संवेदनशील हो। अब तुम स्त्रैण हो गए। पुरुष अहंकार जाता रहा और अब तुम स्त्रैण गर्भ बन गए।
जिस व्यक्ति के प्रति तुमने समर्पण किया, वह धोखेबाज भी हो सकता है। वह महत्वपूर्ण ही नहीं है। महत्वपूर्ण यह हे कि तुमने समर्पण किया। अब तुम्हें कुछ घटित हो सकता है। अनेक बार ऐसा हुआ है कि नकली गुरुओं के साथ रहकर भी शिष्य ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि झूठे गुरुओं के साथ रहकर भी शिष्य बुद्धत्व को उपलब्ध हो गए हैं।
तंत्र सूत्र
ओशो
लेकिन वह आदमी अपने से ही बातें कर रहा था। परमात्मा से की गई सब बातचीत एकालाप है, वहां दूसरा कोई नहीं है। तो यह तुम्हारी अपनी मर्जी की बात है। तुम क्या करते हो, उसके तुम मालिक हो।
यही कारण है कि तंत्र में जीवित गुरु के प्रति समर्पण पर इतना जोर दिया जाता है, क्योंकि तब तुम्हारा अहंकार चूर-चूर हो जाता है। और अहंकार का विसर्जन ही आधार है। वही आधार है और तभी उससे कुछ संभव है।
लेकिन मुझसे यह मत पूछो कि समर्पण कैसे करें? तुम कुछ नहीं कर सकते। या तुम सिर्फ एक चीज कर सकते हो : इसके प्रति जागरूक हो जाओ कि करके भी मैं क्या कर सकता हूं! करके मैंने क्या पाया! अपने करने के प्रति जागरूक बनो। तुमने बहुत कुछ पाया है, तुमने बहुत दुख पाया है, तुमने बहुत संताप पाया है। तुमने अपने करने से यही पाया है। और यही है जिसे अहंकार पा सकता है। इसके प्रति सजग होओ। तुमने जो दुख, समर्पण किए बिना, सक्रिय रूप से, विधायक रूप से अर्जित किया है, उसके प्रति होशपूर्ण बनो। तुमने अपने जीवन के साथ जो किया है, उसके प्रति जागरूक बनो।
यही बोध एक दिन इन चीजों को कचरेघर में फेंकने में और समर्पण करने में तुम्हें सहयोगी होगा। और स्मरण रहे, तुम किसी गुरु के प्रति समर्पण से रूपांतरित नहीं होते, समर्पण से रूपांतरित होते हो। गुरु प्रासंगिक नहीं है, वह सवाल नहीं है।
बहुत लोग मेरे पास आकर कहते हैं कि हम समर्पण करना चाहते हैं, लेकिन किसके प्रति समर्पण करें? वह बात ही नहीं है, तुम तब बात ही चूक गए। प्रश्न यह नहीं है कि किसको समर्पण करें। समर्पण करने से ही बात बन जाती है। किसके प्रति समर्पण किया, वह व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है। संभव है वहां कोई व्यक्ति न हो, संभव है वह व्यक्ति प्रामाणिक न हो, ज्ञानोपलब्ध न हो। यह भी संभव है कि वह कोई बदमाश हो।
लेकिन यह बात प्रासगिकनहीं है। तुमने समर्पण किया, यही बात सहयोगी है। क्योंकि अब तुम खुले हो, ग्राहक हो, संवेदनशील हो। अब तुम स्त्रैण हो गए। पुरुष अहंकार जाता रहा और अब तुम स्त्रैण गर्भ बन गए।
जिस व्यक्ति के प्रति तुमने समर्पण किया, वह धोखेबाज भी हो सकता है। वह महत्वपूर्ण ही नहीं है। महत्वपूर्ण यह हे कि तुमने समर्पण किया। अब तुम्हें कुछ घटित हो सकता है। अनेक बार ऐसा हुआ है कि नकली गुरुओं के साथ रहकर भी शिष्य ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं। तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि झूठे गुरुओं के साथ रहकर भी शिष्य बुद्धत्व को उपलब्ध हो गए हैं।
तंत्र सूत्र
ओशो
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