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Friday, June 9, 2017

संदेह मित्र है



मैं आपसे निवेदन करता हूं, ऐसी शांति झूठी होगी, जो संदेह को दबा कर लाई जाती है। शांति तो वह सच्ची है, जो संदेह के पूरे प्रयोग से आती है। उस शांति को तोड़ने के लिए फिर संदेह कभी वापस नहीं लौटता। वह हमेशा के लिए चला गया होता है।

संदेह तो मित्र है। जब तक ज्ञान का आलोक न आ जाए, तब तक संदेह साथी की तरह ज्ञान की यात्रा पर ले जाता है। संदेह तो मित्र है, जो कहता है, ज्ञान की तरफ चलो। और जब आप किसी विश्वास को पकड़ते हैं, तो वह कहता है, मत पकड़ो। यह तो विश्वास है, यह आपका जानना नहीं है। यह संदिग्ध है। लेकिन मित्र को आप इनकार करते हैं और विश्वास को पकड़ते हैं। विश्वास शत्रु है, क्योंकि वह ज्ञान तक जाने से रोकता है। संदेह मित्र है, क्योंकि वह यह कहता है कि ज्ञान के पहले किसी बात को मानने को मैं राजी नहीं हूं। लेकिन हजारों वर्ष की शिक्षा का यह परिणाम हुआ है कि संदेह मित्र नहीं मालूम होता है और विश्वास मित्र मालूम होता है।

विश्वास तो जहर है, नशा है। संदेह तो बड़ा मित्र है। वह तो यह कहता है, कि मानना मत, जब तक तुम न जान लो। वह तो उसी समय शांत होगा, जब मैं जान लूंगा। उस वक्त संदेह कहेगा, ठीक है, आ गई मंजिल। अब मैं विदा होता हूं। अब मेरा काम समाप्त हो गया। तुम वहां पहुंच गए, जहां असंदिग्ध कुछ उपलब्ध हो गया है, जिस पर संदेह नहीं किया जा सकता है।

तो संदेह तो निरंतर साथ देना चाहता है और आप कहते हैं, तकलीफ दे रहा है! तकलीफ देगा तभी, जब आपने विश्वास पकड़ लिए होंगे। कृपा करें, विश्वासों को छोड़ दें। संदेह के साथी हो जाएं। खोजें, खोजें! उस दिन तक संदेह का साथ जरूरी है, जब तक कि संदेह खुद कहे कि बस आ गया है मुकाम, अब यहां मेरा कोई भी काम नहीं है। अब वह चीज आपने जान ली है, जिसको आप मानते थे, तो मैं खड़ा हो जाता था और संदेह करता था कि नहीं, अभी मानना मत। अब तो वह जगह आ गई है, जहां मेरी कोई जरूरत नहीं। अब आप जानते हैं, मानना जब तक होता है, तब तक संदेह खड़ा होता रहता है। जिस दिन जानना आ जाता है, उस दिन संदेह विलीन हो जाता है।

तो संदेह कष्ट नहीं दे रहा है। कष्ट दे रहे हैं आपके विश्वास। संदेह बढ़ता है, तो विश्वास की नींव डगमगा जाती है। तो हमारे प्राण कंपते हैं। कि सारा जीवन हमने विश्वास पर खड़ा किया हुआ है। संदेह से घबड़ाएं न। अगर ज्ञान की यात्रा पर ही जाना है, तो संदेह की नौका पर ही वह यात्रा करनी होगी। जो ठीक से संदेह करना सीख लेता है, वह ठीक से यात्रा करना सीख जाता है।

माटी कहे कुम्हार सूं 

ओशो

जिसे हम जीवन जानते हैं, वह जीवन नहीं है



एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा को मैं प्रारंभ करना चाहूंगा। बहुत बार उस कहानी को देश के कोने-कोने में अनेक-अनेक लोगों से कहा है। फिर भी मेरा मन नहीं भरता और मुझे लगता है उसमें कुछ बात है जो सभी को खयाल में आ जानी चाहिए।

जीसस क्राइस्ट यात्रा पर थे। जो उन्हें मिला था उसे लुटाने की यात्रा पर थे। और आनंद का स्वभाव है कि वह मिल जाए तो उसे लुटाना अनिवार्य हो जाता है। दुख मनुष्य को सिकोड़ता है और आनंद मनुष्य को फैला देता है। दुख में मनुष्य चाहता है, मैं अपने में बंद हो जाऊं; और आनंद में मनुष्य चाहता है, मैं सब तक पहुंच जाऊं और सब तक फैल जाऊं। इसीलिए आनंद को ब्रह्म कहा है। दुख अहंकार की अंतिम सीमा है; आनंद निर-अहंकारिता की, ब्रह्म होने की। 

शायद आपने खयाल किया हो, महावीर और बुद्ध या क्राइस्ट जब दुख में हैं, तब वे जंगल में भाग गए हैं; और जब उन्हें आनंद उपलब्ध हुआ है, वे बस्ती में वापस लौट आए हैं। आनंद बंटना चाहता है, दुख सिकुड़ना चाहता है। दुख अपने में बंद होना चाहता है, आनंद दूसरे तक फैलना चाहता है।
क्राइस्ट को जब आनंद उपलब्ध हुआ, वे उसे बांटने की यात्रा पर निकल गए। वे एक गांव में पहुंचे। सुबह-सुबह ही उस गांव को वे पार करते थे--एक झील के किनारे उन्होंने एक मछुए को मछली मारते देखा। उसने अपना जाल फेंका था और मछलियों की प्रतीक्षा करता था। उसे पता भी नहीं था कि पीछे से कौन गुजरता है। क्राइस्ट ने जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा और उससे कहा, मित्र, मेरी ओर देखो! कब तक मछलियां ही मारते रहोगे

और जो क्राइस्ट ने उससे कहा, मैं हरेक आदमी के कंधे पर हाथ रख कर मेरा भी मन होता है कि पूछूं कि कब तक मछलियां ही मारते रहोगे? इससे क्या फर्क पड़ता है कि रोटियां मार रहे हैं या मछलियां मार रहे हैं! सब मछलियां मारना है। जीवन अधिक लोगों का मछलियां मारने में ही नष्ट हो जाता है। 

क्राइस्ट ने उससे पूछा कि कब तक मछलियां मारते रहोगे

उसने लौट कर देखा, एक झील सामने थी और पीछे इस आदमी की आंखें थीं जो झील से भी ज्यादा गहरी थीं। उसने सोचा कि अब इस जाल को वहीं फेंक दूं और इन आंखों में एक जाल को फेंकूं। उसने जाल वहीं फेंक दिया और क्राइस्ट के पीछे हो लिया। उसने कहा, मैं साथ चलता हूं। अगर कुछ और पकड़ा जा सकता है, उसे पकड़ने को मैं तैयार हूं। यह जाल यहीं फेंक दिया, ये मछलियां यहीं छोड़ दीं। 

जिसे धर्म की खोज करनी हो, उसे इतना साहस होना चाहिए कि समय पड़े तो जाल को और मछलियों को फेंक दे।

वह क्राइस्ट के पीछे गया। वे गांव के बाहर भी नहीं निकल पाए, एक आदमी ने आकर उस मछुए को खबर दी कि तुम कहां जा रहे हो? तुम्हारे पिता जो बीमार थे, उनकी रात्रि में मृत्यु हो गई। अभी-अभी वे समाप्त हो गए हैं। लौटो, हम तुम्हें खोजते हुए सब तरफ घूम आए हैं! 

वह युवा मछुआ क्राइस्ट से बोला, क्षमा करें, मैं जाऊं और अपने पिता का अंतिम संस्कार करके दो-चार दिन में वापस लौट आऊंगा। 

क्राइस्ट ने उसका हाथ पकड़ा और उससे कहा, तुम तो मेरे पीछे आओ। एंड लेट दि डेड बरी देयर डेड। और वे जो गांव के मुर्दे हैं, वे मुर्दे को दफना लेंगे। तुम मेरे पीछे आओ। क्राइस्ट ने कहा, वे जो गांव में बहुत मुर्दे हैं, वे मुर्दे को दफना लेंगे। तुम्हें जाने की कौन सी जरूरत है

बहुत ही अजीब बात उन्होंने कही और बहुत अर्थपूर्ण भी। निश्चित ही जिन्हें अभी जीवन का पता नहीं है, वे मृत ही हैं। और हमें जीवन का कोई भी पता नहीं है। जिसे हम जीवन कहते हैं, वह तो क्रमिक मृत्यु का ही नाम है। वह वस्तुतः जीवन नहीं है। हम जिस दिन पैदा होते हैं और जिस दिन हम मर जाते हैं, इन दोनों के बीच में जो फैला हुआ है, वह जीवन नहीं है, वह तो धीमे-धीमे मरते जाने का नाम है। हम रोज मरते जा रहे हैं। जिसे हम जीवन कह रहे हैं, वह रोज मरते जाना है। वह ग्रेजुअल डेथ है। 

अमृत की दशा 

ओशो

ध्यान का दीया

मुल्ला नसरुद्दीन कल मुझसे कह रहा था: चंद्रलोक से उतरी एक अनोखी चीज मैंने आज शाम अपनी खिड़की से देखी। नीला और नारंगी रंग, धीमी चाल और उसके अंदर ढेरों छोटे-छोटे आदमी! 

मैंने मुल्ला नसरुद्दीन से कहा कि बड़े मियां, सरे-शाम इतनी मत पी लिया करो। वह स्कूल के बच्चों की बस थी जिसे तुमने देखा है। वह कोई चांद से उतरी हुई चीज नहीं थी, कोई उड़नतश्करी नहीं थी। और वे जो छोटे-छोटे आदमी तुमने देखे, वे स्कूल के बच्चे थे। 

लेकिन आदमी नशे में हो तो कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। आदमी नशे में हो तो वही नहीं दिखाई पड़ता जैसा है। और गाली तुम शराब को दोगे! या कि तुमने पी? शराब अपने आप तुम्हारे कंठ में नहीं उतर जाती। कोई जबरदस्ती शराब तुम्हारे कंठ में नहीं उतर जाती। शराब तुमसे कहती नहीं कि आओ और मुझे पीओ। तुम पीते हो, तो बेहोश होते हो।

मुल्ला नसरुद्दीन एक रात पीकर लौटा है। एक बिजली के खंभे के नीचे खड़े होकर खंभे को बजा रहा है। एक सिपाही देख रहा है। थोड़ी देर बाद उसे दया आई और उसने कहा कि बड़े मियां, यह क्या कर रहे हो

मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, देखते नहीं क्या कर रहा हूं? अपने घर के दरवाजे पर दस्तक कर रहा हूं। पत्नी उठ आए, शायद सो गई हो, तो दरवाजा खोले। 

सिपाही हंसा, उसने कहा कि बड़े मियां, यह घर नहीं है, जरा गौर से तो देखो! 

तो उसने कहा, तुम किसी और को बनाना। गौर से देख रहा हूं, ऊपर अभी मंजिल का दीया जल रहा है। पत्नी सो भला गई हो, मगर अभी दीया जला हुआ है।

एक और रात घर लौटा, ज्यादा पीए हुए। चाबी ताले में डालना चाहता है, मगर हाथ कंप रहे हैं, चाबी ताले में जाती नहीं। राहगीर कोई देखा, पास आया और कहा, बड़े मियां, लाओ चाबी मुझे दो, मैं खोल दूं। 

मुल्ला ने कहा कि चाबी तो मैं ही डाल दूंगा, तुम जरा इतना करो, यह कंपते हुए मकान को सम्हाल लो। 

बेहोश आदमी की एक अलग दुनिया है। और हम सब बेहोश हैं तब तक जब तक ध्यान का दीया न जले।

प्रेम पंथ ऐसो कठिन 

ओशो

मैं क्या करूं? मेरो मन बड़ो हरामी!




संत! तुम पुराने संतों जैसी ही बात कह रहे हो। मेरो मन बड़ो हरामी! 

मन को गाली न दो! मन का उपयोग करना सीखो। मन एक बहुमूल्य यंत्र है। इससे अदभुत कोई यंत्र नहीं। मन परमात्मा की परम भेंट है तुम्हें। इसी मन से तुम चाहो तो संसार में उलझ जाओ और इसी मन से तुम चाहो तो संसार से सुलझ जाओ। इसी मन से तुम चाहो तो नरक की सीढ़ियों में उतर जाओ और इसी मन से तुम चाहो तो स्वर्ग तुम्हारा है। इसको हरामी न कहो! मन तुम्हें नहीं भटकाता, तुम भटकना चाहते हो, मन संगी-साथी हो जाता है। मन तुम्हारा नौकर है, तुम्हारा चाकर है। तुम चोरी करो तो मन चोरी के उपाय बताने लगता है और तुम भजन गाओ तो मन भजन निर्माण करने लगता है। पूजा करो तो मन अर्चना बन जाता है, पाप करो तो मन पाप बन जाता है। लेकिन मनुष्य की एक बहुत आधारभूत आदत है: दोष किसी पर डालना; दोष अपने पर नहीं लेना।

अब देखो संत, तुम कहते हो: "मैं क्या करूं?' 

तुमने अपने को अलग कर लिया। 

"मेरो मन बड़ो हरामी!

मन पर सब छोड़ दिया, कि मन है हरामी; मैं तो भला आदमी, मगर यह मन मुझे भटकाता है। तुमने मन से अपने को तोड़ लिया। तुमने मन पर दायित्व छोड़ दिया। यह तो हमारी तरकीब है। और इन्हीं तरकीबों के कारण तो हम उठ नहीं पाते, जग नहीं पाते। 

आदमी की आदत है: किसी न किसी पर दोष दे दे। कोई कहता है, भाग्य ही ऐसा है, क्या करें? कोई कहता है, परमात्मा ने ऐसा बनाया, हम क्या करें? कोई कहता है, मनुष्य तो प्रकृति के अधिकार में बंधा है। कार्ल माक्र्स कहता है कि मनुष्य तो समाज की व्यवस्था में जकड़ा है, क्या कर सकता है? सिगमंड फ्रायड कहता है कि मनुष्य तो अचेतन वृत्तियों के जाल में उलझा है, क्या कर सकता है? लेकिन सबकी बात का अर्थ एक ही है कि तुम जैसे हो, बस ऐसे ही रहोगे, कुछ हो नहीं सकता। क्योंकि दोष तुम्हारा है ही नहीं, दोष किसी और का है। उसको तुम नाम कुछ भी दे दो--अ ब स, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता।

मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूं: मन तुम्हें नहीं भटकाता; तुम भटकना चाहते हो तो मन तुम्हें साथ देता है। तुम न भटकना चाहो तो मन तुम्हें उसमें साथ देगा। मन तो बड़ा प्यारा सेवक है। तुम क्रोध करना चाहो, मन क्रोध करता है। तुम करुणा करना चाहो, मन करुणा करता है। मन तो तुम्हारे पीछे चलता है। तुम उलटी बातें कर रहे हो। 

तुम कहते हो, मैं क्या करूं, यह छाया मुझे गलत जगह ले जाती है। छाया तुम्हारी है। तुम जहां जाते हो, वहां जाती है। लेकिन गाली तुम छाया को देते हो, कि मैं क्या करूं, यह छाया मुझे कल वेश्यागृह ले गई। माने ही न! बस एकदम वेश्यागृह की तरफ चलने लगी।

छाया तुम्हें वेश्यागृह ले जा सकती है? तुम गए वेश्यागृह, तो छाया को जाना पड़ा। तुम मंदिर गए होते, तो छाया मंदिर गई होती। मन तो तुम्हारी छाया है।

मैं तुम्हारी इस बात में सहयोग नहीं दे सकता। तुम अभी सोए हो, तुम अभी मूर्च्छित हो, इसलिए मन तुम्हें तुम्हारी मूर्च्छा में सहयोग देता है। तुम जरा जागो! मेरे पास भी मन है, मैं उसका उतना ही उपयोग कर रहा हूं जितना तुम--शायद उससे ज्यादा। बुद्ध के पास भी मन है। बुद्धत्व हो जाने के बाद, बयालीस साल तक निरंतर बुद्ध बोलते रहे। बिना मन के कैसे बोलेंगे? बिना मन के कौन बोलेगा? समझाते रहे; गांव-गांव, गली-गली, द्वारे-द्वारे दस्तक देते रहे। बिना मन के यह कौन करेगा? महावीर भी ज्ञानोपलब्धि के बाद चालीस वर्ष तक पहुंचाते रहे संदेश। बिना मन के कौन यह करेगा?

मन गालियां ही नहीं देता, गीत भी गाता है। अगर तुम गालियां ही गा रहे हो तो मन को गाली मत दो। मन तो अवश है। मन तो विवश है। मन तो तुम्हारा है। लेकिन हम एक चालबाजी कर लेते हैं, हम अपने को अलग कर लेते हैं। हम कहते हैं, हम तो अलग, हम तो बिलकुल दूध-धोए, और यह मन हरामी! यह कहता है ऐसा करो, तो करना पड़ता है। 

बात ऐसी नहीं है। जरा होश में आओ! जरा गौर से देखो! तुम मालिक हो, मन गुलाम है। तुम चूंकि मालिक की तरह सोए हुए हो, इसलिए मन भी करे तो क्या करे, वह तुम्हारा मालिक बन बैठा है। तुमने उसे मालिक बना दिया है। तुमने ही सोए रह कर उसे मालिक बना दिया है। तुम नौकर पर इतने निर्भर हो गए हो कि तुम नौकर से ही पूछते हो कि कहां जाएं? क्या करें?

प्रेम पंथ ऐसो कठिन 

ओशो 

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